क्या स्वास्थ्य के लिये सम्यक् दर्शन आवश्यक है?

क्या स्वास्थ्य के लिये सम्यक् दर्शन आवश्यक है?


स्वस्थ कौन?

                स्वास्थ्य का मतलब है- स्व में स्थित हो जाना अर्थात अपने निज स्वरूप में आ जाना या विभाव अवस्था से स्वभाव में आ जाना। जैसे अग्नि के सम्पर्क से पानी गरम हो जाता है, उबलने लगता है। परन्तु जैसे ही अग्नि से उसको अलग करते हैं, धीरे-धीरे वह ठण्डा हो जाता है। शीतलता पानी का स्वभाव है, उष्णता नहीं। उसको वातावरण के अनुरूप रखने के लिये किसी बाह्य आलम्बन की आवश्यकता नहीं होती। उसी प्रकार शरीर में जैसे हड्डियों का स्वभाव कठोरता है, परन्तु किसी कारणवश कोई हड्डी नरम हो जाए तो रोग का कारण बन जाती है। मांसपेशियों का स्वभाव लचीलापन है, परन्तु उसमें कहीं कठोरता आ जाती है तो गाँठ बन जाती है, तो शरीर रोगग्रस्त हो जाता है। हृदय एवं रक्त को शरीर में अपेक्षाकृत गरम रहना चाहिये, परन्तु यदि वे ठण्डे हो जाए। मस्तिष्क तनावमुक्त शान्त रहना चाहिये, परन्तु वह उत्तेजित हो जाए। शरीर का तापक्रम 98.4 डि.ग्री. फारेहनाईट रहना चाहिये, परन्तु वह बढ़ जाए अथवा कम हो जाए। शरीर में सभी अंगों एवं उपांगो का आकार निश्चित होता है, परन्तु वैसा न हो। विकास जिस अनुपात में होना चाहिये उस अनुपात में न हो। जैसे शरीर बेढंगा हो, शरीर में विकलांगता हो, आँखों की दृष्टि कमजोर हो, कान से कम सुनायी देता हो, मुँह से बराबर बोल न सके आदि शरीर की विभाव दशायें हैं, अतः रोग के प्रतीक हैं। शरीर का गुण है – जो अंग और उपांग शरीर में जिस स्थान पर स्थित होता है उनको वहीं स्थित रखना। हलन-चलन के बावजूद आगे पीछे न होने देना। शरीर में विकार उत्पन्न हो जाने पर उसको दूर कर पुनः अच्छा करना। यदि कोई हड्डी टूट जावे तो उसे पुनः जोड़ना। चोट लग जाने से घाव हो गया हो तो उसको भरना तथा पुनः त्वचा का आवरण लगाना। रक्त बहने अथवा रक्त-दान आदि से शरीर में रक्त की कमी हो गई हो तो उसकी पुनः पूर्ति करना। ये सब कार्य, गुण यानि शरीर के स्वभाव हैं। परन्तु यदि किसी कारणवश शरीर इन कार्यों को बराबर न करे तो यह उसकी विभावदशा होती है अर्थात् शारीरिक रोगों का प्रतीक है।

                शरीर विभिन्न तन्त्रों का समूह हैं। जैसे ज्ञानतन्त्र, नाड़ीतन्त्र, श्वसन, पाचन, विसर्जन, मज्जा, अस्थि, लासिका, शुद्धिकरण, प्रजनन तन्त्र आदि। सभी आपसी सहयोग से अपना-अपना कार्य स्वयं ही करते हैं, क्योंकि ये चेतनाशील प्राणी के लक्षण अथवा स्वभाव हैं। परन्तु यदि किसी कारणवश कोई भी तन्त्र शिथिल हो जाता है एवम् उसके कार्य को संचालित अथवा नियन्त्रित करने के लिये बाह्य सहयोग लेना पड़े तो यह शरीर की विभावदशा होती है। जो शारीरिक रोग का सूचक होता है।

