शारीरिक क्षमता बढ़ाने वाली प्रभावशाली मुद्राएँ

शारीरिक क्षमता बढ़ाने वाली प्रभावशाली मुद्राएँ

प्रायः अधिकांश व्यक्ति बढ़ते तनाव, खान-पान में अनियमितता एवं मिलावट तथा प्रदूषित वातावरण के कारण अपनी क्षमताओं का पूर्ण सदुपयोग नहीं कर पाते। यहाँ तक जीवन के लिए सर्वाधिक आवश्यक प्राण तत्त्व श्वसन के माध्यम से पूर्ण नहीं ले पाते। इन मुद्राओं के प्रभाव से शरीर में प्राण तत्त्व बढ़ने लगता है। जिससे सभी अंग-उपांग अपनी क्षमताओं के अनुरूप कार्य करने लगते हैं।

श्वसन सुधारने वाली मुद्रा-

इस मुद्रा को सुखासन, वज्रासन, पदमासन, कुर्सी पर बैठकर या सीधा लेट कर भी कर सकते हैं। अंगूठे हथेली की ओर अन्दर करते हुए हल्के से मुट्ठियों को बंद करके, नाभी के नीचे पेट पर दोनों मुट्ठियों को हल्के से रखें। मुट्ठियों की अंगुलियाँ आमने-सामने सीधी हों, नीचे की ओर न हों। दोनों मुट्ठियों के बीच करीब दो इंच का अंतर हो।

इस मुद्रा से श्वास नाभी तक चलने लगता है, जिससे पूरे शरीर में प्राण ऊर्जा बढ़ने लगती है। अतः इस मुद्रा से श्वसन संबंधी रोग जैसे दमा, सर्दी, जुकाम में लाभ होता है। नाड़ी संस्थान बराबर कार्य करने लगता है। निद्रा अच्छी तरह से आती है। शरीर ऊर्जावान बनने लगता है। रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने लगती है।

ज्ञानेन्द्रियों के लिए प्रभावशाली मुद्रा-

इस मुद्रा को सुखासन, वज्रासन, पद्मासन, कुर्सी पर बैठकर भी किया जा सकता है। दोनों मुट्ठियाँ बंद रखें, अंगूठा अन्दर हो, अंगुलियाँ आकाश की तरफ करते हुए घुटनों पर रखें। इस मुद्रा को करने से चेहरे में प्राण तत्त्व बढ़ने लगते है। जिससे कान, नाक, आँख, मुँह एवं चेहरे संबंधी सभी रोगों में राहत मिलती है। नकारात्मक सोच दूर होती है एवं तनाव में कमी आती है। ध्यान में शीघ्र एकाग्रता आती है। अनिद्रा दूर होती है। यदि इस मुद्रा के पश्चात् ज्ञान मुद्रा की जावे तो इस मुद्रा का प्रभाव और अधिक बढ़ जाता है।

शरीर में गर्दन से छाती तक के अंगों में प्रभावी मुद्रा-

इस मुद्रा को बैठकर ही किया जा सकता है। इसमें मुट्ठियों को बंद कर खड़ी एवं अंगुलियाँ आमने-सामने रखकर घुटनों पर रखी जाती है। इस मुद्रा को करने से गर्दन से डायफ्राम तक प्राण ऊर्जा का प्रभाव बढ़ने लगता है। अतः इससे हृदय संबंधी तकलीफें, कंधे संबंधित समस्याएँ, बांहों व हाथों संबंधित समस्याएँ, गर्दन संबंधित समस्याओं से छुटकारा पाया जा सकता है। यदि इस मुद्रा के पश्चात् प्राण मुद्रा, अपान वायु मुद्रा की जायें तो इस मुद्रा का लाभ और अधिक बढ़ जाता है।

पेट एवं उसके नीचे के भागों को स्वस्थ रखने वाली मुद्रा-

इस मुद्रा को भी बैठकर ही किया जा सकता है। इसमें मुट्ठियों को बंद कर घुटनों के ऊपर उल्टा रखा जाता है अर्थात् अंगुलियाँ घुटनों की तरफ हों। इस मुद्रा को करने से चंद मिनटों के अभ्यास द्वारा पेट से संबंधित परेशानियों यानी एसी.डी.टी., पाचन संबंधी तकलीफें, पेट के रोग, डायबिटीज, लीवर, पेट व अन्य भाग में सूजन होना, हार्मोन का असंतुलन हो जाना, जनाना व मर्दाना तकलीफें होना, पीठ में दर्द होना, स्लिप डिस्क हो जाना, किडनी के विकार होना, गुप्तांगों संबंधी विकार, पैरों संबंधित विकार से छुटकारा पाया जा सकता है।

उपरोक्त चारों मुद्राएँ कभी भी, कहीं भी बिना किसी दुष्प्रभाव से की जा सकती है। वज्रासन, पद्मासन अथवा गोदुआसन एवं किसी भी योगिक क्रियाओं को इन मुद्राओं के साथ करने से वे अधिक प्रभावशाली हो जाती है। प्रत्येक मुद्रा को लगभग 30 मिनट करना चाहिए। आवश्यकतानुसार मुद्राओं को एक से अधिक बार भी किया जा सकता है। इन मुद्राओं को जितना अधिक किया जाता हैं, उतना ही अधिक लाभ प्राप्त होगा।