आत्मशुद्धि स्वास्थ्य की सर्वोच्च आवश्यकता

आत्मशुद्धि स्वास्थ्य की सर्वोच्च आवश्यकता


                आत्म-शुद्धि जीवन की सर्वोच्च आवश्यकता है परन्तु आज जीवन शैली का निर्धारण करते समय तथा स्वास्थ्य के सम्बन्ध में परामर्श देते समय प्रायः अधिकांश चिकित्सा पद्धतियों और चिकित्सकों की सोच मात्र शरीर तक ही सीमित होता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि हमारी गतिविधियाँ के संचालन में शरीर की प्रमुख भूमिका होती है। सभी कार्य और जीवन, शरीर के अस्तित्व के बिना असम्भव होते हैं। शरीर की अनुपस्थिति में, मन, बुद्धि और वाणी का भी अस्तित्व नहीं होता। फिर भी आत्मा की उपेक्षा कर मात्र शरीर का ख्याल करने का मतलब कार में पेट्रोल डाल, चालक को भूखा रखने के समान बुद्धिहीनता ही समझना चाहिए। ऐसी कार में निर्विध्न यात्रा सम्भव नहीं हो सकती। अतः जीवन-यापन करते समय हम ऐसी प्रवृत्तियों से यथा-सम्भव बचे, जिससे आत्मा अपवित्र और विकारग्रस्त बनती हो। आत्मा को शुद्ध, पवित्र और विकारों से मुक्त रखना हमारे जीवन की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। उसका एक मात्र उपाय है- अशुभ कर्मो के बन्धनों से मुक्त जीवनचर्या जीना। आत्म-दर्शन, आत्म-निरीक्षण, आत्मोत्थान की नियमित समीक्षा करना। अध्यात्म योगी ऐसा ही जीवन जीने से अपेक्षाकृत अधिक स्वस्थ होते हैं। प्रतिकूलताएँ, वियोग, अभाव परीषह, कष्ट, दुःख और परिस्थितियों में भी मस्त एवं प्रसन्नचित रहते हैं। यही सुख एवं स्वस्थ जीवन की सच्ची आधारशीला है तथा ऐसी सोच ही स्वास्थ्य का सच्चा सम्यक् ज्ञान एवं सम्यक् दृष्टिकोण होता है।

आत्मा की उपेक्षा अनुचित-

                किसी तालाब को खाली करने के लिए आवश्यक है कि तालाब में पहले आते हुए पानी को रोका जाए। उसके पश्चात् तालाब में जो पानी है, उसको पम्प या अन्य विधि द्वारा खाली करना अथवा पानी को सुखाना। ठीक उसी प्रकार आत्मा को शुद्ध, पवित्र बनाने के लिए आवश्यक है कि मानव जीवन में ऐसी प्रवृत्तियों से यथा-सम्भव बचें, जो अशुभ कर्मो के बन्ध का हेतु बन आत्मा को कर्मो से विकारी बनाती है। साथ ही साथ आत्मा पर पहले से जो कर्मो का आवरण है, उसको दूर करने के लिए अनुभवी, निस्पृही, समत्व की साधना में लीन आध्यात्मिक साधकों के मार्गदर्शन में सम्यक् पुरुषार्थ करना चाहिए। जब तक कर्जा नहीं उतरता व्यापारी ऋण-मुक्त नहीं हो सकता। ठीक उसी प्रकार अशुभ कर्मो को दूर किये बिना, आत्मा शुद्ध, बुद्ध, मुक्त नहीं बन सकती। ऐसी साधना मनुष्य योनि में ही सम्भव होती है। महावीर के दर्शन में गुणस्थान स्वरूप के आधार पर आत्मा के विकास की चौदह क्रमिक स्थितियों का विस्तृत विवेचन मिलता है, जिसका सम्यक् आचरण आवश्यक होता है।

                मुक्त आत्मा ही परमात्मा स्वरूप होती है। यही स्थायी सम्पूर्ण स्वास्थ्य की अवस्था होती है। आत्म-साधना के लिए शरीर का स्वस्थ होना भी आवश्यक है।

स्वास्थ्य हेतु शरीर को प्राथमिकता क्यों?

