क्या स्वस्थता के लिये प्राण ऊर्जा का सन्तुलन आवश्यक है?

क्या स्वस्थता के लिये प्राण ऊर्जा का सन्तुलन आवश्यक है?  


      मानव जीवन का संचालन आज भी विज्ञान के लिये आश्चर्य बना हुआ है। हमारे शरीर में जो क्रियायें अथवा प्रतिक्रियायें होती है उसका संचालन एवं नियन्त्रण कौन और कैसे करता है? क्या हमारे जन्म समय पर ग्रह एवं नक्षत्रों की ब्रह्माण्ड में स्थिति के आधार पर ज्योतिषियों द्वारा बनायी जाने वाली जन्म कुण्डलियों की यर्थाथता एवं भविष्यवाणियों के पीछे कोई वैज्ञानिक आधार है अथवा कोरी कल्पनायें? क्या विशेष प्रकार के पिरामिड प्राकृतिक ऊर्जा को आकर्षित एवं नियन्त्रित करने में सहयोग करते हैं जिससे  हजारों वर्शों तक ‘‘मीश्र (Egypt)’’ में मृत व्यक्तियों के शव सुरक्षित रखे जा सके हैं? अधिकांश मन्दिरों में मूर्ति एवं उसके बाहर वाला कक्ष जहाँ बैठ प्रभु का ध्यान किया जाता है, उसकी छत प्रायः पिरामिड के आकार की ही क्यों बनायी जाती है। पिरामिड का आकार विशेष ऊर्जा का स्रोत क्यों माना गया है एवं उसमें कौनसी ऊर्जा कहां से नियन्त्रित होती है।

      क्या हमारे आस पास का वास्तु हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करता है? अलग-अलग प्रकार के रंगों का स्पर्श, उपयोग, चिन्तन एवं ध्यान हमारे स्वास्थ्य को क्यों और कैसे प्रभावित करते हैं? विभिन्न प्रकार के मणि रत्नों, स्फटिकों एवं बहूमूल्य पत्थरों से निकलने वाली किरणें हमारे स्वास्थ्य का क्यों और कैसे नियन्त्रण करती है? 

      क्या रेकी, प्राणिक हीलिंग, डाउजिंग, दूरस्थ चिकित्सा पद्धतियाँ प्रभावशाली है एवं उनके सिद्धान्त स्वास्थ्य विज्ञान पर आधारित हैं? विशेष प्रकार प्रकार के मन्त्रोच्चारण से सर्प एवं बिच्छू का विष दूर होने के पीछे क्या वैज्ञानिक आधार है? ध्वनि चिकित्सा रोग मुक्त करने में कैसे उपयोगी सिद्ध हुयी है? विभिन्न इलैक्ट्रोनिक उपकरणों से प्रवाहित होने वाली आणविक तरंगें हमारे स्वास्थ्य के लिए कितनी और क्यों हानिकारक है? चुम्बकीय ऊर्जा हमारे स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित करती है? रोग निवारण में महत्वपूर्ण भूमिका क्यों निभा रही है? ब्रह्माण्ड में जो भी घटित होता है उसका हमारे ऊपर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष क्यों प्रभाव पड़ता है? पूर्णिमा की रात में जब समुद्र में ज्वार आता है तब हमारे मन में तो उन्माद नहीं आता? साधकों को ऐसे समय व्रत नियम रख एवं संयम के प्रति विशेष सजगता रखने की विशेष प्रेरणा क्यों दी जाती है? हमारे  विभिन्न इन्द्रियों के माध्यम से ग्रहण किये गये विषय जैसे देखना, सुनना, बोलना, गन्ध लेना, स्वाद, स्पर्श आदि के प्रति रुचि अथवा अरुचि हमारे अंगों की स्वस्थता की अभिव्यक्ति क्यों न करते है? क्या हमारा मनोबल, सहनशक्ति, उत्साह, चिन्तन, मनन हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करता है? क्या हमारी भावनाओं, आकांक्षाओं, संकल्पों, विकल्पों, आवेगों, संवेदनाओं को नियन्त्रित करने का चिकित्सकों ने उपाय खोज लिया है? अगर नहीं तो क्या उनका रोगों से प्रत्यक्ष या परोक्ष कोई सम्बन्ध तो नहीं है?

