प्रभावशाली स्वावलम्बी लीवर शुद्धिकरण चिकित्सा-(Liver Cleansing Therapy)

प्रभावशाली स्वावलम्बी लीवर शुद्धिकरण चिकित्सा

(Liver Cleansing Therapy)


स्वावलम्बी चिकित्सा क्यों प्रभावशाली?

                विकार रोगों का मूल होता है। जितने ज्यादा विकार होते हैं, व्यक्ति उतना ही रोग ग्रस्त होता है। शरीर में जमे विकारों के कारण शरीर, मानसिक विकारों के कारण मन और आत्मिक विकारों के कारण आत्मा विकारग्रस्त हो जाती है। आत्मा, मन एवं शरीर की विकार मुक्त अवस्था ही सम्पूर्ण स्थायी स्वास्थ्य का परिचायक होती है। जितने ज्यादा विकार होते हैं, उतना ही व्यक्ति वास्तव में रोग ग्रस्त होता है।  प्रायः अधिकांश प्रभावशाली स्थायी उपचार विकारों के शुद्धिकरण के सिद्धान्त पर ही प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप  से कार्य करते हैं। संयोग-वियोग, हानि-लाभ, प्रतिकूलता- अनुकूलता में समभाव रखने एवं तप द्वारा पूर्व उपार्जित कर्मो का क्षय करने से कर्मजन्य आत्मिक विकार दूर होते हैं एवं आत्मा शुद्ध स्वरूप को प्रकट कर परमात्व रूप में परिवर्तित हो जाती है।

                स्वाध्याय, स्वदोष निरीक्षण एवं उसमें सुधार, पश्चात्ताप एवं प्रायश्चित्त, सकारात्मक चिन्तन, ध्यान एवं कषायों के शमन से मानसिक विकार दूर होते हैं, जिससे मानसिक स्वस्थता प्राप्त होती है। परन्तु आजकल अधिकांश प्रचलित चिकित्सा पद्धतियाँ मात्र शरीर स्वास्थ्य तक ही अपना कार्य क्षेत्र सीमित रखती है एवं इस हेतु आत्मा और मन को विकारी बनाते भी कभी-कभी संकोच नहीं करती। जबकि स्वावलम्बी अहिंसात्मक चिकित्सा पद्धतियाँ निर्दोष होती है एवं यथासंभव शरीर का उपचार करते समय करणीय-अकरणीय, न्याय-अन्याय, वर्जित-अवर्जित, हिंसा-अहिंसा, भक्ष्य-अभक्ष्य, हानि-लाभ, राहत-उपचार का विवेक रखती है। प्रकृति के सनातन सिद्धान्तों एवं उपचार से पड़ने वाले दुष्प्रभावों की उपेक्षा नहीं करती। अतः अन्य प्रचलित चिकित्सा पद्धतियों से अधिक प्रभावशाली होती है।

शरीर में विषैले विकार जमा होने के कारण-

                हमारा आधुनिक खान-पान, रहन-सहन, चिन्तन-मनन, आचार-विचार, आसपास का बाह्य प्रदुषित वातावरण, रसायनिक खाद एवं कीटनाशक दवाइयों से उत्पन्न एवं मिलावट वाली आहार सामग्री, अनावश्यक दवाइयों का सेवन एवं शारीरिक परीक्षण, असंयमित जीवन शैली, आणविक तरंगों (Mobile, T.V.,Computer, X-Ray, Sono-Graphi, M.R.I., C.T. Scanning) का दुष्प्रभाव, स्वास्थ्य विरोधी सरकारी नीतियाँ, स्वास्थ्य के प्रतिकूल आवास एवं प्रतिकूल व्यावसायिक वातावरण, वृद्धावस्था, नकारात्मक सोच, मानसिक आवेग, अनियन्त्रित इच्छाएँ एवं कामभोग की प्रवृत्तियाँ इत्यादि शरीर में नवीन कोशिकाओं के सृजन एवं मृत कोशिकाओं के रूप में विषैले पदार्थो के जमा होने के प्रायः प्रमुख कारण होते हैं।

