क्या है रेकी चिकित्सा?

क्या है रेकी चिकित्सा?

               


              रेकी ब्रह्माण्ड में उपलब्ध चैतन्य शक्ति की तरंगों को शरीर में सुव्यवस्थित ढंग से प्रवाहित करने की सरल प्रक्रिया है, जिसके द्वारा शरीर, मन एवं आत्मा को सन्तुलित कर सम्पूर्ण स्वास्थ्य, प्रसन्नता, समृद्धि प्राप्त की जा सकती है। रेकी एक जापानी शब्द है, जिसका मतलब होता है, यूनिवर्सल लाइफ फोर्स या ब्रह्माण्ड की प्राण ऊर्जा। हमारा ब्रह्माण्ड जीवनदायिनी ऊर्जा से परिपूर्ण है। इस प्राण ऊर्जा को चीन में ‘ची, इंग्लैण्ड में लाईट अथवा होली स्प्रिट, रूस में बायोएनर्जी तथा भारत में प्राण ऊर्जा के नाम से पहचाना जाता है। प्रत्येक व्यक्ति इस ऊर्जा (रेकी) के साथ ही जन्म लेता है, बड़ा होता है और इसी के साथ मरता है अर्थात् रेकी जीवन का सार है। रेकी हमारी क्षमताओं को बढ़ाती है। हमारे आभा मण्डल को शुद्ध एवं व्यवस्थित रखने में सहयोग देती है। जीवन में मानवीय गुणों को विकसित करने में सहयोग देती है। रेकी प्रज्ञावन्त है। शुद्ध एवं सात्विक प्रेम का भण्डार है। अन्तर-आत्मा की आवाज है। जन्म के साथ हमारे अन्दर इस ऊर्जा का भण्डार होने के बावजूद तनाव युक्त जीवन कषायों (क्रोध, मान, माया, लोभ) की जीवन में बाहुल्यता, अनैतिक, आचरण, गुणग्राहता के अभाव में जीवन के प्रति निराशा, वैचारिक प्रदूषण आदि कारणों से हमारा इस ऊर्जा से सम्बन्ध टूटने लगता है, परन्तु जब कोई अनुभवी रेकी प्रशिक्षक उसे रेकी वाहक बनाता है, तो यह सम्पर्क पुनः स्थापित हो जाता है, जो भविष्य में भी बना रह सकता है। रेकी प्राण ऊर्जा के प्रवाह की एक प्रक्रिया है। सारे विश्व की रचना, अस्तित्व एवं घटनाचक्र के पीछे रेकी की महत्वपूर्ण भूमिका है। प्रायः सभी धर्मो ने इस चैतन्य शक्ति को स्वीकारा है।

रेकी का इतिहासः-

                इस प्रभावशाली प्राण ऊर्जा के बारे में व्यवस्थित ज्ञान उपलब्ध कराने में जापान के मिकाउसद की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। मिकाउसद जापान में एक चर्च में पादरी के रूप में कार्य करते थे। एक दिन किसी जिज्ञासु ने उनसे पूछा-“ऐसी कौनसी शक्ति है, जिसके कारण ईसा-मसीह जब किसी दुःखी को आशीर्वाद देते थे तो उसका कष्ट दूर हो जाता।” मिकाउसद द्वारा इस प्रश्न का सन्तोषजनक समाधान न कर पाने के कारण, उन्होंने उस पद पर रहना उचित नहीं समझा और इस प्रश्न का समाधान ढूंढने विभिन्न धार्मिक ग्रन्थों का अध्ययन किया तथा विभिन्न देशों का भ्रमण किया इसके लिए उन्होंने अमरीका, भारत, तिब्बत में विशेष रूप से अनुसंधान किया और अन्त में पुनः जापान आकर शान्त एकान्त पहाड़ी पर 21 दिन तक ध्यान की मौन साधना की। साधना के अंतिम दिन उन्होंने ऐसा अनुभव किया कि कोई अदृश्य चैतन्य शक्ति उनमें प्रवाहित हो रही है। साधना समाप्त कर पहाड़ी के नीचे उतरते समय उनके पैर के अंगूठे में चोट लग गई और रक्त बहने लगा परन्तु जब उन्होंने हथेली से अपने अंगूठे को दबाया तो थोड़ी देर में अंगूठे का दर्द समाप्त हो गया और रक्त का प्रवाह बन्द हो गया। यही उनकी रेकी का प्रथम प्रयोग था और यही से रेकी का पुनः प्रादुर्भाव हुआ। इसके पश्चात् उन्होंने इस ऊर्जा द्वारा हजारों भिखारियों को शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ बना सुखी जीवन जीने का मार्ग प्रशस्त किया। रेकी द्वारा उनके स्पर्श मात्र से हजारों असाध्य, रोगी स्वस्थ होने लगे। डाॅ. मिकाउसद के साथ कार्य करने वाले डाॅ. चिजिरो हयाषी ने इस कार्य को आगे बढ़ाया तथा टोकियों स्थित अपने चिकित्सालय में सैंकड़ों असाध्य एवं पुराने रोगियों को रोग मुक्त किया। 1941 में चिजिरो हयाषी की मृत्यु के पश्चात् हवायी तकता ने इस विद्या को आगे बढ़ाया और सैकड़ों लोगों को रेकी का प्रशिक्षण दिया। परिणामस्वरूप आज संसार में हजारों रेकी प्रशिक्षक एवं अनेकों अन्तरराष्ट्रीय संस्थाएं  इसके प्रचार-प्रसार में संलग्न हैं।

