महावीर का स्वास्थ्य चिन्तन

महावीर का स्वास्थ्य चिन्तन


आत्म दर्शन स्वास्थ्य का मूलाधारः-

                महावीर का दर्शन मौलिक रूप से स्वास्थ्य और चिकित्सा का दर्शन नहीं है, वह तो आत्मा से आत्मा का दर्शन है। परन्तु जब तक आत्मा मोक्ष को प्राप्त नहीं हो जाती तब तक, आत्मा शरीर के बिना रह नहीं सकती। शरीर की उपेक्षा कर आत्म-शुद्धि हेतु साधना भी नहीं की जा सकती। महावीर की दृष्टि में शरीर का आत्म-साधना हेतु महत्त्व होता है, इन्द्रियों के विषय भोगों के लिए नहीं। उनका अधिकांश चिन्तन आत्मा  को केन्द्र में रख कर हुआ, परन्तु उन्होंने शरीर के निर्वाह हेतु केवल ज्ञान के आलोक में, जिस सम्यक् जीवन शैली का कथन किया, वह स्वतः मानव जाति के स्वास्थ्य का मौलिक शास्त्र बन गया। महावीर के स्वास्थ्य दर्शन को समझने के लिए उनके द्वारा कथित आत्मा और शरीर के संबंधों तथा एक दूसरे को प्रभावित करने वाले तथ्यों का ज्ञान आवश्यक हैं।

आत्म-शुद्धि और चेतना का विकासः-

                महावीर की दृष्टि में शुद्धात्मा-अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त शक्ति और अनन्त आनन्द का स्रोत होती है तथा उस अवस्था में स्वास्थ्य की कोई समस्या नहीं होती। जितनी-जितनी उसकी मलिनता, उतनी-उतनी स्वास्थ्य की समस्या। परन्तु जब वह कर्मो के आवरणों से आच्छादित हो जाती है तो, आवरण के धनत्व के अनुसार उसकी सारी शक्तियां सीमित हो जाती है तथा वह मुख्य रूप से नरक, तिर्यचं मनुष्य और देव गति में भटकती रहती है। उसके जन्म और मृत्यु का चक्र चलता रहता है। कर्मो के अनुसार ही किसी भी योनि में उसे शरीर के साथ इन्द्रियाँ और मन उपलब्ध होते हैं। एकेन्द्रिय वाले जीव में मात्र स्पर्शेन्द्रिय अर्थात् शरीर ही होता है। दो इन्द्रिय वाले जीवों में शरीर के साथ-साथ रसनेन्द्रिय, तीन इन्द्रिय जीवों को शरीर, रसनेन्द्रिय और ध्राणेन्द्रिय (गंध का ज्ञान कराने वाली) मिलती है। चार इन्द्रिय वाले जीवों को स्पर्शेन्द्रिय, रसनेन्द्रिय, घ्राणेन्द्रिय और चक्षु इन्द्रिय (नेत्र) प्राप्त होते हैं। पंचेन्द्रिय जीवों को चारों इन्द्रियों के साथ श्रवणेन्द्रिय (सुनने की शक्ति) मिलती है। चेतना का और अधिक विकास होने पर उसे पाँचों इन्द्रियों के साथ मन मिलता है। इस दृष्टि से मानव कर्मो से युक्त आत्म चेतना के विकास का सर्वोच्य स्तर होता है।

षट् द्रव्य का सिद्धान्तः-

                किसी भी पदार्थ के मौलिक गुण उसमें सदैव विद्यमान रहते हैं। भले ही उनके अनुपात में घटत बढ़त हो सकती है, परन्तु उनकी अवस्थाएँ प्रति क्षण बदलती रहती हैं। पदार्थ के गुण एवं पर्याय (अवस्था) के योग को महावीर ने द्रव्य बतलाया। प्राणी मात्र की  समस्त परिस्थितियों का निर्माण, विनाश, संचालन और नियन्त्रण जिन शाश्वत द्रव्यों के बिना संभव नहीं होता, ऐसे छः द्रव्यों का महावीर ने कथन किया, जो अपने अपने गुणों के अनुसार इस लोक की सारी गतिविधियों के संचालन में सहयोग देते हैं।

धर्मास्तिकायः-

                जो द्रव्य हलन-चलन में सहायक होता है, जिसके अभाव में हलन-चलन संभव नहीं हो सकता। जहाँ-जहाँ धर्मास्तिकाय होता है वहीं तक जीव गमनागम कर सकता है। मृत्यु के पश्चात् जीव एक योनि से दूसरी योनि में, इसी द्रव्य की सहायता से जाता है। स्थूल जगत में हलन-चलन में सहायक वायु उस अवस्था में प्रभावहीन हो जाती है। आधुनिक विज्ञान भी उस ऊर्जा को अभी तक नहीं खोज पाया, जिसका महावीर ने कथन किया।

अधर्मास्तिकायः-

                यह द्रव्य हलन-चलन में अवरोध उत्पन्न करता है। अर्थात् वाहन में बे्रक की भांति कार्य करता है। इसी द्रव्य के कारण शरीर में सारे अंग, उपांग, स्नायु, अस्थियाँ, इन्द्रियाँ आदि अपने-अपने स्थान पर स्थिर रह सकते हैं। जिसके लिए भी आधुनिक विज्ञान के पास भी कोई तर्क संगत स्पश्टीकरण नहीं है।

आकाशास्तिकायः-

                यह द्रव्य अन्य सभी पदार्थों को स्थान देता है। इसी कारण हलन-चलन और तरंगों आदि का प्रवाह संभव होता है।

पुद्गलास्तिकायः-

                शब्द, गंध, रस, स्पर्श एवं वर्ण पुद्गलों आदि से युक्त पदार्थ पुद्गल होता है। सारा लोक पुद्गलों से ठसाठस भरा हुआ है। ये पुद्गल इन्द्रियों, मन आदि के ग्राह्य किया जाता है, उसी के अनुरूप परिस्थितियों का निर्माण होने लगता है। एक ही स्थान पर बोया गया नीम और गन्ना, इसी कारण समान जल वायु, धरती, पानी, धूप एवं हवा के बावजूद, गन्ना मधुर रस वाला और नीम के कड़वा स्वाद विकसित होता है। शरीर में इन पुद्गलों का आवश्यक अनुपात न होना अथवा अनावश्यक पुद्गलों की अधिकता से होने वाली स्थिति से रोग उत्पन्न होते हैं।

                गंध, स्पर्श, स्वाद, ध्वनि, त्राटक आदि चिकित्साएँ इन पुद्गलों के सिद्धान्तों पर कार्य करती है, तथा उन्हें संतुलन करने से ही प्रभावशाली बनती है। पुद्गलों के प्रसारण एवं पुनः आकर्षण के कारण ही सारे संचार माध्यम, इंटरनेट, टी.वी., टेलीफोन, कम्प्यूटर, रेडियों आदि कार्य करते हैं। सारे शारीरिक और मानसिक रोगों के कारण भी अशुभ कर्म के पुद्गलों का उद्भव एवं असंतुलन से होता है। महावीर ने बिना किसी सूक्ष्म यंत्र इन पुद्गलों का कथन कैसे किया, आधुनिक विज्ञान के शोध का विषय है?