      क्या चौबीसों घन्टें हमारे सभी अंग समान रूप से सक्रिय होते हैं? भोजन एवं पानी को ही जीवन की एकमात्र ऊर्जा मानने वालों तथा उनके लिये स्वाद की लोलुपता के नाम पर निःसंकोच अभक्ष्य मांसाहार का सेवन कर ताकत पाने की कामना रखने वालों को भी स्वीकार करना होगा कि हमारे साधक एवं ऋर्षि मुनि बिना भोजन एवं पानी लगातार दीर्घकाल तक तपस्या करके भी स्वस्थ रहते थे। आज भी हमारे देश में ऐसी अनेकों विभूतियां हैं जो अनेक वर्षों से बिना भोजन स्वस्थ जीवन जी रहे हैं जो हमारी पूर्वाग्रसित भावनाओं के लिये चिन्तन का विषय है। प्राणायाम का साधक समाधि के समय लम्बे समय तक श्वसन क्रिया को रोकने में सक्षम हुये हैं। उपरोक्त सारे तथ्य हमें सोचने को बाध्य करते हैं कि हमारे जीवन का मूल आधार हवा पानी एवं भोजन के अतिरिक्त ऐसी ऊर्जा है जिससे हम हलन-चलन कर सकते हैं, श्वास ले सकते हैं, खाया हुआ पचा सकते हैं, अनुपयोगी विकारों को शरीर से बाहर निष्कासित कर सकते हैं तथा प्रजनन करने में सक्षम होते हैं। मृत्यु के पश्चात् कृत्रिम साधनों द्वारा कितनी भी प्राण वायु शरीर में क्यों न पहुँचायी जावे, ये क्रियायें नहीं हो पाती। मृत्यु के साथ ही हमारे सारे अंग ब्राह्य रूप से दिखते हुये भी पूर्ण रूपेण शान्त अथवा निष्क्रिय हो जाते हैं। बाजार में उपलब्ध ताकत की दवाईयां, जड़ी बूटियां, केपसूल, इन्जेक्षन आदि जिन्हें हम हमारी ऊर्जा का स्रोत समझने की भूल कर रहे हैं, पुनः जीवन संचालन करने में क्यों प्रभावहीन हो जाते है?

      इसका अभिप्रायः यही है कि भोजन, पानी, हवा एवं उपचार के अन्य साधन जीवन संचालन में सहयोगी मात्र ही होते हैं। अदृश्यरूप से प्रतिक्षण प्रकृति से प्रवाहित होने वाली प्राण ऊर्जा ही जीवन का मूलाधार होती है। इसी कारण यदि त्वचा के सभी छिद्रों को किसी रसायन द्वारा बन्द कर दिया जावे तो जीवन तत्काल समाप्त हो जाता है। जैन आगमों में वर्णित ‘रोम आहार’का सिद्धान्त शरीर द्वारा प्रकति से सीधी प्राण ऊर्जा ग्रहण करने के तथ्य को पुष्ट करता है। हमारे शरीर के चारों तरफ जो आभामण्डल है, वह इस प्राण ऊर्जा को सन्तुलित रखने में सहयोग करता है तथा हमारे व्यक्तित्व, चरित्र, समभाव तथा आध्यात्मिक स्तर की अभिव्यक्ति करता है। उपचार के सारे माध्यम जो शरीर में प्राण ऊर्जा को सन्तुलित कर संचालन करने के सिद्धान्तों पर, जितने-जितने आधारित होते हैं, रोग निवारण में उतने ही प्रभावशाली सिद्ध होते हैं। जो चिकित्सा पद्धतियां इस तथ्य की उपेक्षा करती है वे भले ही तत्कालिक लाभ पहुँचा सके, परन्तु अपने दुष्प्रभावों के कारण अन्य रोगों की उत्पति का कारण बन सकती है।