                मन का कार्य मनन करना, चिन्तन करना, संकल्प-विकल्परना, इच्छाएँ करना आदि होता है। इस पर जब ज्ञान एवम् विवेक का अंकुश रहता है तो वह शुभ में प्रवृत्ति करता है, व्यक्ति को नर से नारायण बनाता है। परन्तु जब स्वछन्द होता है तो अपने लक्ष्य से भटका देता है। जब चाहा, जैसा चाहा चिन्तन, मनन, इच्छा, एषणा, आवेग करने लग जाता है। जिसका परिणाम होता है- क्रोध, मान, माया, लोभ, असंयम, द्वन्द्व, प्रमाद, जैसी अशुभ प्रवृत्तियाँ। ये सब मानसिक रोगों के कारण होते हैं। इसके विपरीत क्षमा, करुणा, दया, मैत्री, सेवा, विनम्रता, सरलता, संतोष, संयम एवम् शुभ प्रवृत्तियां मन के उचित कार्य होते हैं। अतः मानसिक स्वस्थता के प्रतीक होते हैं। अज्ञान, मिथ्यात्व, मोह आत्मा की विभावदशा होती है, जो कर्मों के आवरण से उसको अपना भान नहीं होने देती, अतः आत्मा के रोग होते हैं। अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, वीतरागता शुद्धात्मा के लक्षण होते हैं जो आत्मा की स्वस्थता के द्योतक होते हैं। जैसे कोई व्यक्ति केवल झूठ बोलकर ही जीना चाहे, सत्य बोले ही नहीं, तो क्या दीर्घकाल तक अपना जीवन सुचारू रूप से चला सकता है? नहीं, क्योंकि झूठ बोलना आत्मा का स्वभाव नहीं है। व्यक्ति छोटा हो या बड़ा अपने स्वभाव में बिना किसी परेशानी के सदैव रह सकता है। बाह्य आलम्बनों एवम् परिस्थितियों में जितना-जितना वह विभाव अवस्था में जाएगा, शारीरिक, मानसिक अथवा आत्मिक रोगी बनता जाएगा। जितना-जितना अपने स्वभाव को विकसित करेगा, स्वस्थ बनता जाएगा। अपने आपको पूर्ण स्वस्थ रखने की कामना रखने वालों को इस तथ्य, सत्य का चिन्तन कर अपने लक्ष्य की तरफ आगे बढ़ना चाहिये।

आरोग्यता एवं नीरोगता में अन्तर-

                ‘नीरोग’का मतलब रोग उत्पन्न ही न हों। ‘आरोग्य’का मतलब शरीर में रोगो की उपस्थिति होते हुए  भी हमें उनकी पीड़ा एवं दुष्प्रभावों का अनुभव न हों। आज हमारा सारा प्रयास आरोग्य रहने तक ही सीमित हो गया है। उसमें भी हम मात्र शारीरिक रोगों को ही रोग मान रहे हैं। मानसिक एवं आत्मिक रोग जो उससे भी ज्यादा खतरनाक होते हैं, हमें जन्म-मरण एवम् विभिन्न योनियों में भटकाने वाले हैं। उस तरफ प्रायः हमारा ध्यान जाता ही नहीं। शारीरिक रूप से भी नीरोग बनना असम्भव सा लगता है। रोग चाहे शारीरिक हो, चाहे मानसिक अथवा आत्मिक उसका प्रभाव तो शरीर पर ही पड़ता है। अभिव्यक्ति तो शरीर के माध्यम से ही होती है। मन और आत्मा अरूपी होते हैं। उनको इन भौतिक आँखों से नहीं देखा जा सकता। मुख्य रूप से रोग आधि (मानसिक), व्याधि (शारीरिक), उपाधि (कर्मजन्य) के रूप में ही प्रकट होते हैं। अतः आधि, व्याधि, उपाधि को शमन करने से ही समाधि, परम शान्ति अथवा पूर्ण स्वास्थ्य अर्थात् नीरोग अवस्था की प्राप्ति हो सकती है।

सम्यग्दर्शी का चिन्तन-

                सम्यग्दर्शन का सीधा-साधा सरल अर्थ होता है सही दृष्टि, सत्य दृष्टि, सही विश्वास। अर्थात् जो वस्तु जैसी है जितनी महत्त्वपूर्ण है, जितनी उपयोगी है उसको उसके स्वरूप, गुण एवं धर्म के आधार पर जानना। सम्यक् दर्शन से स्वविवेक जागृत होता है। स्वदोषदर्शन की प्रवृत्ति विकसित होती है। वस्तुस्थिति ऐसी हो गई है कि हमारा शरीर रूपी नौकर एवम् मन रूपी मुनिम, आत्मा रूपी मालिक पर शासन कर रहें हैं। हमारी स्थिति उस शेर के समान हो गई हैं जो भेड़ियों के बीच पल कर बड़ा होने से अपनी शक्तियों का भान भूल जाता है। सम्यग्दर्शन से आत्मा और शरीर का भेदज्ञान होता है। आत्मा का साक्षात्कार होने से उसकी अनन्त शक्ति का भान होने लगता है। उसके ऊपर आये कर्मों की तरफ दृष्टि जाने लगती है। उसके शुद्धिकरण का प्रयास प्रारम्भ होने लगता है। सभी चेतनाशील प्राणियों में एक जैसी आत्मा के दर्शन होने लगते हैं। सत्य प्रकट होते ही पूर्वाग्रह एवम् एकान्तवादी दृष्टिकोण समाप्त होने लगता है। अनेकान्तवादी दृष्टि विकसित होने लगती है। जैसे खुद को पीड़ा, दुःख होता है वैसे ही दूसरों के दुःख का अनुभव होने लगता है।

