जल चिकित्सा

जल चिकित्सा

                जल तत्त्व पृथ्वी तत्त्व से हल्का और तरल होता है। अतः धरती पर जल रहता है। पृथ्वी ही उसका आधार होती है। उसका बहाव सदैव नीचे की तरफ होता है। शरीर में गुदा से नाभि तक के भाग में जल तत्त्व की अधिकता होती है। शरीर में जितने तरल पदार्थ होते हैं, जैसे- रक्त, वीर्य, लासिका, मल, मूत्र, कफ, थूक, पसीना, मज्जा आदि का संबंध जल तत्त्व से अधिक होता है।

                जल तत्त्व की कमी से शरीर में शुष्कता, त्वचा संबंधी रोग, बालों का समय से पूर्व सफेद होना, प्यास अधिक लगना जैसे लक्षण प्रकट होने लगते हैं। जबकि जल तत्त्व की अधिकता से कफ का बढ़ना, पसीना ज्यादा आना, पेशाब अधिक लगना आदि स्थितियाँ बनती है। शरीर में जल तत्त्व की अधिकता वाले अधिक भावुक और आसक्ति रखने वाले होते हैं। आलस्य और निद्रा की अधिकता रहती है एवं कठिन कार्य करने में अपनी मानसिकता देरी से बना पाते हैं।

                जल तत्त्व के असंतुलन से व्यक्ति में आलस्य बढ़ने लगता है। कठोर, परिश्रम वाले कार्यो के करने में कठिनाई अनुभव होती है। स्वभाव में रूखापन होने लगता है। गहरी निद्रा नहीं आती। बात-बात में आवेग आने लगता हैं। जल तत्त्व की अधिकता वाले रसनेन्द्रिय के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। खाने-पीने की चीजों के बारे में जल्दी प्रतिक्रिया करते हैं। शुद्ध जल के सेवन, सब्जियों, फलों के रस और अन्य तरल पदार्थो के सेवन से शरीर में जल तत्त्व की पूर्ति होती है।

                प्राकृतिक चिकित्सक पानी का अलग-अलग प्रकार से शरीर में उपयोग करवाकर, उषापान, वाष्प-स्नान, टब-बाथ, एनिमा, नेति एवं अन्य जल सम्बन्धी क्रियाओं द्वारा जल तत्त्व को संतुलित करते हैं।

नमी ऊर्जा का प्रभाव- सजगता और विवेक

                शरीर में लगभग 2/3 भाग जल होता है। नमी ऊर्जा द्वारा शरीर में व्याप्त तरल पदार्थो का नियन्त्रण होता है। जब जल का अनुपात विभिन्न अवयवों में असंतुलित हो जाता है तो शरीर में अनेकों समस्याएँ उत्पन्न होने लगती है। आंखों में आंसूओं के रूप में, मुंह में थूक के रूप में, फेंफड़ों में कफ के रूप में, शरीर से पसीने एवं मूत्राशय से पेशाब के रूप में अनावश्यक तत्त्व पदार्थो का विसर्जन होने लगता है। कभी-कभी नाक से पानी और कान से पीब भी आने लगती है। इस ऊर्जा के असंतुलन से शरीर में लासिका तंत्र संबन्धी रोगों के लक्षण प्रकट होने लगते हैं। रूक-रूक कर दर्द अनुभव होने लगता है। तिल्ली/पेन्क्रियाज और आमाशय इस ऊर्जा के असंतुलन से अधिक प्रभावित होते हैं।

                अपाचन, मधुमेह व एलर्जी प्रायः इसी ऊर्जा के असंतुलन के कारण होती है। वर्षा ऋतु और मौसम के बदलाव के समय होने वाले रोग, शरीर की प्रतिकारात्मक क्षमता, मोटापा अथवा दुबलापन, सूजन, एनेमिक स्थिति (रक्त की कमी) प्रायः ऊर्जा के असंतुलन से होती है। जब शरीर में नमी बढ़ती है तो, भारीपन और थकावट का अनुभव होने लगता है।