काल द्रव्यः-

                समय जो पुराने को नवीन और नवीन को पुराना बनाता है। समय, सैकेण्ड, मिनट, घंटे, दिन, मास, वर्ष आदि काल द्रव्य सूचक होते हैं।

जीवास्तिकायः-

                उपयोग युक्त चेतनामय तत्त्व जीव होता है। जिनमें ये दोनों गुण न हों, वे अजीव होते हैं। महावीर ने संसार के सारे पदार्थों का दो प्रकार से कथन किया। जीव या चेतन और अजीव अर्थात् जड़ या अचेतन। जीव में अनुभव और संवेदन करने की क्षमता होती है। स्वास्थ्य का सारा चिन्तन और समस्याएँ जीव को ही होती है। मृत्यु के पश्चात् शरीर में से चेतना के निकल जाने के पश्चात्, इसी कारण जड़ शरीर को जल्दी नष्ट कर दिया जाता है। क्योंकि मृत शरीर में जीव के लक्षण समाप्त हो जाते हैं। अजीव में संवेदन और अनुभव करने की क्षमता नहीं होती और न उनमें सजातीय पदार्थो को पैदा करने की क्षमता ही होती है। जीव सदैव अरूपी होता है, परन्तु उसका अनुभव किया जा सकता है। परन्तु अजीव रूपी और अरूपी दोनों ही हो सकते हैं। जो स्थूल दृष्टि अथवा भौतिक यंत्रों से देखे जा सकते हैं, उन्हें रूपी पदार्थ, परन्तु जिनको इन माध्यमों से देखना संभव नहीं होता, वे अरूपी पदार्थ कहलाते हैं। सभी जीवों में आत्मा समान होती है, परन्तु कर्मो के आवरण के अनुसार चेतना के विकास में अन्तर होता है। इसी आधार से प्रथम पांच द्रव्य अजीव की श्रेणी में आते हैं, जबकि छठा द्रव्य जीव होता है। सभी द्रव्य एक दूसरे से प्रभावित होते हैं।

महावीर की शरीर संबंधी अवधारणाः-

                महावीर की दृष्टि से जब जीव मानव योनि में आता है तो, उसे पाँच प्रकार के शरीर मिल सकते हैं।

  1. औदारिक या स्थूल शरीर- जो पंच द्रव्यों और सप्त धातुओं (अवयवों) से बनता है।
  2. वैक्रिय शरीर- जिसको इच्छानुसार घटाया, बढ़ाया अथवा छोटा-बड़ा किया जा सकता है।
  3. आहारक शरीर- जिसकी संरचना उच्च साधकों द्वारा संकल्प की तरंगों से की जा सकती है। साधारण व्यक्ति नहीं कर सकता।
  4. तेजस शरीर (विद्युत शरीर)- यह सूक्ष्म शरीर होता है।
  5. कार्मण अथवा कर्म शरीर- सूक्ष्मतम शरीर होता है, जो कर्म पुद्गलों से बनता है।

                वैक्रिय और आहारक शरीर की प्राप्ति मानव जीवन में चेतना की उत्कृष्ट स्थिति वाले साधकों को साधना द्वारा ही प्राप्त होती है। अतः मोटे रूप से प्रत्येक मानव को स्थूल, सूक्ष्म और सूक्ष्मतम शरीर ही प्राप्त होते हैं। तेजस् और कार्मण शरीर आत्मा की मलीन अवस्था में सदैव उसके साथ रहते हैं तथा मृत्यु के समय जब तक आत्मा पूर्ण रूप से शुद्धावस्था को प्राप्त नहीं हो जाती, स्थूल शरीर ही नष्ट होता है, सूक्ष्म शरीर समाप्त नहीं होता। परन्तु अधिकांश आधुनिक प्रचलित चिकित्सा पद्धतियाँ उपचार को मात्र स्थूल शरीर तक ही सीमित रखती है। रोग के मूल कारण कर्मो तक उनका सोच प्रायः नहीं होता। इसी कारण जन्मजात रोगों एवं मृत्यु का रहस्य उनके पूर्ण समझ में नहीं आ पाता।

                इन तीनों शरीरों का स्वास्थ्य के साथ गहरा संबंध होता है। शक्तिशाली सूक्ष्म दर्शक यंत्रों की खोज से भी स्थूल शरीर के रहस्यों को तो जाना जा सकता है। परन्तु सूक्ष्म और सूक्ष्मतम शरीर को अभी भी नहीं देखा जा सकता। फिर भी उनका स्थूल शरीर पर प्रभाव पड़ता है। जिसका प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता है। कर्म शरीर में जितने स्पन्दन होते हैं, वे स्थूल शरीर में अपना संबंध स्थापित करते हैं। स्थूल शरीर सूक्ष्म शरीर का संवादी होता है।

चित्त, भाव, मन, वाणी और शरीर का संबंधः-

                भगवान् महावीर ने आत्मा के अस्तित्व से जुड़े चित्त, मन, भाव, वाणी, शरीर, इन्द्रियों आदि का जितना स्पष्ट तथ्यपरक विवेचन किया, उतना अन्यत्र नहीं मिलता। जीवन से हमारा परिचय शरीर, वाणी और मन के माध्यम से होता है। जिसका आधार मन और चित्त से भी परे हमारी आत्मा है। हमारी चेतना सूर्य के समान होती है और उसकी एक किरण का नाम होता है चित्त। चित्त चौतन्य मय होता है तथा सूक्ष्म शरीर द्वारा संचालित होता है। चित्त से ही भाव, मन और वाणी का उत्पाद होता है। अतः भाव, मन और वाणी चित्त द्वारा संचालित होते हैं। चित्त मन की भांति अस्थायी नहीं होता है। दीर्घ जीवी होता है। हमारी सारी चेतना का प्रवाह चित्त से ही होता है। सूक्ष्म शरीर का दूसरा उत्पाद होता है। स्थूल शरीर एवं इन्द्रियाँ। हमारे मन का कोई भाव हम छिपाकर नहीं रख पाते। वह किसी न किसी रूप में प्रकट हो ही जाता है। परोक्ष रूप से छिपे हुए भाव भी हमारे अन्दर निरन्तर क्रियाशील रहते हैं और अपनी अभिव्यक्ति का मार्ग खोज निकालते हैं। शरीर में पनपने वाले असाध्य रोग भी हमारी छिपी भावनाओं को ही अभिव्यक्त करते हैं। हमारी अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ भाव के अनुसार ही शरीर में हारमोन्स अथवा रसायनों का निर्माण करती है फलस्वरूप हम अच्छी या बुरी, करणीय अथवा अकरणीय प्रवत्तियाँ करने लगते हैं। अतः अधिकांश रोगों का मूल कारण प्रायः भावनात्मक स्तर पर होता है और जब तक उसमें परिवर्तन नहीं आता, आरोग्य लाभ नहीं मिल सकता। क्षणिक आने वाले भाव तो हमें बहुत प्रभावित नहीं करते, परन्तु लम्बे काल तक बना रहने वाला भावात्मक असंतुलन संस्कार बन गहरा प्रभाव दिखाता है।

