संतुलन ही स्वास्थ्य का मूलाधार

आत्मा ही स्वास्थ्य का मूलाधार

स्वास्थ्य का सम्यक् दर्शन-

सम्यक् दर्शन का सीधा-सादा सरल अर्थ होता है। सही दृष्टि, सत्य दृष्टि, सही विश्वास। अर्थात् जो वस्तु जैसी है, जितनी महत्त्वपूर्ण है, जितनी उपयोगी है, उसको उसके स्वरूप, गुण एवं धर्म के आधार पर जानना, मानना और उसके अनुरूप आचरण करना। सम्यक्  दर्शन से स्वविवेक जाग्रत होता है। स्वदोष दर्शन की प्रवृत्ति विकसित होती है। आत्मा और शरीर का भेद ज्ञान होता है। आत्मा का साक्षात्कार होने से उसकी अनन्त शक्ति का भान होने लगता है।

सम्यक् दर्शन होने पर व्यक्ति में पूर्वाग्रह एवं एकान्तवादी दृष्टिकोण समाप्त होने लगेगा। रोग में रोगी स्वयं की भूमिका ढूँढेगा एवं रोग के कारणों से बचने हेतु सजग एवं सक्रिय रहेगा। रोग होने की स्थिति में उसके लिए दूसरों को दोष देने के बजाय, स्वयं की गलतियों को ही रोग का कारण मानेगा तथा धैर्य और सहनशीलता पूर्वक उसका उपचार करेगा। उपचार कराते समय तात्कालिक राहत से प्रभावित नहीं होगा, दुष्प्रभावों की उपेक्षा नहीं करेगा। उपचार कराते समय उसमें काम में लिए जाने वाले साधन, सामग्री की पवित्रता का ध्यान रखेगा। अपने उपचार हेतु अन्य प्राणियों के साथ प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से हिंसा, क्रूरता, निर्दयता का आचरण न तो स्वयं करेगा, न करवाएगा और न करने वालों को प्रोत्साहन देगा। यथार्थ दृष्टिकोण जीवन निर्माण की सबसे प्राथमिक आवश्यकता हैं। व्यक्ति की जैसी सोच, दृष्टि होगी वैसे ही उसके जीवन की सृष्टि होगी। सम्यक् दर्शन जीवन का प्राण है क्योंकि इसी से जीवन को सही दृष्टि प्राप्त होती है।

स्वास्थ्य हेतु सम्यक् आचरण आवश्यक-

परन्तु आजकल अधिकांश व्यक्ति अपना सारा चिन्तन और प्रयास शारीरिक स्वास्थ्य तक ही सीमित रखते हैं। जब तक शरीर में दर्द अथवा बैचेनी, कमजोरी अथवा निष्क्रियता के लक्षण स्पष्ट रूप से प्रकट नहीं हो जाते तब तक अपने आपको पूर्ण स्वस्थ ही समझते हैं। आत्मा के विकार जो रोग उत्पन्न करने में प्रभावशाली भूमिका रखते हैं, उनकी पूर्ण उपेक्षा कर स्वस्थ रहने की कल्पना करते हैं, जो कभी भी सम्भव नहीं है।

आत्मा ही जीवन है-

हमारे जीवन का प्रारम्भ और अन्त शरीर में आत्मा की उपस्थिति पर निर्भर करता है। मृत्यु के पश्चात् शरीर से ऐसा कौनसा तत्त्व है, जिसके निकल जाने के पश्चात् इस अचेतन शरीर का कोई मूल्य नहीं होता? मृत्यु के पश्चात् भी शरीर में प्रत्यक्ष रूप में सभी अंगों, उपांगों, भौतिक इन्द्रियों की उपस्थिति होने के बावजूद सभी क्यों निष्क्रिय हो जाते हैं? इस नश्वर शरीर को मृत्यु के पश्चात शीघ्रातिशीघ्र जलाकर या दफनाकर अथवा अन्य किसी विधि द्वारा नष्ट करना ही क्यों श्रेयश्कर होता है? मृत्यु के पश्चात् डाॅक्टरों की विश्वासपात्र, प्राणदायिनी आक्सीजन, रक्त, जीवन रक्षक दवा और इंजेक्क्षन, जड़ी बूटिया, यंत्र, तंत्र, मंत्र, यौगिक क्रियाएँ एवं लम्बे-चौड़े दावे करने वाले डाॅक्टर और चिकित्साएँ क्यों प्रभावहीन हो जाते हैं? इसका अभिप्राय यही है कि जीवन के लिए आवश्यक दवा, पानी, भोजन, धूप आदि प्राकृतिक ऊर्जाओं तथा उपचार के अन्य साधन शरीर में जब तक आत्मा होती है, जीवन संचालन में सहयोगी मात्र होते हैं। तभी तक उनका जीवन संचालन में सहयोग होता है।