 रेकी कैसे कार्य करती है?

                जब कोई रेकी प्रवाहक रोगी के रोगग्रस्त भाग पर अपनी हथेली रखता है, तो रेकी उसके मस्तिष्क से शरीर में प्रवेश कर हथेली के मार्ग से रोगी के शरीर में प्रवाहित होने लगती है। रेकी का प्रवाह शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक तथा आत्मिक आदि सभी स्तरों पर पड़ता है। यह शरीर और मन में उत्पन्न असुंतलन को दूर करती है, अवरोधों को हटाती है, जो सभी रोगों के प्रमुख कारण होते हैं। यह अपने ढंग से कार्य करती है। इसकी कार्यप्रणाली बिल्कुल स्वतंत्र है। हम इस शक्ति का न तो दुरुपयोग ही कर सकते हैं और न ही इस पर जोर जबरदस्ती। किसी प्रकार के अंधविश्वास को यहां स्थान नहीं। रेकी वाहक हथेली द्वारा ऊर्जा भेजता है, परन्तु हस्त स्पर्श ही सब कुछ नहीं। रेकी वाहक गलती कर सकता है परन्तु रेकी गलती नहीं करती। रेकी वाहक तो केवल उपचार का माध्यम होता है। उपचार स्वीकार करना अथवा न करना रोगी पर निर्भर करता है। रेकी का कार्य बिजली के तारों की भांति, बिजली के उपकरणों तक बिजली पहुँचाने के माध्यम के समान ही उसकी भूमिका होती है। यदि 15 वाट का बल्ब होगा तो 15 वाट जितनी बिजली ग्रहण करेगा तथा यदि बल्ब फ्यूज होगा तो तनिक भी बिजली का उपयोग नहीं करेगा। ठीक उसी प्रकार रेकी द्वारा उपचार करते समय शरीर में कितनी ऊर्जा कहां भेजनी है, इसका मार्गदर्शन रेकी स्वयं अपने वाहक को करती है। जिस प्रकार बिजली का स्वीच चालू करने मात्र से प्रकाश हो जाता है। व्यक्ति को यह जानने की आवश्यकता नहीं कि बिजली कहां से और कैसे प्रवाहित हो रही है, प्रकाश मिल जाता है, ठीक उसी प्रकार रेकी प्रवाहक का कार्य तो मात्र ऊर्जा भेजना ही होता है। रेकी प्रवाहक को रोगी के रोग के बारे में पूर्ण जानकारी की आवश्यकता नहीं और न ही शरीर विज्ञान की सूक्ष्म जानकारी। प्रायः सभी रोगों की उपचार पद्धति एक जैसी है।