                सूक्ष्म शरीर से कर्म विपाक के अनुसार जो स्पन्दन आते हैं,  वे चित्त को प्रभावित करते हैं। जिससे चित्त मस्तिष्क के साथ कार्य करने वाले भावों का निर्माण करता है तथा उन भावों की अभिव्यक्ति के लिये दो सहयोगी तंत्रों का निर्माण करता है और वे होते हैं, मन और वाणी। इस प्रकार मस्तिष्क-चित्त और स्थूल शरीर का संगम स्थल होता हैं। अतः मन और चित्त एक नहीं, अलग-अलग होते हैं। मन चंचल होता है। चित्त बुद्धि और विवेक से उस पर नियन्त्रण रखने की क्षमता रखता है। मन कुछ भी नहीं होता और सब कुछ भी होता है। मन का कोई स्थायी अस्तित्व नहीं होता परन्तु जब अस्तित्व में होता है तो सब कुछ बन जाता है, परन्तु यदि हम मन को पैदा न करें तो मन कुछ भी नहीं होता। मन को विराम दिया जा सकता है। स्वास्थ्य का संबंध मन के साथ बहुत कुछ जुड़ा होता है। मन स्वस्थ तो शरीर स्वस्थ और मन अस्वस्थ तो शरीर अस्वस्थ।

प्राण ऊर्जा और उसके स्रोतः-

                भगवान महावीर के सिद्धान्तानुसार जब मानव का जीव गर्भ में आता है तो, उसे अपने कर्मो के अनुसार आहार, शरीर, इन्द्रिय, श्वासोच्छवास, भाषा और मन रूपी छः पर्याप्तियाँ मूल ऊर्जा के स्रोत (Bio Potential Energy Source) प्राप्त होते हैं। प्रत्येक पर्याप्ति अपने-अपने गुणों के अनुसार पुद्गलों को आकर्षित कर मानव शरीर का विकास करती है। जिन्हें ये शक्तियाँ पूर्ण रूप से प्राप्त होती है, उनका सम्पूर्ण एवं संतुलित विकास होता है तथा जिन्हें ये पर्याप्तियाँ आंशिक रूप में प्राप्त होती हें उनका विकास आंशिक ही होता है।

                महावीर ने चेतना के विकास में इन्द्रियों के स्वतंत्र अस्तित्व का कथन किया। जबकि अन्य दर्शनों एवं चिकित्सा वैज्ञानिकों ने उनकी शरीर के एक अवयव तक ही कल्पना की। उनका सम्बन्ध पंच तत्त्वों में से किसी तत्त्व अथवा अंग तक ही सीमित कर दिया। ये जीवनी शक्तियाँ कार्य के अनुसार मुख्य रूप से दस भागों में रूपान्तरित हो मानव की समस्त गतिविधियों का संचालन करती हैं। जिन्हें प्राण भी कहते हैं। प्राण जीवन शैली को शक्ति प्रदान करती है। प्रत्येक प्राण अपने लिये आवश्यक पुद्गलों को आसपास के वातावरण से ग्रहण कर अपने-अपने कार्य कर सकते हैं।

श्रोत्रेन्द्रिय बल प्राण-          जिससे सुनने योग्य पुद्गलों को आकर्षित करने की शक्ति प्राप्त होती है।

चक्षु इन्द्रिय बल प्राण-       जिससे देखने योग्य पुद्गलों को आकर्षित करने की शक्ति प्राप्त होती है।

घ्राणेन्द्रिय बल प्राण-         जिससे गंध योग्य पुद्गलों को आकर्षित करने की शक्ति प्राप्त होती है।

रसनेन्द्रिय बल प्राण-        जिससे स्वाद योग्य पुद्गलों को आकर्षित करने की शक्ति प्राप्त होती है।

स्पर्शन्द्रिय बल प्राण-        जिससे स्पर्श योग्य पुद्गलों को आकर्षित करने की शक्ति प्राप्त होती है।

श्वासोच्छ्वास बल प्राण-      जिससे श्वसन योग्य योग्य पुद्गलों को आकर्षित करने की शक्ति प्राप्त होती है।

मन बल प्राण-                जिससे मनोवर्गणा योग्य पुद्गलों को आकर्षित करने की शक्ति प्राप्त होती है।

वचन बल प्राण-              जिससे भाषा वर्गणा योग्य पुद्गलों को आकर्षित करने की शक्ति प्राप्त होती है।

काय बल प्राण-               जिससे हलन-चलन योग्य पुद्गलों को आकर्षित करने की शक्ति प्राप्त होती है।

आयुष्य बल प्राण-           जिसके कारण जीव निष्चित अवधि तक किसी योनि में रह सकता है।

                सारी प्राण शक्तियाँ आपसी सहयोग और समन्वय से कार्य करती है, परन्तु एक दूसरे का कार्य नहीं कर सकती। आंख सुन नहीं सकती। कान बोल नहीं सकता, नाक देख नहीं सकता इत्यादि। सबमें आयुष्य बल प्राण मुख्य होता है तथा उसके समाप्त होते ही अन्य प्राण प्रभावहीन हो जाते हैं। आयुष्य बल प्राण का प्रमुख सहयोगी श्वासोच्छवास बल प्राण होता है।

                प्राण ऊर्जा का जितना सूक्ष्म एवं तर्क संगत विश्लेषण महावीर दर्शन में है उतना, आधुनिक चिकित्सा पद्धति में भी नहीं किया गया। परिणाम स्वरूप उन्हें आंख, नाक, कान, आदि जड़ उपकरणों की खराबियों को दूर करने में तो आंशिक सफलता मिली, परन्तु जिनमें प्राण ऊर्जा का मौलिक प्रवाह ही नहीं हो, उनको  सुधार पाने में अभी सफलता नहीं मिलती।