      जिन मार्गो से शरीर में प्राण ऊर्जा प्रवाहित होती है उन्हें प्राण ऊर्जा मार्ग अथवा मेरेडियन (Merdian) कहते हैं। शरीर में 12 मुख्य मेरेडियनस होती है, जिनमें से 10 मेरेडियन प्रमुख अंगों में ऊर्जा प्रवाहित करती है, अतः उन्ही के नाम से पहिचानी जाती है। बाकी दो प्रमुख मेरेडियन अपने कार्य अथवा गतिविधियों के आधार पर पहिचानी जाती है। शरीर में प्रमुख 12 मेरेडियन निम्न है-

  1. फेंफड़े की प्राण ऊर्जा का मार्ग (Lungs Meridian)
  2. बड़ी आंत की प्राण ऊर्जा का मार्ग (Long Intestine Meridian)
  3. आमाशय की प्राण ऊर्जा का मार्ग (Stomach Meridian)
  4. तिल्ली की प्राण ऊर्जा का मार्ग (Spleen Meridian)
  5. हृदय की प्राण ऊर्जा का मार्ग (Heart Meridian)
  6. छोटी आंत की प्राण ऊर्जा का मार्ग (Smale Intestine Meridian)
  7. गुर्दे की प्राण ऊर्जा का मार्ग (Kidney Meridian)
  8. मूत्राशय की प्राण ऊर्जा का मार्ग (Urinary Meridian)
  9. यकृत की प्राण ऊर्जा का मार्ग (Lever Meridian)
  10. पीत्ताशय की प्राण ऊर्जा का मार्ग (Gall Bladder Meridian)
  11. हृदय को संकुचन करने वाली ऊर्जा का मार्ग (Pericardia Meridian)
  12. तीन अगिन्यों को नियन्त्रित करने वाली प्राण ऊर्जा का मार्ग (Triple Heater Meridian)

      उपरोक्त सभी प्रमुख मेरेडियन शरीर में दाहिने एवं बायें भाग में समान रूप से होती है। इसी कारण शरीर के किसी भी भाग में दर्द होने पर उसके दूसरी तरफ भी धीरे-धीरे उसका प्रभाव पड़ने लगता है। जैसे यदि बायें घुटने में दर्द होता है तथा उसकी उपेक्षा की जावेगी तो धीरे-धीरे दाहिने घुटने में भी दर्द होने लगता है।

      इन मेरेडियन मार्गो पर अनेक प्रतिवेदन बिन्दु होते हैं, जहां से इनकी शाखायें एवं उपशाखायें निकलती हैं, जिनके माध्यम से प्राण ऊर्जा शरीर के प्रत्येक अवयव तक पहुँचती है। प्राण ऊर्जा के प्रवाह में अवरोध से सम्बन्धित मेरेडियन पर स्थित प्रतिवेदन बिन्दु जल्दी प्रभावित होते हैं एवं उस स्थिति में उन पर दबाव देने से पीड़ा की अनुभूति होती है। जिन-जिन प्रतिवेदन बिन्दुओं पर अवरोध आ जाता है उनसे सम्बन्धित प्राण ऊर्जा प्राप्त करने वाले अंगों पर असन्तुलन होने के कारण रोग की स्थिति बनने लगती है। एक्युप्रेशर द्वारा सही ढंग से, उन स्थानों पर दबाव देकर अवरोध को दूर कर, प्राण ऊर्जा के प्रवाह को पुनः सन्तुलित किया जा सकता है, ताकि सम्बन्धित अंग रोग मुक्त हो सकें।

