जल का उपयोग कब

जल का उपयोग कब, क्यों, कितना और कैसे करें?

शरीर में जल के कार्य:-

                हवा के पश्चात् शरीर में दूसरी सबसे बड़ी आवश्यकता पानी की होती है। पानी के बिना जीवन लम्बे समय तक नहीं चल सकता। शरीर में लगभग दो तिहाई भाग पानी का होता है। शरीर के अलग-अलग भागों में पानी की आवश्यकता भी अलग-अलग होती हैं। जब पानी के आवश्यक अनुपात में असंतुलन हो जाता है तो शारीरिक क्रियाएँ प्रभावित होने लगती हैं।

                हमारे शरीर में जल का प्रमुख कार्य भोजन पचाने वाली विभिन्न प्रक्रियाओं में शामिल होना तथा शरीर संरचना में सहयोगी अवयवों का निर्माण करना होता हैं। जल शरीर के भीतर विद्यमान गंदगी को पसीने एवं मलमूत्र के माध्यम से बाहर निकालने, शरीर के तापक्रम को नियंत्रित करने तथा शारीरिक शुद्धि के लिए बहुत उपयोगी तथा लाभकारी होता हैं। शरीर में जल की कमी से कब्ज, थकान, ग्रीष्म ऋतु में लूं आदि की अधिक संभावना रहती हैं। जल के कारण ही हमें, छः प्रकार के रसों-मीठा, खट्टा, कड़वा, तीखा और कषैला आदि का अलग-अलग स्वाद अनुभव होता है। अतः हमें यह जानना और समझना आवश्यक है कि पानी का उपयोग हम कब और कैसे करें? पानी कितना, कैसा और कब पीये? उसका तापमान कितना हो?

पानी कैसा पीयें?

                स्वच्छ, शुद्ध, हल्का, छना हुआ, अथवा उबला हुआ पानी स्वास्थ्य के लिए उपयोगी होता है। छने हुए पानी में भी जलवायु एवं वातावरण के अनुसार निश्चित समय पश्चात जीवों के उत्पत्ति की पुनः सम्भावना रहती है। अतः उपयोग लेते समय इस तथ्य की छानबीन कर लेनी चाहिए एवं आशंका होने पर पीने से पूर्व पुनः छानकर ही पीना चाहिए। परन्तु आजकल पश्चिम के अन्धाःनुकरण एवं भ्रामक विज्ञापनों से प्रभावित स्वयं की रोग प्रतिरोधक क्षमता ठीक न होने के कारण मिनरल वाटर के नाम से पुराना, अनछना, हानिकारक प्लाष्टिक बोतलों में बंद महंगा पानी पीने का प्रचलन बढ़ता जा रहा है, सामूहिक प्रसंगों  पर मिनरल वाॅटर के नाम से पानी पर कितने रुपयों का अपव्यय हो रहा है, चिंता का विषय है? जैन साधकों द्वारा कार्य में लिए जाने वाला अचित्त धोवन (गोबर की राख से बना हुआ) पानी, वैज्ञानिक अनुसंधानों के अनुसार अधिक स्वास्थ्यवर्धक होता है, जिस पर पूर्वाग्रह छोड़ समग्र दृष्टिकोण से चिन्तन आवश्यक है।

पानी कैसे पीयें?

                पानी को धीरे-धीरे, घूंट-घूंट, बैठकर, चन्द्र स्वर में पीना लाभप्रद होता है। घूंट-घूंट पानी पीने के साथ थूक मिल जाने से वह पानी पाचक बन जाता है। इसी कारण हमारे यहाँ लोकोक्ति प्रसिद्ध है ‘खाना पीओ और पानी खाओं’अर्थात् धीरे-धीरे पानी पीओ। खड़े-खड़े पानी पीने से गैस, वात विकार, घुटने तथा अन्य जोड़ों का दर्द, दृष्टि दोष एवं श्रवण विकार पनपने की संभावना रहती है।

पानी कब पीएं?