                भावनात्मक स्तर पर इस ऊर्जा से व्यक्ति अपने से संबंधित प्रत्येक बात को गम्भीरता से लेता है। अकारण चिन्ता और छोटी-छोटी अनावश्यक बातों का चिन्तन करने से ऐसे व्यक्ति अधिक तनावग्रस्त और असंतोषी होते हैं। प्रत्येक घटनाक्रम का बहुत सूक्ष्मता से चिन्तन करते हैं। अतः शीघ्र निर्णय नहीं ले पाते। बिना बात चिंताओं से शरीर पर भी उसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इस कारण बहुत से व्यक्तियों को अनिद्रा, मधुमेह आदि रोग होने की संभावना बढ़ जाती है। ऐसे व्यक्ति अपने विचार विस्तार से दूसरों को बताना अथवा सुनाना चाहते हैं। यदि कोई उनकी बात सुनने में रुचि लेता है, तो मन ही मन बहुत शान्ति और राहत का अनुभव करते हैं। जो रोगी चिकित्सक को अपने रोग का पुराना इतिहास विस्तार से बताते हैं, उनमें नमी ऊर्जा के असंतुलन की प्रबल संभावना रहती  है।

                जिन व्यक्तियों में जन्म से इस ऊर्जा का बाहुल्य होता है, उनका स्वर मधुर होता है। अकेले में गुनगुनाया करते हैं तथा संगीत अधिक प्रिय होता है। वे अपने कार्य एवं जिम्मेदारियों के प्रति प्रायः अधिक सजग होते हैं। अपनी क्षमताओं का सही आंकलन कर हानि-लाभ को ध्यान में रख कार्य करते हैं। अवसर का पूरा लाभ उठाते हैं। परिवार और समाज में प्रायः सबको साथ लेकर चलने वाले होते हैं। ऐसे व्यक्तियों को क्रोध अपेक्षाकृत कम आता है। जिनके स्वभाव में ऐसे गुण सहज हों, वे व्यक्ति वैज्ञानिक, न्यायाधीश, निरीक्षक, अंकेक्षक, शोध संबंधी कार्यो में अधिक सफल होते हैं।

                नमी ऊर्जा की बहुलता वाले व्यक्ति बाजार में जाने पर अपनी पूर्व योजना के अनुरूप सिर्फ आवश्यकता वाली वस्तुओं का अपनी अर्थिक क्षमतानुसार प्राथमिकता के आधार पर क्रय करते हैं। अनावश्यक वस्तुएँ नहीं खरीदते।

जल तत्त्व-

                जल तत्त्व से संबंधित शरीर में यिन अंग गुर्दे और यांग अंग मूत्राशय तथा ऊर्जा ठण्डक होती है। जीवन की अंतिम अवस्था में अर्थात् वृद्धावस्था में शरीर में जल तत्त्व अधिक सक्रिय हो जाता है। काला अथवा नीला रंग, नमकीन स्वाद, श्रवण शक्ति, सर्दी की मौसम, सिर के बाल, प्रजनन अंग, हड्डियाँ इस तत्त्व से विशेष संबंधित होती है।

                इस तत्त्व के अंसतुलन से मूत्र संबंधी रोग होने की संभावनाएँ बढ़ जाती है। यदि व्यक्ति में नकारात्मक सोच हों तो, अभिव्यक्ति में भय झलकता है। दुःख में आंसू जल्दी आने लगते हैं। ठण्डक ऊर्जा की अधिकता का मतलब मात्र शीतलता ही नहीं, अपितु निष्क्रियता भी होता है। सारी इन्द्रियों की क्षमता क्षीण होने लगती हैं।

                पानी बर्फ कब बनता है जब उसमें ठण्डक होती है। ठीक उसी प्रकार जब शरीर में अग्नि तत्त्व का प्रभाव कम हो जाता है तो व्यक्ति का रक्त भी ठण्डा पड़ जाता है। उसमें उत्साह, जोश समाप्त होने लगता है। परिणाम स्वरूप शरीर में एकत्रित विजातीय तत्त्वों का विसर्जन बराबर नहीं होता। कचरा जब जम जाता है तो, गांठ बन अवरोध पैदा  करता है। परिणाम स्वरूप कम करने के बजाय शल्य चिकित्सा द्वारा उस भाग को अलग किया जाना, आज आम बात हो गयी है।