                अतः स्वयं के लाभ के लिये दूसरों को कष्ट पहुँचाने की प्रवृत्ति कम होने लगती है। सत्य को पाने के लिये उसका सारा प्रयास होने लगता है एवम् अनुपयोगी कार्यो के प्रति उसमें उदासीनता आने लगती है। जीवन में समभाव बढ़ने लगता है अर्थात उसके जीवन में सम (समता), संवेग (सत्य को पाने की तीव्र अभिलाषा), निर्वेद (अनुपयोगी कार्यो के प्रति उपेक्षावृति) अनुकम्पा (प्राणीमात्र के प्रति दया, करुणा, परोपकार, मैत्री के भाव) तथा सत्य के प्रति आस्था हो जाती है। यही व्यवहार में सम्यक्त्व के पाँच लक्षण होते है। उसका उद्देश्य मेरा जो सच्चा के स्थान पर सच्चा जो मेरा हो जाता है। उसका जीवन स्व-पर कल्याण के लिये ही कार्यरत रहता है। उसमें प्रत्येक क्रिया को सम्यक् प्रकार से करने का विवेक रहता है।

सम्यग्दर्शी का चिकित्सा के प्रति दृष्टिकोण-

                सम्यक्दर्शन होने पर व्यक्ति रोग के प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष, वर्तमान एवम् भूत सम्बन्धी शारीरिक, मानसिक एवम् आत्मिक कारणों  का चिंतन करेगा, समझेगा और उन कारणों से बचने का प्रयास करने लगेगा। फलतः रोग उत्पन्न होने की सम्भावनायें बहुत कम हो जाएगी, जो स्वस्थ रहने के लिये अति आवश्यक है। रोग उत्पन्न हो भी गया हो तो उसके लिये दूसरों को दोष देने के बजाय स्वयं की गलतियों को ही उसका प्रमुख कारण मानेगा तथा धैर्य एवं सहनशीलता पूर्वक उसका उपचार करेगा। उपचार करते समय क्षणिक राहत से प्रभावित नहीं होगा, दुष्प्रभावों की उपेक्षा नहीं करेगा। साधन, साध्य एवम् सामग्री की पवित्रता पर विशेष ध्यान रखेगा। ऐसी दवाओं से बचेगा जिसके निर्माण एवम् परीक्षण में किसी भी जीव को कष्ट पहुँचता हो। उपचार के लिये अनावश्यक हिंसा को प्रोत्साहन नहीं देगा। आशय यह है कि सम्यक्दर्शन होने के पश्चात् व्यक्ति पाप के कार्यो अर्थात् अशुभ प्रवृत्तियों से यथासम्भव बचने का प्रयास करता है। उसका जीवन पानी में कमल की भांति निर्लिप्त होने लगता है। प्रत्येक कार्य को करने में उसका विवेक एवं सजगता जागृत होने लगते हैं। अनुकूल एवम् प्रतिकूल परिस्थितियों का उस पर विशेष प्रभाव नहीं पड़ता। उसका प्रयास नवीन कर्मों को क्षय कर आत्मा को नर से नारायण बनाने का होता है।