                भोजन पाचन की आमाशय में प्रारम्भिक क्रिया के पश्चात् पानी पीना स्वास्थ्यवर्धक होता है। भोजन पाचन से पूर्व पानी पीने से आंव की वृद्धि, अपच और कब्ज होने की संभावना रहती है। बिना पूर्ण चबाकर भोजन करने वालों को भोजन के दो घंटे पश्चात् जितनी आवश्यकता हो खूब पानी पीना चाहिए, जिससे शरीर में पानी की कमी न हों। भोजन के 1-1/2 से 2 घंटे पहले पर्याप्त मात्रा में जल पीना उत्तम रहता है। ऐसा करने से पेट के अन्दर अपचित आहार जो सड़ता रहता है, पानी में पूर्णतया घुल जाता है। पाचन संस्थान एवं पाचक रस ग्रन्थियाँ सबल एवं स्वस्थ बनती है। दिन में दो तीन घंटे के अन्तर पर पानी अवश्य पीना चाहिए, क्योंकि इससे अन्तःस्रावी ग्रन्थियों का श्राव पर्याप्त मात्रा में निकलता रहता है।

                उच्च अम्लता में अधिक पानी पीना चाहिए, क्योंकि वह पेट तथा पाचन नली के अन्दर की कोमल सतह को जलन से बचाता है। पर्याप्त मात्रा में जल पीने से पित्ताशय व गुर्दे की पथरी तथा जोड़ों की सुजन व दर्द ठीक होते हैं। रक्त में मिश्रित विकार घुलकर बाहर निकल जाते है। भय, क्रोध, मूच्र्छा, शोक व चोट लग जाने के समय अन्तःश्रावी ग्रन्थियों द्वारा छोड़े गये हानिकारक श्रावों के प्रभाव को कम करने के लिये पानी पीना लाभप्रद होता है। डायरिया, हैजा व उल्टी, दस्त के समय उबाल कर ठंडा किया हुआ पानी पीना चाहिये। उपवास के समय पाचन अंगों को भोजन पचाने का कार्य नहीं करना पड़ता। अतः अधिक पानी पीने से शरीर से विजातीय तत्त्वों के निष्कासन में मदद मिलती है।

स्वास्थ्य वर्धक उषापान

                प्रातःकाल बिना कुछ खाये पीये बिना दांतुन एवं कुल्ला कीये, भर पेट पानी पीने को उषा पान कहते हैं। रात भर में निःश्वास के साथ जीभ पर विजातीय तत्व जमा हो जाते हैं। इसी कारण दिन भर कार्य करने के बावजूद मुँह में जितनी बदबू नहीं आती, उतनी निद्रा के पष्चात् बिना कुछ खायें ही आती है। ये विजातीय तत्त्व जब पानी के साथ घुलकर  पेट में पुनः जाते हैं तब औषधि का कार्य करते हैं। अतः उषापान का पूर्ण लाभ बिना दांतुन पानी पीने से ही मिलता है। उसके पश्चात् मूल बंध एवं उड्डियन बंध लगाने, टहलने अथवा पेट का हलन-चलन वाला व्यायाम (संकुचन और फैलाना) करने से पेट में आतें एक दम साफ हो जाती है, जिससे पाचन संबंधी सभी प्रकार के रोगों में शीघ्र राहत मिलती है। पानी पीने का श्रेष्ठतम समय प्रातःकाल भूखे पेट होता है। रात्रि के विश्राम काल में चयापचय क्रिया द्वारा जो विजातीय अनावश्यक तत्त्व शरीर में रात भर में जमा हो जाते हैं, उनका निष्कासन गुर्दे, आंते, त्वचा अथवा फेंफड़ों द्वारा होता है। अतः उषापान से ये अंग, सक्रिय होकर समस्त विजातीय पदार्थो को बाहर निकालने में सक्रिय हो जाते हैं। जब तक रात भर में एकत्रित विष भली भांति निष्काषित नहीं होता और ऊपर से आहार किया जाये तो विभिन्न प्रकार के रोग होने की संभावना रहती है। उषापान से बवासीर, सूजन, संग्रहणी, ज्वर, उदर रोग, कब्ज, आंत्ररोग, मोटापा, गुर्दे संबंधी रोग, यकृत रोग, नासिका आदि से रक्त स्राव, कमर दर्द, आँख, कान आदि विभिन्न अंगों के रोगों से मुक्ति मिलती है। नेत्र ज्योति में वृद्धि, बुद्धि निर्मल तथा सिर के बाल जल्दी सफेद नहीं होते अर्थात् अनेक रोगों में लाभ होता है।

पानी कब नहीं पीना चाहिए?

