प्राण ऊर्जा का संतुलन ही स्वास्थ्य

प्राण ऊर्जा का संतुलन ही स्वास्थ्य


प्राण ऊर्जा क्या है?

                संसार में दो तत्त्व मुख्य हैं। प्रथम जीव, आत्मा और चेतना एवं दूसरा अजीव, जड़ या अचेतन। इन तत्त्वों से ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की संरचना होती है। इसी आधार पर ऊर्जा को भी मोटे रूप में दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। पहली चैतन्य अथवा प्राण ऊर्जा और दूसरी भौतिक ऊर्जा। जिस ऊर्जा के निर्माण, वितरण, संचालन और नियन्त्रण हेतु चेतना की उपस्थिति आवश्यक होती है, उस ऊर्जा को प्राण ऊर्जा और बाकी सभी ऊर्जाओं को जड़ अथवा भौतिक ऊर्जा कहते हैं। भौतिक विज्ञान प्रायः जड़ पर ही आधारित होता है। अतः उसकी सारी शोध एवं चिन्तन जड़ पदार्थो तक ही सीमित रहती है। जब तक शरीर में आत्मा अथवा चेतना का अस्तित्व रहता है, प्राण ऊर्जा क्रियाशील होती है। मानव जीवन का महत्व होता है, परन्तु उसकी अनुपस्थिति में अर्थात् मृत्यु के पश्चात् प्राण ऊर्जा के अभाव में मानव शरीर का कोई महत्त्व नहीं। अतः उसको जला अथवा दफना कर नष्ट कर दिया जाता है। आत्मा अथवा चेतना अरूपी है। अतः उसकी प्राण ऊर्जा भी अरूपी होती है तथा शरीर में अदृश्य मार्गो से प्रवाहित होती है, फिर भी उसके प्रभावों का अनुभव किया जा सकता है। इसी कारण चेतना के बिना आज का विकसित स्वास्थ्य विज्ञान शरीर के किसी भी अवयव, यहां तक बाल, नाखून, आंसू, पसीने जैसे, साधारण पदार्थो का भी निर्माण नहीं कर सकता।

प्राण ऊर्जा के मूल स्रोतः-

                मां के गर्भ में आते ही कर्मो की स्थिति के अनुसार जीव को एक विशेष प्रकार की ऊर्जा प्राप्त होती है जिसके द्वारा जीव आहार को शरीर एवं इन्द्रियों में परिणत करता है। इस परिणमन करने वाली जीवन दायिनी मूल ऊर्जा को पर्याप्ति (Bio Potential Energy Source) कहते हैं। मनुष्य को आहार, शरीर, इन्द्रिय के अलावा श्वासोच्छवास, भाषा और मन पर्याप्तियाँ भी प्राप्त होती है। श्वासोच्छवास पर्याप्ति से ही वायुमण्डल से श्वसन योग्य पुद्गलों को ग्रहण कर जीव शरीर के लिये आवश्यक विशेष ऊर्जा में परिणित करता है। भाषा पर्याप्ति के कारण ही जीव भाषा योग्य सूक्ष्म पुद्गलों को ग्रहण कर बोलने की योग्यता प्राप्त करता है। जिन जीवों में भाषा पर्याप्ति का अभाव होता है, वे मुंह होते हुए भी बोल नहीं सकते। मन पर्याप्ति के प्रभाव से जीव में मनोवर्गणा के पुद्गलों को ग्रहण कर द्रव्य मन की सहायता से चिन्तन मनन में परिणत करने की क्षमता प्राप्त होती है। जिन जीवों को मन पर्याप्ति प्राप्त नहीं होती, वे मनुष्य की भांति मनन, चिन्तन, अध्ययन आदि नहीं कर सकते। उपचार करते समय जब तक चेतना के विकास के इस क्रम की उपेक्षा होगी, निदान अपूर्ण और उपचार अस्थायी होगा।