पूर्वकृत कर्मों का वर्तमान जीवन से सम्बन्ध-

                जन्म के साथ मृत्यु निश्चित है। पूर्वकृत पुण्यों के आधार पर हम प्राण ऊर्जा अर्थात् श्वासों के रूप में आयुष्य का जो खजाना लेकर आते हैं वह प्रतिक्षण कम होता जा रहा है। जीवन के अंतिम समय तक उस संचित, संगृहीत प्राण ऊर्जा को संतुलित एवं नियन्त्रित कैसे रखा जाए, यह स्वास्थ्य की मूलभूत आवश्यकता है। पूर्वकृत कर्मों के आधार पर ही हमें अपना स्वास्थ्य, सत्ता, साधन, संयोग अथवा वियोग मिलते हैं। अनुकूल अथवा प्रतिकूल परिस्थितियाँ बनती हैं। परन्तु कभी-कभी पूर्वकृत पुण्यों के उदय से व्यक्ति को मनचाहा रूप, सत्ता, बल, साधन एवम् सफलताएँ लगातार मिलने लगती हैं। प्रतिकूल परिस्थितियाँ, वियोग, रोग यदि उत्पन्न न हों तो व्यक्ति अज्ञानवश अभिमानपूर्वक कर्म-सिद्धान्त को स्वीकार नहीं करता। कर्मसिद्धान्त को समझने के लिये हमें चिन्तन करना होगा कि वे कौनसे कारण हैं, जिनसे बहुत से बालक जन्म से ही विकलांग अथवा रोगग्रस्त होते हैं? कोई गरीब के घर में तो कोई अमीर के घर में जन्म क्यों लेते हैं? कोई बुद्धिमान् तो कोई मूर्ख क्यों बनते हैं? भारतीय संविधान में प्रत्येक व्यक्ति को राष्ट्र का सर्वोच्च पद प्राप्त करने का अधिकार है, परन्तु चाहते हुए अथवा प्रयास करने के बावजूद भी सभी राष्ट्रपति अथवा प्रधानमंत्री क्यों नहीं बन पाते? संसार की सारी विसंगतियाँ एवम् हमारे चारों तरफ का वातावरण हमें पुर्नजन्म एवम् कर्मों की सत्ता के बारे में निरन्तर सजग और सतर्क कर रहे हैं। अज्ञानवश उसके महत्त्व को न स्वीकारने से उसके प्रभाव से कोई बच नहीं सकता। पारस को पत्थर कहने से वह पत्थर नहीं हो जाता और पत्थर को पारस मान लेने से वह पारस नहीं बन जाता। ‘सम्यक् दर्शन’रोग के इस मूल कारण पर दृष्टि डालता है एवम् कर्मों को दूर करने की प्रेरणा देता है, जो अच्छे स्वास्थ्य के लिये परमावश्यक है।

                अपनी सफलताओं का अहम् करने वालों के जैसे ही पूर्वकृत पुण्यों का क्षय हो जाता है और अशुभ कर्मों का उदय प्रारम्भ होने लगता है, उसका अहम् चूर-चूर हो जाता है। अपराध के प्रथम प्रयास में न पकड़ा जाने वाला यदि अपनी सफलता पर गर्व करे तो यह उसका अज्ञान ही समझना चाहिए।

रोगों के अन्य कारण एवं उपचार की सीमाएँ-

                रोग होने के मुख्य कारण हमारे पूर्वकृत संचित अशुभ कर्मों का उदय, हमारी असंयमित, अनियमित, अनियन्त्रित, अविवेकपूर्ण, अपनी क्षमताओं के प्रतिकूल शारीरिक, मानसिक एवम् आत्मिक जीवन पद्धति होता है। सम्यक् दर्शन होने के पश्चात् रोग होने पर व्यक्ति रोग का कारण अपनी गलतियों को मानेगा और धैर्य एवं सहनशीलता से समभावपूर्वक उसको सहन कर कर्मों से हलका होना चाहेगा। रोग की स्थिति में हाय-हाय कर, चिल्लाकर सबको परेशान कर, नवीन कर्मो का बन्ध नहीं करेगा। जिससे कर्मों का रोग सदैव के लिये चला जायेगा। परन्तु अपरिहार्य कारणों से धैर्य एवम् सहनशीलता के अभाव में अगर उपचार भी करायेगा तो इस बात का अवश्य विवेक रखेगा कि उपचार के लिये जो साधन, साध्य एवम् सामग्री कार्य में ली जा रही है, वह यथासंभव पवित्र हो। यदि उपचार कर्म बन्धन का कारण बने तो उसका मतलब कर्जा चुकाने के लिए ऊँचें ब्याज की दर पर नया कर्ज लेने के समान नासमझी होगी।

मिथ्यात्व सब पापों की जड़-

                आज अज्ञानवश प्रायः अधिकांश अहिंसा प्रेमी साधक भी उपचार के नाम पर हिंसक दवाइयों की गवेषणा तक नहीं करते। भूल का प्रायश्चित्त होता है, जानते हुये भूलें करना एवम् बाद में प्रायश्चित लेकर दोषों से अपने आपको शुद्धिकरण करना कहाँ तक तर्कसंगत हैं? वे प्रभावशाली, स्वावलम्बी, अहिंसक चिकित्सा पद्धतियों को सीखने, समझने एवम् अपनाने हेतु क्यों नहीं प्रेरित होते? ऐसी पद्धतियों के प्रशिक्षण, प्रचार-प्रसार एवम् शोध हेतु जनसाधारण को प्रेरणा क्यों नहीं देते? अहिंसा प्रेमियों द्वारा सेवा के नाम पर हिंसा पर आधारित अस्पतालों के निर्माण एवम् संचालन तथा प्रेरणा के पीछे उनकी दृष्टि सम्यक् नहीं कही जा सकती?