शुद्धिकरण चिकित्सा (Cleansing Therapy)-

                शारीरिक स्वास्थ्य की प्राप्ति के लिए शरीर के सभी अंगों एवं तंत्रों का हानिकारक विषैले अनावश्यक विकारों (Toxins) से शुद्धिकरण होना आवश्यक है। यदि इन विकारों को शरीर से निष्कासित कर दिया जाए तो अनेक रोगों का सहज उपचार हो सकता है। शरीर को विकारों से मुक्त कर शुद्धिकरण करने की चिकित्सा पद्धति क्लींजिंग चिकित्सा (Cleansing Therapy) कहलाती है।

                शरीर में जमे विषैले अनावश्यक विकारों के कारण सम्बन्धित अंग अपनी पूर्ण क्षमता से कार्य नहीं कर सकते। परिणामस्वरूप शरीर में प्राण ऊर्जा का प्रवाह आवश्यकतानुसार नहीं हो पाता एवं शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने लगती है। शरीर में पाचन तंत्र, श्वसन तंत्र, रक्त परिभ्रमण, विसर्जन, अस्थि, मज्जा, नाड़ी आदि सभी तंत्र प्रभावित होने लगते हैं एवं शरीर में रोग होने लगते हैं।

                जैसा कि हम अनुभव करते है कि प्राणायाम से श्वसन तंत्र, उपवास, तपस्या आदि से आमाशय, एनिमा से आँतों के, मसाज से मांसपेशियों के, व्यायाम से जोड़ों में जमे विकार, सूर्य मुखी तेल गंडूस से रक्त के विकार कुछ सीमा तक दूर किये जा सकते हैं।  आयुर्वेद की पंच कर्म क्रिया में जिस प्रकार वमन, विरेचन, नेति, स्वेदन इत्यादि के माध्यम से शरीर के विषैले तत्त्वों को निकालकर रोगी को रोगमुक्त किया जा सकता है। उसी प्रकार क्लींजिग थैरेपी में हमारे आसपास सहज रूप से उपलब्ध औषधिय गुणों वाले नैसर्गिक पदार्थो के सेवन से शरीर से रोगकारक विषैले तत्त्वों को शरीर से निष्काशित किया जाता है। भारत में डाॅ. पीयूष जी सक्सेना ने शरीर में लीवर, गुर्दो, एसीडिटी, जोड़ों जैसे अनेक अंगों एवं अवयवों की क्लींजिंग पर शोध किया है। जो अन्य चिकित्सा पद्धतियों के साथ सामंजस्य रखते हुए अपना कार्य करती है। इन विभिन्न शुद्धिकरण प्रक्रियाओं की अधिक जानकारी के लिए आप निम्न वेबसाइट www.drpiyushsaxena.com, www.thetempleofhealing.org पर देख सकते हैं। अमेरिका में ऐसी चिकित्सा का प्रचलन गत शताब्दी से ही था, जिसकी विस्तृत जानकारी  www.curezone.com पर उपलब्ध है।

लीवर शुद्धिकरण चिकित्सा

लीवर एवं उसके कार्य-

                लीवर (यकृत) एवं गुर्दे शरीर के दो ऐसे अंग हैं जो लगभग 75 प्रतिशत गड़बड़ी की अवस्था में भी अपना कार्य करते रहते हैं। अतःउनके रोगग्रस्त होने का प्रारम्भ में पता ही नहीं लगता।

                लीवर हमारे शरीर का त्वचा के पश्चात् दूसरा सबसे बड़ा अंग होता है। लीवर शरीर में दायीं और डायाफ्राम रेखा से नीचे स्थित होता है, जिसका अन्तिम सिरा बांयी और ठीक पेट के नीचे होता है। इसके ठीक नीचे मध्य भाग में गालब्लेडर (पित्ताशय) होता है। इसका प्रमुख कार्य एक रसायन का तैयार करना है, जिसे पित्त कहते हैं। जो भोजन में मिले हुए वसा व नाइट्रोजन युक्त हानिकारक पदार्थो के चयापचय में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह शरीर का प्रमुख रसायनिक कारखाना होता है। लीवर पाचन की सभी जटिल प्रक्रियाओं को अंजाम देता है। यह शरीर के लिए अपरिचित या हानिकारक तत्त्वों को शरीर के लिए उपयोगी तत्त्वों में परिवर्तित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लीवर एक तरह का तरल पदार्थ पैदा करता है जो रक्त को गाढ़ा रखता है, जिससे चोट लगने पर शरीर से रक्त बहने से रूक जाता है। साधारणतया एक वयस्क व्यक्ति के लीवर का वजन उसके शरीर के वजन का लगभग दो प्रतिशत होता है। जन्म के समय बच्चों में यकृत का वजन उसके शरीर के वजन का लगभग 5 प्रतिशत होता है।

