स्वास्थ्यरक्षक व्यायाम ‘स्वायसो’

स्वास्थ्यरक्षक व्यायाम ‘स्वायसो’

स्वायसो क्या है?

                स्वायसो एक अत्यन्त सरल एवं अल्प समय में किया जा सकने वाला व्यायाम है। स्वायसो का प्रारम्भ चीन में कुछ दशक पूर्व ही हुआ। इसको बच्चे, युवक, महिलाएँ एवं वृद्ध सभी कर सकते हैं। इसमें किसी प्रशिक्षक की भी आवश्यकता नहीं होती है। बहुत साधारण होते हुए भी सैंकड़ों बीमारियों में यह अत्यधिक प्रभावशाली है। चीन एवं जापान में हजारों लोग इसके द्वारा असाध्य रोगों से मुक्ति पा रहे हैं। इसी कारण यह पद्धति चीन, जापान, हांगकांग, दक्षिण-पूर्व एशिया, अमेरिका, कनाडा, भारत आदि राष्ट्रों में दिनों-दिन लोकप्रिय होती जा रही है।

                स्वायसो व्यायाम हमारे शरीर में एकत्र हुए अवरोध, तनाव व ऐंठन को समाप्त कर देता है जिससे रोगों से बचना संभव होता है, तथा रोग से मुक्ति मिलती है। इसके प्रणेता एवं प्रचारक मासाओ हयाशिमा ने चन्द वर्षों पूर्व जानबूझकर अपने शरीर में कैन्सर रोग उत्पन्न किया तथा स्वायसो कसरत द्वारा उसे ठीक भी कर दिया। स्वायसो व्यायाम तेओईस्ट के सिद्धान्तों पर आधारित है। उनके अनुसार पश्चिमी दवाइयों के 170 सालों और चीनी दवाइयों के 1000 सालों से ज्यादा इतिहास में ऐसी कोई खबर नहीं है कि उन्होंने किसी पागल को ठीक किया हो।

क्या है स्वायसो?

                स्वाय शब्द का चीनी अर्थ होता है झूलना या दूर फेंकना। इस प्रकार स्वायसो का अर्थ होता है बाहों को आगे व पीछे झुलाना। स्वायसो द्वारा शरीर के विकारों को बाहर झटक दिया जाता है। ये विकार ही शरीर में ब्लोक्स व तनाव के कारण होते हैं। इसका प्राथमिक उद्देश्य शरीर की विकृत ऊर्जा को बाहर निकालकर शरीर में शुद्ध ऊर्जा का संचार करना होता है। इस प्रकार यह व्यायाम शरीर में प्राकृतिक स्थिति पैदा कर देता है। यह चीन में प्रचलित सर्वाधिक लोकप्रिय व्यायाम है जो अनेक रोगों में रामबाण सिद्ध हो रहा है।

स्वायसो व्यायाम कैसे करें?

  1. सर्वप्रथम पैरों को सीधा रखते हुए जमीन पर तनकर खड़े हो जाएं। बाँहों को धरती के समानान्तर फैलाएं एवं अंगुलियों को इस प्रकार रखें जैसे कि जमीन को पकड़ रखा हो।
  2. दोनों बाँहों को एक साथ आगे व पीछें झुलाएँ। बाँहों को पीछे की ओर धकेलते समय ही शक्ति का प्रयोग करें व आगे उन्हें स्वयं आने दें। कुहनियाँ सीधी रखें, हथेलियाँ पीछे की ओर मुड़ी हुई हों। आँखें ठीक सामने की तरफ देख रही हों। मस्तिष्क को बिल्कुल खाली छोड़ दें व तसल्ली से गिनती करते जाएं।
  3. पहली बार स्वायसो व्यायाम दो सौ अथवा तीन सौ से प्रारम्भ करें व धीरे-धीरे संख्या बढ़ाते जाएं। अन्ततः अपनी क्षमता के अनुसार एक हजार या दो हजार तक पहुँचें।