                शरीर के किसी अंग अथवा भाग को काटकर फेंक देना समस्या का स्थायी समाधान नहीं होता, परन्तु राहत मात्र होता है। अपनी भूलों, उपेक्षाओं, दवाईयों, के दुश्प्रभावों का परिणाम होता है। समय पर सही निदान न होना और गलत उपचार का प्रतिफल है। शरीर की प्रतिरोधक क्षमताओं को क्षीण करने वाली दवाईयां एवं अप्राकृतिक जीवन शैली का प्रतिफल है। प्रमाद एवं आलस्यमय जीवन, शारीरिक श्रम न करने का परिणाम होता है। विजातीय तत्त्वों को शरीर से पूर्णतया विसर्जन न करने का नतीजा है। संक्षेप में कहें तो हमारे अज्ञान एवं असत्य मान्यताओं का परिणाम होता है।

                जो गांठ शरीर में बनती है, वह बिखर भी सकती है, घुल भी सकती है, सिकुड़ भी सकती है। आवश्यकता है, रोग के कारण जो तत्त्वों और उससे संबंधित ऊर्जाओं के असंतुलन हो जाता है, उसका पुनः संतुलन करना। जिस प्रक्रिया द्वारा रोग में वृद्धि हुई हो, ठीक उसके विपरीत प्रक्रिया द्वारा, पुनः संतुलन करना। यदि असंतुलन का कारण ठण्डक हो तो ठण्डक को कम करना तथा अग्नि तत्त्व को बढ़ाकर पुनः संतुलित किया जा सकता है। असाध्य एवं संक्रामक रोगों में प्रायः जल तत्त्व से संबंधित ठण्डक ऊर्जा के असंतुलन की अधिक संभावना रहती है, जिसको अग्नि तत्त्व की ऊर्जा के साथ अन्य तत्त्वों में आवश्यक परिवर्तन कर संतुलित किया जा सकता है। परिणाम स्वरूप बहुत से रोगों में शल्य चिकित्सा की आवश्यकता नहीं रहती तथा भविष्य में उससे पड़ने वाले दुश्प्रभावों एवं दवाओं की दासता से मुक्ति पाई जा सकती है।

                असाध्य रोगों में जब किसी अंग की क्षमता बहुत कम हो जाती है, तब यदि उस अंग की शुष्क एवं ठण्डक ऊर्जा को कम कर दिया जाये तथा वायु और अग्नि ऊर्जा को बढ़ा दिया जाये तो प्रभावशाली परिणाम होते हैं। अधिकांश शल्य चिकित्साओं का प्रारम्भिक अवस्था में यह सरलतम वैकल्पिक प्रभावशाली तरीका होता है।

                पांचों तत्त्वों का प्रभाव शरीर में कभी भी एक जैसा नहीं रहता। कभी कोई तत्त्व अधिक प्रभावी होता है तो, कभी दूसरा तत्त्व।

                पगथली और हथेली में निरन्तर परिवर्तन होने वाली रेखाएँ हों या त्वचा की स्थिति अथवा चेहरे की अभिव्यक्ति  हमारी आन्तरिक अवस्था को अभिव्यक्त करती है, परन्तु अज्ञान एवं असजगता के कारण हम उन परिवर्तनों को समझ नहीं पाते। इसी प्रकार कुछ व्यक्ति चेहरे को देख कर तो, कुछ व्यक्ति जीभ, नाखून, आंख, होठ, कान अथवा शरीर के किसी भाग की आकृति देख, शरीर की आन्तरिक अवस्था का निदान कर देते हैं। ये सारे लक्षण प्रत्येक व्यक्ति में अलग-अलग होते हैं। अतः प्रत्येक व्यक्ति का स्वास्थ्य और रोग की अवस्था एक जैसी नहीं होती। अतः दो रोगियों के रोग का परिवार कभी भी शत-प्रतिशत एक जैसा नहीं हो सकता। सभी को अलग-अलग रंग, स्वाद, गन्ध, स्पर्श प्रिय या अप्रिय क्यों लगते हैं? सभी व्यक्तियों की त्वचा का रंग रूप, आकार, संरचना, लम्बाई, स्वभाव, मोटापा अलग-अलग क्यों होता है? कोई मोटा तो कोई दुबला पतला क्यों? कोई लम्बा तो कोई बोना क्यों? किसी का चेहरा आकर्षक तो किसी का बदसूरत क्यों? सभी की स्मरण शक्ति, भूख-प्यास, चिंतन, मनन, तर्क और समझ एक जैसी क्यों नहीं होती?