संयम ही जीवन हैः-

                स्वास्थ्य की दृष्टि से पर्याप्तियों और प्राणों का बहुत महत्त्व है। अतः महावीर ने पर्याप्तियों के संयम एवं सदुपयोग को सर्वाधिक महत्त्व दिया। जहाँ जीवन है वहाँ प्रवृत्ति तो निष्चित रूप से होती ही है। अतः पर्याप्तियों और प्राणों के संयम का मतलब हम उनका अनावश्यक दुरुपयोग अथवा अपव्यय न करें, अपितु अनादिकाल से आत्मा के साथ लगे कर्मों से छुटकारा पाने हेतु सदुपयोग द्वारा सम्यक् पुरुषार्थ करें।

आहार संयम- जीवन चलाने के लिये जितना आवश्यक हो भक्ष्य-अभक्ष्य का विवेक रख कर आहार-पानी आदि ग्रहण करना।

शरीर का संयम- शरीर की अनावश्यक प्रवृत्तियों से बचना एवं सम्यक् पुरुषार्थ करना।

इन्द्रियों का संयम- इन्द्रियों की क्षमता से अधिक तथा अनावश्यक कार्य न लेना। वीर्य का नियन्त्रण रखना अर्थात् ब्रह्मचर्य का पालन करना। इन्द्रिय विषयों को उत्तेजित करने वाली प्रवृत्तियों एवं वातावरण से यथा संभव दूर रहना।

श्वास का संयम- मन्द गति से दीर्घ श्वास लेना तथा पूरक और रेचक के साथ-साथ कुम्भक कर श्वास को अधिकाधिक विश्राम देना। जितना अधिक श्वास का संयम होगा, उतना व्यक्ति संवेगों से सहज बच जाता है। इससे शरीर और मन को बहुत आराम मिलता है। आवेग नहीं आते हैं। आवेग से शरीर में असंतुलन और रोग होने की संभावनाएँ बढ़ जाती है।

भाषा का संयम- वाणी का विवेक एवं यथा संभव मौन रखना, परन्तु आवश्यकता पड़ने पर मधुर बोलना। अनावश्यक बोलने से जीवनी शक्ति क्षीण होती है। वाणी के प्रकम्पन हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। ध्वनि और मंत्र चिकित्सा का यही आधार होता है। वाणी शरीर और मन दोनों को प्रभावित करती है।

मन का संयम- मन से अनावश्यक मनन, चिन्तन, स्मृति और कल्पनायें न करना अर्थात् मन की सम्यक् प्रवृति करना। मनोबल कमजोर करने वाले दृष्यों को न तो देखना और न सुनना मन का संयम होता है। हिंसा, क्रूरता, घृणा, कामुकता, भय इत्यादि मनोबल कमजोर करने वाले वातावरण में रहना, मन का असंयम होता है।

                उपर्युक्त सभी का आचरण अर्थात् संयम महावीर के अनुसार स्वास्थ्य की कुंजी होता है। सभी रोगों का कारण पर्याप्तियों के असंयम से होने वाले प्राणों का असंतुलन ही होता है। पर्याप्तियों के संयम से शरीर में रोग उत्पन्न होने की संभावनाएँ काफी कम हो जाती है और यदि रोग की स्थिति हो भी जाती है तो पर्याप्तियों, के संयम से पुनः शीघ्र स्वास्थ्य को प्राप्त किया जा सकता है। यही महावीर के सिद्धान्तानुसार शरीर स्वास्थ्य का मूलाधार है।

कर्म सिद्धान्त और स्वास्थ्यः-

                सम्पूर्ण स्वास्थ्य की दृष्टि से रोग पैदा करने वाले कारणों से बचना, रोग पैदा न हों, ऐसी जीवन शैली जीना तथा जो रोग पहले जमें हुए हों उनका विरेचन अथवा सफाई आवश्यक होती है। महावीर की दृष्टि में हमारे कर्म ही सबसे बड़े शत्रु हैं। जीवन की सारी समस्याओं के सूत्रधार कर्म ही होते हैं। अतः उससे छुटकारा पाने के लिए उन्होंने जो मार्ग बतलाये, उस हेतु आश्रव, संवर और निर्जरा जैसे अलग-अलग पारिभाषिक शब्दों का कथन किया।

                महावीर ने कर्मो का कथन आठ प्रकार से किया। जो कर्म आत्मा के मूलगुणों का घात अथवा प्रभावित करते हैं, उनको घाती कर्म और जिनका संबंध मात्र शरीर से होता है, उन्हें अघाती कर्म कहा। इस आधार पर ज्ञानावरणीय (ज्ञान पर आवरण करने वाले), दर्शनावरणीय कर्म (सम्यक् दर्शन को आच्छादित करते हैं) मोहनीय कर्म (राग-द्वेश पैदा कर वीतराग अवस्था में बाधक बनते हैं) अन्तराय (आत्मा के अनन्त बल को सीमित करने वाले अथवा जिसके प्रभाव से व्यक्ति अपनी क्षमताओं का सम्यक् एवं पूर्ण उपयोग नहीं कर सकता) कर्म घाती कर्म कहलाते हैं। जबकि वेदनीय (जिस कर्म के अनुसार शरीर को सुख-दुःख की संवेदना हो), नाम (जिस कर्म के अनुसार किसी योनि में शरीर का रंग रूप, आकार आदि मिलता है), गोत्र (जिस कर्म के अनुसार जीव का उच्च अथवा नीच कुल में जन्म होता है और प्रारम्भिक संस्कार मिलते है), आयुष्य (जिसके प्रभाव से जीव को निष्चित अवधि तक किसी योनि में रहना पड़ता है) ये चार कर्म अघाती कर्म कहलाते हैं। इनका संबंध जब तक शरीर होता है, तभी तक रहता है। जितना-जितना कर्मों का क्षय होता है, उतने-उतने आत्म गुण प्रकट होते हैं और शरीर को उसके अनुसार उपलब्धियाँ प्राप्त होती हैं। ज्ञानावरणीय कर्म के पूर्ण क्षय से अनन्त ज्ञान, दर्शनावरणीय कर्म के पूर्ण क्षय से अनन्त सत्य दर्शन, मोहनीय कर्म के पूर्ण क्षय से अव्याबाध (सदैव रहने वाला) सुख एवं अन्तराय कर्म के पूर्ण क्षय होने से अनन्त शक्ति की प्राप्ति होती है। ऐसी स्थिति में जीव संसार के सूक्ष्मतम पदार्थो को देखने एवं वर्तमान, भूत एवं भविष्य में घटित होने वाले सभी तथ्यों को जानने में सक्षम बन जाता है।ये चार कर्म ही आत्म गुणों की घात करते हैं। इनके क्षय होने के पश्चात् बाकी चार वेदनीय, आयु, नाम और गौत्र कर्म जिनका संबंध तो मात्र शरीर से होता है, शरीर के साथ स्वयं नष्ट हो जाते हैं। यही महावीर का शरीर स्वास्थ्य का आधार है तथा आत्मा और शरीर को प्रभावित करने वाले कर्मो की भेद रेखा।