प्राण क्या है?-

                जिस शक्ति विशेष द्वारा जीव जीवित रहता है अर्थात् जीवन जीने की शक्ति को प्राण कहते हैं। कानों के द्वारा शब्दों को ग्रहण करने अथवा सुनने की शक्ति विशेष को श्रोत्र इन्द्रिय बल प्राण, आंखों के द्वारा देखने की शक्ति विशेष को चक्षु इन्द्रिय बल प्राण। नासिका द्वारा गंध ग्रहण करने की शक्ति विशेष को घ्राणेन्द्रिय बल प्राण, जीभ द्वारा स्वाद का अनुभव कराने की शक्ति विशेष को रसनेन्द्रिय बल प्राण, शरीर द्वारा ठण्डा-गरम, कोमल-कठोर, हल्का-भारी आदि स्पर्ष का ज्ञान कराने वाली शक्ति विशेष को स्पर्षेन्द्रिय बल प्राण, मन से चिंतन मनन करने की शक्ति को मनोबल प्राण, भाषा वर्गणा के पुद्गलों की सहायता से वाणी की अभिव्यक्ति की विशेष ऊर्जा वचन, बल प्राण, शरीर के माध्यम से उठने-बैठने, हलन-चलन करने की विशेष शक्ति काय बल प्राण, श्वासोच्छवास वर्गणा के पुद्गलों की सहायता से श्वास लेने और बाहिर निकालने की शक्ति विशेष श्वासोच्छवास बन प्राण तथा निश्चित समय तक निश्चित योनी में जीवित रहने की शक्ति विशेष आयुष्य बल प्राण कहलाती है। आयुष्य बल प्राण के अभाव में अन्य प्राणों का कोई अस्तित्व नहीं होता। प्रत्येक व्यक्ति की एक निश्चित आयुष्य होती है जिसका निर्धारण उसके पूर्व भव में ही हो जाता है। अन्य प्राणों की स्थिति बदल सकती है। क्षय के साथ-साथ उन प्राणों का निर्माण भी हो सकता है। प्राणों की विविधता के कारण ही प्रत्येक व्यक्ति के सुनने, देखने, चखने, सूंघने, चिंतन मनन करने, वाणी की अभिव्यक्ति आदि अलग-अलग होती है। कभी-कभी भौतिक उपचारों से कान, नाक, चक्षु, जीभ आदि इन्द्रियों के द्रव्य उपकरणों में उत्पन्न खराबी को तो दूर किया जा सकता है परन्तु उनमें प्राण ऊर्जा न होने से भौतिक उपचार सदैव सफल नहीं होते। इसी कारण सभी नेत्रहीनों को नेत्र प्रत्यारोपण द्वारा रोशनी नहीं दिलाई जा सकती। सभी बहरे उपकरण लगाने के बाद भी सुन नहीं सकते। मूर्ति में मानव की आंख लगाने के बाद भी उसमें देखने की शक्ति नहीं आ जाती।

प्राण ऊर्जा का अपव्यय हानिकारकः-

                प्राण और पर्याप्तियों पर ही हमारा स्वास्थ्य निर्भर करता है। शरीर एवं प्राण का परस्पर संबंध न जानने पर कोई भी व्यक्ति न तो प्राणों का अपव्यय अथवा दुरुपयोग ही रोक सकता है और न अपने आपको नीरोग ही रख सकता है। आत्मिक आनन्द सच्ची शान्ति तो प्राण ऊर्जा के सदुपयोग से ही प्राप्त होती है। यही प्रत्येक मानव के जीवन का सही लक्ष्य होता है। प्रतिक्षण हमारे प्राणों का क्षय हो रहा है। अतः हमारी सारी प्रवृत्तियां यथा संभव सम्यक् होनी चाहिये। पांचों इन्द्रियों, मन, वचन, काया का संयम स्वास्थ्य में सहायक होता है तथा उनका असंयम रोगों को आमन्त्रित करता है। हवा, भोजन और पानी से ऊर्जा मिलती है परन्तु उनका उपयोग कब, कैसे, कितना, कहां का सम्यक् ज्ञान और उसके अनुरूप आचरण आवश्यक होता है? स्वाध्याय, ध्यान, कायोत्सर्ग भी ऊर्जा के स्रोत होते हैं, जिसका जीवन में आचरण आवश्यक होता है। प्राण ऊर्जा के सदुपयोग से शरीर स्वस्थ, मन संयमित, आत्मा जागृत और प्रज्ञा विकसित होती है।

शरीर से ही आत्मा और मन के भावों की अभिव्यक्ति होती हैः-

                मन शरीर के सभी विषयों को अभिव्यक्त करने की क्षमता रखता है। मन और वचन का अलग से कोई अस्तित्व नहीं होता। सभी बनते हैं चित के द्वारा। जो मन के लिये सामग्री चाहिये  उसका आकर्षण काया के द्वारा ही होता है। मनन से पहले और मनन के बाद में भी मन नहीं होता। उसी प्रकार बोलने के पहिले और बोलने के पश्चात् वाणी नहीं होती। भाषा और मन का अस्तित्व शरीर पर निर्भर होता है। जीव शरीर को उत्पन्न करता है। शरीर वीर्य को उत्पन्न करता है और वीर्य, मन, वचन और काया की हलन-चलन को उत्पन्न करता है। सारी शक्ति का केन्द्र, सारी शक्ति का संचालन, नियंत्रण और आत्मा की समस्त अभिव्यक्तियाँ शरीर के द्वारा ही होती है। शरीर हमारी सारी शक्ति का उत्पादक यंत्र है। जहां से ये शक्तियाँ विभिन्न मार्गो में प्रवाहित होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार आत्मा से शरीर और मन, मस्तिष्क प्रभावित होते हैं, उसी प्रकार शरीर की गतिविधियों से मन और आत्मा भी प्रभावित होते हैं। जिस स्तर का रोग हो उसके अनुरूप उपचार करने से ही स्थायी एवं प्रभावशाली परिणाम शीघ्र प्राप्त होते हैं।