                जिस प्रकार किसी भी वाहन के प्रत्येक घटक का प्रमुख घटक से संबंध होता है, उसी प्रकार प्रत्येक अंग से संबंधित कुछ शरीर में घटक होते हैं, जो कि गर्भावस्था में विकसित होते है तथा उस समूह से जीवन पर्यन्त संबंधित रहते है, जिस प्रकार संतान अपने माता-पिता से जीवन भर संबंधित रहता है। उन अवयवों, तंत्रों के असंतुलनों से भी संबंधित अंग प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से विशेष प्रभावित होते हैं।

जल और स्वास्थ्य

शरीर में जल के कार्य-

                हवा के पश्चात् शरीर में दूसरी सबसे बड़ी आवश्यकता पानी की होती है। पानी के बिना जीवन लम्बे समय तक नहीं चल सकता। शरीर में लगभग दो तिहाई भाग पानी का होता है। शरीर के अलग-अलग भागों में पानी की आवश्यकता अलग-अलग होती है। जब पानी के आवश्यक अनुपात में असंतुलन हो जाता है तो, शारीरिक क्रियाएँ प्रभावित होने लगती है, अतः हमें यह जानना और समझना आवश्यक है कि पानी का उपयोग हम कब और कैस करें? पानी कितना, कैसा और कब पिये? उसका तापमान कितना हो? स्वच्छ, शुद्ध, हल्का, छना हुआ शरीर के तापक्रम के अनुकूल पानी जन साधारण के लिए उपयोगी होता है। पानी को जितना धीरे-धीरे घूंट-घूंट पीये उतना अधिक लाभप्रद होता है। इसी कारण हमारे यहाँ लोकोक्ति प्रसिद्ध है- ‘खाना पीओ और पानी खाओ’ अर्थात् धीरे-धीरे पानी पीओ।

                हमारे शरीर में जल का प्रमुख कार्य भोजन पचाने वाली विभिन्न प्रक्रियाओं में शामिल होना तथा शरीर की संरचना का निर्माण करना होता है। जल शरीर के भीतर विद्यमान गंदगी को पसीने एवं मलमूत्र के माध्यम से बाहर निकालने, शरीर के तापक्रम को नियंत्रित करने तथा शारीरिक शुद्धि के लिए बहुत उपयोगी तथा लाभकारी होता है। शरीर में जल की कमी से कब्ज, थकान, ग्रीष्म ऋतु में लू आदि की संभावना रहती है। जल के कारण ही हमें, छः प्रकार के रसों-मीठा, खट्टा, नमकीन, कड़वा, तीखा और कषैला आदि का अलग-अलग स्वाद अनुभव होता है।

भोजन के तुरन्त बाद पानी पीना हानिकारक-

                भोजन के तुरन्त पहले पानी पीने से भूख शान्त हो जाती है। बिना भूख भोजन का पाचन बराबर नहीं होता। खाना खाने के पश्चात् आमाशय में लीवर, पित्ताशय, पेन्क्रियाज आदि के श्राव और अम्ल के मिलने से जठराग्नि प्रदीप्त होती है। अतः प्रायः जनसाधारण को पानी पीने की इच्छा होती है। परन्तु पानी पीने से पाचक रस पतले हो जाते हैं, जिसके कारण आमाशय में भोजन का पूर्ण पाचन नहीं हो पाता। फलतः भोजन से जो ऊर्जा मिलनी चाहिए, प्रायः नहीं मिलती। आहर के रूप में ग्रहण किये गये। जिन पौष्टिक तत्त्वों से रक्त, वीर्य आदि अवयवों का निर्माण होना चाहिये, नहीं हो पाता।  अपाच्य भोजन आमाशय और आंतों में ही पड़ा रहता है, जिससे मंदाग्नि, कब्जी, गैस आदि विभिन्न पाचन संबंधी रोगों के होने की संभावना रहती है। दूसरी तरफ अपाच्य भोजन को मल द्वारा निष्काशित करने के लिये शरीर को व्यर्थ में अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। अतः भोजन के पश्चात् जितनी ज्यादा देर से पानी पीयेंगे उतना पाचन अच्छा होता है। प्रायः भोजन के दो घंटें पश्चात् जितनी आवश्यकता हो खूब पानी पीना चाहिए। जिससे शरीर में पानी की कमी न हो।

