क्या वास्तु शास्त्र का सिद्धान्त वैज्ञानिक है?

क्या वास्तु शास्त्र का सिद्धान्त वैज्ञानिक है?


क्या भवन उसका उपयोग करने वालों को प्रभावित करता हैः-

                कभी-कभी सारे प्रयास सही रूप से करने के बावजूद जीवन में बार-बार अनचाहे अनहोनी घटनाएँ घटित होती है। पूर्ण सजगता विवेक एवं परिश्रम से कार्य करने के बावजूद सफलता के स्थान पर विफलताएँ मिलती है। घर में परिवार के सदस्यों में आपसी समन्वय, सामंजस्य तालमेल नहीं होता। तिरुपति एवं नाकोड़ा जैन मंदिर की भांति दर्शनार्थियों एवं भक्तों की भीड़ चन्द मंदिरों में आती रहती है, तो बहुत से मंदिरों अथवा धार्मिक स्थलों पर नियमित पूजा अर्चना अथवा आरती तथा स्वाध्याय तक नहीं होता। एक ही व्यक्ति के एक ही प्रकार के कारखानों में एक अपेक्षा से अधिक लाभ अर्जित करता है तो दूसरे में तालाबंदी हो जाती है। हजारों निर्माण कार्य बनते बनते रूक जाते हैं। उनका निर्माण पूरा नहीं होता। अगर निर्माण पूरा हो भी जाता है तो वे उपयोग में नहीं आते। यदि उपयोग में लिये भी जावें तो जिन उद्देश्यों के लिय उनका निर्माण हुआ उनकी पूर्ति नहीं कर पाते। घर में विकलांग सदस्यों का जन्म अथवा बार-बार शल्य चिकित्सा करवाने की स्थिति का बनना, अकाल मृत्यु का होना, आगजनी की घटनाएँ, जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न होती है। कोई शहर, जिला, प्रान्त एवं राष्ट्र तीव्र गति से विकास करता है तो वैसी ही सुविधाएँ उपलब्ध कराने के बावजूद अन्य अविकसित ही रहते हैं। समय-समय पर आने वाली बाढ़ें, तूफान, भूकम्प, महामारी, शत्रुओं के आक्रमण, युनियन कार्बाइड जैसी प्राकृतिक आपदाओं के पीछे क्या वैज्ञानिक रहस्य है जो आज के वैज्ञानिकों के लिये चिन्तन का विषय है? ऐसे सभी अप्रत्यक्ष कारणों की विस्तृत जानकारी हमें वास्तुशास्त्र के ज्ञान से मिल सकती है। हमारे पौराणिक ग्रन्थों में स्थान-स्थान पर द्रव्य काल एवं स्वभाव के साथ-साथ क्षेत्र के महत्त्व की विस्तृत चर्चा की गयी है। भवन, गांव, नगर, जिला, प्रान्त एवं राष्ट्र की स्थिति का हमारे शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक, विकास से गहरा सम्बंध है।

वास्तु विज्ञान का उद्भव एवं महत्त्वः-

                वास्तु शास्त्र का साधारण सा सम्बन्ध भवन निर्माण एवं आवास व्यवस्था से है। वास्तु शास्त्र अर्थात निर्माण आभियान्त्रिकी (Structural Engineering) शिल्प कला, मूर्तिकला आदि का ज्ञान कराने वाला विज्ञान। मनुष्य सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है। अतः उसके आवास एवं कार्य क्षेत्र के सभी स्थान सर्वश्रेष्ठ, साताकारी, सुखदायी, निरापद होना चाहिये। वास्तु शास्त्र पौराणिक विज्ञान है और हमारी संस्कृति की विश्व को अमूल्य देन। प्राचीन काल में भारतीय विद्वानों, चिन्तकों, ऋर्षि मुनियों ने मनुष्य के जीवन को सुखी समृद्ध बनाते हुए जीवन के चरम लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये आध्यात्म के साथ-साथ जीवनोपयोगी ज्ञान के प्रत्येक क्षेत्र की विस्तृत जानकारी दी। जैन आगमों में प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ की सुपुत्रियों द्वारा सारे विश्व को सर्वप्रथम 72 कलाओं के ज्ञान कराने का वर्णन मिलता है। जिससे मानव अपनी क्षमताओं का अधिकतम उपयोग कर जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए अपने चरम लक्ष्य को प्राप्त कर सके। देलवाड़ा और राणकपुर जैसे जैन मंदिर जैन स्थापत्य कला के आज भी जीवन्त उदाहरण हैं।

                अन्य भारतीय दर्शनों में भी वास्तु शास्त्र पर सैंकड़ों पुस्तकों का प्रकाशन हुआ है जिसमें भवन निर्माण के विषय में सूक्ष्म से सूक्ष्म जानकारी की गहरायी से व्यवस्थित रूप से, तर्क संगत, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से वर्णन किया गया है। विश्वकर्मा द्वारा रचित ग्रन्थों तथा कौटिल्य के अर्थ शास्त्र एवं पुराणों में इसका विस्तृत विवेचन है। वाराहमिहिर के ज्योतिष ग्रन्थ ‘’वृहत संहिता’’, महाराजा भोजदेव द्वारा रचित  ‘’समरांगण सूत्रधार’’ वास्तु शास्त्र के प्रामाणिक ओर अधिकृत अंग है।

