क्या वाणी स्वास्थ्य को प्रभावित करती है?

क्या वाणी स्वास्थ्य को प्रभावित करती है?


                भावों, विचारों, अभिव्यक्ति एवं संवाद का सशक्त माध्यम है-वाणी। विचार जब तक मन में रहते हैं, भाव कहलाते हैं, परन्तु जब वे वाणी के माध्यम से अभिव्यक्त हो जाते हैं, तो सार्वजनिक हो जाते हैं। मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है, जिसको मन के साथ-साथ वाणी की प्राप्ति होती है। मधुर वाणी हृदय की मधुरता, कठोर वाणी भावों की कठोरता, असम्बन्धित वाणी विचारों की अस्त-व्यस्थता की परिचायक होती है। वाणी में व्यक्ति का व्यक्तित्व झलकता है। मन में घबराहट अथवा कांपने से वाणी भी काँपने लगती है। दृढ़ मनोबल और आत्म-विश्वास से वाणी में ओज आता है। स्वर दृढ़ हो जाता है। आशंका अथवा भय में स्वर धीमा हो जाता है। उसमें अस्पष्टता आ जाती है। वाणी ज्ञान और चिन्तन के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। वक्ता की वाणी के प्रभाव से समझने की क्षमता बहुत बढ़ जाती है। जो भाषा नहीं जानते उस भाषा में कहीं गई बात का विशेष प्रभाव नहीं पड़ता। वाणी का सम्बन्ध शब्दों से होता है। भाषा उसकी अभिव्यक्ति का माध्यम होती है। भाषा के द्वारा होने वाली आत्म प्रवृत्तियों को वचन योग कहते हैं। वाणी मन द्वारा परिष्कृत होकर ही प्रकट होती है। जब मन में सरलता, पवित्रता होती है तो वाणी मधुर और शुद्ध होती है, परन्तु जब मायावृत्ति होती है तो वाणी अपवित्र हो जाती है। शब्द की तरंगों में अपार शक्ति होती है। जो हम बोलते हैं, उन शब्दों की तरंगे क्षण मात्र में सारे संसार में फैल जाती है। इसी कारण तो मोबाइल फोन से हम दुनिया में किसी भी क्षेत्र में रहने वाले व्यक्ति से बातचीत कर सकते हैं। टी.वी., रेडियों, टेलीफोन आदि उपकरण ध्वनि की शक्ति से ही कार्य करते हैं। वाणी का शरीर और मन पर विशेष प्रभाव पड़ता है।

                शब्द में अनन्त शक्ति होती है। प्रत्येक अक्षर शक्ति से ओत-प्रोत होता है। ‘अ’से ‘ह’तक प्रत्येक अक्षर का वर्ण होता है। स्वाद होता है। यदि हम उच्चारण की शुद्धता में जाएं तो पता चलेगा कि अक्षरों के उच्चारण के साथ-साथ स्वाद में भी अन्तर आ जाता है, परन्तु आज यह सूक्ष्म ज्ञान लुप्त हो गया है, जिसके कारण मंत्रों की शक्ति भी विस्मृत हो रही है। मंत्र शक्ति शब्द की संयोजना और उच्चारण पर निर्भर होती है। किस उद्देश्य से मंत्र का उपयोग करना है, उसके अनुसार शब्दों की संयोजना की जाती है। जैसे रसायनशास्त्री जानता है कि किन-किन द्रव्यों को मिलाने से कौन-सा द्रव्य बनता है? उसका प्रभाव कैसा होगा? ठीक उसी प्रकार मंत्र विद् भी जानता है कि किन शब्दों के संयोजन से किस प्रकार की तरंगे पैदा होती है? वे परमाणुओं को कैसे प्रभावित और प्रकम्पित करेंगे? उनकी परिणति किस प्रकार की होगी? इस सिद्धान्त के आधार पर हमारे ऋर्षि-मुनियों ने चमत्कारी एवं प्रभावकारी मंत्रों की संरचना की, जो हमारे धर्म ग्रन्थों में भरे पड़े हैं। नमस्कार मंत्र, गायत्री मंत्र आदि आज भी श्रद्धा से जपे जाते हैं।

                ओम्, अहम्, सोहम् आदि मंत्राक्षरों का दीर्घ उच्चारण करने से, मन वाणी के साथ जुड़ जाता है। मन का योग पाकर वाणी शक्तिशाली हो जाती है। वायुमण्डल में कम्पन पैदा करती है, जिससे हानिकारक, अनिष्टकारी परमाणु दूर हो जाते हैं और वातावरण शुद्ध हो जाता है। मंदिरों में प्राण प्रतिष्ठा के समय अथवा विशेष प्रसंगों पर मंत्रों के सामूहिक जाप के पीछे यही भावना और सिद्धांत है। संगीत, प्रार्थना, भजन, भाषण, उपदेश, आदेश आदि के शरीर और मन पर पड़ने वाले प्रभावों का हम प्रतिदिन अनुभव करते हैं।