अतः आत्मा ही जीवन का आधार होती है। फलतः हमें जानना और समझना होगा कि आत्मा क्या है? जन्म से पूर्व और मृत्यु के पश्चात् उसका क्या अस्तित्व होता है? उसमें कितनी शक्ति होती है? जन्म और मृत्यु का चक्र क्यों चलता है? आत्मा को प्रभावित करने वाले प्रमुख तत्त्व कौनसे होते हैं? इसकी ऊर्जा क्यों क्षीण अथवा निष्क्रिय हो जाती है तथा उसको कैसे बढ़ाया जा सकता है? शरीर, मन,  मस्तिष्क, भाव, वाणी आदि का व्यवस्थित निर्माण कौन और कैसे करता है? सभी व्यक्तियों का रंग, रूप, आकार में एकरूपता क्यों नहीं होती? सभी को संयोग-वियोग, प्रतिकूलताएँ-अनुकूलताएँ, सुख-दुःख का अलग-अलग वातवारण क्यों मिलता है? उनका नियंत्रण कौन और कैसे करता है? कोई जन्म से ही विकलांग अथवा रोगग्रस्त क्यों होता है? इन सभी प्रश्नों का समाधान आत्मा और शरीर के भेद को समझने से मिल जाता है। आत्मा और शरीर में कौन ज्यादा महत्त्वपूर्ण है, शक्तिशाली है, उपयोगी है, सनातन है, अपना है अथवा पराया है, आसानी से समझा जा सकता है।

आत्मा क्या है?

आत्मा जीव का पर्यायवाची शब्द है। आत्मा का लक्षण चेतना और उपयोग है। यह सभी आत्माओं में पाया जाता है। सामान्य चैतन्य की दृष्टि से सभी आत्माएँ समान होती हैं, परन्तु आत्म-चेतना का विकास सब में एक-जैसा नहीं होता। आत्मा कर्मो से आवृत्त होने के कारण अपवित्र, अशुद्ध या विकारग्रस्त हो जाती है। जितने गहरे कर्म और उनका आवरण, उतनी ही चेतना अचेतन अवस्था में होती है। जो आत्माएँ कर्म रज को हटाकर पूर्ण उज्जवल बन जाती है, उसे मुक्तात्मा अथवा सिद्धात्मा कहते हैं। परन्तु आत्मा कर्मो से जब तक आवृत्त रहती है, संसार में विभिन्न योनियों में परिभ्रमण कर जन्म और मृत्यु के बीच का समय व्यतीत करती है ऐसी आत्माएँ संसारी आत्माएँ कहलाती है। मृत्यु शरीर और आत्मा की भेद रेखा है। मृत्यु के पश्चात् वह शरीर से अलग हो जाता है, जिसके अभाव में शरीर निष्क्रिय हो जाता है।

आत्मा ही स्वास्थ्य का मूलाधार-

स्वास्थ्य विज्ञान का मूलाधार आत्मा है। प्रत्येक जीव जीना चाहता है, मरना कोई नहीं चाहता। प्रत्येक जीव स्वाधीन, स्वतंत्र रहना चाहता है। पराधीनता, परावलम्बन और बन्धन उसे पसन्द नहीं। तीसरी बात प्रत्येक जीव शान्त, सुखी और स्वस्थ रहना चाहता है। संसार का यह सनातन सिद्धान्त है। जितना-जितना इन सनातन नियमों के पालन में सद् आचरण, सम्यक् चिन्तन द्वारा प्रत्यक्ष परोक्ष रूप से सहयोग किया जाएगा उतना-उतना पुण्य अथवा शुभ कर्मों का उपार्जन होगा। इसके विपरीत इन सिद्धान्तों की पालना में जितना व्यवधान डाला जाएगा, अवरोध पैदा किया जाएगा, उतना-उतना अशुभ कर्मो का या पाप का उपार्जन होता जायेगा। जो पाप से डरेगा, वह पाप से बचेगा। अतः हमारा जीवन पाप और पुण्य, शुभ और अशुभ कर्मो से प्रभावित होता है। जब जीवन में पाप का पलड़ा भारी हो जाता है अथवा अशुभ कर्मो का उदय होता है तो हमारे प्रतिकूल परिस्थितियाँ, वियोग, दुःख पीड़ा, तनाव, रोग आदि के प्रसंग बनते है। अतः स्वस्थ रहने के लिए अशुभ कर्म के बन्धनों के कारणों को समझ उनसे बचने का यथा सम्भव प्रयास करना चाहिए।