प्राण ऊर्जा के असंतुलन का प्रभावः-

                जब शरीर में कोई रोग होता है तो उसका प्रभाव सारे शरीर में चारों तरफ प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से थोड़ा बहुत पड़ता है। जिस प्रकार विद्युत उपकरणों में जब क्षमता से अधिक वोल्टेज पर बिजली प्रवाहित होती है तो उस उपकरण के खराब होने की संभावना रहती है और यदि कम वोल्टेज पर बिजली प्रवाहित हो तो उपकरण पूर्ण क्षमता से कार्य नहीं करते। ठीक उसी प्रकार जब किसी अंग में प्राण ऊर्जा का प्रवाह आवश्यकता से कम अथवा अधिक हो तो ऊर्जा असंतुलन के कारण उस की ऊर्जा से संबंधित शरीर के अंग उपांग रोग ग्रस्त हो जाते हैं। सारे शरीर में अन्य ऊर्जाएं भी असंतुलित होने लगती है। लम्बे समय तक ऊर्जा का असंतुलन बने रहने से शारीरिक स्तर पर मांसपेशियाँ, रक्त परिभ्रमण, श्वसन, पाचन, हृदय की धड़कन, नाड़ी की गति, विजातीय तत्वों के विसर्जन आदि प्रभावित होने लगते हैं। परिणाम स्वरूप मानसिक स्तर पर भूख प्यास, निद्रा, थकान, अरूचि, बैचेनी, तनाव, पीड़ा, दर्द, चिड़चिड़पन, मनोबल में कमी जैसी स्थितियां प्रकट होने लगती है। आत्मिक स्तर पर स्मरण शक्ति का विस्मृत होना, सम्यक् प्रवृत्तियों के प्रति अरूचि अथवा  उपेक्षा भाव, इन्द्रियों और मन पर नियन्त्रण न रख पाना, स्वयं के लिये आवश्यक प्राथमिकता का ज्ञान एवं विवेक न रहना तथा उसके अनुरूप आचरण न कर पाने जैसी स्थिति बनने लगती है। स्वाध्याय, ध्यान, कार्योत्सर्ग में मन नहीं लगता। दूसरी तरफ ऊर्जा के असंतुलन के कारण, रक्त, मल-मूत्र आदि अवयवों के रासायनिक तत्त्वों में परिवर्तन होने लगता है। शरीर का बाह्य संतुलन भी प्रभावित होने से, चलने-फिरने, उठने-बैठने में तकलीफ तथा अन्य लक्षण प्रकट होने लगते हैं। कमजोरी अनुभव होने लगती है। इन्द्रियों की क्षमताएं क्षीण होने लगती है। कहने का तात्पर्य यह है कि शरीर के विभिन्न अंगों में प्रवाहित प्राण ऊर्जा का संतुलन शरीर की मुख्य आवश्यकता है। जिसके असंतुलन से न केवल शारीरिक स्तर पर दुष्प्रभाव पड़ता है अपितु मानसिक, भावात्मक और आत्मिक स्तर भी प्रभावित होते हैं। अतः जो उपचार प्राण ऊर्जा के संतुलन के सिद्धान्त पर जितना अधिक आधारित होता है, वह उपचार उतना ही अधिक सनातन, व्यापक और प्रभावशाली होता है।

प्राण ऊर्जा के संतुलन बिना उपचार अपूर्णः-

                अधिकांश चिकित्सा पद्धतियां प्राण ऊर्जा के असंतुलन से मात्र शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों को अपने ढंग से समझ, रोग का निदान और उपचार करती है। नाड़ी वैद्य नाड़ी की गति के आधार पर वात, कफ, पित्त की शरीर में स्थिति द्वारा निदान करते हैं। एलौपैथिक चिकित्सक मल-मूत्र के परीक्षणों तथा ई.सी.जी., सोनोग्राफी, एक्स-रे, सी.टी. स्केनिंग आदि के आधार पर शरीर के रोग का निदान करते हैं। मन, भाव और आत्मा के विकार  निदान और उपचार करते समय प्रायः उपेक्षित होते हैं।

                अधिकांश चिकित्सा पद्धतियां शरीर में विजातीय तत्त्वों की उपस्थिति को रोगों का एक मात्र कारण मानती है। आत्मिक विजातीय तत्त्वों की तरफ उनका ध्यान ही नहीं जाता। शरीर जड़ है। अतः बाजार से मिलने वाली दवाइयां, अन्य खाद्य पदार्थ और भौतिक उपकरणों की मदद से जड़ ऊर्जा तो मिल सकती है, पर प्राण ऊर्जा नहीं। ऐसी चिकित्सा पद्धतियां अधिक से अधिक शरीर को ठीक कर सकती है। मानसिक व आत्मिक रोगों का उपचार तो स्वयं की चेतना से उत्पन्न प्राण ऊर्जाओं से ही संभव हो सकता है। प्रत्यक्ष या परोक्ष हिंसा को प्रोत्साहन देने वाली चिकित्सा पद्धतियां प्राण ऊर्जा का उल्टा असंतुलन ही करती है, अतः रोगी को स्थायी रूप से रोग मुक्त नहीं बना सकती।

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