                आकस्मिक दुर्घटना के पश्चात् डाॅक्टर के आने का समाचार सुनते ही रोगी को कितनी राहत का अनुभव होता है? रोगी का आराम पूछने से, सान्त्वना के शब्दों से थोड़े समय के लिए रोगी अपना रोग कैसे भूल जाता है? अनुभवी डाॅक्टरों के प्रेम भरे शब्द रोगी को जितनी राहत दिलाते हैं, उतनी कभी-कभी अच्छी से अच्छी दवा भी नहीं दिलाती। इसी कारण तो सभी पैथियों (चिकित्सा पद्धतियों) में सहानुभूति (Sympathy) को सबसे अच्छी चिकित्सा माना है। किसी को प्रोत्साहित करने से, प्रेरणा देने से कार्यक्षमता कैसे बढ़ जाती है? थकान का अनुभव क्यों कम हो जाता है? न्यायाधीश द्वारा अपने अनुकूल फैसला देने से तनाव कैसे दूर हो जाता है? किसी की प्रशंसा करने से उसके चेहरे पर क्यों मुस्कुराहट झलकने लगती है। शत्रु के क्षमा मांगने से विरोधी का क्रोध कैसे शान्त हो जाता है? गलती पर माफी माँगने वालों को उचित दण्ड क्यों नहीं दिया जाता? संकट के समय संवेदना और सान्त्वना के शब्दों से सामने वाले का मनोबल कैसे बढ़ जाता है? मैत्री और प्रेम भरे शब्दों से सामने वाले का हृदय सरलता से जीता जा सकता है। जीवन में प्रतिदिन ऐसे सैकड़ों प्रसंग आते हैं, जब हम वाणी के प्रभाव से ऊर्जा पाते हैं। मनपसन्द बात अथवा संगीत सुनते ही व्यक्ति भावविभोर हो, झूमने लगता हैं। तालियों या चेहरे की मुस्कुराहट से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। इसके विपरीत व्यंग्यात्मक और अपमानजनक शब्दों के प्रयोग से महाभारत हो सकता है। कटुवाणी से मित्रता का नाश होता है। डांटने, फटकारने, चिड़चिड़ाने से स्वयं की मानसिकता और विचारों में तो विकार होते ही हैं, सामने वालों में घृणा, नफरत, द्वेश के भाव पैदा करते हैं। निन्दा करने वालों और चुगली खाने वालों को शत्रुओं को ढूँढ़ने की जरूरत नहीं होती। सत्य, मधुर और कम बोलने वालों का सभी आदर करते हैं और सदैव निर्भय एवं तनावमुक्त होते हैं। इसके विपरीत झूठ, कड़वा और ज्यादा बोलने वाले सदैव भयभीत और तनावग्रस्त रहते हैं। मधुर वाणी सर्वोत्तम आदर-सत्कार और उपहार है।

                इस प्रकार हम देखते हैं कि वाणी एक ऊर्जा है। ऊर्जा का प्रयोग अच्छे कार्य के लिए भी हो सकता है और बुरे कार्य के लिए भी हो सकता है। शक्ति, शक्ति होती है। उसका अच्छा अथवा बुरा प्रयोग करना प्रयोक्ता पर निर्भर करता है। ऊर्जा अपने आप में अच्छी या बुरी नहीं होती। वाणी का प्रभाव तुरन्त और प्रभावशाली होता है। संगीतमय वातावरण में गाय ज्यादा दूध देती है। पेड़-पौधे और वृक्ष जल्दी विकसित होते हैं तथा उनकी गुणवता बढ़ जाती है। आदर-सत्कार एवं प्रेम भरे वातावरण में खाया और खिलाया गया भोजन ज्यादा शक्तिवर्धक होता है। इसके विपरीत घृणा, द्वेश और अपमानजनक वातावरण में खाया गया पौष्टिक भोजन भी जहरतुल्य हो जाता है। इसी कारण हमारे देश में अतिथियों को पहले देवता के तुल्य समझा जाता था। उनका आदर सत्कार किया जाता था। भोजन कराते समय भी प्रेमपूर्वक मनुहार का प्रचलन था। खुशी के प्रसंगों पर सम्मानपूर्वक अपने प्रियजनों की आमंत्रित कर भोजन कराने का रिवाज था, परन्तु आज उसमें काफी कमी आ गई है। तनाव, संकट, पीड़ा, दुःख भुलाने के लिए मधुर वाणी अमूल्य औषधि का कार्य करती है। अतः स्वास्थ्य की कामना रखने वालों को वाणी का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए तथा आवश्यकता पड़ने पर ही कम से कम विवेकपूर्वक सत्य, मधुर भाषा का प्रयोग करना चाहिए। मौन साधना से व्यक्ति का आत्मबल बढ़ता है।

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