रेकी की विशेषताएँ-

                रेकी सरल, सस्ती, अहिंसक, स्वावलम्बी, पीड़ा एवं दुष्प्रभावों से रहित शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, आत्मिक, असंतुलन के सिद्धान्तों पर आधारित प्रभावशाली चिकित्सा पद्धति हैं। शरीर में विजातीय तत्वों को पूर्ण रूप से साफ कर स्वाभाविक अवस्था में लाती है, जिससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है तथा शरीर में स्वयं स्वस्थ होने की क्षमता विकसित होने से रोगों की पुनरावृत्ति नहीं होती। रोगी एवं रेकी वाहक उपचार करते समय दोनों लाभान्वित होते हैं। रेकी व्यक्ति को पुनः स्वाभाविक जीवन जीने की प्रेरणा की अनुभूति कराती है। बुरी आदतों, दुव्र्यसनों से छुटकारा दिलाती है। मानसिक एवं शारीरिक तनाव घटाती है। विषैले जानवरों के काटने से शरीर में फैले विष को निकालने में छूआछूत की बीमारियों की रोकथाम, टूटी हड्डियों को जल्दी जोड़ने, घाव शीघ्र भरने में रेकी अत्यधिक प्रभावशाली है। रेकी मानसिक एवं शारीरिक तनाव घटाती है और सजगता बढ़ाती है। आधि, व्याधि और उपाधि को संतुलित कर व्यक्ति को समभाव यानी समाधि में लाती है। व्यक्ति में आत्मविश्वास बढ़ने लगता है। कषाय मन्द होने लगती है तथा जीवन में सच्चा सुख, शान्ति, समृद्धि की प्राप्ति होती है। रेकी सेवा का उत्तम साधन है।

                रेकी वनस्पति एवं सारे प्राणी मात्र के लिए भी लाभप्रद है। आज के युग में रेकी के अनुभवी रेकी प्रवाहक ब्रह्माण्ड में कहीं भी जीवन की प्रत्येक समस्या के समाधान में सहायक हो रहे हैं। जैसे इच्छा शक्ति बढ़ाने, आत्मविश्वास जगाने, बुरी आदतें छुड़वाने, दुव्र्यसनों से मुक्ति दिलाने, असहनीय दर्दो में राहत दिलवाने, स्मरण शक्ति सुधारने, अशुभ कर्मो का शमन करने आदि में रेकी के प्रयोग सफलतापूर्वक किए जा सकते हैं।

                रेकी द्वारा व्यक्ति की अनुपस्थिति में भी उपचार तथा उसकी समस्याओं का समाधान उतना ही प्रभावशाली ढंग से किया जा सकता है, जितना उसकी उपस्थिति में। टी.वी., रेड़ियों, टेलीफोन, फैक्स आदि की तरंगों के प्रभाव से हम भलीभांति परिचित हैं। उसी प्रकार रेकी का उपयोग दूरस्थ समस्याओं के लिए समान रूप से किया जा सकता है। कहने का तात्पर्य यह है कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में रेकी द्वारा समस्याओं का निराकरण किया जा सकता है। रेकी जैसी प्रभावशाली ऊर्जा का उपयोग स्व-पर कल्याण के लिए ही करना चाहिए। इस बात का ध्यान रहे कि इसका अवमूल्यन व उपेक्षा न हों।

रेकी की सीमाएं व दोष-

                रेकी जन्म से प्राप्त दोषों को दूर नहीं कर सकती। किसी के शरीर में कोई अवयव न हों अथवा शल्य चिकित्सा द्वारा निकाल दिया गया हों, तो फिर से निर्माण नहीं कर सकती। रेकी मृत्यु को नहीं टाल सकती, परन्तु असाध्य रोगों में पीड़ा से राहत पहुंचाती हैं।

रेकी प्रवाहक कौन बन सकता है?

                सामान्य बुद्धि वाला छोटे से छोटा बच्चा भी रेकी सीख सकता है, परन्तु सफल रेकी प्रवाहक बनने के लिए जीवन में निम्न बातें अपनानी आवश्यक होती हैं-

  1. रेकी वाहक का जीवन सात्त्विक, आय के स्रोत्र अनैतिक नहीं हों।
  2. रेकी वाहक को रेकी करते समय तनाव मुक्त, चिन्ता मुक्त, यश कीर्ति से दूर, मायावृत्ति, छल-कपट, धोखाघड़ी, घमण्ड आदि दुर्गुणों से बचना आवश्यक है।
  3. रेकी करते समय विश्व के सभी सजीव व निर्जीव पदार्थो के प्रति कृतज्ञता का भाव होना चाहिए।
  4. अपने गुरुजनों तथा अन्य सभी श्रेष्ठ पुरुषों के प्रति आदर की भावना।
  5. प्राणी मात्र के प्रति करूणा, मैत्री, प्रमोद, भावना का होना।