      प्राण ऊर्जा के प्रवाह की दूसरी महत्वपूर्ण बात यह होती है कि यदि किसी अंग में प्राण ऊर्जा के असन्तुलन से रोग हो जाता है तो उससे सम्बन्धित मेरेडियन के मार्ग में आने वाले सभी अंगों पर भी उसका प्रभाव पड़ता है। जैसे हृदय आघात के समय पूरे हाथ में छोटी अंगुली की तरफ वाले भाग में हृदय मेरेडियन के प्रतिवेदन बिन्दुओं पर दबाव देने से पीड़ा का अनुभव होता है। इसके विपरीत मेरेडियन के किसी भाग पर चोट लग जाने अथवा विकार आ जाने से उस मेरेडियन के प्रमुख अंग पर भी उसका प्रभाव पड़ता है। इस सिद्धान्त से रोग निदान में काफी सहायता मिलती है। यदि शल्य चिकित्सक इस तथ्य की उपेक्षा न करें तथा प्रभावशाली प्रतिवेदन बिन्दुओं को हानि न पहुंचावें तो रोगी शल्य चिकित्सा के पश्चात् शरीर में प्राण ऊर्जा के असन्तुलन से पड़ने वाले अनेक दुष्प्रभावों से सहज बच सकता है। परन्तु इस तथ्य को उपेक्षा से कभी-कभी भयंकर दुष्परिणाम हो सकते हैं।

      शरीर में कुछ प्रमुख अंगों का आकार एवं स्थिति में विशेष परिवर्तन नहीं होता। जैसे फेंफड़े, हृदय, तिल्ली, गुर्दे एवं यकृत आदि। इन अंगों में यिन ऊर्जा प्रवाहित होती है। इसके विपरीत कुछ प्रमुख अंग प्रायः कभी खाली तो कभी भरे हुए रहते हैं। जैसे आमाशय, बड़ी आंत, छोटी आंत, मूत्राशय, पीत्ताशय इत्यादि। इन अंगों में यांग ऊर्जा प्रवाहित होती है। छः प्रमुख मेरेडियनस में प्राण ऊर्जा का प्रवाह हाथ अथवा पैर की अंगुली या अंगुठे से शरीर में अन्दर की तरफ होता है। जैसे बड़ी आंत छोटी आंत, त्रिअग्नी, तिल्ली, गुर्दे एवं यकृत मेरेडियन आदि। अतः ये अंग बाह्य वातावरण एवं कारणों से अपेक्षाकृत जल्दी प्रवाहित होते हैं। जैसे- सर्दी, गर्मी, वर्षा, लू  इत्यादि। इसके विपरीत छः प्रमुख सहयोगी अंगों वाली मेरेडियनस (फेंफड़े, हृदय, पेरीकार्डियन, आमाशय, मूत्राशय एवं पीत्ताशय) में प्राण ऊर्जा का प्रवाह शरीर में अन्दर से हथेली अथवा पगथली की अंगुलियों या अंगुठे की तरफ होता है। अतः इन मेरेडियनस से सम्बन्धित अंग आन्तरिक एवं भावात्मक कारणों से अपेक्षाकृत शीघ्र प्रभावित होते हैं। जैसे अत्याधिक हर्ष, दुःख, डर, तनाव, आवेग इत्यादि। प्राण ऊर्जा के प्रवाह एवं उसके प्रभाव से होने वाले रोगों का वर्गीकरण इस तथ्य को पुष्ट करता है कि अलग-अलग अंग प्रकृति से प्राण ऊर्जा का आदान-प्रदान कर संतुलित रह सकें। परन्तु इस तथ्य को अभीतक पूर्ण वैज्ञानिक आधार पर पुष्ट नहीं किया जा सका है। वर्तमान मान्यताओं के आधार पर तो सारी मेरेडियनस एक दूसरे से मिल ऊर्जा का पूर्ण चक्र बनाती है। अर्थात् जहां पर एक मेरेडियन समाप्त होती है उसके आसपास से दूसरी मेरेडियन प्रारम्भ होती है। अतिरिक्त मेरेडियन अथवा उपशाखाओं के माध्यम से ये आपस में जुड़ी रहती हैं। परन्तु हाथ एवं पैर की अंगुलियां सदैव जुड़ी न रहने के कारण सभी मेरेडियन अंगुलियों में आपस में कैसे मिलती है, शोध का विषय है। परन्तु दोनों तथ्यों पर जितनी अधिक खोज की जावेगी नवीन सत्य सामने आवेंगे। जो हमारी पूर्वाग्रसित मान्यताओं के प्रतिकूल भी हो सकते हैं।

