स्वास्थ्य हेतु स्वयं की सजगता आवश्यक

स्वास्थ्य हेतु स्वयं की सजगता आवश्यक

स्वास्थ्य के प्रति सरकारी उपेक्षाः-

                आज हमारे स्वास्थ्य पर चारों तरफ से आक्रमण हो रहा है। स्वास्थ्य मंत्रालय की नीतियों में स्वास्थ्य गौण हैं। भ्रामक विज्ञापनों तथा स्वास्थ्य के लिये हानिकारक प्रदूषित, पर्यावरण, दुव्र्यसनों एवं दुष्प्रवृत्तियों पर प्रभावशाली कानूनी प्रतिबंध नहीं हैं, अपितु वे सरकारी संरक्षण में पनप रही है। आज राष्ट्रीयता, नैतिकता, स्वास्थ्य के प्रति सजगता थोथे नारों और अन्धाःनुकरण तक सीमित हो रही है। परिणाम स्वरूप जो मांसाहार एवं Fast Food नहीं खिलाना चाहिये व खिलाया जा रहा है। जो शराब एवं ठण्डे पेय नहीं पिलाना चाहिये उसे सरकार पैसे के लोभ में पिला रही है। जो काम-वासना, क्रूरता, हिंसा आदि के दृष्यों को सार्वजनिक रूप से टी.वी. पर नहीं दिखाया जाना चाहिये, मनोरंजन के नाम पर दिखाया जा रहा हैं। जो नहीं पढ़ाना चाहिये वह भी कभी-कभी पढ़ाया जा रहा है एवं जो हमारी संस्कृति, समाज एवं राष्ट्र के लिये Sex Education (यौन-शिक्षा) जैसी घातक, गतिविधियाँ हैं, वे नि:संकोच करवाई जा रही है। आज रक्षक ही भक्षक हो रहे हैं। खाने में मिलावट, आम बात हो गयी हैं। सारा वातावरण पाश्विक वृत्तियों से दूषित हो रहा हैं। सरकारी तंत्र को सच्चाई जानने, समझने व उसकी क्रियान्विति में कोई रूचि नहीं है। सारे सोच का आधार है भीड़ एवं संख्या बल। क्योंकि जनतंत्र में उसी के आधार पर नेताओं का चुनाव और नीतियां निर्धारित होती हैं। फलतः उनके माध्यम से राष्ट्र विरोधी, जन साधारण के लिये अनुपयोगी, स्वास्थ्य को बिगाड़ने वाली कोई भी गतिविधि व्यक्तिगत स्वार्थवश आराम से चलायी जा सकती हैं। जन्म से पूर्व डाॅक्टरों की दवा लेने वाले, विभिन्न जांच प्रक्रियाओं से रोग होने पर बचपन से ही गुजरने वाले, भविष्य में संक्रामक एवं असाध्य रोगों से क्यों पीडि़त हो जाते हैं?उनकी रोग प्रतिकारात्मक क्षमता क्यों क्षीण हो जाती है? इस संबंध में आधुनिक चिकित्सकों का स्पष्टीकरण क्या है एवं उसमें कितनी यथार्तता है?

                विदेशों में जबरदस्ती दवा पिलाने और इंजेक्शन लगाने के विरूद्ध स्वयं सेवी संस्थाएं राष्ट्रीय आन्दोलन चला रही है। दवाओं के दुष्प्रभावों की क्षतिपूर्ति देने के कारण दवा कारखाने बंद हो रहे हैं। सरकारी अनदेखी के कारण हमारे यहां वे ही राष्ट्रीय कार्यक्रमों के रूप में सरकारी संरक्षण में नागरिकों की दुष्प्रभावों के प्रति असजगता के कारण तीव्र गति से चल रहे हैं। आज 80 प्रतिशत से अधिक बच्चों को पोलियों जन्म से नहीं होता परन्तु सिर के बुखार में आधुनिक डाॅक्टरों की उपेक्षावृत्ती स्वरूप दी जाने वाली गलत दवा होती है। पोलियो पल्स का व्यापक अभियान हो या स्वास्थ्य हेतु आयोडीन युक्त नमक की अनिवार्यता एवं प्रभावशालीता का टी.वी. पर भ्रामक प्रचार, उचित नहीं। क्या कभी किसी ने उनके मूल अवयवों की प्राप्ति के स्रोतों को जानने का प्रयास किया? उनसे पड़ने वाले दुष्प्रभावों का अध्ययन किया? जहाँ साधन, साध्य और सामग्री अशुद्ध हो, अपवित्र हो, वहां दुष्प्रभाव न हो, यह कैसे संभव है? बचपन से ही रोग प्रतिकारात्मक क्षमता नष्ट करने का षडयंत्र चलाया जा रहा है। सरकार को स्पष्ट करना चाहिये कि पोलियों पल्स और आयोडिन नमक में क्या जानवरों के अवयवों का समावेश तो नहीं होता है? अहिंसक शाकाहारी प्रजा को जबरदस्ती मांसाहारी बनाने का प्रयास निंदनीय है। भ्रामक विज्ञापनों को सरकारी प्रचार-प्रसार अथवा संरक्षण मिल जाने मात्र से असत्य सत्य नहीं बन जाता। हमारा यह दुर्भाग्य है कि झूठे विज्ञापनों के प्रसारण पर इस देश में कोई कानूनी प्रतिबंध नहीं है। शाकाहारी गायों को मांसाहार खिलाने से चन्द वर्ष पूर्व इंगलैण्ड में Mat Cow रोग फैला, लाखों मुर्गियों का कत्ले आम करने का परिणाम चिकनगुनियां के रूप में सामने आया। आज एड्स बढ़ाने में कबूतरों का योगदान बताकर स्वार्थी  लोगों द्वारा शांत प्रिय कबूतरों को समाप्त करने की योजनाएं बनायी जा रही है। दवाओं के दुष्प्रभावों से पीडि़त लोगों की राहत के लिये कानूनी प्रावधान नहीं है। अन्य देशों से प्रतिबंधित दवाओं को बेचने पर कोई कानूनी रोक एवं दंड की व्यवस्था नहीं है। आयोडिन नमक का प्रचार हो अथवा पोलियों निवारण कार्यक्रम स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा चलाये जा रहे रोग नियन्त्रक कार्यक्रमों से पड़ने वाले दुष्प्रभावों की निष्पक्ष न्यायिक जांच एवं क्षतिपूर्ति आवश्यक है।