लीवर/पित्ताशय में गड़बड़ी के लक्षण-

                लीवर (यकृत), गालब्लेडर (पित्ताशय) के बराबर कार्य न करने से आँखों संबंधी विभिन्न रोग, पित्ताशय की पत्थरी, पीलिया, भूख न लगना, अपाचन, पेट एवं आंतों में मरोड़े चलना, पेट में सूजन, गैस बनना, हाथों में कम्पन्न एवं हलन-चलन में कठिनाई, मांसपेशियों में अकड़न एवं दर्द, स्वभाव में चिड़चिड़ापन एवं क्रोध शीघ्र आना, स्मरण शक्ति कमजोर होना, घबराहट, श्वास फूलना, तेज बुखार या एलर्जी, बार-बार बुखार आना, बच्चों के विकास में अवरोध, हर्निया, मासिक सम्बन्धी तकलीफे, रात्रि में पसीना आना, लू लगना, अधिक पेशाब आना, कमजोरी, बदन में खुजली, रक्त बनने में अवरोध, रक्त की कमी, थूक में रक्त आना, मुँह में खारापन, जीभ पर मैल जमना, मुँह में पानी भर जाना, खट्टी डकारें आना इत्यादि रोगों के लक्षण प्रकट होते हैं।

लीवर शुद्धिकरण (Cleansing) से लाभ-

                लीवर शुद्धिकरण से मात्र लीवर विकार रहित नहीं बनता अपितु सम्पूर्ण स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। चीनी पंच तत्त्व के यिन-यांग सिद्धान्तानुसार लीवर-पित्ताशय की प्राण ऊर्जा तिल्ली-आमाशय की प्राण ऊर्जा को नियन्त्रित रखती है और फेंफड़े, बड़ी आंत की प्राण ऊर्जा से नियन्त्रित होती है। साथ ही लीवर-पित्ताशय को प्राण ऊर्जा गुर्दे-मूत्राशय से प्राप्त होती है और हृदय, छोटी आंत में लीवर-पित्ताशय से जाती है। अतः लीवर-पित्ताशय का शुद्धिकरण,  हृदय, फेंफड़े, तिल्ली, गुर्दो, छोटी आंत, बड़ी आंत, आमाशय, मूत्राशय जैसे शरीर के सभी अंगों को प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से रोग मुक्त रखने में सहायक होता है। लीवर-पित्ताशय की मुख्य ऊर्जा वायु होती है, जिसका शरीर के सभी प्रकार के हलन-चलन से सम्बन्ध होता है। वायु ऊर्जा का शरीर की मांसपेशियों एवं मज्जा तंत्र तथा आंखों से सीधा सम्बन्ध होता है। अतः लीवन क्लींजिंग से शरीर में आंखों, हलन-चलन तथा मांसपेशियों सम्बन्धित रोगों में भी चमत्कारिक परिणाम आते हैं।

      लीवर क्लींज से हृदय रोग, एलर्जी, अस्थमा, मधुमेह, सायटिका, स्पोंडोलाइटिस, प्रोस्टेट ग्रन्थि के बढ़ने जैसी गम्भीर समस्याओं के साथ-साथ यह शरीर के सभी छोटे-बड़े रोगों के उपचार में कुछ कम तो कुछ अधिक रूप से प्रभावशाली होता है। फिर वे समस्याएँ चाहे माहावारी से जुड़ी हुई हो अथवा रजोनिवृत्ति से, मोटापे की समस्या हो अथवा हड्डियों से सम्बन्धित।