                प्रारम्भ में जब तक अभ्यास न हो, ठोस भोजन के साथ तरल पदार्थों का भी उपयोग अवश्य करना चाहिये। भोजन की बीच में थोड़ा सा पानी पी सकते हैं, परन्तु वह पानी गुनगुना हो न कि बहुत ठण्डा। खाने के पश्चात् भी आवश्यक हो तो जितना ज्यादा गरम पीने योग्य पानी थोड़ा पी सकते है। भोजन पाचन के पश्चात् पानी पीना पथ्य होता है। भोजन पाचन से पूर्व एक साथ ज्यादा पानी पीने से आंव की वृद्धि होती है। अपच, गैस और कब्ज होता है। जैन साधु और बहुत से श्रावक रात्रि में पानी नहीं पीते। परिणाम स्वरूप सायंकालीन भोजन के तुरन्त पश्चात् उनको पर्याप्त पानी पीना पड़ता है, जिससे उनके पाचन संबंधी रोग होने की संभावना अधिक रहती है। अतः स्वास्थ्य प्रेमी साधकों को सायंकालीन भोजन यथा संभव त्यागना ही उपयुक्त होता हैं परन्तु यदि ऐसा संभव न हो और भोजन के पश्चात् पानी पीना आवश्यक हों तो, जितना गर्म पानी पी सकते हैं, उतना गर्म पानी धीरे-धीरे घूंट-घूंट पीना चाहिए, जिससे आमाशय की गर्मी कम न हो। साथ ही धीरे-धीरे पानी पीने से, पानी के साथ थूक मिल जाने से वह पानी पाचक बन जाता है।

उषापान-

                प्रातःकाल निद्रा से उठने के पश्चात् बिना मुंह धोये अथवा दांतुन या कुल्ला किये रात भर ताम्र पात्र में रखा हुआ अपनी क्षमतानुसार सवा से डेढ लीटर पानी पीना चाहिये। इस क्रिया को उषा पान कहते हैं। रात भर में निःश्वास के साथ जीभ पर विजातीय तत्व जमा हो जाते हैं। इसी कारण दिन भर कार्य करने के बावजूद मुंह में जितनी बदबू नहीं आती, उतनी निद्रा में बिना कुछ खाये ही आती है। ये विजातीय तत्व जब पानी के साथ खाली पेट में पुनः जाते हैं तब औषधि का कार्य करते हैं। अतः उषापान का पूर्ण लाभ बिना दांतुन पानी पीने से ही मिलता है। उसके पश्चात् टहलने अथवा पेट का हलन-चलन वाला व्यायाम (संकुचन और फैलाना) करने से पेट में आंतें एक दम साफ हो जाती है। जिससे पाचन संबंधी सभी प्रकार के रोगों में शीघ्र राहत मिलती हैं। पानी पीने का श्रेष्ठतम समय प्रातःकाल भूखे पेट होता है। रात्रि के विश्राम काल में चयापचय क्रिया द्वारा जो विजातीय अनावश्यक तत्त्व  शरीर में रात भर में जमा हो जाते हैं, उनका निष्कासन गुर्दें, आंते, त्वचा अथवा फेंफड़ों द्वारा होता है। अतः उषापान से ये अंग, सक्रिय होकर समस्त विजातीय पदार्थों को बाहर निकालने में सक्रिय हो जाते हैं। जब तक रात भर में एकत्रित विष भली भांति निष्कासित नहीं होता और ऊपर से आहार किया जाये तो विभिन्न प्रकार के रोग होने की संभावना रहती है। उषापान से बवासीर, सूजन, संग्रहणी, ज्वर, उदर रोग, कब्ज, आंत्ररोग, मोटापा, गुर्दे संबंधी रोग, यकृत रोग, नासिका आदि से रक्त स्राव, कमर दर्द, आंख, कान आदि विभिन्न अंगों के रोगों से मुक्ति मिलती है। नेत्र ज्योति में वृद्धि, बुद्धि निर्मल तथा सिर के बाल जल्दी सफेद नहीं होते आदि अनेक लाभ होते हैं।

                जापान के सिकनेश एसोसियेशन द्वारा प्रकाशित एक लेख में इस बात की पुष्टि की गई है। ऐसे प्रयोग का पूर्ण लाभ तब ही मिलता है जब उपरोक्त विधि से पानी पीने के साथ भोजन के लगभग दो घंटें बाद अथवा आमाशय में भोजन के पाचन के पश्चात् ही पानी पीते हैं।

