पतंजलि अष्टांग योग

पतंजलि अष्टांग योग

Patanjali Ashtang Yoga

योग क्या है?

                योग सुखी जीवन जीने की सरल एवं प्रभावशाली श्रेष्ठ विधि है। जिसके द्वारा मनुष्य का शरीर पूर्ण स्वस्थ, इन्द्रियों में अपार शक्ति, मन में अपूर्व आनन्द, बुद्धि में सम्यक् ज्ञान एवं भावों में कषायों की मंदता और सजगता आती है, वही सच्चा योग होता है। योग साधना से मनुष्य जन्म-मृत्यु के बन्धनों से मुक्त हो सकता है। योग से शरीर को रोग, इन्द्रियों की थकावट और कमजोरी, मन की चिंता, भय, तनाव, आवेगों से अपने आपको मुक्त रखा जा सकता है।

                मन, वचन और काया का सम्यक् संयम, तालमेल और संतुलन ही सच्चा योग होता है। वास्तव में योग सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन और सम्यक् आचरण की उत्कृष्ट साधना है। जिससे शरीर, मन और आत्मा ताल से ताल मिलाकर कार्य करते हैं। तीनों के विकारों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है तथा तीनों निर्विकारी बनते हैं। यही मनुष्य जीवन का ध्येय होता है।

यम-

                हमारे जीवन को जो विकारी बनाते हैं, पतित बनाते हैं, जीवन के लिए जो अकरणीय हैं, उनको छोड़ें बिना जीवन का विकास हो नहीं सकता। पतंजलि ने ऐसे पांच यमों को योग की आधारशिला माना है। ये पांच यम हैं हिंसा, झूठ, चोरी, मैथुन या व्यभिचार तथा परिग्रह का त्याग।

नियम-

                नियम अथवा सिद्धान्त जीवन की वे प्रवृत्तियाँ हैं, जो योग के लिए अनिवार्य होती है तथा जो यम के पालन में सहयोग करते हैं। मुख्य नियम भी पांच हैं। शौच अर्थात् शुद्धता, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान। शौच का मतलब मन, वाणी और काया की पवित्रता अर्थात् आत्मा के विकारों की शुद्धि।

आसन-

                आसन शरीर की वह स्थिति है, जिससे शरीर बिना किसी बैचेनी के स्थिर रह सके और मन को सुख की प्राप्ति हो। आसनों से शरीर के ऊर्जा केन्द्र जागृत होते हैं और शरीर में आवश्यक हारमोन्स बनाने वाली अन्तःश्रावी ग्रन्थियाँ बराबर कार्य करने लगती है। आसनों के अलावा प्रायः अन्य कोई ऐसा सरल व्यायाम नहीं होता, जिससे शरीर के सभी अंगों की यथोचित कसरत हो सके।

                आसन का चयन करते समय इस बात का विवेक रखा जाये कि अधिक कार्य करने वाले को आराम दिया जाए अन्यथा अधिक श्रम की गर्मी से शरीर का वह भाग विकृत हो जायेगा। साथ ही जो भाग कम कार्य करते हैं, उनसे श्रम कराया जाये, अन्यथा शरीर का वह भाग निस्तेज, निष्क्रिय, निकम्मा, क्रियाहीन और कमजोर होकर रोगों का घर बन जायेगा।

प्राणायाम-

                सम्यक् प्रकार के श्वसन क्रिया को संचालित, नियन्त्रित करने की विधि को प्राणायाम कहते हैं। शरीर का भारीपन एवं मन और मस्तिष्क के तनाव से श्वसन क्रिया भी प्रभावित हो जाती है। प्राणायाम से शरीर में प्राण ऊर्जा उत्प्रेरित, संचारित और संतुलित होती है। जिस प्रकार बाह्य शरीर की शुद्धि कि लिए स्नान की आवश्यकता होती है, ठीक उसी प्रकार शरीर के आन्तरिक अवयवों के लिये प्राणायाम का बहुत महत्त्व होता है।

                प्राणायाम योग की आत्मा है। जब तक श्वसन क्रिया चालू है, तभी तक हमारा जीवन है। अतः श्वसन की प्रक्रिया को जानना, समझना और उसका ढंग से प्रयोग करना प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनिवार्य हैं।

                अधूरी श्वास लेने वालों के फेंफड़े का अधिकांश भाग निष्क्रिय पड़ा रहता है। जिन मकानों की सफाई नहीं होती, उनमें गन्दगी, मकड़ी, मच्छर आदि का प्रकोप होने लगता है। ठीक उसी प्रकार फेंफड़े के जिस भाग में श्वसन द्वारा शरीर में जाने वाली वायु नहीं पहुँचती, उनमें क्षय, खांसी, जुकाम, कफ, दमा आदि रोग होने की संभावना बढ़ जाती है।

प्राणायाम की चार अवस्थाएँ-

                प्राणायाम में श्वास अन्दर खींचने की प्रक्रिया को पूरक, श्वास बाहर निकालने की क्रिया को रेचक तथा श्वास को अन्दर अथवा बाहर रोकने की अवस्था को कुम्भक कहते हैं। प्राणायाम का मूल सिद्धान्त है श्वास धीरे-धीरे परन्तु जितना गहरा लम्बा लिया जा सके लें। श्वास लेते समय पेट पूरा फूल जाना चाहिये। श्वास को जितना ज्यादा देर रोक सकें, अन्दर रोकने का प्रयास करें, ताकि श्वसन द्वारा शरीर में प्रविष्ट प्राण वायु अपना कार्य वापस बाहर निकालने के पूर्व पूर्ण कर सके अर्थात् आक्सीजन का पूरा उपयोग हो सके। श्वास को धीरे-धीरे निष्कासित करें। रेचक का समय पूरक से जितना ज्यादा होगा उतना प्राणायाम प्रभावकारी होता है। कुछ योगियों की ऐसी मान्यता है कि जितना ज्यादा श्वास को अंदर रोक कर जाता है उतनी अधिक शारीरिक शक्ति प्राप्त होती है, परन्तु यदि दिमाग को शांत करना हो तो श्वास को बाहर अधिक रोकने का अभ्यास करना चाहिए।