                सभी प्रकार के सिरदर्द, अस्पष्ट सोच, स्मरण शक्ति में कमी, स्वभाव में चिड़चिड़ापन, भय, घबराहट, थकान, रक्त में सुगर का असन्तुलन, स्तनों में कठोरपन, मांसपेशियों की जकड़न, उन्माद, अवसाद, थायरोइड की गड़बड़ी, पांव एवं घुटनों की सूजन, स्त्रियों के प्रजनन सम्बन्धी रोग, वृद्धावस्था के कारण त्वचा में होने वाली शुष्कता, अनिद्रा, मूत्र त्याग में जलन जैसी अनेक रोगों में काफी प्रभावशाली परिणाम आते हैं। इस प्रक्रिया से किसी भी प्रकार के दुष्प्रभाव की प्रायः संभावना नहीं रहती।

                त्वचा मुलायम हो जाती है एवं उसमें निखार आकर वह साफ हो जाती है, वह आकर्षक लगने लगती है। नाखून गुलाबी रंग के हो जाते हैं तथा बाल भी स्वस्थ, चमकीले व मुलायम हो जाते हैं।

लीवर क्लींजिंग क्यों करे?

                लीवर की शुद्धिकरण से न केवल लीवर एवं पित्ताशय सम्बन्धी उपरोक्त वर्णित सभी रोगों से बचाव ही होता है साथ ही उनसे छुटकारा भी मिलता है।

  1. हृदयघात एवं बाईपास की सम्भावना कम हो जाती है।
  2. सभी प्रकार की एलर्जी से मुक्ति।
  3. पित्ताशय की पत्थरी निकालने हेतु शल्य चिकित्सा से बचा जा सकता है।
  4. मधुमेह नियन्त्रित रहता है।
  5. अस्थमा में बहुत राहत मिलती है।

लीवर क्लींजिंग में काम आने वाले आवश्यक पदार्थ-

  1. एप्सम साल्ट- मैगनेशियम सल्फेट-                 80 ग्राम या 20-20 ग्राम के चार पैकेट
  2. एक्स्ट्रा वर्जिन आलिव आॅइल- 250 मिली लिटर
  3. फलों का रस                 250 मिली लिटर

एप्सम साॅल्ट के प्रयोग से रक्तचाप नहीं बढ़ता-

      प्रायः उच्च रक्तचाप के रोगियों को एप्सम साॅल्ट लेने में भय लगता है। परन्तु इसके गुण धर्म सामान्य नमक से भिन्न होते हैं। यह मेगनेशियम सल्फेट होता है। सामान्य नमक के विपरीत एप्सम साॅल्ट रक्तचाप कम करता है। अतः जिनके रक्तचाप सामान्य से बहुत कम रहता है, उन्हें एप्सम साॅल्ट की मात्रा कुछ कम कर लीवर क्लींज करना चाहिए।

लीवर क्लींज हेतु एक्सट्रा आॅलिव आॅइल ही क्यों आवश्यक?

                लीवर क्लींज हेतु साधारण आॅलिव आइल नहीं लेना चाहिए। एक्स्ट्रा वर्जिन आॅलिव ही प्रयोग में लेना आवश्यक होता है। इस तेल के निर्माण की प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की ताप ऊर्जा रासायनिक प्रक्रिया, रेडिएशन, माइक्रोवेव इत्यादि को प्रयोग में नहीं लाया जाता। सिर्फ प्रेशर या दबाव से तेल प्राप्त किया जाता है। यह रिफाइण्ड नहीं होता और पूरी तरह से नैसर्गिक होता है। अतः अन्य तेलों के विपरीत विशेष प्रक्रिया द्वारा निर्मित किया गया एक्स्ट्रा वर्जिन आॅलिव आॅइल से रक्त में कोलेस्ट्राॅल नहीं बढ़ता।

लीवर क्लींजिंग कैसे करें?