आत्मा का अस्तित्व-

आत्मा अरूपी है। वर्ण, गन्ध, रस, शब्द, स्पर्श रहित है। अतः इन्द्रियों के द्वारा उसकी क्षमताओं का पूर्ण ज्ञान नहीं किया जा सकता। इन्द्रिय ज्ञान का विषय केवल दृश्य-जगत तक ही सीमित होता है। इसी कारण इन्द्रिय ज्ञान को ही सब कुछ मानने वाले आत्मा के अस्तित्व को नहीं मानते। इन्द्रिय ज्ञान भौतिक साधनों की अपेक्षा रखता है। साधन जितने शक्तिशाली होंगे, अच्छे और प्रबल होंगे, ज्ञान उतना ही स्पष्ट होगा। जिन दूरस्थ सूक्ष्म पदार्थो को हम साधारणतया अपनी आँखों से नहीं देख सकते, उनको यंत्रों की सहायता से देखा जा सकता है तथा जिन्हें यंत्रों की सहायता से भी नहीं देख सकते, उनको आत्मिक ज्ञान का विकास होने पर देख सकते हैं। जैसे स्मृति होने पर अप्रत्यक्ष पूर्वघटित घटनाओं को प्रायः हम देखते हैं।

इन्द्रियों से पदार्थो का बाहरी ज्ञान ही हो सकता है। यंत्र चाहे जितना शक्तिशाली क्यों न हो, हम इन्द्रिय ज्ञान से परे की वस्तु को नहीं पहचान सकते? अतः हम चाहे कितना ही समय या शक्ति क्यों न लगा दें, हम आधुनिक विकसित यंत्रों से पदार्थो के असली स्वरूप का पूर्ण रूप से पता नहीं लगा सकते। यंत्रों द्वारा प्राप्त आज का ज्ञान कल अज्ञान में परिणित हो सकता है। भूतकाल का ज्ञान चन्द बातों में आज गलत प्रमाणित हो चुका है और आज का भौतिक ज्ञान भविष्य में अज्ञान समझा जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। आत्मिक बल को भौतिक यंत्रों से नहीं मापा जा सकता। आत्मानुभूतियाँ स्वयं अपने आप में उसके अस्तित्व का बोध कराती है। जिन्हें भौतिक परीक्षणों अथवा प्रयोगों के द्वारा पूर्ण रूप से जानना सम्भव नहीं। सत्य की ताकत सत्य बोलने वाला ही जान सकता है। सत्य बोलने  वालों के मन में कितनी शान्ति एवं निर्भयता मिलती है, उसका अनुभव तो सत्य बोलने वाला ही कर सकता है। युद्ध में हजारों योद्धाओं को जीतने वाला वीर अपने आपको क्यों नहीं जीत पाता? आत्मबल भाषण, लेखन अथवा अभिव्यक्ति का विषय नहीं होता। पानी पीने से प्यास बुझती है। अतः जनसाधारण को यह जानने की आवश्यकता नहीं कि पानी पीने से प्यास क्यों बुझती है? अनुभव द्वारा आत्मा के अस्तित्व का बोध किया जा सकता है। जैसे हम हवा को नहीं देख सकते, फिर भी स्पर्श के द्वारा उसका बोध होता है। उसी प्रकार अनुभव एवं ज्ञान गुण से आत्मा की प्रतीति की जा सकती है।

एक अंधेरे कमरे में परदे पर सिनेमा के चित्र दिखाए जा रहे है। हम उन चित्रों को अच्छी तरह से देख रहे है। किसी ने उस कमरे की खिड़कियाँ और दरवाजे खोल दिए और उसके कारण यदि परदे पर सूर्य का प्रकाश पड़ने लग जाए तो हमें पर्दे पर वे चित्र दिखना बंद हो जाएंगे। चित्र अब भी परदे पर है, परन्तु हम उन्हें नहीं देख सकते। इस स्थिति में क्या हम परदे पर चित्रों के अस्तित्व को नकार सकते है? कभी नहीं। इसी प्रकार हमारे पूर्व जन्म की घटनाएँ हमारी आत्मा के साथ होती है, परन्तु हम उसके सम्बन्ध के बारे में अस्तित्व होते हुए भी नहीं जान सकते। हमारे वर्तमान के इन्द्रिय ज्ञान ने उन घटनाओं का ज्ञान रोक रखा है। अतः हम अपने इन्द्रिय ज्ञानरूपी दरवाजों और खिड़कियों को बन्द कर मानसिक एकाग्रता, आत्म-चिन्तन, ध्यान, कार्योत्सर्ग रूपी किरणों से जानने का प्रयत्न करें तो पूर्व जन्म की समस्त घटनाक्रमों का ज्ञान प्राप्त कर सकते है।