      इन 12 प्रमुख मेरेडियन का एक सिरा हाथ अथवा पैर की अंगुलियों अथवा अंगूठे में होता है, जबकि दूसरा सिरा शरीर के मध्य भाग अथवा मस्तिष्क के भाग में होता है। हमारे हाथ पैर की अंगुलियां तथा अंगूठे से प्राण ऊर्जा के आदान-प्रदान में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। आयुर्वेद का पंच तत्व सिद्धान्त जिसमें हाथ की प्रत्येक अंगुलियां अलग-अलग तत्व की प्रतीक मानी गयी है तथा मुद्रा विज्ञान की अनेक मुद्रायें इसी सिद्धान्त के आधार पर प्राण ऊर्जा का सन्तुलन कर हमारे स्वास्थ्य, विचारों एवं गतिविधियों को नियन्त्रित करने में सहयोग करती है। जैन परम्परा में कार्योत्सर्ग की अवस्था में हथेली पर हथेली रखने से वहां प्रवावित होने वाली यिन एवं यांग ऊर्जा में सन्तुलन होता है एवं साधक को समभावी बनने में मदद मिलती है। हाथ जोड़ने से हमारा अहम् घटता है। इसी कारण हाथ एवं पैर की अंगुलियों एवं अंगूठों का आकार लम्बाई एवं बनावट हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं तथा उनके आकार में होने वाली अस्वभाविकता हमारे असन्तुलन का प्रतीक होती है। ऐसी स्थिति में विशेष रूप से पैरों की अंगुलियों पर दबाव देने से ज्यादा पीड़ा होती है।

      हाथ एवं पैरों में स्थित प्रतिवेदन बिन्दु प्रायः शरीर की सतह पर होते हैं जब कि अन्य स्थानों पर स्थित प्रतिवेदन बिन्दु अपेक्षाकृत अन्दर तथा गहरे होते हैं। शरीर के अधिकांश जोड़ों पर कोई न कोई प्रतिवेदन बिन्दु अवश्य होता है। अतः हाथ एवं पैर के प्रत्येक जोड़ों को 10 से 15 बार उल्टा और सीधा घुमाने से मेरेडियन मार्गो में उत्पन्न अवरोध आसानी से दूर हो जाते हैं।

      इन मेरेडियनस का नाड़ियों, रक्त वाहिनियों एवं शरीर में उत्पन्न विभिन्न श्रावों (हारमोन्स) से गहरा सम्बन्ध होता है। हृदय, फेंफड़े एवं पेराकार्डियन मेरेडियन शरीर के मध्य भाग में होते हुये कन्धे से हथेली की तरफ हाथ में प्रवाहित होती है, जब कि इनके सहयोगी छोटी आंत, बड़ी आंत एव त्रिअग्नी मेरेडियन हथेली के पीछे की तरफ अंगुलियों से कन्धे की तरफ होते हुए मस्तिष्क तक जाती हैं, एवं अपने सहयोगी अंगों में ऊर्जा के सन्तुलन को बनाये रखती हैं। इसी प्रकार आमाशय, मूत्राशय एवं पीत्ताशय में प्राण ऊर्जा का प्रवाह मस्तिष्क से पैरों की अंगुलियों की तरफ तथा इनके सहयोगी अंगों (गुर्दे, यकृत, तिल्ली) में मेरेडियन द्वारा ऊर्जा का प्रवाह पैरों की अंगुलियों से शरीर के मध्य भाग तक होता है। अतः रोग की अवस्था में उपचार के लिये मेरेडियन की दिशा में मसाज करने से अधिक प्रभावशाली परिणाम आते हैं।