महावीर का नव तत्त्वों का सिद्धान्तः-

                महावीर के दर्शन की दूसरी विशेषता है उनका अनेकान्त दृष्टिकोण। अतः महावीर ने मुख्य रूप से संसार के सभी पदार्थो का जीव और अजीव के रूप में कथन किया। आत्मा और शरीर के संबंधों को प्रभावित करने वाले अन्य सार भूत पदार्थों के विशेष गुणों का महावीर ने जीव, अजीव, पुण्य, पाप, आश्रव, संवर, निर्जरा, बंध (कर्मो का आत्मा से बंधना) और मोक्ष (आत्मा की परम शुद्धावस्था) जैसे नव मूल तत्त्वों का कथन किया। महावीर ने मानव जीवन का लक्ष्य मोक्ष एवं उसकी प्राप्ति हेतु पाप, आश्रव और बंध से बचने तथा संवर और निर्जरा युक्त प्रवृत्ति करने का कथन किया।

आश्रवः- वे सारे अकरणीय कार्य अथवा पाप की प्रवृत्तियाँ, जो अशुभ कर्मों को आकर्षित कर हमारी चेतना को दुर्बल करती हैं। जिन्हें मुख्य रूप से पांच भागों में विभाजित किया जा सकता है-

  1. मिथ्यात्व (सही का गलत मानना या गलत को सही मानना)-
  2. अव्रत अथवा असंयम-
  3. प्रमाद (आलस्य अथवा गलत कार्यो में पुरुषार्थ)-
  4. कषाय (आत्मा को मलिन करने वाले क्रोध, मान, माया, लोभ, राग, द्वेश आदि)-
  5. अशुभ योग (मन, वचन, काया से अनावश्यक प्रवृत्ति)-

मिथ्यात्वः- मिथ्यात्व अथवा गलत दृष्टिकोण का मूल कारण सम्यक् ज्ञान का अभाव होता है। जिसके कारण व्यक्ति असत्य अथवा आंशिक सत्य को पूर्ण सत्य मान तथा असत्य को सत्य मान आचरण करने लगता है। जब दृष्टिकोण ही गलत हों तो, आचरण कैसे सम्यक् हो सकता है। अज्ञान और अविवेक के कारण उसका खान-पान, रहन-सहन, आचार-विचार आदि शरीर में रोग पैदा करने में अहं भूमिका निभाते हैं।

अव्रत (असंयम)- असंयमी व्यक्ति स्वछन्द होने से अपना भला-बुरा नहीं सोच पाता। जीवन की प्राथमिकताओं एवं लक्ष्य का सही चयन नहीं कर पाता तथा स्वाद के वशीभूत होकर आहार का विवेक न रखने से रोगों को आमन्त्रित करता है। इन्द्रियों का उपयोग विषय भोगों में करता है। उसका जीवन अनियन्त्रित, अनियमित एवं प्राथमिकताओं की उपेक्षा करने से लक्ष्य हीन हो जाता है।

प्रमादः- आलस्य अथवा गलत अनावश्यक कार्यों में पुरुषार्थ। यदि व्यक्ति श्रम नहीं करता है तो, शरीर के अंग-उपांग बराबर कार्य नहीं करने से रोग की समस्या उत्पन्न होती हैं। ठीक उसी प्रकार, जो व्यक्ति अनावश्यक अथवा कम उपयोगी अप्राथमिक कार्यो में पुरुषार्थ कर अपनी प्राण ऊर्जा को खर्च करते हैं, ऐसे व्यक्ति भी प्रमादी की श्रेणी में आते हैं। ऐसे सारे कार्य, जो आत्मा को मलिन बनाते हैं, कर्म बंधन में सहयोगी होते हैं, प्रमाद की श्रेणी में ही आते हैं।

कषायः- अर्थात् आत्मा को कलुषित करने वाले क्रोध, मान, माया, लोभ एवं राग-द्वेश बढ़ाने वाले तत्त्व। सबसे पहले रोग की उत्पति भावों में होती है। अतः जब क्रोध, मान, माया, लोभ, राग, द्वेश में व्यक्ति उलझ जाता है तो तनाव, भय, चिंता, दुःख आदि, जो रोग के मूल कारण होते हैं, बढ़ने लगते हैं तथा स्वास्थ्य अस्त-व्यस्त होने लगता है।

अशुभ योगः- अर्थात् मन, वचन और काया से अनावश्यक प्रकृति के सनातन सिद्धान्तों के विपरीत पाप की दुष्प्रवृत्तियाँ करना, करवाना और करने वालों का अनुमोदन करना। जब मनुष्य अपने मन, वाणी और शरीर का हिंसा, झूठ, चोरी जैसी पाप प्रवृत्तियाँ में दुरुपयोग करता है, दूसरों से करवाता है और जो दुरुपयोग करते हैं, उनका प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष अनुमोदन कर सहयोग करता है तो, उसकी प्राण ऊर्जा अनावश्यक क्षीण होने से, वे स्वास्थ्य के लिये समस्याएँ पैदा करने वाली हो जाती हैं। साथ ही आत्मा कर्मो से भारी हो जाती है।

संवरः- आत्मा पर नये विकारों को जमा न होने देने अर्थात् नवीन कर्म बंधनों से बचने हेतु जिस जीवन शैली को अपनाया जाता है, उसे महावीर ने संवर बतलाया। महावीर ने अहिंसा, संयम और तप मय जीवन प्रवृत्ति को स्वास्थ्य हेतु आवश्यक बतलाया।

                व्यक्ति का विचार और चिन्तन हर क्षण सम्यक् नहीं होता, अतः जब भी उसके मन में शुभ संकल्प जागृत हों, उसकी क्रियान्विति का संकल्प अथवा प्रत्याख्यान (प्रतिज्ञा) ले लेनी चाहिए, जिससे प्रतिकूल परिस्थितियों में भी नियमों के पालन में दृढ़ता और स्थिरता रहती है।

