रोग हमारा मित्र है शत्रु नहीं

रोग हमारा मित्र है शत्रु नहीं


रोग कब होते हैं?

                उपचार से पूर्व यह जानना और समझना आवश्यक है कि रोग क्या है? रोग क्यों, कब और कैसे होता है? उसके प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष कारण क्या हैं? शरीर की रोग प्रतिरात्मक शक्ति कैसे बढ़ती हैं? और क्यों कम होती है? उसके सहायक और विरोधी तत्व क्या हैं? क्या शारीरिक रोगों का मन, विचार, भाव, वाणी अथवा आत्मा से प्रत्यक्ष-परोक्ष संबंध होता है? क्या उपचार  करते समय उनसे संबंधित कारणों को प्राथमिकता दी जाती है? क्या उन कारणों की उपेक्षा तो नहीं होती अथवा उपचार मन और आत्मा के विकारों को बढ़ाने वाला तो नहीं होता है? उपचार हेतु उपयोग में लिए जाने वाले साधन, साध्य और सामग्री कितने पवित्र हैं? रोगी का आचरण और जीवनचर्या प्रकृति के सनातन सिद्धान्तों और नियमों के प्रतिकूल तो नहीं है?

                रोग का मतलब शरीर के विकारों, दोषों, विजातीय अथवा अनुपयोगी तत्वों का जमा होकर, शरीर के विभिन्न तन्त्रों के स्वचलित, स्वनियन्त्रित कार्यो में अवरोध अथवा असंतुलन उत्पन्न करना होता है। वास्तव में प्राकृतिक सनातन नियमों का जाने अनजाने वर्तमान अथवा भूतकाल में उल्लंघन करना अर्थात् असंयमित, अनियंत्रित, अविवेकपूर्ण स्वच्छन्द आचरण के द्वारा जो शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक क्षमताओं का अपव्यय, दुरुपयोग करने से जो विकार उत्पन्न हों, असंतुलन की जो स्थिति बनती है, वही रोग होता है। ऐसी परिस्थिति में शरीर एवं मन की सभी क्रियाएं, अंग, उपांग, इन्द्रियां, तंत्र, अवयव आदि  अपना-अपना कार्य स्वतंत्रता पूर्वक सामान्य रूप से नहीं कर पाते। फलतः शरीर, मन और आत्मा के अवांछित, विजातीय, अनुपयोगी विकारों का विसर्जन बराबर नहीं होता। उनमें अवरोध उत्पन्न होने से पीड़ा, दर्द, वेदना, जलन, सूजन, विघटन, चेतना की शून्यता, तनाव, बैचेनी, भय, चिन्ता, अधीरता, असजगता, गलत दृष्टिकोण, चिंतन, जीवन के प्रति निराशा आदि के जो लक्षण प्रकट होते हैं, वहीं मिलकर रोग का परिवार कहलाते हैं।

रोग के मुख्य कारणः-

                रोग होने के कारणों को मुख्य रूप से दो भागों में विभक्त किया जा सकता है। प्रथम स्वयं से संबंधित और दूसरा अन्य बाह्य वातावरण अथवा परिस्थितियों से संबंधित। जो रोग स्वयं से संबंधित होता है, उसका उपचार तो स्वयं के द्वारा ही संभव होता है। आज सबसे बड़ी समस्या अपने आप पर अनास्था की है। अपनी क्षमताओं से अनभिज्ञता की। हमारे चिन्तन, सोच का समस्त आधार भीड़, विज्ञापन, अन्धाःनुकरण, बाह्य वातावरण होता है न कि स्वविवेक, सम्यक् चिन्तन। हम भूल जाते हैं कि करोड़ों सूर्यो की अपेक्षा व्यक्ति के लिए आंख का महत्व अधिक होता है।

                प्रायः अधिकांश प्रचलित चिकित्सा पद्धतियों से रोग से संबंधित मानसिक कारणों को दूर करने की कोई दवा अथवा इंजेक्षन अभी तक नहीं बन पाया है और न उपचार करते समय उन कारणों को दूर कर मानसिक विकारों से मुक्त होने को प्राथमिकता ही दी जाती है। जब तक रोग के कारण बने रहते हैं, स्थायी उपचार कैसे हो सकता है? आज के विकसित चिकित्सा विज्ञान के पास प्रत्येक रोग का उपचार हो सकता हो परन्तु सभी रोगों  का प्रायः एक सा उपचार नहीं होता। अंग्रेजी में एक कहावत प्रसिद्ध है- “All Diseases can be cured but not all patients, because they are very much impatience” अतः व्यक्ति के स्वयं पर निर्भर करता है कि वह रोग ग्रस्त जीवन जीना चाहता है या स्वस्थ जीवन? चाहने मात्र से तो स्वास्थ्य नहीं मिलता, अपितु स्वस्थ जीवन जीने के लिए सजगता, नियमितता, निरन्तरता के साथ सम्यक् पुरुषार्थ आवश्यक होता है।