                उषापान स्वस्थ एवं रोगी दोनों के लिए समान उपयोगी होता है। प्रारम्भ में यदि एक साथ इतना पानी न पी सकें तो, प्रारम्भ में दो गिलास जल से शुरु करें। धीरे-धीरे सवा से डेढ़ लीटर तक मात्रा बढ़ावें। इतना ज्यादा पानी एक साथ पीने पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता। सिर्फ प्रथम कुछ दिनों में अधिक पेशाब आ सकता है। यह प्रयोग सस्ता, सुन्दर, स्वावलम्बी और काफी प्रभावशाली होता है।

गर्म पानी औषधि है-

                ठण्डे पेय तथा फ्रीज में रखा अथवा बर्फ वाला पानी स्वास्थ्य के लिये हानिकारक होता है। स्वस्थ अवस्था में हमारे शरीर का तापक्रम 98.4 डिग्री फारहनाइट यानि 37 डिग्री सेन्टीग्रेड के लगभग होता है। जिस प्रकार बिजली के उपकरण एयर कंडीशनर, कूलर आदि चलाने से बिजली खर्च होती है। उसी प्रकार ठण्डे पेय पीने अथवा खाने से शरीर को अपना तापक्रम नियन्त्रित रखने के लिये अपनी संचित ऊर्जा व्यर्थ में खर्च करनी पड़ती है। अतः पानी यथा संभव शरीर के तापक्रम के आसपास तापक्रम जैसा पीना चाहिये। आजकल सामूहिक भोजों में भोजन के पश्चात् आइसक्रीम और ठण्डे पेय पीने का जो प्रचलन है, वह स्वास्थ्य के लिये बहुत हानिकारक होता है।

                गर्मी स्वयं एक प्रकार की ऊर्जा है और शारीरिक गतिविधियों में उसका व्यय होता है। अतः जब कभी हम थकान अथवा कमजोरी का अनुभव करते हैं तब गर्म पीने योग्य पानी पीने से शरीर में स्फूर्ति आती है। जिन व्यक्तियों को लगातार अधिक बोलने का अर्थात् भाषण अथवा प्रवचन देने का कार्य पड़ता है, जब वे थकान अनुभव करें, तब ऐसा पानी पीने से पुनः ऊर्जा का प्रवाह सक्रिय होता है। लम्बी तपस्या करने वालों के लिये ऐसा पानी विशेष उपयोगी होता है, जिससे शक्ति का संचार होता है। गर्म पानी सर्दी  संबंधी रोगों में क्षीण ऊर्जा को पुनः प्राप्त करने का सरलतम उपाय होता हैं।

                साधारणतया रोजाना पानी को उबालकर पीने से उसमें रोगाणुओं और संक्रामक तत्त्वों की संभावना नहीं रहती। अतः ऐसा पानी स्वास्थ्य के लिये अधिक उपयोगी होता है।

                खाली पेट गर्म पानी से अम्लपित्त जनित हृदय की जलन और खट्टी डकारें आना दूर हो जाता है। गर्म जल सुखी खांसी की प्रभावशाली औषधि है। सहनीय एक गिलास गर्म जल में थोड़ा सा सेंधा नमक डालकर पीने से कफ पतला हो जाता है और अंत में खांसी का वेग बहुत कम हो जाता है। खाली पेट दो गिलास गर्म पानी पीने से मूत्र का अवरोध दूर होता है। जिनके मूत्र पीला अथवा लाल हो, मूत्र नली में जलन हो उनको गर्म जलपान करना चाहिए।

पानी कब न पीना चाहिए?

                चिकनाई वाले पदार्थ अथवा मीठा खाने के तुरन्त बाद पानी पीने से खांसी और गले के रोग होने की संभावना रहती है। धूप में चलकर आने पर अथवा व्यायाम के पश्चात् जब तक पसीना पूरा सूख न जायें पानी नहीं पीना चाहिये, अन्यथा तुरन्त जुकाम होने की संभावना रहती है। चिकित्सकों की दृष्टि से शौच के तुरन्त पश्चात् भी पानी नहीं पीना चाहिये। सोने के लगभग दो घंटे पूर्व तक पानी नहीं पीना चाहिये। विशेषकर ऐसे व्यक्तियों को जिन्हें रात्रि में पेशाब के लिए बार-बार उठना पड़ता है। सोते समय पानी पीने से निद्रा में पेशाब की शंका बनी रहने के कारण गहरी निद्रा आने में बाधा पहुँचती है। एक बार निद्रा भंग होने के पश्चात् पुनः निद्रा सरलता से नहीं आती। अतः ऐसे व्यक्तियों को अधिक समय तक सोये रहना पड़ता है। परिणाम स्वरूप प्रातः जल्दी नहीं उठ पाते।

पानी का उपयोग कैसे करे?