                चिकनाई वाले पदार्थ अथवा मीठा खाने के तुरन्त बाद पानी पीने से खांसी और गले के रोग होने की संभावना रहती है। धूप में चलकर आने पर अथवा व्यायाम के पश्चात् जब तक पसीना सूख नहीं जायें पानी नहीं पीना चाहिये,  अन्यथा तुरन्त जुकाम होने की संभावना रहती हैं। चिकित्सकों की दृष्टि से शौच के तुरन्त पश्चात् भी पानी नहीं पीना चाहिये। सोने के लगभग दो घंटे पूर्व तक पानी नहीं पीना चाहिये। विशेषकर ऐसे व्यक्तियों को जिन्हें रात्रि में पेशाब के लिए बार-बार उठना पड़ता है। सोते समय पानी पीने से निद्रा में पेशाब की शंका बनी रहने के कारण गहरी निद्रा आने में बाधा पहुँचती है। एक बार निद्रा भंग होने के पश्चात् पुनः निद्रा सरलता से नहीं आती। अतः ऐसे व्यक्तियों को अधिक समय तक सोये रहना पड़ता है। परिणाम स्वरूप प्रातः समय पर जल्दी नहीं उठ पाते।

                खाना खाने के पश्चात् आमाशय में लीवर, पित्ताशय, पेन्क्रियाज आदि के श्राव और अम्ल के मिलने से जठराग्नि प्रदीप्त होती हैं। अतः प्रायः जनसाधारण को पानी पीने की इच्छा होती है परन्तु पानी पीने से पाचक रस पतले हो जाते हैं, जिसके कारण आमाशय में भोजन का पूर्ण पाचन नहीं हो पाता। फलतः भोजन से जो ऊर्जा मिलनी चाहिए, प्रायः नहीं मिलती। आहार के रूप में ग्रहण किये गये जिन पौष्टिक तत्त्वों से रक्त, वीर्य आदि अवयवों का निर्माण होना चाहिये नहीं हो पाता। अपाच्य भोजन, आमाशय और आंतों में ही पड़ा रहता है, जिससे मंदाग्नि, कब्जी, गैस आदि विभिन्न पाचन संबंधी रोगों के होने की संभावना रहती है। दूसरी तरफ अपाच्य भोजन को मल द्वारा निष्काषित करने के लिये शरीर को व्यर्थ में अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। भोजन के पश्चात् पानी पीना अति आवश्यक हो तो गरम-गरम पीने योग्य थोड़ा पानी घूंट-घूंट पी सकते हैं जिससे आमाशय की पाचन क्षमता कम नहीं होती।

गरम पानी औषधि है

                ठण्डे पेय तथा फ्रीज में रखा अथवा बर्फ वाला पानी स्वास्थ्य के लिये हानिकारक होता है। स्वस्थ अवस्था में हमारे शरीर का तापक्रम 98.4 डिग्री फारहनाइट के लगभग होता है। जिस प्रकार बिजली के उपकरण एयर कंडीशनर, कूलर आदि चलाने से बिजली खर्च होती है। उसी प्रकार ठण्डे पेय पीने अथवा खाने से शरीर को अपना तापक्रम नियन्त्रित रखने के लिये अपनी संचित ऊर्जा व्यर्थ में खर्च करनी पड़ती है। अतः पानी यथा संभव शरीर के तापक्रम के आसपास तापक्रम जैसा पीना चाहिये। आजकल सामूहिक भोजों में भोजन के पश्चात् आइसक्रीम और ठण्डे पेय पीने का जो प्रचलन है, वह स्वास्थ्य के लिये बहुत हानिकारक होता है।