                आज दुनियां भर में हजारों रेकी प्रशिक्षक रेकी प्रवाहक बनने का प्रशिक्षण देते हैं। रेकी प्रशिक्षण के लिए जापान, अमरीका, इंग्लैण्ड, भारत आदि विभिन्न राष्ट्रों में राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर संस्थाएं कार्यरत हैं। अमेरीका में आजकल अधिकांश डाॅक्टर, वैज्ञानिक, नर्सेज, व्यवसायी रेकी का प्रशिक्षण ले रहे हैं। जापान में रेकी सर्वाधिक लोकप्रिय है और उपचार के साथ-साथ स्वयं की तथा दूसरों की समस्याओं को समाधान करने, क्षमताओं का अधिकतम उपयोग कर राष्ट्रीय विकास के लक्ष्यों को प्राप्त कराने में विश्व में अपनी अलग पहचान बनाए हुए हैं। रेकी प्रशिक्षण में सर्वप्रथम विचार शून्य जाग्रत अवस्था में प्रशिक्षणार्थियों को लाने का अभ्यास कराया जाता है, उसके पश्चात् शरीर में शक्ति के केन्द्र सातों चक्रों का उनसे सम्बन्धित ध्वनि एवं रंगों के आधार पर ध्यान का अभ्यास कराया जाता है। इसके साथ-साथ आभामण्डल को स्वच्छ एवं शुद्ध करने की प्रक्रिया कराई जाती है। साथ ही साथ चेतना के प्रवाह का श्वसन क्रिया के साथ एक लय में अभ्यास कराया जाता है, जिसके परिणामस्वरूप प्रशिक्षणार्थियों के शरीर में विभिन्न प्रकार की तरंगों के प्रवाह की अलग-अलग अनुभूतियाँ होती हैं। रेकी प्रशिक्षक विद्यार्थी के चक्रों का ब्रह्माण्ड की प्राण ऊर्जा के साथ सम्बन्ध जुड़वाते हैं, जिससे रेकी उनसे मस्तिष्क के ज्ञान केन्द्र में प्रवेश कर हथेली में प्रवाहित होने लगती है। लगातार अभ्यास से रेकी का प्रवाह विद्यार्थियों में सुव्यवस्थित ढंग से होने लगता है। ऐसी परिस्थिति में विद्यार्थी स्वयं रेकी वाहक बन जाते हैं और जहां-जहां वे अपनी हथेली रखते हैं, वहां से रेकी का प्रवाह होने लगता है। रोगग्रस्त भाग में हथेली स्पर्श करने अथवा चक्रों पर हथेली का स्पर्श करने से वह भाग सक्रिय हो जाता है और रोग से राहत मिलने लगती है। रेकी के प्रवाह से शरीर में पुराने जमे हुए शारीरिक व मानसिक आवेगों से उत्पन्न अवरोध, विकार, दुर्गुण हटने लगते हैं। जितना-जितना अभ्यास किया जाएगा, आवश्यक मापदण्डों का पालन किया जाएगा, रेकी का प्रवाह उतना ही शक्तिशाली होगा तथा अच्छे परिणाम शीघ्र ही प्राप्त होने लगेंगे।