                लीवर क्लींजिंग हेतु 4 खुराक 20 ग्राम एप्सम साल्ट को  200 मिली लीटर पानी में मिलाकर एवं एक्स्ट्रा वर्जिन आॅलिव आॅइल की दो खुराक (पहली खुराक में 175 मिली लीटर में उतना ही फलों का रस मिलाकर एवं दूसरी खुराक में 75 मिली लीटर में उतने ही फलों का रस मिलाकर) लेनी पड़ती है। उपचार प्रायः खाना खाने के कम से कम 4 घण्टे के बाद प्रारम्भ होता है। खाना खाने के लगभग 4 घण्टे या उससे जितना समय ज्यादा हो, एप्सम साल्ट की पहली खुराक लेनी चाहिए। उसके लगभग 2 घण्टे के पश्चात् 20 ग्राम एप्सम साॅल्ट की दूसरी खुराक लें। उसके लगभग 2 घण्टे पश्चात् एक्स्ट्रा वर्जिन आॅलिव आॅइल को किसी भी फल के रस में 175 मिली लीटर वाली खुराक लेकर कुछ समय दाहिनी करवट लेट कर पूर्ण आराम करना चाहिए एवं लगभग 8 घण्टे के पश्चात् एप्सम साॅल्ट (20 ग्राम) की तीसरी खुराक लेनी चाहिए। उसके लगभग 2 घण्टे पश्चात् एक्सट्रा वर्जिन आॅलिव आॅइल जो 75 मिली लीटर बचा है उसको उतना ही ताजे फलों के रस में मिलाकर लेना चाहिए। उसके लगभग दो घण्टे पश्चात् एप्सम साॅल्ट की चौथी खुराक लेनी चाहिए।

                उदाहरण के लिए जिस दिन लीवर क्लींजिंग करना हो, रात्रि में भोजन न करने वालों को प्रातः 10 बजे अपना खाना खा लेना चाहिए। उसके पश्चात् दोपहर लगभग 2 बजे एप्सम साॅल्ट की पहली खुराक, दोपहर 4 बजे एप्सम साॅल्ट की दूसरी खुराक एवं सायंकाल 6 बजे एकस्ट्रा वर्जिन आॅलिव आइल 175 मिली लीटर को उतने ही ताजे फलों के रस में मिलाकर लेना चाहिए एवं कुछ देर के लिए दायीं करवट लेकर लेट जाना चाहिए। एप्सम साॅल्ट की खुराक लेने के पश्चात् प्रायः डायरिया होने की पूर्ण संभावना रहती है। अतः लीवर कलींज अवकाश के दिन ही करना चाहिए।

                एप्सम साॅल्ट की तीसरी खुराक दूसरे दिन प्रातःकाल सूर्योदय के पश्चात् लगभग 7 बजे लेनी चाहिए एवं लगभग 2 घण्टे के बाद शेष बची एकस्ट्रा आॅलिव आइल की 75 मिली लीटर को उतने ही फलों के रस में मिलाकर लेना चाहिए। उसके लगभग 2 घण्टें के बाद एप्सम साॅल्ट की चौथी खुराक लेनी चाहिए। एप्सम साॅल्ट की आखिरी खुराक के सेवन के लगभग एक घण्टे के पश्चात् कुछ हल्का सुपाच्य भोजन ग्रहण किया जा सकता है और उसके लगभग 3 से 4 घण्टे के पश्चात् क्लींजिंग करने वाला अपना सामान्य भोजन कर सकता है। क्लींजिंग करते समय किसी भी प्रकार का भोजन नहीं करना चाहिए, परन्तु यदि अति आवश्यक हो तो कुछ मात्रा में फलों का रस लिया जा सकता है।

                लीवर क्लींजिंग करते समय प्रायः डायरिया होता है, जिससे घबराना नहीं चाहिए। सामान्य किस्म के डायरिया में जहाँ कई बार इलाज की आवश्यकता होती है वहीं लीवर क्लींज के कारण होने वाला डायरिया 4 से 6 घण्टे में स्वतः ठीक हो जाता है। दूसरे दिन होने वाले डायरिया में हरे रंग के पित्ताशय से निकलने वाले पत्थरी के टुकड़ों को स्पष्ट देखा जा सकता है। उपचार के पश्चात् व्यक्ति अपने आपको तरोताजा एवं ऊर्जावान अनुभव करता है। 