प्राणायाम के लाभ-

  1. फेंफड़े मजबूत होते हैं।
  2. रक्त के विकार दूर होते हैं।
  3. शरीर का संतुलित और सुडोल विकास होता है।
  4. मन में उत्साह एवं मानसिक बल भी बढ़ता है।
  5. ध्यान में मन लगता है।
  6. प्राणायाम से दीर्घ आयु प्राप्त होती है, स्मरण शक्ति बढ़ती है।
  7. स्फूर्ति आती है।

प्रत्याहार-

                शरीर की वह अवस्था जब पाँचों इन्द्रियाँ शान्त हो अपने बाह्य विषयों से मुक्त होकर अन्तर्मुखी हो जाती है, प्रत्याहार कहलाती है। इस अवस्था में मन की स्वच्छन्दता समाप्त हो जाती है। चित्त शान्त रहने लगता है। साधक को अपनी आत्मिक शक्तियों का आभास होने लगता है।

                शब्द आया, चला गया, उसके अर्थ पर ध्यान न देना। देखा, अनदेखा कर देना उस पर चिन्तन नहीं करना। जिस प्रकार पानी बर्फ बनने के पश्चात् ही छलनी में टिक सकता है, ठीक उसी प्रकार प्रत्याहार में पांचों इन्द्रियों के विषयों से ध्यान हटा लिया जाता है। प्रत्याहार को जैनागमों में प्रतिसंलीनता कहते हैं।

धारणा-

                शांत चित्त को शरीर के किसी स्थान पर एकाग्र करने को धारणा कहते हैं। धारणा ध्यान की प्रारम्भिक अवस्था होती है।

ध्यान-

                धारणा से चित्त वृत्ति को जिस विषय में लगाया गया हो, उसी विषय में उसे निरन्तर लगाए रखने को ध्यान कहते हैं। मन, वचन और काया की स्थिरता को भी ध्यान कहते हैं। चित्त विक्षेप का त्याग करना ध्यान है, एकाग्र चिन्तन ध्यान होता है।

समाधि-

                जब केवल ध्येय स्वरूप का ही भान रहे, ध्यान की उस अवस्था को समाधि कहते हैं। समाधि ध्यान की चरम सीमा होती है, जिसे कायोत्सर्ग भी कहते हैं। जिसमें शरीर, मन और वाणी की प्रवृत्तियाँ समाप्त हो जाती है और साधक मुक्त अवस्था को प्राप्त कर लेता है।

उपसंहार-

                अष्टांग योग के प्रथम पांच अंगों अर्थात् यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार को बहिरंग योग तथा अन्तिम तीन धारणा, ध्यान और समाधि को संयम कहा जाता है। यदि बहिरंग योग को विवेक पूर्वक जीवन में उतारा जाये तो मनुष्य में मानवीय गुणों के विकसित होने के साथ-साथ शारीरिक, मानसिक और आत्मिक विकास भी होता है, जो स्वस्थ जीवन का मूलाधार होता है।

                पतंजलि योग में यम नियमों द्वारा अन्तः चेतना की सफाई के बाद आसन, प्राणायाम से शरीर बलवान होता है। वहीं प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि से मनोबल और आत्म बल बढ़ता है। जिस प्रकार फूटे हुये घड़े को छिद्र बन्द करने के पश्चात् ही पानी से भरा जा सकता है। अच्छी फसल के लिए खेती की जीव जन्तुओं से रक्षा और खाद देने के साथ-साथ, पानी से नियमित सींचन और धूप की भी आवश्यकता होती है। योग साधना ऐसी ही खेती है जिसे यम-नियम द्वारा हिंसा, झूठ, चोरी, व्यभिचार, लोभ, मलिनता, तृष्णा, आलस्य, अज्ञान अहं जैसे दस प्रकार के दुर्गुणों रूपी हानिकारक आत्मिक विकारों से रक्षा करनी होती है और आसनों का खाद तथा प्राणायाम का पानी देना होता है, तभी संतोषजनक स्वास्थ्य की उपलब्धि होती है। शरीर आकर्षक और पुष्ट बनता है। शरीर में हल्कापन, कार्य करने का उत्साह बढ़ता है। शरीर की बेटरी चार्ज हो जाती है। चिन्ता, भय, निराशा, अनिद्रा, दुर्बलता, आलस्य आदि दूर होकर व्यक्ति सजग एवं अप्रमादी बनने लगता है। अपने आपको पहचानने लगता है। आत्मावलोकन करने लगता है। यही आत्मा से परमात्मा बनने की कला होती है।

                परन्तु आजकल विश्व भर में प्रचलित एवं प्रसारित पंतजलि योगाभ्यास प्रायः आसन और प्राणायाम तक सीमित होता जा रहा है। यम, नियम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि के अभाव में नर से नारायण और आत्मा को परमात्मा बनाने वाली योग साधना मात्र शरीर का व्यायाम बन कर रह गया है। यह योग का अवमूल्यन है, अष्टांग योग की क्रमिक साधना ही सच्चा योग होता है।

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