                संवर आश्रव का प्रतिपक्ष होता है। जिसमें मिथ्यात्व के स्थान पर सम्यक् दृष्टिकोण, सही सोच को प्रधानता दी जाती है। जीवन में स्वछन्द मनोवृत्ति को यम-नियम एवं व्रत-प्रत्याख्यान द्वारा संयमित रखा जाता है। प्रमाद के स्थान पर साधक सम्यक् पुरुषार्थ हेतु सजग रहता है। राग-द्वेश एवं क्रोध, मान, माया, लोभ रूपी कषायों से बचने हेतु अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों में समता रखने का तथा मन, वचन और काया की दुष्प्रवृत्तियों को शुभ में लाने का प्रयास किया जाता है। साधु को जीवन पर्यन्त अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य एवं अपरिग्रह का पूर्ण रूप से तथा श्रावकों को अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, क्षेत्र की मर्यादा, उपयोग की वस्तुओं के सीमित उपभोग, अनावश्यक अथवा अप्राथमिक कार्यो से बचने एवं सामायिक, पोषध एवं सम्यक् दान जैसे बारह व्रतों का अधिकाधिक पालन करने का निर्देष दिया। उन्होंने भोजन में अभक्ष्य, तामसिक पदार्थो के सेवन का, रात्रि भोजन एवं सचित्त पानी जिसमें जीवों के उत्पन्न होने की संभावना हो, ऐसा पानी उपयोग करने का निषेध किया। रात्रि में किया गया भोजन तामसिक और विकारी बन जाता है। अतः शरीर में रोगों का कारण बनता है। इसी कारण जैन साधक जीवन पर्यन्त उबला हुआ अथवा अचित्त पानी जिसमें जीवों की उत्पत्ति की संभावना न हो, पीते हैं। आज पर्यावरण और प्रदूषण के युग में पानी की शुद्धता संदिग्ध है। भोजन और पानी जीवन की मूलभूत आवश्यकता है तथा उनके सम्यक् सेवन से रोग होने की संभावना बहुत कम हो जाती है।

                ‘संवर’वास्तव में पर्याप्तियों और प्राणों का संयम ही होता है। जिससे शरीर, मन और वाणी संतुलित रहने लगते हैं। नये रोगों के आने की संभावनाएँ कम हो जाती हैं। संवर से प्राण ऊर्जा का अपव्यय नहीं होता।

निर्जराः-

                कर्म विरेचन का साधन- भगवान महावीर के अनुसार जीवन एवं स्वास्थ्य की सभी समस्याओं का मूलाधार कर्म होता है। कर्मो के प्रभाव से ज्ञान अज्ञान हो जाता है, दर्शन मिथ्या हो जाता है। अतः जब तक आत्मा पर कर्मो का आवरण रहता है, तब तक सम्पूर्ण स्वास्थ्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती। न मालूम कब वे कर्म उदय में आकर व्यक्ति को रोगी बना दें, कहा नहीं जा सकता। अत आत्मार्थी साधकों के लिये एक तरफ जहाँ आश्रव से बचने का कथन किया तो दूसरी तरफ संवर में प्रवृत्ति करने का कथन किया।

महावीर का योग शास्त्र

                महावीर ने संचित कर्मो को क्षय करने हेतु विविध प्रकार के बारह तप एवं साधना हेतु सम्यक् पुरुषार्थ को आवश्यक बतलाया, जिसे महावीर दर्शन का द्वादशांग योग कहते हैं। कर्मो को क्षय करने अथवा उनको आत्मा से निर्जरित करने की प्रक्रिया को निर्जरा कहते हैं। जिस प्रकार सोना अग्नि में तप कर शुद्ध हो जाता है, ठीक उसी प्रकार सम्यक् तप की आराधना से आत्मा कर्मो के विकारों से मुक्त हो शुद्ध बन जाती है। छः तप कर्म बन्धन के बाह्य कारणों को क्षय करने के साथ-साथ शरीर और रोग के स्थूल कारणों को दूर कर शरीर को स्वस्थ बनाते हैं। अतः उन्हें बाह्य तप कहते हैं। ये तप दूसरों को प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं, जिसका सीधा प्रभाव शरीर पर पड़ता है। बाह्य तप के आचरण से  शरीर के प्रति आसक्ति, स्वादलोलपुता, कष्ट सहिष्णुता एवं खान-पान की आसक्ति छूट जाती है। साधक भूख-प्यास पर विजय पा लेता है। ये सब साधना के विघ्न हैं, जो देह के प्रति आसक्ति, विलासिता और प्रमाद को बढ़ाते हैं। बाह्य तप आभ्यन्तर तप में सहायक होते हैं। आभ्यंतर तपों से हमारे भावों और चित्त की शुद्धि होती है। अतः वे हमारे मानसिक स्वास्थ्य को सुधारते हैं तथा आत्मबल और मनोबल में वृद्धि करते हैं। आभ्यंतर तप में बाह्य द्रव्यों की अपेक्षा नहीं होती। इनका प्रत्यक्ष प्रभाव अन्तःकरण पर पड़ता है।

                आत्म-शुद्धि की साधना के सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन, और सम्यक् चारित्र तीन मूल आधार स्तम्भ होते हैं। पातंजलि योग की भांति महावीर के योग की आधारशिला भी यम-नियम के पालन से होती है। आत्म-शुद्धि की साधना की चाहे जो अवस्था हो, साधक को साधना से पूर्व अहिंसा, सत्य-अस्तेय, ब्रह्मचर्य एवं परिग्रह आदि पांच नियमों का पालन करना महावीर ने अत्यन्त आवश्यक बतलाया। इन नियमों को धारण किये बिना की जाने, वाली साधना को महावीर ने अज्ञान तप की संज्ञा दी। अपने बल पुरुषार्थ के अनुसार साधक दो प्रकार से साधना कर सकता है। प्रथम जिसमें पांच यमों का पूर्ण तथा जीवन पर्यन्त पालन कर साधु जीवन स्वीकार करना तथा दूसरा आंशिक रूप से अथवा कुछ समय के लिये नियमों को स्वीकार कर गृहस्थ जीवन जीते हुए आत्म शुद्धि करना। बिना यम-नियम साधना विकसित नहीं हो सकती।