                गर्मी स्वयं एक प्रकार की ऊर्जा है और शारीरिक गतिविधियों में उसका व्यय होता है। अतः जब कभी हम थकान अथवा कमजोरी का अनुभव करते हैं तब गरम पीने योग्य पानी पीने से शरीर में स्फूर्ति आती है। जिन व्यक्तियों को लगातार अधिक बोलने का अर्थात् भाषण अथवा प्रवचन देने का कार्य पड़ता है, जब वे थकान अनुभव करें, तब ऐसा पानी पीने से पुनः ऊर्जा का प्रवाह सक्रिय हो जाता है। लम्बी तपस्या करने वालों के लिये ऐसा पानी विशेष उपयोगी होता है, जिससे शक्ति का संचार होता है। गरम पानी कफ एवं सर्दी संबंधी रोगों में क्षीण ऊर्जा को पुनः प्राप्त करने का सरलतम उपाय होता हैं।

                गरम पानी पीने से पेट में भारीपन, खट्टी डकारें आना, पेट की जलन तथा पाचन सुधरता है और उपरोक्त रोगों में राहत मिलती है। गरम जल सुखी खांसी की प्रभावशाली औषधि है। सहनीय एक गिलास गर्म जल में थोड़ा सेंधा नमक डालकर पीने से कफ पतला हो जाता है और अंत में खांसी का वेग बहुत कम हो जाता है। खाली पेट गर्म पानी पीने से मूत्र का अवरोध दूर हो जाता है। हृदय की जलन कम होती है। जिनके मूत्र पीला अथवा लाल आता हो, मूत्र नली में जलन हो, उनको गर्म जल पीने से लाभ होता है।

पानी की दवा कैसे बनाएँ?

                पानी विभिन्न प्रकार की ऊर्जाओं को सरलता से अपने अन्दर समाहित कर लेता है। अतः आजकल विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों में पानी में आवश्यक ऊर्जा संचित कर रोगी को देने से उपचार को प्रभावशाली बनाया जा सकता है। शरीर में जिस रंग की आवश्यकता होती है, उस रंग की कांच की बोतल या बर्तन में पानी को निश्चित विधि तथा धूप में रखने से पानी में उस रंग के गुण आ जाते हैं। चुम्बक पर पानी को रखने से पानी चुम्बकीय ऊर्जा वाला बन जाता है। इसी प्रकार पिरामीड के अन्दर अथवा पिरामीड के ऊपर रखने से पानी में स्वास्थ्यवर्धक गुण उत्पन्न हो जाते हैं। पानी को रेकी, रत्नों, मंत्रों, विभिन्न प्रकार के रंगों के प्रकाश, अलग-अलग धातु के सम्पर्क में रखने से स्फटिक, चुम्बक, धूप, पिरामीड, रंग, रेकी, रत्न, मंत्रों की तरंगों के प्रभाव से पानी में उनसे संबंधित गुणों का समावेश हो जाता है। उस पानी को विभिन्न पद्धतियों के चिकित्सक उपचार हेतु दवा के रूप में उपयोग में लेने का परामर्श देते हैं। पानी को जैसे बर्तन अथवा धातु के सम्पर्क में रखा जाता है, उसमें उस धातु के गुण उत्पन्न होने लगते हैं। प्रत्येक धातु का स्वास्थ्य की दृष्टि से अपना अलग-अलग प्रभाव होता है। सोने से ऊर्जित जल पीने से श्वसन प्रणाली के रोग, जैसे-दमा, श्वास फूलना, फेफड़ों संबंधी रोगों, हृदय और मस्तिष्क संबंधी रोगों में लाभ होता है। चांदी से पाचन क्रिया के अवयवों, जैसे-आमाशय, लीवर, पित्ताशय, आंतों के अनेक रोगों एवं मूत्र प्रणाली के रोगों में आराम मिलता है। तांबे में ऊर्जित जल सेवन से जोड़ों के रोग, पोलियो, कुष्ठरोग, रक्त चाप, घुटनों का दर्द, मानसिक तनाव आदि में काफी लाभ होता है। स्नायु संस्थान शक्तिशाली होता है। इसी कारण पीने के पानी को प्लास्टिक के बर्तनों, बोतलों एवं पाउचों में संग्रह नहीं करना चाहिए क्योंकि उसमें प्लास्टिक के हानिकारक रसायनों के प्रभाव की संभावना रहती है।

                सारांश यही है कि पानी के विवेकपूर्ण एवं आवश्यकतानुसार सही उपयोग से हम स्वस्थ जीवन जी सकते हैं, रोगों से बच सकते हैं, तथा रोग होने की स्थिति में पुनः स्वस्थ हो सकते हैं।

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