                प्राचीन काल में हमारे देश में बनने वाले अधिकांश राजमहल, मंदिर, स्तूप, सार्वजनिक भवनों का निर्माण वास्तु शास्त्र के नियमों के अनुरूप होता था जिससे वे निर्माण अत्यंत भव्य, मजबूत और दीर्घकाल तक स्थायी रहते थे।

पंचतत्त्वों का मानव जीवन पर प्रभावः-

                इस सृष्टि में पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश आदि पांच तत्वों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। हमारे शरीर के संचालन में भी इन पंच तत्त्वों का योगदान होता है। इस धरती पर किये जाने वाले किसी भी प्रकार के निर्माण कार्य में भी ये ही पंच तत्त्व काम में लिये जाते हैं। इन पंच तत्त्वों से उत्पन्न अलग-अलग प्रकार की ऊर्जाओं का उस क्षेत्र में कार्यरत अथवा रहने वालों से गहन सम्बन्ध होता है। जो उनके मन और शरीर पर हितकारी अथवा अहितकारी प्रभाव डालते हैं। इन पंच मूलभूत तत्त्वों के सूक्ष्म और अदृश्य रूप से पड़ने वाले आपसी प्रभावों को अपनी इच्छानुसार नियंत्रित करना या बदलना आज भी पूर्ण रूप से हमारे सामथ्र्य से परे है। अतः हमें प्रकृति की पंचभूतात्मक व्यवस्था को बिना बिगाड़े कोई निर्माण कार्य करवाना चाहिये। यदि इस संतुलन की उपेक्षा की गयी अथवा बिगाड़ा गया तो उसमें रहने वालों को किसी न किसी रूप में उसके दुष्परिणामों को भुगतना पड़ेगा। अतः कोई भी निर्माण करते अथवा उसमें परिवर्तन करते समय प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर योजना, प्रारुप और नक्षा बनाकर निर्माण करना चाहिये ताकि उसमें रहने वालों के आपसी सम्बन्धों में मधुरता, स्नेह बना रहे तथा सभी पारस्परिक सहयोग करते हुए शान्ति, सुख, प्रसन्नता के साथ अपने उद्देश्यों को प्राप्त कर सकें। इसके विपरीत इन नियमों की अवहेलना से उनके जीवन में अशान्ति, तनाव, कष्ट जैसी प्रतिकूलताओं का सामना करना पड़ सकता है। किसी भी कार्य की सिद्धी के लिये काल की परिपक्वता, वस्तु का स्वभाव, कर्मो के उदय में आने की स्थिति, नियति और पुरुषार्थ आदि सभी जिम्मेदार होते हैं। किसी एक को भी नकारा नहीं जा सकता। पांचों का समन्वय आवश्यक है। ठीक उसी प्रकार वास्तु भी घटित होने वाले घटनाक्रम को आंशिक रूप से प्रभावित करते हैं। जिस प्रकार भयंकर गर्मी में भी पर्वतीय स्थलों पर जाकर रहने से गर्मी की तीव्रता से बचा जा सकता है। एक ही मौसम में पर्वतीय क्षेत्र और रेगिस्थान में गर्मी की अलग-अलग स्थितियाँ होती है। वे हमारे साथ जबरदस्ती नहीं करते। हम अपनी इच्छानुसार मौसम के अनुकूल क्षेत्र का चयन कर सकते हैं। दुःख में संवेदना मिलने पर दुःख का कम अनुभव होता है। कर्जा मांगने वाला तकाजा न करे तो मामूली राहत तो अनुभव होती ही है। ठीक उसी प्रकार वास्तु के दोषों को दूर करने से बहुत बड़ा संकट थोड़े में टल जाता है। वास्तु से अच्छे भाग्य की स्थिति बनी रहती है।