प्रभावशाली चिन्हों का रेकी में उपयोगः-

                विभिन्न चिन्हों की सहायता से रेकी प्रवाहक रेकी को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष क्षेत्रों में प्रभावशाली ढंग से हस्तान्तरित कर सकते हैं। इन्हीं चिन्हों के प्रभाव से रेकी का प्रभाव कई गुणा बढ़ जाता है। जिस प्रकार हथियारों एवं लड़ाई के काम में आने वाले विशिष्ट उपकरणों से सैनिक की लड़ने की ताकत बढ़ जाती है, ठीक उसी प्रकार इन चिन्हों के साथ रेकी प्रवाहित करने से उसका प्रभाव और कार्यक्षेत्र काफी बढ़ जाता है तथा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में रेकी का उपयोग किया जा सकता है। जिस प्रकार टेलीफोन का सही नम्बर डायल करने पर सामने वाले के टेलीफोन की घंटी बजने लगती है, वह इसकी चिंता नहीं करता कि तरंगें कैसे प्रवाहित होती हैं। ठीक उसी प्रकार रेकी प्रवाहक का कार्य तो मात्र चिन्ह का चुनाव कर रेकी को भिजवाना मात्र ही होता है। बाकी सारा कार्य तो रेकी स्वयं करती है। अलग-अलग कार्यो अथवा समस्याओं के समाधान हेतु अलग-अलग चिन्ह होते हैं। इन चिन्हों को कैसे अंकित किया जाए, उच्चारण कैसे किया जावे तथा कितने समय तक किस अनुक्रम में चिन्हों के साथ रेकी को अन्यत्र भेजा जाए आदि विधियां द्वितीय श्रेणी के प्रशिक्षण में सिखाई जाती है। उदाहरण के लिए जैसे- किसी परिवार में आपसी सौहार्द नहीं है तो सर्वप्रथम जिस चिन्ह की सम्बन्धित व्यक्ति के ललाट पर अंकित करने की कल्पना की जाती है, उसका कार्य परिवार के सदस्य की गलतफहमियों को दूर करना, घृणा, द्वेश, निंदा, चुगली, व्यंग्यों, आक्षेपों आदि से दूषित धारणाओं को साफ करना, अपने दोष देखने तथा दूसरों की अच्छाइयां देखने हेतु प्रेरित करने का होता है। तत्पश्चात् इन सारी बुराइयों को अन्य चिन्हों द्वारा रेकी भेजकर सदा के लिए समाप्त करना, दफनाना अथवा जलाने का होता है। जिससे सम्बन्धित व्यक्ति पुरानी बातों को भूल जाए। उसके पश्चात् सदस्यों में मैत्री, प्रेम, सौहार्द, त्याग, समर्पण की भावना बढ़ाने वाले चिन्हों के द्वारा स्वस्थ, शक्तिशाली बनाने के लिए उपर्युक्त रेकी का हस्तान्तरण किया जाता है। अन्त में उन व्यक्तियों को भविष्य में पुनः दूषित विचारों से बचाने के लिए उनके ऊपर सुरक्षा का आवरण बनाने के लिए उपयुक्त चिन्ह द्वारा रेकी भिजवानी जाती है। जिससे भविष्य में पुनः वैमनस्य की पुनरावृत्ति न हों। प्रत्येक प्रक्रिया का समय साधारणतया 3 से 5 मिनट का होता है, परन्तु अलग-अलग परिस्थितियों में ज्यादा कम भी हो सकता है। रेकी का हस्तान्तरण उसका आग्रह करने वालों में ही करना चाहिए, जिसका इसमें विश्वास हो अथवा अपनी समस्या के समाधान का हृदय से इच्छुक।

                इसी प्रकार रेकी का उपयोग घर, समाज एवं राष्ट्र को समृद्ध बनाने, संकटपूर्ण स्थितियों से निपटने, विष के प्रभाव को समाप्त करने , दुव्र्यसनों से छुटकारा पाने, मालिक मजदूरों के सम्बन्ध सुधारने, उत्पादन बढ़ाने, दुर्घटनाएं रोकने, घाव भरने, स्मरण शक्ति सुधारने, पीड़ा को तुरन्त शान्त करने, पूर्व उपार्जित अशुभ कर्मो के प्रभाव को कम करने आदि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र मे किया जा सकता है। रेकी का उपयोग स्व-पर कल्याण के लिए ही करना चाहिए। रेकी के प्रभावशाली चिन्हों को गुप्त रखना चाहिए और यदि ऐसा न किया गया परन्तु दुरुपयोग किया गया, तो उसके दुष्परिणाम भी भुगतने पड़ सकते हैं। पूर्ण स्वास्थ्य का मतलब शारीरिक स्वस्थता अर्थात् पीड़ा रहित संतुलित शारीरिक, मानसिक, प्रक्रियाएं। मानसिक और आत्मिक स्वस्थता के लिए हम समभाव की अवस्था प्राप्त करें, अनुकूल अथवा प्रतिकूल परिस्थितियों में विचलित ना हों, शान्ति, सन्तोष स्वावलम्बन, स्वतंत्रता, शुद्धता, नैतिकता एवं कामना रहित हमारा जीवन बनें। सम्पूर्ण प्राणी मात्र की प्रसन्नता के लिए हम खुष हों, हमारा परिवार सुखी हों, हमारा व्यवसाय अनुकरणीय हों तथा समाज और राष्ट्र समृद्धशाली हों।

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