लीवर क्लींजिंग से बाई-पास में क्यों राहत-

                लीवर शुद्धिकरण से स्क्स् कोलेस्ट्राॅल जो हृदय के लिए हानिकारक होता है, उसे बाहर निष्काषित कर दिया जाता है। अतः हृदयघात अथवा बाई-पास की संभावना अपने आप कम हो जाती है। लीवर क्लींजिंग के पश्चात् जब लीवर में स्क्स् कोलेस्ट्राॅल की मात्रा कम हो जाती है तब शरीर के अन्य भाग में जहाँ कोलेस्ट्राॅल की मात्रा सर्वाधिक होती है, जैसे- कोरोनरी आर्टरी से कोलेस्ट्राॅल को खींचकर लीवर की ओर आता है। परिणामस्वरूप रक्त की धमनियों में कोलेस्ट्राॅल के जमाव के कारण उत्पन्न अवरोध कम हो जाता है, जिससे बाई-पास की संभावना भी कम हो जाती है। अधिकांश व्यक्तियों को यह आशंका रहती है कि आॅयल पीने से कोलेस्ट्राॅल बढ़ जायेगा। परन्तु एक्स्ट्रा वर्जिन आॅलिव आॅइल के सेवन से कोलेस्ट्राॅल नहीं बढ़ता।

लीवर क्लींजिंग कौन कर सकता है?

                साधारण सी सावधानी रखने पर लीवर क्लींज 10 वर्ष के बच्चे से लेकर 90 वर्ष तक का वृद्ध भी कर सकता है। जो भी व्यक्ति एक बार लीवर क्लींज कर लेता हे वहीं उसके चमत्कारी प्रभावों से अवगत हो उसका प्रशंसक बन जाता है। अतः प्रत्येक स्वास्थ्य प्रेमी को एक बार लीवर कलींज कर उसके चमत्कारीक परिणामों का अवश्य अनुभव कर लेना चाहिए। इससे प्रायः किसी भी प्रकार के दुष्प्रभावों की संभावना नहीं रहती। उपचार सहज, सरल, सुलभ, सस्ता एवं अवधि चन्द घण्टों की होती है। अस्पताल में जाकर परीक्षण कराने अथवा डाॅक्टर के परामर्श की आवश्यकता नहीं होती। प्रारम्भ में लीवर क्लींज दो-दो सप्ताह के अन्तराल में करना चाहिए, जब तक की लीवर-पित्ताशय से सभी पत्थर न निकल जायें। उसके पश्चात् टाॅक्सीन की सफाई के लिए 6 महीने के अन्तराल में लीवर क्लींज कर लेना काफी होता है। प्रायः ऐसा अनुभव किया गया है कि 5-6 बार लीवर क्लींज से सभी प्रकार की एलर्जी से छुटकारा मिल जाता है तथा सभी प्रकार के रोगों में राहत मिलती है। दवाइयों की मात्रा कम हो जाती है अथवा पूर्णरूप से छूट जाती है।

                लीवर क्लींज के साथ-साथ यदि नाभि को अपने केन्द्र में व्यवस्थित कर लिया जाए, दोनों पैरों को बराबर कर लिया जाए तथा मेरुदण्ड को संतुलित कर लिया जाए तो उपचार की प्रभावशालीता काफी बढ़ जाती है। परन्तु इसके साथ-साथ एक्यूप्रेशर, शिवाम्बु, चुम्बकीय, स्वर, सूर्य मुखी तेल के गंडूस, रोग ग्रस्त भाग पर मैथी का स्पर्श, प्राणिक मुद्राएँ एवं प्राणायाम जैसी स्वावलंबी चिकित्साओं का सहयोग लिया जाए तो अधिकांश रोगों में दवाइयों की पराधीनता से प्रायः शीघ्र मुक्ति मिल सकती है। जिसकी विस्तृत जानकारी आपको वेबसाइट से प्राप्त हो सकती है।

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