वास्तु की सीमाएँ-

                जब तक घर में रहने वालों के पुण्य प्रबल होते हैं तब तक वास्तु दोषों का उन पर विशेष प्रभाव नहीं पड़ता। वास्तु के नियमों के अनुरूप निर्माण कराने मात्र से बिना पुरुषार्थ सारी समस्याओं का समाधान भी संभव नहीं है। जब पुण्य क्षीण होने लगते हैं तो वास्तु नियमों से विपरीत बने भवनों में रहने से चारों तरफ संकट का सामना करना पड़ता है। परन्तु यदि वास्तु अनुरूप बने मकान में रहते हैं तो उन व्यक्तियों का जीवन सामान्य रूप से चलता रहता है। प्रतिकूलताएँ अपना अपेक्षित प्रभाव नहीं दिखा पाती। कोई भी निर्माण कार्य युगों -युगों तक एकसा प्रभावशाली नहीं रहता। किसी भी निर्माण के प्रभावशाली बने रहने की भी मनुष्य के एक निश्चित आयु की भांति अवधि होती है। इसी कारण किसी काल में वास्तु शास्त्र की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ बना हुआ भवन कालान्तर में प्रभावहीन हो जाते हैं। परन्तु फिर भी यदि पिछले 100 वर्षों में निर्मित विभिन्न भवनों का अध्ययन किया जावे जिसमें व्यक्ति की तीन चार पीढ़ीयां अपने जीवन के अमूल्य समय बीता चुकी हो तो उनके परिणामों, अनुभवों के आधार पर वास्तु के प्रभाव को आसानी से परखा जा सकता है। अतः वास्तु शास्त्री के लिये प्रत्येक निर्माण एक प्रयोगशाला है और उसमें रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति प्रयोग का माध्यम। आवश्यकता है कि हम अनेकान्त दृष्टिकोण से पूर्वाग्रह छोड़ खुले दिमाग से, जिज्ञासावृति से, धैर्यपूर्वक उन कार्यक्षेत्र वाले भवनों अथवा आवासों में रहने वाले व्यक्तियों के उत्पन्न होने वाली प्रत्येक अनुकूल अथवा प्रतिकूल परिस्थितियों के कारणों का अध्ययन कर अपनी मान्यताएँ बनावें।

क्या वास्तु शास्त्र वैज्ञानिक है?-

                कोई भी सिद्धान्त तब ही वैज्ञानिक कहा जा सकता है जबकि वे चिन्तनीय, विवेकपूर्ण, विचारयुक्त हो, व्यवहार में लाने योग्य हो, समय के साथ न बदले, सर्व मान्य हो तथा अपने विशेष नियमों पर आधारित हो। विज्ञान सत्य, तथ्य, तर्क, प्रमाण, परिणाम, अनुभव पर आधारित होता है। मात्र जिसे देखा जा सके, मांपा जा सके, बार-बार पुनरावर्तित किया जा सके उस ही को विज्ञान मानना अदूरदर्शिता होगी। विज्ञान अध्ययन, अनुभव एवं आचरण का विषय है। किसी बात को बिना सोचे समझे पूर्वाग्रह के कारण नकारना, अविश्वास करना भी तो बुद्धिमता नहीं कहा जा सकता। विज्ञान की भी अपने सीमाएँ है। प्रत्येक घटनाक्रम को सही रूप से अभिव्यक्त करना उसकी पहुँच से परे है।

                वास्तु का सिद्धान्त स्थायी है क्योंकि यह पंच मूलभूत तत्त्वों से प्रभावित होता है। जब तक इनका अस्तित्व रहेगा वास्तु के नियम भी प्रभावशाली रहेंगे। वास्तु सूर्य और पृथ्वी के सम्बन्धों पर आधारित हैं। इन दोनों ग्रहों का स्वभाव सारे जगत के लिये एक जैसा हैं। धर्म, जाति, राष्ट्र से ये प्रभावित नहीं होते। कुदरत के कानून सभी पर लागू होते हैं। वे किसी के साथ भेदभाव नहीं करते। पृथ्वी सबका भार सहन करती है। वायु एवं आकाश सबके लिये उपलब्ध हैं। सूर्य बिना भेदभाव ऊर्जा और प्रकाश देता है। वास्तु भी एक ऊर्जा है जिसके स्वयं का कोई दिमाग नहीं होता। जैसे आग में कोई भी हाथ डाले उसका हाथ जलेगा। जिस प्रकार कोई मशीन खराब होने पर उसके अनुभवी टेक्नीशियन को बुलाकर ठीक करानी पड़ती है ठीक उसी प्रकार वास्तु के दोषों को दूर करने से उस घर में रहने वालों की समस्याओं का समाधान होने लगता है। ठीक उसी प्रकार वास्तु के नियम, सिद्धान्त, सर्वकालिक, सार्वभौमिक एवं सर्वत्र उपयोगी है। जिस प्रकार शरीर की लघुतम कोशिकाएँ भी ब्रह्माण्ड में घटित होने वाली घटनाओं से प्रभावित होती है, ठीक उसी प्रकार भूखण्ड का छोटा से छोटा भाग ब्रह्माण्ड का लघु रूप होता है अतः मकान अथवा किसी भी भवन के छोटे से छोटे भाग पर वास्तु शास्त्र के वे सारे नियम लागु होते हैं जो पूरे मकान , भवन, प्लाॅट, बस्ती, ग्राम, जिला, प्रान्त, राष्ट्र अथवा सम्पूर्ण विश्व की स्थिति पर लागु होते हैं। अतः किसी भवन का निर्माण करते समय हमें न केवल सिर्फ पूरे भवन की दृष्टि से ही वास्तु का ख्याल करना है अपितु उसके प्रत्येक भाग पर भी यथासंभव नियमों का पालन करना चाहिये जिससे अच्छे अपेक्षित परिणामों की प्राप्ति हो। कहने का तात्पर्य वास्तु शास्त्र मात्र श्रद्धा का विषय नहीं अपितु पूर्णतः वैज्ञानिक है जिस पर निरंतर शोध की आवश्यकता है।

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