सिद्धान्त-      

ऊपर भरा व निचला खाली को ऊपर खाली व निचला भरा में बदलना

                मानव शरीर के महत्त्वपूर्ण अंग शरीर के ऊपरी आधे भाग में होते हैं, जैसे मस्तिष्क, हृदय, फेंफड़े आदि। निचले आधे भाग में कूल्हें व टागें आदि होती हैं। आज की तनावयुक्त जीवन शैली एवं अन्य कारणों के परिणामस्वरूप ऊपरी भाग को अत्यधिक कार्यरत रहना पड़ता है तथा हम अपनी अधिकांश शक्ति एवं ध्यान इसी ऊपरी भाग पर लगाते हैं। इस प्रकार हमारा शरीर सदैव ऊपर से भरा व निचला खाली जैसी अवस्था में रहता है। जैसे अगर हम सात आठ घंटे लगातार पढ़ते रहेंगे तो सिर भारी हो जाएगा, आँखे लाल हो जाएगी और आगे पढ़ते रहना मुश्किल हो जाएगा। इस अवस्था हो हम सिर का असाधारण रूप से भारी हो जाना कह सकते हैं। ऐसी स्थिति में हम थक जाते हैं तथा कोई भी रोग लग सकता है।

                ऊपर भरा से तात्पर्य न केवल सिर से है, बल्कि पूरे ऊपरी आधे शरीर से होता है। जब ऊपर भरा व निचला खाली होता है तो थकावट बढ़ती जाती है और विभिन्न रोग लग जाते हैं, क्योंकि विकृत ऊर्जा भी शरीर में बढ़ती जाती है।

                ‘स्वायसो’व्यायाम का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य यही होता है कि यह ऊपर-भरा व निचला खाली वाली अवस्था को उलट देती है इसके द्वारा विकृत ऊर्जा बाहर निकल जाती है, शुद्ध ऊर्जा का संचरण होता है तथा शरीर के निचले अंगों में बने हुए अवरोध व तनाव बिखर जाते हैं। स्वायसो द्वारा जो 70 प्रतिशत ऊर्जा निचले भाग में एकत्र हो जाती है उसे ऊपरी भाग में भेजना है तथा सिर्फ 30 प्रतिशत ऊर्जा ही निचले अंगों में रखनी है।

स्वायसो करते समय ध्यान रखने हेतु आवश्यक मार्गदर्शन –

  1. अपनी कमर सीधी रखें। शरीर के ऊपरी भाग को पूर्णतः शिथिल हो जाने दें। कन्धों में तनाव नहीं लाएँ तथा बाँहों को घड़ी के पेण्डुलम की तरह झूलने दें।
  2. शरीर के निचले भाग में गुरुत्वाकर्षण महसूस करें। तलवे पर मजबूती से खड़े रहें एवं पैरों में जूता-चप्पल नहीं पहनें। धरती को पकड़ने का प्रयास करें एवं अंगुलियों से जमीन की खुदाई करने का प्रयास करें। एडियों को जमीन पर इस प्रकार रखें जैसे कि वे भारी पत्थर हों।
  3. ऐसा सोचें की आपका सिर किसी रस्से द्वारा लटक रहा है एवं सारा शरीर ढ़ीला होकर झूल रहा है, इस प्रकार कंधों का शिथिलीकरण हो जाएगा।
  4. जबड़ों को ढ़ीला छोड़ दें, मुँह बन्द रखें, परन्तु दाँतों को नहीं भीचें।
  5. मस्तिष्क को निश्चेष्ट रखें एवं अपने विचारों को भटकने नहीं दे। अपने शरीर के ऊपरी भाग को पूर्णतः खाली हो जाने दें।
  6. पहिए की धुरी की तरह अपने नाभि-प्रदेश को व्यायाम के लिए केन्द्र बिन्दु मानें।
  7. कुहनियों को कंधे से अधिक ऊँचाई तक नहीं झुलाएँ।
  8. अपनी बांहें ढ़ीली रखे। अपनी बांहों को नाव के दो चप्पू समझें एवं इस प्रकार झुलाएं जैसे हवा को धकेल रहे हों।
  9. अपना ध्यान नाभि के केन्द्र बिन्दु पर स्थिर करें। जांघों के भीतरी हिस्से को तनाव मुक्त रखें। गुदा को सिकोड़ने का प्रयास करें।
  10. जब आप बाँहें झुला रहे हों तो हथेलियों को नीचे की ओर रखें।

