मांसाहार स्वास्थ्य के लिए हानिकारक

मांसाहार स्वास्थ्य के लिए हानिकारक


                अज्ञान सभी दुःखों का मूल है। अज्ञान के कारण ही मानव सद्चिन्तन से अलग हो अपना भला-बुरा सोचने में असमर्थ है तथा मन एवम् इन्द्रियों का गुलाम बन लक्ष्यहीन जीवन जी रहा है। विज्ञान की दुहाई देने वाले सत्य को जानते एवं मानते हुए भी नकार रहे हैं। उनका जीवन प्रदर्शन, विज्ञापन एवं शीघ्रातिशीघ्र लाभ पाने की भावना से दीर्घकालीन दुष्प्रभावों को समझने में असमर्थ होता जा रहा है। आज का मानव विवेक शून्य बन आँखें होते हुए भी ठोकरें खा रहा है, तथा अमूल्य मानव जीवन को विषय कषायों की तृप्ति के क्षणिक आनन्द में व्यर्थ गंवा सच्चे सुख से वंचित हो रहा है और दीर्घकाल तक स्वस्थ रहने की कला भूल रहा है। स्वस्थ रहने के लिये शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक संतुलन आवश्यक होता है परन्तु संतुलित आहार की प्रेरणा देने वालों का चिन्तन क्षणिक लाभ तक ही सीमित हो रहा है। वे जानते हैं कि मानसिक स्थिति का मनुष्य की स्वस्थता में बहुत बड़ा योगदान होता है, फिर भी वे उसको नकार रहे हैं। जो आहार हमारी मानसिकता को बिगाड़ता है वह कैसे संतुलित आहार माना जा सकता है? यह सभी बुद्धिमान व्यक्तियों के लिये चिन्तन का प्रश्न है। अतः मेरा सभी व्यक्तियों से विनम्र अनुरोध है कि वे निम्न बिन्दुओं पर चिन्तन कर अपने आहार के बारे में सही फैसला करें, कहीं वे गलत धारणाओं के शिकार तो बने हुए नहीं हैं?

मांसाहार हेतु मारे जाने वाले जानवरों के रोगों का प्रभाव-

                क्या जिन जानवरों का वध किया जाता है, उन पशुओं के स्वास्थ्य का परीक्षण होता है? कहीं वे असाध्य रोगों से पीड़ित तो नहीं होते? कहीं मांस के साथ जानवरों के रोग एवं मवाद तो मांसाहार करने वालों के शरीर में प्रवेश नहीं करते? ‘जहर उबालने से अमृत नहीं बन जाता।’

जैसा खाये अन्न वैसा होये मन-

                क्या जानवर हँसते-हँसते अपनी इच्छा से मरता है? जिस निर्दयता, क्रूरता, बेरहमी से उनको मारा जाता है, उस वातावरण से उत्पन्न तनाव, भय, घबराहट, छटपटाहट आदि पशुओं के मांस को विषैला बना देते हैं, जो मांसाहार के साथ मांसाहारियों के शरीर में प्रवेश कर भविष्य में अनेक असाध्य रोगों का कारण बनते हैं, उनकी मानसिकता को विकृत बनाने में सहायक होते हैं। इसीलिए तो कहा है-“जैसा खावे अन्न वैसा होवे मन”।

मांसाहार में रोग के कीटाणुओं की उत्पत्ति-

                चेतनाशील जीवों में मृत्यु के पश्चात् हानिकारक कीटाणुओं की उत्पत्ति अधिक एवं शीघ्र होती है। इसी कारण मृत्यु होने के पश्चात् मृतक को जल्दी से जल्दी जलाया अथवा दफनाया जाता है। शवयात्रा में भाग लेने वाले अपने शरीर की शुद्धि हेतु प्रायः स्नान करते हैं। क्या पशुओं का वध करते ही मांस का भक्षण कर लिया जाता है? अगर नहीं तो क्या तब तक उसमें हानिकारक कीटाणु उत्पन्न हो आसपास के वातावरण को दूषित नहीं करते? क्या मांसाहारियों का पेट मृत जानवरों का कब्रिस्तान है?

विपरीत गुण वाले रक्त का दुष्प्रभाव-

                रोगी को जब रक्त की आवश्यकता होती है तब डाॅक्टर उस रोगी के ग्रुप का ही रक्त क्यों देते हैं? क्या मांसाहारी ऐसा दावा कर सकते हैं कि मांस के साथ जो खून का अंश पेट में जाता है, वह उनके ग्रुप का ही होता है? क्या विपरीत गुण वाला रक्त एवं मांस शरीर में हानि तो नहीं पहुँचावेगा?