                इसी कारण मिथ्यात्व को सबसे बड़ा पाप माना है। सम्पूर्ण भारत में बच्चों को पोलियों पल्स के टीके लगाने का अभियान चल रहा है, परन्तु शायद ही किसी ने यह जानने का प्रयास किया कि इनके कोई दुष्प्रभाव तो नहीं होते? ये दवाइयां कैसे बनती है? इनके निर्माण में बछड़ों के ताजे खून एवम् बन्दरों के गुर्दो के अवयवों की आवश्यकता होती है। 60 से 70 प्रतिशत इन दवाओं का निर्माण करने वाली कम्पनियाँ दुष्प्रभावों की क्षतिपूर्ति का भुगतान मांगने वालों के कारण विदेशों में बन्द हो रही है। ऐसी दवाइयों का सेवन कर अथवा अस्पतालों के निर्माण और संचालन की प्रेरणा देकर कहीं हम बूचड़खानों को तो अप्रत्यक्ष रूप से प्रोत्साहन नहीं दे रहे हैं। जब तक पाप से नहीं डरेंगे, आत्म कल्याण के मार्ग की तरफ तीव्र गति से कैसे बढ़ पायेंगे? ठीक उसी प्रकार जब तक हिंसा से निर्मित दवा लेने का हमारा मोह भंग नहीं होगा, न तो हम पूर्ण स्वस्थ बनेंगे और न प्रभावशाली स्वावलम्बी चिकित्सा-पद्धतियों को सीखने, समझने एवम् अपनाने का मानस ही बना पायेंगे। आज चिकित्सा के लिये जितने जानवरों पर अत्याचार हो रहा हैं उतने शायद और किसी कारण से नहीं। क्योंकि जानवरों के अवयवों की जितनी ज्यादा कीमत दवाई व्यवसाय वाले दे रहें हैं, उतने अन्य कोई व्यवसाय वाले नहीं देते। जब दवाइयों के लिए जानवर कटेंगे तो माँसाहार को कोई रोक नहीं सकता। सम्यग्दर्शन में आस्था रखने वाले प्रत्येक साधक एवम् अहिंसा प्रेमियों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से हिंसा को प्रोत्साहन देने वाली प्रवृत्तियों से अपने आप को अलग रखना चाहिये।

शरीर में स्वयं स्वस्थ होने की क्षमता है-

                आज हमारे सारे सोच का आधार जो प्रत्यक्ष है, अभी सामने है उसके आगे-पीछे जाता ही नहीं। सही आस्था लक्ष्य-प्राप्ति की प्रथम सीढ़ी होती है। रोग कहीं बाजार में नहीं मिलता। रोग का कारण हम स्वयं ही होते हैं। हमारी अनेक विषयों में गलत धारणायें हैं। वास्तव में दर्द हमारा सबसे बड़ा दोस्त है। वह हमें जगाता हैं कत्र्तव्यबोध हेतु चिन्तन करने की प्रेरणा देता है, चेतावनी देता है। परन्तु सही दृष्टि न होने से हम उसको शत्रु मानते हैं। हम स्वप्न में हैं, बेहोशी में जी रहे हैं। दर्द उस बेहोशी को भंग कर हमें सावधान करता है। रोगी सुनना नहीं चाहता है, उसको दबाना चाहता है। उपचार स्वयं के पास है और ढूंढता है बाजार में, डाॅक्टर एवम् दवाइयों में। जितना डाॅक्टर एवम् दवा पर विश्वास हैं उतना अपने आप पर, अपनी छिपी क्षमताओं पर नहीं। यही तो मिथ्यात्व है। क्या वह कभी चिन्तन करता है कि मनुष्य के अलावा अन्य चेतनाशील प्राणी अपने आपको कैसे ठीक करते हैं? क्या स्वस्थ रहने का ठेका दवा एवम् डाॅक्टरों के सम्पर्क में रहने वालों ने ही ले रखा हैं? वस्तुतः हमें इस बात पर विश्वास करना होगा कि शरीर ही अपने आपको स्वस्थ करता है, अच्छी से अच्छी दवा और चिकित्सक तो शरीर को अपना कार्य करने में सहयोग मात्र देते हैं। जिसका शरीर सहयोग करेगा वहीं स्वस्थ होगा। स्वास्थ्य के सम्बन्ध में यही दृष्टि सम्यक् दर्शन है तथा सम्पूर्ण स्वास्थ्य प्राप्त करने का मूलभूत आधार भी है।

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