बाह्य तपः-

                भूख-प्यास पर विजय पाने के लिये अनशन तप का कथन किया। इसमें सीमित समय के लिये अन-जल का पूर्ण अथवा आंशिक त्याग किया जाता है। इसका कारण यह है कि भूख पर विजय प्राप्त कर लेते हैं तब बाकी सभी इन्द्रियाँ षांत होने से स्वतः नियन्त्रित और अनुषासित होने लगती हैं। अनशन से पाचन संबंधी रोगों का नाश होता है। इच्छा शक्ति अर्थात् मनोबल बढ़ाने के लिये भूख से कम खाना, अपने कषायों को सीमित करना उणोदरी तप का उद्देश्य होता है। ऊणोदरी तप से वात, पित्त, कफादिजनित दोषों का शमन होता है। विकार बढ़ने वाली प्रवृत्तियों से बचने हेतु वृत्ति संक्षेप तप का प्रावधान है। वृत्ति संक्षेप तप से भोज्य वस्तुओं की इच्छा का निरोध एवं भोजन की चिन्ता पर नियन्त्रण होता है। भोजन में रस लोलुपता त्यागने के लिये स्वादिष्ट भोजन को छोड़ना त्याग कहलाता है। रस परित्याग तप से इन्द्रिय निग्रह, निद्रा विजय, स्वाध्याय और ध्यान में रुचि बढ़ती है। जिन पदार्थो से जीभ और मन दोनों विकृत होते हैं तथा जो व्यक्ति को स्वाद लोलुप और विषयोलोलुप बनाते हैं, महावीर ने ऐसे पदार्थो को विगय कहा तथा साधकों को उसके सेवन का यथा संभव निषेध किया। मांस, मधु, मद्य और मक्खन को महावीर ने महा विगय तथा दूध, घी, तेल और मीठे पदार्थो को विगय बताया। आधुनिक चिकित्सक भी प्रायः इन सभी पदार्थो के कम से कम उपयोग का परामर्श देते हैं। स्वाद विजय के लिए महावीर ने बिना विगय वाले आहार की तपस्या को आयंबिल तप कहा। स्वास्थ्य की दृष्टि से आयंबिल तप कहा। स्वास्थ्य की दृष्टि से आयंबिल तप से रक्त की शुद्धि होती है और मोटापा जैसे अनेक रोग नहीं होते। शरीर को कष्ट सहन करने का अभ्यास करवाने हेतु प्रतिकूलता में समत्व रखना, शरीर को कठिन स्थिर आसनों और मुद्राओं का अभ्यास करना, काया क्लेष तप कहलाता है। यह तप शरीर और आत्मा का भेद ज्ञान कराने में सहायक होता है। जैन श्रमणों को आचरणीय बाईस परिषह इपनी इच्छा से कर्मो की निर्जरा हेतु प्रतिकूलताओं को अपनाना एवं उन्हें शान्त भाव से सहन करना काया क्लेष तप का ही प्रयोगात्मक पक्ष होता है। स्वयं भगवान महावीर स्वामी ने सारी साधना विभिन्न कठोर आसनों में की। जब उन्हें केवल ज्ञान हुआ तब वे गोदुहासन में ही थे। अन्तर्मुखी बनने और पांचों इन्द्रियों और मन को वश में करने वाले तप को प्रतिसंलीनता तक कहते हैं। इस तप में मनोज्ञ शब्द, रूप, गंध, शब्द, स्पर्श द्वारा विषयों से मन चलित नहीं होता तथा अमनोज्ञ में राग द्वेश नहीं करता। ये छः बाह्य तप कहलाते हैं।

आभ्यंतर तपः-

                प्रायश्चित्त से पुराने दोषों की शुद्धि होती है तथा भविष्य में उनसे बचने हेतु सजगता बढ़ती है। असजगता ही अविवेक  का कारण है और अविवेक से ही सारी समस्याएँ पैदा होती हैं। अहंकार हमारी बुद्धि, ज्ञान और विवेक को नष्ट करता है। अतः उस पर विजय पाने के दूसरे आभ्यंतर तप के रूप में महावीर ने विनय तप की आरधना का कथन किया। विनय से अनेक गुण विकसित होते हैं। प्रज्ञा विकसित होती है। आदर करने वालों को स्वतः सम्मान और सुख मिलता है। बिना विनय शिष्य गुरु का विश्वास पात्र नहीं बन सकता, जिससे आत्मिक गुणों का पूर्ण विकास नहीं हो सकता। प्राणी मात्र के प्रति करूणा, मैत्री, अनुकंपा का भाव विकसित करने के लिए, दुःखियों का दुःख दूर करने के लिए महावीर ने सेवा को भी तप बतलाया। सम्यक् ज्ञानार्जन के लिए स्वाध्याय तप का कथन किया। स्वाध्याय का मतलब अपने आप का अध्ययन करना। हमारी आत्मा ही सदैव हमारे साथ रहने वाली है। अनित्य, अशरण, अशुचि, एकत्व आदि बारह भावना के माध्यम से स्वरूप का चिन्तन, निरीक्षण एवं समीक्षा करते रहना, आत्म-शुद्धि हेतु आवश्यक होता है। रोग का प्रारम्भ भावों से ही होता है और भावों की सभी आत्मिक एवं मानसिक शुद्धि से प्रज्ञा निर्मल होती है, विवेक जागृत होता है। स्वाध्याय से विकथा एवं व्यर्थ का वाद-विवाद और प्रमाद छूट जाता है। व्यक्ति रोग के मूल कारणों के प्रति सजग हो जाता है। यही स्वास्थ्य का राजमार्ग है। मन को एकाग्र कर आत्म साक्षात्कार हेतु महावीर ने धर्म एवं शुक्ल (शुभ) ध्यान का कथन किया एवं आत्र्त और रौद्र ध्यान का निषेध किया। आत्म-रमणता के लिये कार्योत्सर्ग तप का कथन किया। शरीर में रहते हुए भी शरीर के प्रति ममत्व न होने का नाम कार्योत्सर्ग होता है। इस प्रकार प्रायश्चित्त, विनय, सेवा, स्वाध्याय, ध्यान और कार्योत्सर्ग छः प्रकार के आभ्यंतर तप होते हैं।

                महावीर के दर्शन में बाह्य तप और आन्तरिक तप का अपना-अपना महत्वपूर्ण स्थान होता है। उन सभी बाह्य क्रियाओं, जिनसे आत्मा दूषित होती है, बाह्य तप से ठीक कर दिया जाता है। इसी प्रकार आत्मिक दोषों को आभ्यंतर तप से ठीक किया जाता है। बाह्य तप का उद्देश्य साधक की आभ्यंतर तप हेतु भूमिका तैयार करना होता है। बिना आभ्यंतर तप बाह्य तप का कोई महत्त्व नहीं होता। बाह्य एवं आभ्यंतर दोनों ही प्रकार के सम्यक् तप के सामजस्य पूर्ण साधना से ही आत्म शुद्धि होती है।

कषाय की मंदता-साधना एवं स्वास्थ्य का मापदण्डः-

                साधक कितना ही उग्र तप करें परन्तु उसमें यदि कषाय मंद न हों अर्थात् क्रोध का शमन, अहंकार का दमन, माया से मुक्ति और लोभ अथवा आसक्ति कम न हों, फिर चाहे वह पैसे के प्रति हों अथवा परिजनों अथवा यश, कीर्ति, अहं पोषण की प्रवृत्तियाँ के प्रति, तब तक तप की साधना हितकर नहीं होती।