विकार रोग का सूचक हैः-

                स्वास्थ्य का अर्थ होता है- विकारमुक्त अवस्था। रोग का तात्पर्य विकारयुक्त अवस्था यानि जितने ज्यादा विकार उतने ज्यादा रोग। जितने विकार कम उतना ही स्वास्थ्य अच्छा। विकार का मतलब अनुपयोगी, अनावश्यक, व्यर्थ, विजातीय तत्त्व होते हैं। जब ये विकार शरीर में होते हैं तो शरीर रोगी बन जाता है परन्तु जब ये विकार मन, भावों और आत्मा में होते हैं तो क्रमशः मन, भाव और आत्मा विकारी अथवा अस्वस्थ कहलाती हैं। विकारी अवस्था का मतलब है विभाव दशा अथवा विपरीत स्थिति। जितने-जितने विकार, उतनी-उतनी विभाव दशा।

                शारीरिक विकार के प्रभाव से शरीर के अंग, उपांग, अवयव, ग्रन्थियाँ, मस्तिष्क, इन्द्रियाँ आदि अपने निर्धारित कार्य हेतु असजग, असंतुलित अथवा निष्क्रिय होने लगती हैं जिससे शरीर में अनुपयोगी, अनावश्यक, विजातीय तत्व जमा होने लगते हैं। परिणामस्वरूप शरीर की स्वचलित, स्वनियंत्रित प्रक्रिया में अवरोध और असंतुलन होने लगता है। जो जन-सामान्य की भाषा में रोग कहलाता है। फलतः शरीर में दर्द, पीड़ा, बेचैनी, तनाव, चिड़चिड़ापन, भय, अधीरता, निष्क्रियता, कमजोरी, दुर्बलता, चेतना की शून्यता आदि के लक्षण प्रकट होने लगे हैं। मानसिक विकारों के परिणामस्वरूप मन स्वछन्द ओर अनियंत्रित होने लगता है। चिन्तन और मनन गलत दिशा में होने लगता है तथा व्यक्ति अपने मनोबल एवं मानसिक क्षमताओं का अवमूल्यन करने लगता है। उसकी प्राथमिकताएँ समस्याओं के स्थायी व प्रभावशाली समाधानों पर न होकर तत्कालीन अनुकूलताओं पर आधारित होने लगती हैं।

विभाव अवस्था रोग हैः-

                जैसा कि पूर्व में बतलाया गया है कि स्वास्थ्य का मतलब है स्व में स्थित हो जाना अर्थात् अपने निज स्वरूप में आ जाना अथवा विभाव अवस्था से निज स्वभाव में आ जाना। जैसे अग्नि के सम्पर्क से पानी उबलने लगता है परन्तु जैसे ही पानी को अग्नि से अलग करते हैं, धीरे-धीरे व स्वतः ही ठंडा हो जाता हैं। शीतलता पानी का स्वभाव है, गर्मी नहीं। पानी को वातावरण के अनुरूप रखने के लिए किसी बाह्य आलम्बन की आवश्यकता नहीं होती। उसी प्रकार शरीर में हड्डियों का स्वभाव कठोरता होता है, परन्तु किसी कारणवश कोई हड्डी नरम हो जाए, उसमें लचीलापन आ जाए तो रोग का कारण बन जाती हैं। मांसपेशियों का स्वभाव लचीलापन होता है परन्तु उसमें किसी कारणवश कठोरता आ जाए, गांठ हो जाए अथवा विजातीय तत्वों के जमाव के कारण अथवा आवश्यक रसायनों के अभाव के कारण यदि शरीर के किसी भाग की माँसपेशियों में लचीलापन समाप्त हो जाये अथवा क्षमतानुसार न हों तो रोग का कारण बन जाती हैं। शरीर का तापक्रम 98.4 डिग्री फाॅरेहनाईट रहना चाहिए, परन्तु किसी कारणवश कम या ज्यादा हो जायें तो शरीर में रोग के लक्षण प्रकट हो जाते हैं। रक्त सारे शरीर में आवश्यकतानुसार ऊर्जा पहुँचाने का कार्य अबाध गति से करता है। अतः उसके संतुलित प्रवाह हेतु आवश्यक गर्मी एवं निश्चित दबाव आवश्यक होता है, परन्तु यदि हमारी अप्राकृतिक जीवन शैली से रक्त का बराबर निर्माण न हों अथवा दबाव आवश्यकता से कम या ज्यादा हो जाए तो सारे शरीर में प्राण ऊर्जा का वितरण प्रभावित हो जाता हैं। रक्त नलिकाओं के फैलने अथवा सिकुड़ने की संभावनाएँ बढ़ जाती हैं अर्थात् अपना स्वरूप बदल देती है। अतः रोग की स्थिति पैदा हो जाती हैं।