      वैसे तो प्रतिक्षण शरीर के सभी अंगों में प्राण ऊर्जा का प्रवाह होता ही है, फिर भी चौबिसों घण्टे सभी प्रमुख अंगों में प्राण ऊर्जा का प्रवाह एक सा नहीं होता। प्रतिदिन दो-दो घन्टे बारी-बारी से प्रमुख मेरेडियन में प्राण ऊर्जा का प्रवाह विशेष होता है तथा उसके 12 घण्टे पश्चात् अपेक्षाकृत सबसे कम होता है। अतः यदि रोग का कारण किसी अंग में प्राण ऊर्जा की कमी से होता है तो जब प्रकृति से उस अंग को अधिक ऊर्जा मिलती है तो रोगी को राहत का अनुभव होता है। ऐसे समय किया गया उपचार अधिक प्रभावशाली तथा शीघ्र परिणाम देता है। इसके विपरीत ऐसे रोगों को जब प्राण ऊर्जा प्रकृति से सबसे कम मिलती है तो अपेक्षाकृत अधिक बैचेनी का अनुभव होता है। इसी प्रकार यदि रोग का कारण सम्बन्धित अंगों में प्राण ऊर्जा की अधिकता से हो तो जब प्रकृति से प्राण ऊर्जा स्वाभाविक रूप से अधिक प्रवाहित होती है तो रोगी को अधिक परेशानी का अनुभव होता है और जब उसमें सहज रूप से अपेक्षाकृत प्राप्त ऊर्जा कम प्रवाहित हो तब रोगी को स्वतः राहत का अनुभव होने लगता है। प्राण ऊर्जा की प्रत्येक मेरेडियन में सबसे अधिक ऊर्जा प्रवाह एवं सबसे कम ऊर्जा प्रवाह का समय वैज्ञानिकों की मान्यता के अनुसार निम्न होता है।

       

क्र.सं. मेरेडियन के नाम  

प्राण ऊर्जा के अधिक 

प्रवाह का समय   

प्राण ऊर्जा के अपेक्षाकृत कम  

प्रवाह का समय

1. फेंफड़े रात्रि 3 से 5 बजे तक दोपहर 3 से 5 बजे तक
2. बड़ी आंत   प्रातः 5 से 7 बजे तक सांयकाल 5 से 7 बजे तक
3. आमाशय   प्रातः 7 से 9 बजे तक सांयकाल 7 से 9 बजे तक
4. तिल्ली   प्रातः 9 से 11 बजे तक रात्रि 9 से 11 बजे तक
5. हृदय दोपहर 11 से 1 बजे तक रात्रि 11 से 1 बजे तक
6. छोटी आंत दोपहर 1 से 3 बजे तक  रात्रि 1 से 3 बजे तक
7. मूत्राशय दोपहर 3 से 5 बजे तक प्रातः 3 से 5 बजे तक
8. गुर्दे सांयकाल 5 से 7 बजे तक प्रातः 5 से 7 बजे तक
9. पेरेकार्डियन रात्रि 7 से 9 बजे तक प्रातः 7 से 9 बजे तक
10. त्रिग्रनी रात्रि 9 से 11 बजे तक प्रातः 9 से 11 बजे तक
11. पीत्ताशय रात्रि 11 से 1 बजे तक दोपहर 11 से 1 बजे तक
12. यकृत   रात्रि 1 से 3 बजे तक   दोपहर 1 से 3 बजे तक

                                         