मानव के लिये शाकाहार आवश्यक-   

                क्या कोई व्यक्ति लम्बे समय तक के लिए सिर्फ अकेले मांसाहार पर निर्भर रह सकता है? नहीं ! उसको शाकाहार तो करना ही पड़ता हैं। परन्तु अकेले शाकाहार पर व्यक्ति जीवन भर रह सकता है। अतः स्पष्ट है कि मनुष्य की शारीरिक रचना शाकाहार के लिये ही उपयुक्त है, मांसाहार के लिये नहीं। पेट्रोल की गाड़ी डीजल या केरोसिन ज्यादा नहीं चल सकती। उसी प्रकार शाकाहारी संरचना वाला मानव यदि मांसाहार करेगा तो जल्दी रोग ग्रस्त होगा।

दूषित तरंगों के दुष्प्रभाव-

                आज तरंगों के महत्त्व से कौन परिचित नहीं? टी.वी., रेडियो, स्टेशनों से प्रसारित रंग, रूप, शब्द एवं दृश्यों की तरंगे क्षण मात्र में सारे विश्व में प्रसारित हो जाती हैं एवं उन दृश्यों को हजारों मील दूर बैठा व्यक्ति उसी क्षण देख सकता है। दूरस्थ चिकित्सा अथवा डाउजिंग करने वाले हजारों मील दूर बैठे व्यक्ति के शरीर के छोटे-से-छोटे अवयव जैसे रक्त की बून्द, नाखून, बाल, थूक आदि के माध्यम से रोग का निदान एवं उपचार करते हैं। तब क्या मांसाहार के साथ शरीर में प्रवेश करने वाली मरे हुए जानवरों की बददुआओं की तरंगें मानव के आचार-विचार, रहन-सहन, चिन्तन-मनन को प्रभावित नहीं करेंगी? दया धर्म का मूल है और हिंसा पाप का मुख्य कारण है। मांसाहार निरापराध प्राणियों के साथ घोर विश्वासघात है। विश्वासघात महा पाप है। इसीलिये सभी धर्मों में अहिंसा, करुणा, दया, प्रेम, सहानुभूति, परोपकार को धर्म माना गया है तथा दूसरों को दुःख देने को महापाप बतलाया गया है। सभी धर्म प्रवर्तकों ने मांसाहार का निषेध किया। परन्तु उन्हीं के अनुयायी आज पशुबलि एवं कुर्बानी के नाम पर अपनी स्वाद-लोलुप स्वार्थी प्रवृत्ति के कारण हिंसा में लिप्त हों, मांसाहार की प्रेरणा करें, कितना विसंगत है?

मांसाहार कितना न्याय संगत?

                अगर कोई मनुष्य को खा जाता है तो उसको नरभक्षी कहा जाता है। ऐसे जानवरों को लोग जिन्दा नहीं रहने देते। परन्तु मांसाहारी जीवन-पर्यन्त कितने प्राणियों की हत्या कर खाता है, फिर भी ऐसे मानव को सभ्य, बुद्धिमान मानना कदापि न्याय संगत नहीं है।

जैसा करेगे वैसा फल मिलेगा-

                यदि आपके बच्चे को कोई मार डाले, उस पर क्रूरता करे, अत्याचार करे तो क्या उस व्यक्ति पर आप प्रसन्न होंगे? कभी नहीं। यथाशक्ति आप उसको दण्ड देंगे। अतः अपनी सुरक्षा एवं प्रसन्नता चाहने वालों को दूसरों की सुरक्षा एवं खुशी प्रदान करना चाहिये। प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जीवों पर होने वाली क्रूरता में सहभागी नहीं बनना चाहिये, जो प्राण हम दे नहीं सकते उसको लेने का हमें कोई अधिकार नहीं। यह अपनी नीचता, स्वार्थ एवं ताकत का दुरुपयोग है, कायरता है, प्रकृति के नियमों का उल्लंघन है तथा अन्याय, अत्याचार का प्रतीक है, जिसका परिणाम मांसाहारियों को भविष्य में निश्चित रूप से भुगतना ही पडे़गा।

                “सुख दिया सुख होत है” हमें वही मिलता है जो हम दूसरों को देते हैं। यह जगत क्रिया-प्रतिक्रिया, ध्वनि-प्रतिध्वनि से युक्त है। घृणा या प्रेम जो भी हम देंगे वहीं हम पर लौटकर आने वाला है। जैसा बीज बोयेंगे वैसा ही फल मिलेगा। अतः सारे प्राणी जगत की हम से अपेक्षा है कि जैसा हम दूसरों से चाहते हैं, वैसा ही व्यवहार अन्य जीवों के प्रति करें। प्रकृति का दण्ड देने का अपना अलग ही विधान है। “वहाँ देर हो सकती है अंधेर नहीं है” जो प्रकृति के इस अटूट सिद्धान्त को नकारता है, उसको पछताना पड़ता है। अपराध के प्रथम प्रयास में दण्ड से बच जाने वाला यदि अपनी सफलता पर गर्व करे, तो यह उसकी मूर्खता ही समझनी चाहिये।