रोग के विभिन्न प्रभाव एवं लक्षणः-

                रोग स्वयं की गलतियों से उत्पन्न होता है, अतः उपचार में स्वयं की सजगता और सम्यक् पुरुषार्थ आवश्यक है। जब तक रोगी रोग के कारणों से नहीं बचेगा, उसकी गम्भीरता को नहीं स्वीकारेगा तब तक पूर्ण स्वस्थ कैसे हो सकेगा? रोग प्रकट होने से पूर्व अनेकों बार अलग-अलग ढंग से चेतावनी देता है। परन्तु रोगी उस तरफ ध्यान ही नहीं देता। इसी कारण उपचार एवं परहेज के बावजूद चिकित्सा लम्बी, अस्थायी, दुष्प्रभावों वाली हो तो भी आश्चर्य नहीं? अतः रोग होने की स्थिति में रोगी को स्वयं से पूछना चाहिये कि उसको रोग क्यों हुआ? रोग कैसे हुआ? कब ध्यान में आया? रोग से उसकी विभिन्न, शारीरिक प्रक्रियाओं तथा स्वभाव में क्या परिवर्तन हो रहे हैं? इस बात की जितनी सूक्ष्म जानकारी रोगी को हो सकती है, उतनी अन्य को नहीं। उसके मल के रंग, बनावट व गंध में तो परिवर्तन नहीं हुआ? कब्जी, दस्त या गैस की शिकायत तो नहीं हो रही है? पेशाब की मात्रा एवं रंग और स्वाद में बदलाव तो नहीं हुआ? भूख में परिवर्तन,  प्यास अधिक या कम लगना, अनिद्रा या निद्रा और आलस्य ज्यादा आना, पांच इन्द्रियों के विषयों रंग, स्वाद, स्पर्श, श्रवण, वाणी एवं दृष्टि की क्षमताओं में तो कमी नहीं आयी? रुचि-अरुचि में विशेष परिवर्तन तो नहीं हुआ? श्वसन में कोई अवरोध तो नहीं हो रहा है? स्वभाव में चिड़चिड़ापन, निराशा, क्रोध, भय, अधीरता, घृणा, क्रूरता, तनाव, अशान्ति तो नहीं बढ़ रही है? आलस्य एवं थकान की स्थिति तो नहीं बन रही है। दर्द कब, कहां और कितना होता है? क्या चौबीसों घंटे दर्द एकसा रहता है? सर्वाधिक और निम्नतम दर्द कब होता है? मन में संकल्प विकल्प कैसे आ रहे हैं, इत्यादि सारे रोग के लक्षण हैं। उपचार के तुरन्त पड़ने वाले प्रभाव की सूक्ष्मतम जानकारी रोगी की सजगता से ही प्राप्त हो सकती है तथा इन सभी लक्षणों में जितना-जितना सुधार और संतुलन होगा उतना ही उपचार स्थायी और प्रभावशाली होता है। मात्र रोग के बाह्य लक्षणों के दूर होने अथवा पीड़ा और कमजोरी से राहत पाकर अपने आपकों स्वस्थ मानने वालों को पूर्ण उपचार न होने से नये-नये रोगों के लक्षण प्रकट होने की संभावना बनी रहती है।

उपचार हेतु रोगी की सजगता एवं सम्यक् पुरुषार्थ आवश्यकः-

                ऐसी परिस्थितियों में हमें अपने स्वास्थ्य का खयाल स्वयं रखना होगा। अपनी क्षमताओं को समझ उनका सदुपयोग कर डाॅक्टरों की पराधीनता को छोड़ना होगा। क्या हमारा श्वास कोई दूसरा ले सकता है? खाना अन्य कोई पचा सकता है? प्यास दूसरों के पानी पीने से शांत हो सकती है? हमारी निद्रा अन्य कोई ले सकता है? शरीर से निकलने वाले मल, मूत्र आदि अवांछित तत्वों का विसर्जन दूसरा कर सकता है? हमारा रक्त, मांसपेशियां, कोशिकाएँ, हड्डियाँ जैसी प्रतिक्षण बनने वाली वस्तुएँ भी शरीर स्वयं बनाता है। शरीर जब हृदय, फेंफड़े, गुर्दे, लीवर, पाँचों इन्द्रियों का निर्माण स्वयं कर सकता है तब क्या उसे स्वस्थ नहीं रख सकता? मानव जीवन अमूल्य है। अतः अज्ञानवश उसके साथ छेड़छाड़ न हों। वर्तमान की उपेक्षा भविष्य की समस्या न बने। इस हेतु हमें अपने प्रति सजग, विवेकशील और ईमानदार बनना होगा। जो स्वयं लापरवाह, बेखबर है उसकी चिन्ता दूसरा कैसे कर सकता है?

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