                दूसरी बात कभी-कभी रोगी को निश्चित समय होते ही रोग का आभास होने लगता है। इसका कारण या तो वह अंग है जिनमें ऊर्जा का प्रवाह प्रकृति से उस समय अपेक्षाकृत अधिक अथवा कम प्रवाहित होता है। इस तथ्य से रोग का कारण जानने में सहायता मिलती है। इसी कारण दमा के रोगी को पिछली रात में अधिक परेशानी होती है। प्रातः जल्दी उठ घूमने जाने वाले अपेक्षाकृत अधिक स्फूर्ति वाले होते हैं। बड़ी आंत की सफाई हेतु मल त्याग का समय प्रातःकाल ही उचित है। जो व्यक्ति आमाशय तिल्ली जोड़े के समय ऊर्जा का उपयोग कर भोजन करते हैं, उनके पेट के रोग कम होते हैं। आज बढ़ते हुये हृदय रोगों का एक कारण यह भी है कि हमने अपने भोजन का समय बदल लिया है। जब हृदय छोटी आंत जोड़े को प्राण ऊर्जा का प्रकृति  से स्वाभाविक अधिक प्रवाह होता है। (अर्थात् 11 बजे से 3 बजे तक)  हम भोजन करते हैं जिससे हृदय मेरेडियन प्रकृति से प्राप्त प्राण ऊर्जा को पूर्ण रूपेण ग्रहण नहीं कर पाती। अतः हृदय रोगियों के लिये विशेष रूप से भोजन के समय में परिवर्तन लाभप्रद होता है। आयुर्वेद की मान्यतानुसार भी शरीर में 10 से 12 बजे तक पीत्त प्रकृति रहती है, अर्थात् शरीर में पीत्त बनता है। अतः 12 बजे तक खाना खा लेना चाहिये ताकि पाचन आराम से हो सके। रात्रि में ही सोने का विधान क्यों बनाया गया? यकृत पित्ताशय में प्राण ऊर्जा का प्रवाह मध्य रात्रि 11 बजे से 3 बजे तक जब मन एवं बाह्य वातावरण पूर्ण रूप से शान्त होता है एवं व्यक्ति के लिये निद्रा का उपर्युक्त समय है। अतः जो व्यक्ति रात में देर से सोते हैं अथवा रातभर जागते हैं उनका पाचन प्रायः खराब रहता है। स्वभाविक भूख भी नहीं लगती है। स्वभाव में चिड़चिड़ा रहने लगता हैं।

                प्रतिदिन की भांति 12 प्रमुख मेरेडियनस में लगभग एक मास तक ऊर्जा का अपेक्षाकृत अधिक प्रवाह होता है। इसी कारण मनुष्य की जन्म तिथि के समय जिस मेरेडियन में प्रकृति से प्राण ऊर्जा का प्रवाह अधिक होता है उससे सम्बन्धित अंग ही उस व्यक्ति का प्रमुख संचालक अंग होता है। जब तक वह अंग पूर्णरूपेण स्वस्थ रहता है अन्य रोग ज्यादा हानि नहीं पहुँचा सकते, परन्तु उस मेरेडियन में प्रवाहित ऊर्जा के असन्तुलन की तनिक उपेक्षा भी काफी हानिकारक हो सकती है। मनुष्य की मृत्यु का कारण उस मेरेडियन में ऊर्जा के प्रवाह का अभाव ही होता है।

                इसी कारण किसी व्यक्ति की मृत्यु हृदयघात से होती है तो कोई गुर्दे, यकृत, फेंफड़े, तिल्ली, पेनक्रियाज इत्यादि के रोगों से। कोई-कोई व्यक्ति प्रथम हृदयघात में ही चले जाते हैं क्योंकि उनका संचालक अंग हृदय होता है, जबकि बहुत से व्यक्ति 3-4 हृदयघात आने के पश्चात् भी बच जाते हैं क्योंकि उनका संचालक अंग हृदय नहीं होता।