मांसाहार और अध्यात्म –

                सभी धर्म प्रवृत्तकों ने मांसाहार का निषेध किया। परन्तु उन्हीं के अनुयायी अपनी स्वाद लोलुप प्रवृति के कारण अज्ञान, अविवेक एवं सम्यक् चिन्तन के अभाव में भ्रामक कुतकों का सहारा ले धर्म के नाम पर पशुबली या कुर्बानी करें कितना विसंगतक है? प्रायः किसी भी धार्मिक कार्य को धार्मिक स्थानों में करने की मनाई नहीं होती। यदि कुर्बानी में धर्म होता तो मस्जिदों में कुर्बानी का निषेध नहीं होता।

                जिस कार्य को धर्म स्थानों में करने का निषेध हो, उसको कैसे धर्म माना जा सकता है? सभी चिन्तनशील व्यक्तियों को चिन्तन कर धर्म के नाम पर होने वाली कुर्बानी को रोकने हेतु पहल करनी चाहिए।

मांसाहार अज्ञानता का प्रतीक –

                उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि मांसाहार हानिकारक है, दुःखदायी है, रोगों से प्रेम कराने वाला है, पाशविक वृत्तियाँ बढ़ाने वाला है, व्यक्ति को क्रूर, निर्दय, हृदयहीन, असंवेदनशील, असंयमी, पापी बनाने वाला है।  अतः मानवीय आहार कैसे हो सकता है? स्वास्थ्य की दृष्टि से मांसाहार से लाभ कम हानियाँ ज्यादा है। मांसाहार घाटे का सौदा है। अतः जो मांसाहार की प्रेरणा देने वाले हैं वे उसके दुष्प्रभावों की अनदेखी कर जनसाधारण को गुमराह कर रहे हैं। सत्य की अपने अनुकूल व्याख्यायें कर असत्य पोषण कर रहे हैं।

मांसाहार के प्रति स्वास्थ्य मंत्रालय की उपेक्षा –

                आज हमारा दुर्भाग्य है कि हमारा स्वास्थ्य मंत्रालय अपनी असजगता, अनैतिकता, अदूरदर्शिता, पूर्वाग्रह एवं अज्ञान के कारण उपर्युक्त तथ्यों पर ईमानदारी पूर्वक चिन्तन नहीं कर रहा है, अपितु मांसाहार को प्रोत्साहन देकर जनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहा है। परिणामस्वरूप रोग एवं रोगियों की संख्या में तीव्र गति से वृद्धि हो रही है। राष्ट्र में प्रदूषण बढ़ रहा है। पर्यावरण बिगड़ रहा है। अन्याय, अत्याचार बढ़ रहे हैं। भूकम्प एवं अन्य प्राकृतिक आपदाओं की संभावनाएँ अधिक हो गयी है। स्वास्थ्य के नाम पर होने वाला अरबों रुपयों का खर्च स्वास्थ्य सुधारने के बजाय बिगाड़ने में सहायक बन रहा है।

खान-पान में बुद्धिमान कौन?

                अपने स्वास्थ्य की रक्षा करने वाला या उपेक्षा करने वाला? अपनी क्षमताओं का सदुपयोग करने वाला अथवा दुरूपयोग या अपव्यय करने वाला? दयालु या क्रूर, स्वार्थी या परमार्थी?, अहिंसक या हिंसक? अन्य प्राणियों के प्रति मैत्री और प्रेम का आचरण करने वाला या द्वेष और घृणा फैलाने वाला? जीओं और जीने दो के सिद्धान्तों को मानने वाला या दूसरों को स्वार्थ हेतु कष्ट देने वाला, सताने वाला या नष्ट करने वाला उपर्युक्त मापदण्डों के आधार पर ही मनुष्य को सभ्य, सजग, सदाचारी और बुद्धिमान अथवा असभ्य, असजग, दुराचारी और मूर्ख समझा जाता है। अपने-अपने खाने की आदतों के आधार पर हम स्वयं निर्णय करें कि हमारा खान-पान कितना बुद्धिमत्तापूर्ण हैं?

                सारांश यही है कि मांसाहार स्वास्थ्य की दृश्टि से हानिकारक, आर्थिक दृश्टि से महंगा, आध्यात्मिक दृश्टि से नीच गति में ले जाने वाला, मानवीय गुणों का नाश करने वाला, पर्यावरण की दृश्टि से प्रकृति में असंतुलन पैदा करने वाला तथा न्याय की दृश्टि से अन्याय का पोषण करने वाला है। अतः जो मांसाहार करते हैं, करवाते हैं अथवा करने वालों को अच्छा समझते हैं, वे सभी असजग हैं। असंस्कारित है। अमानवीय हैं। अपनी रसनेन्द्रिय के गुलाम, स्वाद लोलुप हैं। पराधीन एवं परालम्बी हैं। उदासीन हैं। भ्रमित हैं। स्वयं के प्रति भी ईमानदार नहीं हैं। वास्तव में जो बुराई को जानते, मानते हुए भी जो न स्वीकारे उस व्यक्ति, समाज, सरकार को कैसे बुद्धिमान समझा जाए, प्रत्येक चिन्तनशील प्राणी के लिये चिन्तन का प्रश्न है?

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