                उपर्युक्त बातों को ध्यान में रखकर स्वायसो करेंगे तो नीचे-सात, ऊपर-तीन की अवस्था प्राप्त हो जाएगी अर्थात् पहले जो ऊपरी हिस्से में सात हिस्से भार था वह निचले हिस्से में उतर जाएगा एवं ऊपरी हिस्सा हल्का हो जाएगा तथा इसी अनुपात में शक्तिशाली बनता जाएगा। स्वायसो करते समय कल्पना करें कि आप एक पुराने वृक्ष हैं, जिसकी जड़ें जमीन में काफी गहरी पैठी हुई हैं। ऐसा करने से हमारे तलवे में जो मेरेडियन्स की ऊर्जा है वह जागृत होकर ऊपर की ओर बढ़ने लगेगी तथा मांसपेशियों, त्वचा, हड्डियों व जोड़ों को शक्ति मिलने लगेगी।

                हालांकि स्वायसो बाहों को झुलाने की कसरत है, परन्तु इसमें पैरों का अधिक योगदान होता है व नाभि प्रदेश का महत्त्व होता है। स्वायसो में पैर व नाभि प्रदेश का कार्य बाँहों की अपेक्षा अधिक जरुरी है। नाभि प्रदेश से बाँहें ऊपर उठेंगी तथा नाभि प्रदेश का अवलम्बन पैर होंगे। इसी प्रकार स्वायसो में पैर पर जोर देने को कहा जाता है, इसका कारण यह है कि हमारे तलवे में जो किडनी, लीवर एवं हृदय आदि के एक्यूप्रेशर के जो प्रतिवेदन बिन्दु हैं, वे दब जाते हैं एवं जागृत हो जाते हैं।

स्वायसो के परिणाम-

                उच्च तथा निम्न रक्तचाप भी केवल स्वायसो करते रहने से मिट जाता है। हमारे शरीर में असंख्य धमनियाँ व शिराएँ हैं जिनमें रक्त प्रवाह होता रहता है। कई शिराएँ तो इतनी सूक्ष्म होती है कि इनकी मोटाई सूई की नोंक के तीन सौ वे भाग के बराबर होती है। चूँकि रक्त का घनत्व पानी की अपेक्षा अधिक होता है। अतः जब हम किसी अंग से काम नहीं लेते हैं या कम काम लेते हैं तो वहाँ रक्त जमने व थक्के बनने की संभावना रहती है और यही रक्तचाप का कारण बन जाता है। स्वायसो द्वारा हाथ-पैर गतिमान बने रहते हैं एवं रक्तचाप सही बना रहता है। जब स्वायसो नियमित रूप से किया जाएगा तो शरीर में कुछ परिवर्तन होने लगेंगे। पसीने एवं तापक्रम में वृद्धि होगी। श्लेष्मा बढ़ेगी तथा तन्द्रा छाने लगेगी। ये लक्षण स्पष्ट करते हैं कि शरीर से अशुद्ध ऊर्जा बाहर निकल रही है और शरीर मजबूत बनता जा रहा है, बीमारियाँ दूर हो रही हैं। स्वायसो में जब हम अपनी बाँहों को चलाते हैं तो कमर, छाती व पेट की माँसपेशियों में खिंचाव आता है, नाड़ी संचार सही हो जाता है और मेरेडियन में ऊर्जा का प्रवाह सही हो जाता है।

                मासाओ हवाशिमा ने स्वायसो से निम्नलिखित रोगों को ठीक करने में संतोषजनक परिणाम प्राप्त किए हैं- (1) विभिन्न प्रकार के कैंसर, (2) उच्च एवं निम्न रक्तचाप, (3) हृदय रोग, (4) गुर्दे के रोग, (5) आँखों के रोग, (6) पाचन संबंधी रोग, (7) लीवर के रोग, (8) गठिया एवं (9) स्नायु रोग। स्वायसो पद्धति अपनाकर पागलपन एवं मंद बुद्धि वालों के उपचार में सफलता प्राप्त की जा सकती है।

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