                शरीर का गुण है कि जो अंग और उपांग शरीर के जिस स्थान पर स्थित हैं उनको वहीं स्थित रखना तथा हलन-चलन के बावजूद आगे पीछे न होने देना, शरीर में विकार उत्पन्न होने पर उसको दूर करना और पुनः अच्छा करना। अनावश्यक, अनुपयोगी, विजातीय तत्त्वों का विसर्जन करना। यदि कोई हड्डी टूट जाऐ तो उसे पुनः जोड़ना। चोट लग जाने से यदि घाव हो जाए तो उसको भरना तथा पुनः त्वचा पर आवरण लगाना। रक्त बहने अथवा रक्तदान आदि से शरीर में जो रक्त की कमी हो गई हो तो उसकी पूर्ति करना। उपर्युक्त एवं ऐसे अनेक कार्य शरीर के गुण एवं स्वभाव हैं परन्तु यदि किसी कारणवश शरीर इन कार्यो को बराबर न करें तो यह उसकी विभाव दशा कहलाती है अर्थात् रोगों का प्रतीक होती हैं।

                शरीर विभिन्न तंत्रों का समूह है। जैसे ज्ञान तंत्र, नाड़ी तंत्र, श्वसन, अस्थि, मज्जा, लासिका, प्रजनन, विसर्जन आदि। शरीर में पीयूष, पिनियल, थाॅयराइड और पेराथाॅयराइड, एड्रीलन, थाइमस, प्रजनन आदि अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ असक्रिय अथवा अतिसक्रिय हो जाती है तथा उनके कार्यो को संचालित और नियंत्रित करने के लिये बाह्य सहयोग या आलम्बन लेना पड़े तो यह शरीर की विभाव दशा होती है। अतः ये भी रोग का सूचक होते हैं।

रोग के प्रति जनसाधारण का दृष्टिकोणः-

                कोई भी रोग बाजार में नहीं मिलता। आकस्मिक दुर्घटनाओं अथवा जन्मजात रोगों को छोड़ कर रोगों के लिये प्रायः रोगी ही जिम्मेदार होते हैं। जन्मजात अथवा पैतृक रोगों में भी गर्भकाल में माता-पिता द्वारा रखी गई असावधानी, असंयम, उपेक्षावृति ही मूल कारण होते हैं। साधारण से बीज से भी फसल प्राप्त करने के लिये किसान कितनी सावधानी, देख-रेख और पुरुषार्थ करता है। तब मनुष्य जैसे व्यक्तित्व के निर्माण के प्रति माता-पिता, असजग, बेखबर, लापरवाह रहें तो वे अपने कर्तव्य के प्रति ईमानदार नहीं कहे जा सकते और उसका परिणाम होता है असक्त, रोगग्रस्त, दुर्बल व विकलांग संतान।