                जब तक आत्मा मन, वचन और काया से युक्त होती है, तब तक चित्त स्थिर नहीं रह सकता। अतः प्रवृत्ति करने का भाव पैदा होता रहता है, क्योंकि आत्मा के परिस्पन्दन से ऊर्जा पैदा होती है। यदि उस ऊर्जा का सम्यक् उपयोग नहीं किया जा रहा है तो, आत्मा अशुभ प्रवृत्तियों के परिणाम स्वरूप कर्म बन्धन कर विकार ग्रस्त बन जाती है। परन्तु उसी ऊर्जा का उपयोग बाह्य और आभ्यन्तर तप में करके साधक पहले संयमित जीवन जीने लगता है। फिर उसका सम्यक् पुरुषार्थ से प्रमाद छूटने लगता है। अर्थात् उसकी प्राथमिकताएँ बदल जाती है। जीवन में विवेक बुद्धि और सजगता का प्रादुर्भाव होने से संयोग-वियोग अनुकूलता-प्रतिकूलता हानि-लाभ में समभाव रहने लगता है। पर दोष दृष्टि समाप्त हो जाती है। समभाव की साधना का विकास जब पूर्ण रूप से हो जाता है तो, साधक राग द्वेश से पूर्ण विजय प्राप्त कर वीतरागी बन जाता है। साधना की विकास यात्रा का जितना क्रमबद्ध तर्क संगत विवेचन 14 गुणस्थानों के स्तरों के माध्यम से महावीर ने किया वैसा, अन्यत्र प्रायः नहीं मिलता। आत्म-साधकों को बिना पूर्वाग्रह उसका अवश्य चिन्तन, मनन और अध्ययन करना चाहिये।

                महावीर के अनुसार आध्यात्मिक योगी सत्य का खोजी होता है। स्वावलंबी होता है। परावलंबी सत्य की अनुभूति नहीं कर सकता। स्वतंत्र साधक ही अपने चारों तरफ उपस्थित अज्ञात रहस्यों को जानने के लिए चेतना के सूक्ष्म स्तरो से गुजरता है। जब तक आत्म साक्षात्कार न हो जाये, जहाँ सत्य को मात्र जाना ही नहीं जाता अपितु जीया जाता है, तब तक उसकी साधना चलती रहती है।

                साधक शरीर का तभी तक ख्याल रखता है, जब तक शरीर आत्म-विकास की साधना में सहयोग देता है। दूसरी बात साधना का आधार आत्मा होने से आत्मार्थी साधक शरीर को स्वस्थ रखने के लिए आत्मा को कर्मो से बोझिल नहीं बनाता। उपचार हेतु यम-नियम की उपेक्षा करना साधक को मंजूर नहीं होता। अतः उसका उपचार पूर्ण अहिंसक एवं अन्य दोषों से यथा संभव मुक्त होता है। साधक द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव का सम्यक् उपयोग करता है। अर्थात् चारों की शुद्धि का विशेष खयाल रखता है।

                जो चिकित्सा पद्धतियाँ कर्म बन्धन में सहयोगी होती है, महावीर ने उनका पूर्ण निषेध किया। रोग का मूल कारण अप्राकृतिक जीवन शैली, अनियन्त्रित, स्वछन्द, असंयमित-मन, वचन, काया की प्रवृत्तियाँ ही होती है। अतः महावीर ने प्राकृतिक स्वावलम्बी जीवन शैली और मन, वचन और काया के संयम का सर्वोच्य प्राथमिकता दी। जितनी ईमानदारी से उनका पालन किया जाता है, उतना ही साधक स्वस्थ होता है तथा पूर्व संचित असातावेदनीय कर्म के कारण रोग की स्थिति बन भी जाती है तो वह हाय-हाय नहीं करता, परेशान नहीं होता। वह शरीर को आत्मा से अलग, नष्ट और विध्वंसन होने वाला मानता है। अतः उसकी प्राथमिकता शरीर पर नहीं रहती। शरीर से ध्यान के हटते ही शरीर के दर्द, पीड़ा आदि कष्ट नहीं पहुँचा सकते। जहाँ रोग का आदर सत्कार नहीं होता, वहाँ रोग अधिक दिनों का मेहमान नहीं रह सकता।

महावीर का चिन्तन पूर्णतः वैज्ञानिकः-

                महावीर का स्वास्थ्य दर्शन पूर्ण रूप से मौलिक एवं वैज्ञानिक है। अहिंसा को आधार मानकर, अनेकान्त दृष्टि से उसमें स्वास्थ्य का विवेक पूर्ण सनातन सिद्धान्तों को स्वीकारते हुए चिंतन किया गया है। महावीर ने जहां एक तरफ प्राण और प्रर्याप्तियों के संयम को स्वास्थ्य का आधार कहा, वही दूसरी तरफ अशुभ कर्मो एवं आश्रवों से बचने की स्पष्ट प्रेरणा दी तथा उन्हें ही रोग हेतु जिम्मेदार बतलाया। सम्यक् प्रवृत्ति एवं संवर युक्त जीवन शैली का कथन कर, महावीर ने जनमानस को स्वस्थ जीवन जीने का राजमार्ग बतलाया। पूर्व में उपार्जित अशुभ कर्मो के रूप में होने वाले रोग के कारणों के उपचार हेतु बारह प्रकार के तपों की सम्यक् आराधना का सुझाव दिया, जिससे न केवल आत्म शुद्धि ही होती है अपितु अधिकांश पुराने शारीरिक एवं मानसिक रोगों से भी मुक्ति मिलती है। शरीर के निर्माण का कारण पंच तत्त्वों को ही मानने वालों के लिये महावीर ने षट् द्रव्यों तथा नव तत्त्वों की व्याख्या कर जन्म और मृत्यु द्वारा आत्मा के विविध योनियों में भ्रमण का कारण और जीवन पर पड़ने वाले जड़ और चेतन के प्रभावों का जितना तार्किक विवेचन किया है, जो स्वास्थ्य विज्ञान की अमूल्य निधी है।

                शरीर एवं रोगों की अपेक्षा रोग के मूल कारणों को दूर करने पर उन्होंने जो जोर दिया वह आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान के लिये चिन्तनीय हैं। अतः उनके दर्शन पर जितनी अधिक शोध की जायेगी उतने-उतने स्वास्थ्य के प्रति नये आयाम सामने आते जायेंगे। महावीर का दर्शन अपने आप में परिपूर्ण है। अतः उसकी उपेक्षा करने वाला आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान अपने आपको पूर्ण वैज्ञानिक मानने का दावा नहीं कर सकता।

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