 प्रतिवर्ष मेरेडियनस में अपेक्षाकृत अधिक ऊर्जा प्रवाह का समय डाॅ. ब्लेट के अनुसार निम्न  होता है।

क्र. सं. मेरेडियन    समय
1. यकृत मेरेडियन 8 जनवरी से 6 फरवरी
2. फेंफड़े की मेरेडियन  7 फरवरी से 8 मार्च
3. बड़ी आंत मेरेडियन 9 मार्च से 8 अप्रेल
4. अमाशय मेरेडियन  8 अप्रेल से 7 मई
5. तिल्ली मेरेडियन  8 मई से 7 जून
6. हृदय मेरेडियन 8 जून से 7 जूलाई
7. छोटी आंत मेरेडियन 8 जुलाई से 7 अगस्त
8. मूत्राशय मेरेडियन 8 अगस्त से 7 सितम्बर
9. गुर्दे की मेरेडियन 8 सितम्बर से 7 अक्टूम्बर
10. पेरीकार्डियन मेरेडियन 8 अक्टूम्बर से 7 नवम्बर
11. त्रिअग्नी मेरेडियन 8 नवम्बर से 7 दिसम्बर
12. पित्ताशय मेरेडियन 8 दिसम्बर से 7 जनवरी

                उपरोक्त तालिका के अनुसार यदि किसी व्यक्ति की जन्म तिथी एक ही यिन-यांग समूह अंगों के बीच होती है जैसे 8 (जनवरी, मार्च, मई, जुलाई, सितम्बर, नवम्बर) के आसपास का समय, तब प्रमुख संचालक अंग पर विशेष प्रभाव अवश्य पड़ता है, परन्तु यदि जन्म तिथी दूसरे समूह वाले अंग में प्राण ऊर्जा प्रवाहित होने के समय के आसपास, जैसे 8  (फरवरी, अप्रेल, जून, अगस्त, अक्टूम्बर, दिसम्बर) तब प्रमुख अंग को जानने के लिये दोनों अंगों का असंतुलन हो सकता है, अर्थात् जन्म तिथी प्राकृतिक ऊर्जा के अंगों में परिवर्तन के समय जितनी-जितनी समीप होगी उतना-उतना ही उन अंगों की प्रमुख संचालक अंग हेतू भूमिका एवं प्रभाव रहेगा। इस तथ्य से रोग निदान एवं उपचार में काफी सहायता मिलती है। जब रोगी की हालत बहुत चिन्ताजनक हो, वह अपने रोगों के कारणों की सही अभिव्यक्ति करने में असमर्थ हो तथा रोग का निदान नहीं हो पा रहा हो, तब जन्म तिथी के आधार पर सम्भावित प्रमुख संचालक अंगों के उपचार को प्राथमिकता देनी चाहिये। इन अंगों को स्वस्थ रखने में संचालक अंग की अहम् भूमिका होती है। जैसे सेना में सेनापति एवं पाठशाला में प्रध्यानाध्यपक की।

                अतः हमें स्वीकारना होगा कि जितना-जितना व्यक्ति प्रकृति के समीप रहेगा, उसके साथ अपना समन्वय रखेगा, स्वभाविक रूप से प्राप्त प्राण ऊर्जा का अधिकाधिक उपयोग करेगा तथा प्राकृतिक नियमों का पालन कर अपने विचारों में सात्विकता रखेगा, उतना ही वह प्राण ऊर्जा का स्वयं में सन्तुलन रख शारीरिक एवं मानसिक स्वस्थता के नजदीक होगा। चिकित्सा जगत से जुड़े सभी चिकित्सकों एवं स्वास्थ्य मंत्रालय से हमारा विनम्र अनुरोध है कि जनसाधारण के स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिये  इन तथ्यों को स्वीकारें तथा इसके विभिन्न पहलुओं पर पूर्वाग्रह छोड़ शोध करें ताकि हम स्वस्थ रहने की कला सीख सकें।

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