                पानी को छानकर ही प्रयोग करना चाहिए। अगर पानी गंदा हो तो, पीने से पहिले उसको किसी भी विधि द्वारा फिल्टर करना चाहिए। कठोर पानी पीने योग्य नहीं होता। उबला हुआ पानी स्वास्थ्य के लिये लाभप्रद होता है।

                पानी को घूंट-घूंट, धीरे-धीरे चन्द्र स्वर में पीना स्वर में पीना चाहिये और शरीर के तापक्रम पर हो जाने के पश्चात् पानी को निगलना चाहिए।

                प्रत्येक भोजन के डेढ़ से दो घंटें पहले पर्याप्त मात्रा में जलपान करना उत्तम रहता है। ऐसा करने से पेट के अन्दर अपचित आहार जो सड़ता रहता है, पानी में पूर्णतया घुल जाता हैं। पाचन संस्थान एवं पाचक रस ग्रन्थियाँ सबल एवं स्वस्थ बनती है। इसी प्रकार भोजन के दो घंटें पश्चात् मात्रा में जितनी आवश्यकता हो पानी पीना चाहिये, जिससे शरीर में जल की कमी न हों। पर्याप्त मात्रा में जल पीने से पित्ताशय व गुर्दे की पथरी तथा जोड़ों की सूजन व दर्द ठीक होते हैं। रक्त में मिश्रित विकार धुलकर बाहर निकल जाते हैं।

  1. जल से शरीर के अन्दर की गर्मी एवं गंदगी दूर होती है।
  2. खड़े-खड़े पानी पीने से गैस, वात, विकार, घुटने तथा अन्य जोड़ों का दर्द, दृष्टि दोष, श्रवण विकार होते हैं।
  3. थकावट होने अथवा प्यास लगने पर पानी धीरे-धीरे घूंट -घूंट पीना लाभप्रद होता है।
  4. भय, क्रोध, मूच्र्छा, शोक व चोट लग जाने के समय अन्तःश्रावी ग्रन्थियों द्वारा छोड़े गये हानिकारक श्रावों के प्रभाव को कम करने के लिये पानी पीना लाभप्रद होता है।
  5. लू तथा गर्मी लग जाने पर ठंडा पानी व सर्दी लग जाने पर गर्म पानी पीना चाहिये, उससे शरीर को राहत मिलती है। पानी पीकर गर्मी में बाहर निकलने पर लू लगने की संभावना नहीं रहती।
  6. उच्च अम्लता में भी अधिक पानी पीना चाहिए, क्योंकि यह पेट तथा पाचन नली के अन्दर की कोमल सतह को जलन से बचाता है।
  7. दिन में दो घंटें के अन्तर पर पानी अवश्य पीना चाहिए, क्योंकि इससे अन्तःश्रावी ग्रन्थियों का स्राव पर्याप्त मात्रा में निकलता रहता है।
  8. उपवास के समय पाचन अंगों को भोजन पचाने का कार्य नहीं करना पड़ता। अतः वे शरीर में जमे विजातीय तत्त्वों को आसानी से निकालना प्रारम्भ कर देते हैं। अधिक पानी पीने से उन तत्वों के निष्कासन में मदद मिलती है।
  9. पेट में भारीपन, खट्टी डकारें आना, पेट में जलन तथा अपच आदि का कारण पाचन तंत्र में खराबी होता है। अतः ऐसे समय गर्म पानी पीने से पाचन सुधरता है और उपरोक्त रोगों में राहत मिलती है।
  10. डायरिया, हैजा व उल्टी, दस्त के समय उबाल कर ठंडा किया हुआ पानी पीना चाहिये, क्योंकि यह पानी कीटाणु रहित हो जाता है तथा दस्त के कारण शरीर में होने वाली पानी की कमी को रोकता है।
  11. गले और नाक में गर्म जल की वाष्प के बफारे लेने से जुकाम और गले संबंधी रोगों में आराम मिलता है।
  12. पीने वाली अधिकांश दवाईयां में पानी का उपयोग किया जाता है।
  13. अधिकांश ठोस दवाईयां भी चाहें वे एलोपेथिक की टेबलेट हों अथवा आयुर्वेद या अन्य चिकित्सा पद्धति से संबंधित मुंह में लेने वाली दवाईयों को पानी के माध्यम से सरलता पूर्वक निगला जा सकता है।
  14. त्रिफला के पानी से आंखें धोने पर रोशनी सुधरती है। रात भर दाणा मैथी में भिगोया पानी पीने से पाचन संबंधी रोग ठीक होते हैं। प्राकृतिक चिकित्सा में शारीरिक शुद्धि के लिये पानी का अलग-अलग ढंग से उपयोग किया जाता है।
  15. विशेष परिस्थितियों के अतिरिक्त स्नान ताजा पानी से ही करना चाहिये। ताजा पानी रक्त संचार को बढ़ाता है। जिससे शरीर में स्फूर्ति और शक्ति बढ़ती है। जबकि गर्म पानी से स्नान करने पर आलस्य एवं शिथिलता बढ़ती है।