रोग हमारा मित्र अथवा शत्रु-

                जिन शारीरिक अथवा मानसिक रोगों का उपचार संभव होता है, प्रायः उनमें अधिकांश रोगों का कारण हम स्वयं होते हैं। रोग के संबंध में हमारी गलत धारणाएँ हैं। दर्द अथवा रोग के अन्य लक्षण हमें सजग करते हैं। अपने कर्तव्य बोध हेतु चिन्तन करने की प्रेरणा देते हैं। हमें चेतावनी देते हैं, कि हम अपने आपका निरीक्षण कर, अपने आपको बदले ताकि पीड़ा मुक्त, तनाव मुक्त जीवन जी सकें। हम स्वप्न में जी रहे हैं, यानी बेहोशी में हैं। दर्द अथवा रोग के अन्य संकेत उस बेहोशी को भंग कर हमें सावधान करते हैं, परन्तु सही दृष्टि न होने से हमने, उनको शत्रु मान लिया हैं। रोगी शरीर की आवाज सुनना और भाषा को समझना नहीं चाहता। उपचार स्वयं के पास है और खोजता है बाजार में डाॅक्टर और दवाइयों के द्वारा। फलतः दवा द्वारा रोग के कारणों को दबा कर खुश होकर असफल प्रयास करता हैं। रोगी जितना डाॅक्टर, दवा अथवा अपने शुभ चिन्तकों, अधूरे ज्ञान वाले सलाहकारों पर विश्वास करता है, उतना अपने आप पर एवं अपनी क्षमताओं पर विश्वास नहीं करता। यही सबसे बड़ा मिथ्यात्व है। गलत सोच एवं दृष्टिकोण है।

रोग, असजगता की चेतावनीः-

                जब रोग का कारण स्वयं हों तो उपचार पास अवश्य होना चाहिये। शरीर की स्वचलित प्रणाली आंतें, गुर्दे,फेंफड़े और त्वचा शरीर के किसी भी भाग में एकत्र हुए अनुपयोगी, विजातीय अथवा अवांछित तत्वों को किसी न किसी प्रकार का सफाई अभियान चलाकर उसे जुखाम, बुखार, फोड़े, फुंसियां, कफ, मल-मूत्र अथवा पसीने आदि के रूप में शरीर से बाहर फेंक कर शरीर की विभिन्न कार्य प्रणालियों के कार्य को सामान्य रूप में लाने का प्रयास करती हैं। प्रकृति रोग के द्वारा यह दर्शाती है कि हम गलती कर रहे हैं। प्राकृतिक अवस्था में प्रकट होने वाले लक्षण हमारे मित्र होते हैं। हमें हमारी असजगता के कारण भविष्य में होने वाले दुष्परिणामों की चेतावनी देकर सचेत करते हैं। यह तो हमारे शारीरिक प्रक्रिया का एक उपकारी एवं हितैषी कार्य होता है जिसका हमें सहयोग कर, रोग के कारणों का सजगता पूर्वक सम्यक् चिंतन करना चाहिये। यह कोई शत्रुता पूर्ण कार्य नहीं, जिसे रोका जाये, विरोध किया जाये अथवा जिसे नष्ट किया जाये। कारण दूर किये बिना लक्षणों को दबाने से राहत भले ही मिल जाये, पूर्ण उपचार कदापि नहीं हो सकता। अतः वास्तव में रोग तो एक उपहार हैं, क्योंकि इसका उद्देश्य परोपकारी व रक्षाकारी होता है। कचरे को दबाकर अथवा छिपाकर रखने से उसमें अधिक सड़ांध, बदबू अथवा अवरोध की समस्या पैदा होगी। दीमक लगी लकड़ी पर रंग रोगन करने से बाहरी चमक भले ही आ जावे, परन्तु मजबूती नहीं आ सकती। औषधियों के माध्यम से इस सफाई अभियान को रोकने से तो विषैले अथवा दूषित तत्वों के शरीर के अन्दर रूके रहने से धीरे-धीरे शरीर की कार्य प्रणाली में अवरोध बढ़ता जायेगा, शरीर की रोग अवरोधक क्षमता कम होने लग जायेगी। जो भविष्य में विभिन्न गम्भीर रोगों को जन्म देने का कारण बनते हैं। अधिकांश मौसमी एवं वायरस रोगों का यही प्रमुख कारण होता है। वे चाहे मलेरिया, चेचक, चिकनगुनिया, डेंगू, प्लेग, स्वाइन फ्लू आदि किसी भी नाम से पुकारे जाते हों। दवाओं द्वारा लक्षणों को दवा देने से एक तरफ तो रोग के कारण बने रहते हैं, दूसरी तरफ दवाएँ प्रायः शरीर की रोग प्रतिकारात्मक क्षमताओं को क्षीण कर देती हैं। परिणाम स्वरूप भविष्य में नित्य नवीन रोगों के पनपने की संभावनाएँ बनी रहती है।

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