                स्वस्थ जीवन जीने के लिए शरीर को महत्व देने का प्रथम कारण तो यह है कि रोग से पड़ने वाले प्रभावों का निरीक्षण, परीक्षण, अभिव्यक्ति एवं कष्ट का अनुभव शरीर से ही होता है। अतः जनसाधारण की प्राथमिकता भी पहले शरीर को रोग-मुक्त, कष्ट-मुक्त करने की होती है। दूसरी बात आज उपचार के नाम पर जितने भी साधन उपलब्ध हैं और जो प्रचलन में हैं उनका सम्बन्ध प्रायः भौतिक पदार्थो से ही होता है। भौतिक पदार्थ जड़ शरीर को ही प्रभावित कर सकते हैं, विज्ञान का अत्यधिक विकास हो जाने के बावजूद मानव आज तक भौतिक पदार्थो से शरीर में बनने वाले किसी भी अव्यव का निर्माण नहीं कर सका। पृथ्वी, पानी, अग्नि और वायु में चेतना के अस्तित्व का अनुभव नहीं कर सका, जिनका तीर्थंकरों एवं केवल ज्ञानियों ने अपने ज्ञान द्वारा विस्तृत विवेचन किया है। जो आधुनिक वैज्ञानिकों के लिए शोध का विषय है। मानव ने आज अधिकांश विकास, खोज और उपलब्धियाँ भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में अर्जित की है। मानव जड़ पदार्थो का निर्माण ही अपनी इच्छानुसार कर सकता है। चेतन तत्त्वों का निर्माण या नियन्त्रण एकरूपता के आधार पर अपनी इच्छानुसार उससे सम्भव नहीं हो सका। भले ही आज के वैज्ञानिक टेस्ट टयूब बच्चों के जन्म के दावों का बहुत प्रचार करते हों। अतः आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों का लाभ जड़ शरीर को ही मिल सकता है। अतः आधुनिक युग में स्वास्थ्य की समस्त कल्पना और सोच मात्र शरीर तक ही सीमित होती है। कोई भी स्वास्थ्य विशेषज्ञ ज्योतिष एवं हस्त रेखा विशेषज्ञों की भांति मनुष्य जीवन के भविष्यवाणी नहीं कर सकता। आत्मा को विकार-मुक्त करने का मार्ग आध्यात्मिक साधना के रूप में पहचाना जाता है। आत्मा अरूपी है तथा उस पर पड़ने वाले प्रभाव अनुभूति का विषय होते हैं, जो ज्ञान का क्षयोपशम के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति में अलग-अलग होता है। उसको आज के वैज्ञानिक मापदण्डों के अनुसार न तो भौतिक यंत्रों से सही मांपा जा सकता है, न दिखाया जा सकता है और न उन अनुभूत परीक्षणों के परिणामों का संकलन ही सम्भव होता है। अनुभूति और परिणामों की विविधता के कारण रोगोपचार के लिए निष्चित प्रक्रिया एवं विधि प्रस्ताविक करना भी सम्भव नहीं हो सकता। मन, वाणी भावों का अस्तित्व भी प्रत्यक्ष नहीं दिखाया जा सकता। मन और वाणी का योग भी शरीर के अस्तित्व के बिना असम्भव होता है। मन और वाणी के निर्माण हेतु जो पुद्गलों की आवश्यकता होती है, उसका आकर्षण भी शरीर के द्वारा ही होता है। हमारे सामने प्रत्यक्ष अस्तित्व तो शरीर का ही होता है। शरीर का हमारी चेतना से इतना गहरा सम्बन्ध होता है कि शरीर के अणु-अणु में चेतना व्याप्त होती है। चेतना के बिना शरीर की प्रवृत्तियाँ असम्भव होती है और शरीर के बिना चेतना की अभिव्यक्ति भी नहीं हो सकती। अतः अभिव्यक्ति का सबसे मुख्य साधन शरीर ही होता है। परिणामस्वरूप जो आदेश हम शरीर को देते हैं, वह मात्र शरीर को ही नहीं अपितु वे निर्देश हमारी चेतना उस निर्देश को स्वीकार करती है तथा उसके अनुरूप शरीर को प्रवृत्ति करने हेतु प्रेरित करती है। इस प्रकार हमारे समस्त क्रियाकलाप, प्रवृत्तियाँ बाह्य रूप से शरीर पर ही आश्रित होते हैं तथा शरीर के अस्तित्व में आने के बाद ही प्रारम्भ होते हैं। शरीर आत्मा के वाहन का कार्य करता है। खराब वाहन से जीवन के लक्ष्य को प्राप्त नहीं किया जा सकता। शरीर मोटर कार की भाँति मानव द्वारा निर्मित यंत्र नहीं है, जिसके पुर्जे आसानी से बदले जा सकें, क्योंकि भौतिक साधनों द्वारा शरीर को खराब होने के पश्चात् छोड़ना ही पड़ता है। अतः जब तक जीवन है, शरीर की सुरक्षा और स्वस्थता आवश्यक होती है, जिससे जीवन यात्रा को निर्विध्न चलाते हुए सही लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकें। अतः उपचार की प्रचलित चिकित्सा पद्धतियों का आधार शरीर तक ही सीमित होता है और शरीर से ही मन, वाणी, भावों के माध्यम से ही आत्मा को प्रभावित किया जाता है। यद्यपि स्वास्थ्य प्राप्ति का सही क्रम तो आत्मा से शरीर ही होता है। अतः प्रचलित चिकित्सा पद्धतियों और आध्यात्मिक साधना के समन्वय से ही हम स्थायी स्वास्थ्य प्राप्त कर सकते हैं। जब तक जीवन है और मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो जाती, शरीर और आत्मा में से किसी की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती।

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