आत्मा अविनाशी है-

आत्मा शाश्वत है, अनश्वर है। शरीर की मृत्यु के पश्चात् आत्मा की मृत्यु नहीं होती। यह प्रकृति का सनातन सिद्धान्त है कि ‘‘जैसा करेगा वैसा फल मिलेगा।’’ कत्र्ता कोई हो और भोक्ता कोई दूसरा, ऐसा हो ही नहीं सकता। इस सिद्धान्त के द्वारा उस जन्म में जिन कर्मो का फल भोगना बाकी रह गया है, उसको भोगने के लिए दूसरे भव में उस आत्मा को पुनर्जन्म लेना ही पड़ेगा।

दूसरी बात, जो आत्मा बाल्यकाल में हमारे शरीर में थी, वहीं वृद्धावस्था में भी रहती है। यदि ऐसा न हो तो बाल्यकाल की घटनाएँ हमें याद ही नहीं रहेगी। जिस प्रकार वर्तमान शरीर में इतना परिवर्तन होने के बावजूद आत्मा नहीं बदलती, उसी प्रकार मरने के पश्चात् शरीर का रूपान्तरण होता है, आत्मा वही होती है।

जीव और अजीव में भेद-

व्यावहारिक रूप से जीव और अजीव में कुछ भेद स्पष्ट देखे जा सकते हैं। सजीवों में सजातीय जन्म, सजातीय वृद्धि और सजातीय उत्पादन होता है तथा विजातीय पदार्थो को ग्रहण करना और उनका उत्सर्ग करना जैसी प्रवृत्तियाँ होती है। अजीव, निर्जीव, अचेतन अथवा जड़ पदार्थो में विजातीय द्रव्य का स्वीकरण एवं परिणमन नहीं देखा जाता। कषाय (आत्मा को कलुषित करने वाली वृत्तियाँ) सजीव का कर्म कृत दोष है। मन, वचन अथवा काया का योग जीव की प्रवृत्ति में सहायक होता है। उपयोग आत्मा का लक्षण हैं। ज्ञान आत्मा का गुण है। दर्शन आत्मा की रूचि है। चारित्र जीव की निवृत्ति रूप अवस्था है। वीर्य आत्मा की ऊर्जा है। चेतना आत्मा की अभिव्यक्ति का माध्यम है।

बहुत से व्यक्ति आत्मा की तुलना श्रेष्ठतम यंत्र से करते हैं। ऐसे अनेक यंत्र हैं जो नियमित रूप से अपना-अपना काम करते हैं, परन्तु यंत्र चाहे कैसा भी अच्छा क्यों न हो न तो वह अपने सजातीय यंत्रों की देह से उत्पन्न होता है और न उत्पन्न होने के पश्चात् बढ़ता है तथा अपने जैसा किसी भी सजातीय यंत्र को उत्पन्न कर सकता है।

इस प्रकार जीव ओर अजीवों में अनेक भेद हैं। जीव का मुख्य लक्षण उसमें चेतना ही है। एक इन्द्रिय वाले जीव से लेकर पाँच इन्द्रियों वाले जीव में तथा मन सहित और अतीन्द्रिय जीव में, प्रत्यक्ष ज्ञान वाले जीव आदि में चेतना या ज्ञान की मात्रा तो तीनों ही काल में निश्चित रूप से आंशिक अथवा विकसित रूप में होती ही है। चेतना का मतलब जानने और अनुभव करने की शक्ति का होना। अनुभव रूप ज्ञान प्रत्येक आत्मा (जीव) में होता है, उसके बिना जीव का अस्तित्त्व सम्भव नहीं। जानना, अनुभव करना एवं संवेदन सभी आत्माओं में एक समान होता है। अभिव्यक्ति में, इन्द्रियों में मन के आधार पर अन्तर होता है।

अतः स्वास्थ्य विज्ञान को समझने के लिए आत्मा कर्म, नियति जैसे विषयों को जानना, समझना अनिवार्य है। यही स्वास्थ्य का आधार है। शरीर, मन और वाणी तो उसका बोध कराने वाले माध्यम हैं। आत्मा की अनुपस्थिति में न तो उनका कोई अस्तित्व होता हैं और न ही स्वास्थ्य की कोई समस्या। हमें हमारी गलतफहमियों का निराकरण करना होगा। भ्रामक विज्ञापनों पर छाए पूर्वाग्रह से प्रेरित वैज्ञानिकता के मापदण्डों को बदलना होगा।