जल चिकित्सा के अनुभूत प्रयोग-

                पानी विभिन्न प्रकार की ऊर्जाओं को सरलता से अपने अन्दर समाहित कर लेता है। अतः आजकल विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों में पानी में आवश्यक ऊर्जा संचित कर रोगी को देने से उपचार को प्रभावशाली बनाया जा सकता है।

  1. सूर्य किरण और रंग चिकित्सा के अन्तर्गत शरीर में जिस रंग की आवश्यकता होती है, उस रंग की कांच की बोतल या बर्तन में पानी को निश्चित विधि तथा धूप में रखने से पानी में उस रंग के गुण आ जाते हैं। ऐसा पानी पीने से रोगों में राहत मिलती है तथा यदि स्वस्थ व्यक्ति पीये तो रोग होने की संभावना नहीं रहती।
  2. पानी को आवश्यकतानुसार चुम्बक पर रखने से उसमें चुम्बकीय ऊर्जा संचित होने लगती है। उस पानी का उपयोग चुम्बकीय चिकित्सक विभिन्न रोगों के उपचार में करते हैं।
  3. सूर्य किरण एवं चुम्बक की भांति पिरामिड के अन्दर अथवा पिरामिड के अन्दर अथवा पिरामिड समूह के ऊपर पानी रखने में उसमें स्वास्थ्यवर्धक गुण उत्पन्न हो जाते हैं, जिसका सेवन करने से रोगों में राहत मिलती है और स्वस्थ व्यक्ति रोग मुक्त रहता है।
  4. पानी को रेकी, रत्नों, मंत्रों अथवा आवश्यकतानुसार स्वर तथा विभिन्न रंगों के बिजली के प्रकाश की तरंगों से भी अर्जित किया जा सकता है। जिसके सेवन से असाध्य एवं संक्रामक रोगों का उपचार किया जा सकता है।
  5. पानी को जैसे बर्तन अथवा धातु के सम्पर्क में रखा जाता है, उसमें उस धातु के गुण उत्पन्न होने लगते हैं। प्रत्येक धातु का स्वास्थ्य की दृष्टि से अपना अलग-अलग प्रभाव होता है।
  6. सोने से ऊर्जित जल पीने से श्वसन प्रणाली के रोग, जैसे-दमा, श्वास फूलना, फेंफड़े संबंधी रोगों,हृदय और मस्तिष्क संबंधी रोगों में लाभ होता हैं।
  7. चांदी से पाचन क्रिया के अवयवों जैसे-आमाशय, लीवर, पित्ताशय, आंतों के अनेक रोगों एवं मूत्र प्रणाली के रोगों में आराम मिलता है।
  8. तांबें में ऊर्जित जल के सेवन से जोड़ों के रोग, पोलियों, कुष्ठरोग, रक्त चाप, घुटनों का दर्द, मानसिक तनाव आदि में काफी लाभ होता हैं।

                उपरोक्त तीनों धातुओं से ऊर्जित निश्चित विधि द्वारा तैयार पेय स्त्री-पुरुष, बच्चों-जवान-वृद्धों सबके लिये  शक्तिवर्धक होने से लाभदायक होता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *