कर्मो से प्रभावित हमारा स्वास्थ्य

कर्मो से प्रभावित हमारा स्वास्थ्य


स्वस्थ कौन? 

                स्वस्थता तन, मन और आत्मोत्साह के समन्वय का नाम है। जब शरीर, मन, इन्द्रियाँ और आत्मा ताल से ताल मिला कर सन्तुलन से कार्य करते हैं, तब ही अच्छा स्वास्थ्य कहलाता है।

                स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है कि मन और पाँचों इन्द्रियाँ सशक्त हो। स्मरण शक्ति अच्छी हो। क्षमताओं का ज्ञान हो। विवेक जागृत हो। लक्ष्य सही और विकासोन्मुख हो तथा जीवन में स्थायी आनन्द, शान्ति, प्रसन्नता बढ़ाने वाला हो, न कि तनाव, चिन्ता, निराशा, भय, अनैतिकता, हिंसा, झूठ, चोरी, व्याभिचार, तृष्णा आदि दुःख के कारणों को बढ़ाने वाला। प्राथमिकताएँ सही हो एवं उसके अनुरूप संयमित, नियमित, नियन्त्रित जीवनचर्या हो। आवश्यकता की क्रियान्विति और अनावश्यक की उपेक्षा का स्वविवेक हो। मन का चिन्तन और आचरण सम्यक् एवं संयमित हो। मन में बेचैनी न हो। इन्द्रियों की विषय-विकारों में आसक्ति न हो। समस्त प्रवृत्तियाँ सहज और स्वाभाविक हो, अस्वाभाविक न हो

                जो आत्म-विश्वासी, दृढ़ मनोबली, सहनशील, धैर्यवान, निर्भय, साहसी और जीवन के प्रति उत्साही हो। जिसके सभी कार्य समय पर होते हो तथा जीवन नियमबद्ध हो।

                आत्मा में अनन्त शक्तियाँ हैं, जो उसकी शुद्धावस्था में प्रकट होती हैं। जब आत्मा पूर्ण शुद्ध हो जाती है तो, उसमें सृष्टि की समस्त प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष घटनाएँ दर्पण की भांति प्रतिबिम्बित होने लगती हैं। आत्मा परमात्मा बन जाती है। ऐसी अवस्था को वीतराग अवस्था अथवा केवल ज्ञान की स्थिति कहते हैं। जहाँ सारा अज्ञान दूर हो जाता है, केवल ज्ञान ही शेष रहता है।

रोग क्यों?-

                रोग होने के अनेक कारण होते है। जैसे पूर्व जन्म के संचित असाता वेदनीय कर्मो का उदय, पैतृक संस्कार और वंशानुगत रोग, आकस्मिक दुर्घटनाएँ, आस-पास का बाह्य प्रदूषित वातावरण, मौसम का परिवर्तन एवं उसके प्रतिकूल आचरण, पारिवारिक जिम्मेदारियाँ, सामाजिक कुरीतियों का पालन, स्वास्थ्य विरोधी सरकारी नीतियाँ, कानून, सुविधाएँ, प्रोत्साहन, स्वास्थ्य को बिगाड़ने वाले रुढिवादी धार्मिक अनुष्ठानों का पालन, जीवन निर्वाह हेतु स्वास्थ्य विरोधी व्यावसायिक वातावरण, आर्थिक कठिनाईयाँ, अपव्यय, बदनामी, प्राकृतिक आपदाओं का प्रकोप, असंयम, दुव्र्यसनों का सेवन, अकरणीय पाश्विक वृत्तियाँ, मिलावट एवं रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाईयों से प्रभावित उपलब्ध आहार सामग्री, असाध्य एवं संक्रामक रोगों के प्रति प्रारम्भ में रखी गई उपेक्षावृत्ति, अनावश्यक दवाओं का सेवन तथा शारीरिक परीक्षण, इलैक्ट्रोनिक किरणों (एक्स रे, टी.वी, सोनोग्राफी, कम्प्यूटर, सी.टी. स्केनिंग, मोबाइल फोन एवं अन्य प्रकार की आणविक तरंगों) का दुष्प्रभाव, प्राण ऊर्जा का दुरुपयोग या अपव्यय, आराम, निद्रा, विश्राम का अभाव, क्षमता के प्रतिकूल श्रम करना, मल-मूत्र को रोकना, अति भोजन, अति निद्रा, शरीर में रोग प्रतीकारात्मक शक्ति का क्षीण होना, गलत अथवा अधूरे उपचार तथा दवाओं का दुष्प्रभाव, वृद्धावस्था के कारण इन्द्रियों का शिथिल हो जाना। प्रमाद, आलस्य, अविवेक, अशुभ चिन्तन, आवेग, अज्ञान, असजगता, हिंसक, मायावी, अनैतिक जीवन शैली, जिससे सदैव तनावग्रस्त एवं भयभीत रहने की परिस्थितियाँ बनना आदि रोगों के मुख्य कारण होते हैं। कुछ कारण तो हमारे नियन्त्रण में होते हैं कुछ कारण नहीं। फिर भी हमारी आत्मा में अनन्त शक्ति होने से यदि सजगता और स्वविवेक पूर्ण जीवन शैली अपनायी जावे तो रोग के जो कारण हमारे नियन्त्रण में नहीं हैं, उनके प्रभाव को कम किया जा सकता है। जीवन में सभी को सदैव सभी प्रकार की अनुकूलताएँ प्रायः नहीं मिलती। प्रतिकूल परिस्थितियों को स्वस्थ चिन्तन, मनन एवं सम्यक् आचरण द्वारा अपने अनुकूल बनाया जा सकता है, यही स्वास्थ्य का मूल सिद्धान्त और स्वस्थ जीवन की आधारशिला होती है। हमारा चिन्तन और आचरण जितना-जितना सम्यक् होगा, उतने-उतने हम स्वस्थ होते जायेंगे।

                आभूषण की डिब्बी का महत्त्व तभी होता है, जब तक उसमें बहुमूल्य आभूषण होते हैं। बटुए (पर्स) का मूल्य उसमें रखें पैसों के आधार पर होता है। ठीक उसी प्रकार मानव शरीर का मूल्य तभी तक होता है, जब तक उसमें आत्मा होती है। जिस प्रकार आभूषण से शून्य डिब्बी और रुपयों के बिना बटुए का विशेष मूल्य नहीं होता और जो व्यक्ति आभूषणों और रुपयों से ज्यादा डिब्बी और बटुए को महत्त्व देता है, उसे बुद्धिमान नहीं समझा जाता। समझदार व्यक्ति पर्स और डिब्बी दोनों का ख्याल रखता है, परन्तु सुरक्षा हेतु ज्यादा आभूषणों और रुपयों को महत्त्व देता है तथा उनकी अनुपस्थिति में डिब्बी और बटुए की उपेक्षा करते हुए भी संकोच नहीं करता।

सही सोच का अभाव:-

                सम्यक् चिन्तन के अभाव में कभी-कभी व्यक्ति का सोच, मायावी विज्ञापनों, भीड़, तत्कालिक लाभ, बाह्य चकाचौध से प्रभावित हो सकता है। परिणामस्वरूप व्यक्ति अपने लक्ष्य का सही निर्धारण नहीं कर पाता। ऐसी अवस्था में व्यक्ति अपनी क्षमताओं और प्राथमिकताओं से भी प्रायः परिचित नहीं होता। सही जानकारी के अभाव में या आंशिक जानकारी के कारण व्यक्ति कभी-कभी गलत को सही और सही को गलत मानने की भूल कर सकता है। उसकी प्राथमिकताएँ स्वयं के भविष्य के लिए उपयोगी होने के बजाय हानिकारक हो सकती है। फलतः उसका भविष्य तनावग्रस्त, दुःखी अस्वस्थ अथवा संक्षिप्त में कहें तो अन्धकारमय बन जाता है।

वाणी का प्रभाव:-

                वाणी के दुरुपयोग से भी जो अव्यवस्था और असंतुलन होता है। उसका प्रारम्भिक प्रभाव मानसिक रोगों पर होता है। वाणी को सुनकर हंसना, मुस्कराना, डाँटना, चेहरे का रूप बदलना उसका द्योतक होता है। परन्तु अधिकांश चिकित्सक और रोगी तथा उनके परिजन आन्तरिक मानसिक रोगों को तो रोग मानते तक नहीं। तब उनके उपचार एवं निवारण के बारे में सोचने का तो प्रश्न ही नहीं होता। परन्तु दुर्घटना, पैतृक, जन्म जात रोगों को छोड़ अधिकांश रोगों का कारण नकारात्मक भावों से प्रारम्भ होता है और जब तक सम्यक् चिन्तन द्वारा उसे बदला नहीं जाता तब तक दीर्घकालीन स्थायी स्वास्थ्य की प्राप्ति संभव नहीं होती। रोग का कारण जब तक बना रहेगा रोग होने की संभावना बनी रहती है।

बिना कारण कार्य नहीं होता-

                आधुनिक वैज्ञानिकों द्वारा मान्य सर्वसम्मत वैज्ञानिक सिद्धान्त है कि बिना कारण कोई कार्य नहीं होता। प्रत्येक कार्य अथवा घटना के पीछे प्रत्यक्ष या परोक्ष कुछ न कुछ कारण अवश्य होते हैं। बिना कारण कुछ भी घटित नहीं हो सकता। हमें जो मनुष्य की योनि के साथ में संयोग-वियोग, सुख-दुःख, अनुकूलताएँ-प्रतिकूलताएँ मिलती हैं, उसके पीछे हमारे पूर्व संचित कर्मो का प्रभाव होता है। यदि अच्छे का फल अच्छा और बुरे का फल बुरा न मिले तो प्रकृति की सारी व्यवस्थाएँ ही डगमगा जाती है।

                शरीर का चेतन-आत्मा के साथ संयोग ही जीवन है और वियोग मृत्यु है। मृत्यु के पश्चात् शरीर, मन और इन्द्रियों की भांति आत्मा का अन्त नहीं होता। जब तक दोनों साथ-साथ में होते हैं, तभी तक स्वास्थ्य की समस्या होती है। दोनों के अलग होते ही शरीर की सारी गतिविधियाँ स्वतः समाप्त हो जाती हैं। शरीर की समस्त गतिविधियों के संचालन करने वाली चेतना (प्राण) और प्राण ऊर्जा भी दोनों से अलग होती है, जिसका निर्माण आत्मा और शरीर के सहयोग से होता है। बिना आत्मा अथवा शरीर प्राण और प्राण ऊर्जा का अस्तित्व नहीं होता। प्राण और प्राण ऊर्जा को भी प्रायः जनसाधारण एक ही समझते हैं, परन्तु दोनों अलग-अलग होते हैं। ऊर्जा जो जड़ है, जबकि प्राण में चेतना होती है। गुब्बारे में हवा भरने से उसमें प्राण नहीं आ जाते और न हवा निकालने से गुब्बारे के प्राण चले जाते हैं। ऊर्जा शरीर में बाहर से भीतर आती है या शरीर में श्वसन की प्रक्रिया से बनती है। जबकि प्राण शरीर में जन्म से विद्यमान होता है। प्राण अपने आप में शाश्वत होता है, जबकि प्राण ऊर्जा को श्वास आलम्बन आवश्यक होता है। अतः प्राण कहें या चेतना, शरीर में आत्मा के ही अंश होते है तथा आत्मा शरीर में जिस शक्ति से निश्चित आयुष्य तक ठहरी हुई रहती है, उस शक्ति को प्राण ऊर्जा कहा जा सकता है।

                जिसमें प्राण होता है, वही प्राणवन्त होता है। जब किसी की मृत्यु हो जाती है तो, प्रायः हम यही कहते हैं कि व्यक्ति के प्राण निकल गये। यह नहीं कहते कि प्राण ऊर्जा निकल गई। प्राण की उपस्थिति में ही जीव प्राणी कहलाता है। प्राण हमारी आत्मा और स्थूल शरीर के बीच सेतु का कार्य करता है। आत्मा और शरीर का सारा संबंध प्राण के द्वारा ही होता हैं।

                मानव जीवन में आहार, शरीर, इन्द्रिय, श्वासोचछवास, भाषा और मन में ऊर्जा के स्रोत माँ के गर्भ में आते ही मिल जाते हैं। आयुष्य प्राण के रूप में आत्मा के साथ किसी योनि में सीमित अवधि में रहने की ऊर्जा प्राप्त होती है। श्वसन उस ऊर्जा के प्रवाह को संचालित और नियन्त्रिण करता है। जिस प्रकार पेट्रोल समाप्त होते ही कार रूक जाती है, ठीक उसी प्रकार आयुष्य प्राण के समाप्त होते ही जीवन का अन्त हो जाता है। जब तक आयुष्य प्राण रहता है तब तक आँख, नाक, कान, मुँह, स्पर्श आदि पाँचों इन्द्रियाँ और मन तथा वाणी भी अपनी-अपनी प्राण ऊर्जाओं के अनुसार शरीर की गतिविधियों एवं प्रवृत्तियों के संचालन में सहयोग देते हैं। जिस प्रकार बिजली से प्रकाष, गर्मी, वाहन आदि उपकरणों के माध्यम से अलग-अलग ऊर्जाएँ निर्मित होती है, ठीक उसी प्रकार आयुष्य बल प्राण और श्वसन प्राण के सहयोग से आँख में देखने, कान में सुनने, नाक में सुगन्ध लेने, जीभ में बोलने, मुँह में आहार करने, शरीर में स्पर्श ज्ञान की ऊर्जा उत्पन्न होती है। यदि हमारी कोई इन्द्रिय अथवा मन की प्राण ऊर्जा क्षीण हो जाती है तो व्यक्ति की वह इन्द्रिय अथवा मन निष्क्रिय हो जाता है। बाकी सभी इन्द्रियाँ अपना कार्य बराबर करती रहती है, परन्तु आयुष्य प्राण के बिना जीवन एक क्षण भी नहीं चल सकता।

कर्म बंध का कारण है कषाय

                किसी भी जीव को मृत्यु के पश्चात् अन्य कौनसी गति में भेजना, कितनी इन्द्रियाँ उपलब्ध कराना, कैसा शरीर देना है, इन्द्रियों की कितनी क्षमता रखना आदि का निर्णय उसके कर्मो की स्थितिनुसार होता है। अतः स्वास्थ्य कर्मो से प्रभावित होता है। जीव को उसका शरीर नाम कर्म के अनुसार मिलता है। नाम कर्म के अनुसार ही उसे नरक, तीर्यन्च, मनुष्य, देव आदि चार गतियों में से एक गति मिलती हैं। एकेन्द्रिय से पंचेन्द्रिय के अनुसार इन्द्रियाँ मिलती है। पृथ्वीकाय, अपकाय, तेउकाय, वायुकाय, वनस्पति काय एवं त्रस काय में से एक प्रकार की काया प्राप्त होती है। कान, आँख, नाक, मुँह एवं स्पर्शेन्द्रिय और मन में कोई एक अथवा उससे अधिक इन्द्रियाँ मिलती है। चेतना के विकासानुसार एकेन्द्रिय जीव को मात्र स्पर्श इन्द्रिय, बेइन्द्रिय जीव को स्पर्श एवं रसनेन्द्रिय, तेइन्द्रिय को स्पर्श, रसना के अलावा घ्राणेन्द्रिय मिलती है। चउरिन्द्रिय जीव को स्पर्श, रसना, घ्राणेन्द्रिय के साथ चक्षु इन्द्रिय भी प्राप्त होती है। पंचेन्द्रिय जीवों को स्पर्श, रसना, घ्राणेन्द्रिय, चक्षु के साथ में श्रोतेन्द्रिय के रूप में कान भी मिलते हैं। सभी पंचेन्द्रिय जीवों के मन नहीं होता। केवल सन्नी (जिनके मन होता है) पंचेन्द्रिय जीव को ही मन मिलता है। इस प्रकार मनुष्य जीवन चेतना के विकास की सर्वोतम अवस्था होती है। सभी सन्नी पंचेन्द्रिय जीवों का मन भी समान रूप से विकसित नहीं होता, जितना मनुष्य का होता है।

                इन्द्रियों के अनुसार ही जीव को आहार, शरीर, इन्द्रिय, श्वासोच्छवास, भाषा और मन आदि  छः पर्याप्तियों (Bio Potential Energy) अर्थात् मूल प्राण ऊर्जाओं में से पर्याप्तियाँ और श्रोते इन्द्रिय बल प्राण, चक्षु इन्द्रिय बल प्राण, घ्राणेन्द्रिय बल प्राण, रसनेन्द्रिय बल प्राण, स्पर्शेन्द्रिय बल प्राण, श्वासोच्छवास बल प्राण, मन बल प्राण, वचन बल प्राण, काय बल प्राण और आयुष्य बल प्राण आदि दस प्राणों में से कुछ अथवा सभी प्राण और पर्याप्तियाँ प्राप्त होती है। मनुष्य को दसों प्राण प्राप्त होते हैं।

                एकेन्द्रिय जीव को छः में से चार पर्याप्तियाँ (आहार, शरीर, इन्द्रिय और श्वासोच्छवास) मिलती है और दस में से मात्र चार प्राण (स्पर्श इन्द्रिय बल प्राण, काय बल प्राण, श्वासोच्छवास बल प्राण और आयुष्य बल प्राण) ही प्राप्त होते हैं। अन्य प्राण और पर्याप्तियाँ नहीं मिलती। दो इन्द्रिय वाले जीवों को चार पर्याप्तियाँ के साथ रसनेन्द्रिय एवं वचन बल प्राण मिलते हैं। तेइन्द्रिय जीवों को चार पर्याप्तियाँ और सात प्राण अर्थात बेइन्द्रिय की अपेक्षा घ्राणेन्द्रिय अधिक मिलती है। चउन्द्रिय को आठ प्राण अर्थात् तेइन्द्रिय की अपेक्षा चक्षु इन्द्रिय अधिक मिलती है। पंचेन्द्रिय जीवों को चउरिन्द्रिय की अपेक्षा श्रोतेन्द्रिय अधिक मिलती है। कहने का तात्पर्य यह है कि एकेन्द्रिय से लेकर पंचेन्द्रिय जीवों तक की अवस्था में मन नहीं मिलता। मन तो मात्र सन्नी जीवों को ही मिलता है। जब तक आत्मा मोक्ष को प्राप्त नहीं हो जाती अर्थात् प्रत्येक संसारी आत्मा को कम से कम चार प्राण और चार प्रर्याप्तियां तो मिलती ही है।  अतः जो इन प्राणों और पर्याप्तियों का अपव्यय अथवा दुरुपयोग करते हैं अथवा भूतकाल में जिन्होंने दुरुपयोग किया उनको ये चारों प्राण और प्रर्याप्तियां कमजोर मिलेगे। अर्थात् उनका शरीर दुर्लभ होगा, स्पर्श शक्ति कमजोर होगी, श्वसन प्रणाली शक्तिशाली नहीं मिलेगी और आयुष्य भी अपेक्षाकृत कम मिलेगा। मन के बिना मनन और चिंतन नहीं होता। कान के बिना जीव सुन नहीं सकता। चक्षु के बिना जीव में देखनें की योग्यता, घ्राणेन्द्रिय के बिना गंध को पहचानने की, रसनेन्द्रिय के बिना स्वाद को जानने एवं बोलने की योग्यता प्राप्त नहीं होती।

                यदि आपका प्रिय बच्चा आपसे हजार रुपये का नोट मांगे तो प्रेमवश शायद आप उसको हजार रुपये का नोट दे देंगे। परन्तु यदि वह बच्चा नासमझी से उसे मात्र साधारण कागज समझ कर फाड़ दें और आपसे पुनः दूसरा हजार रुपये का नोट मांगने की जिद्द करें तो कोई भी समझदार व्यक्ति बच्चे को फिर से हजार रुपये का नोट देने की गलती नहीं करता, भले ही वह बच्चा कितना ही प्यारा क्यों न हों? ठीक उसी प्रकार जो एकेन्द्रिय जीवों  (पृथ्वी, पानी, हवा, अग्नी एवं वनस्पति) का दुरूपयोग करते हैं, नष्ट करते हैं अर्थात् उनमें उपलब्ध स्पर्शेन्द्रिय बल प्राण, काय बल प्राण, श्वासोच्छवास बल प्राण और आयुष्य बल प्राण को नष्ट करते हैं, भविष्य में उस जीव को ये चारों प्राण कमजोर मिलेंगे। यदि अन्य शुभ कर्मो के प्रभाव से मनुष्य जैसी उच्च गति भी मिल जाये तो गर्भ अथवा बाल्यकाल में ही जीव दुनियाँ से विदा हो सकता है अथवा विकलांग या रोग ग्रस्त शरीर मिल सकता है। पृथ्वीकाय की विराधना अथवा दुरुपयोग से कमजोर अस्थि तंत्र मिलेगा या शरीर में हड्डियाँ संबंधी रोग होंगे। जल काय की विराधना से शरीर में जल तत्त्व के असंतुलन, वायुकाय की विराधना से कमजोर श्वसन तंत्र एवं अग्नीकाय की विराधना से शरीर में अग्नी तत्त्व कमजोर मिलेगा। शरीर के अंगों का विकास असंतुलित एवं अपूर्ण हो सकता है। कारण स्पष्ट है  दुःख देने से दुःख ही मिलेगा। अतः यथासंभव हम अनावश्यक एकेन्द्रिय जीवों को भी कष्ट पहुँचे वैसी प्रवृत्तियों से बचने का प्रयास करें।

                तेजस् और कार्मण शरीर आत्मा की मलीन अवस्था में सदैव उसके साथ रहते हैं तथा मृत्यु के समय जब तक आत्मा पूर्ण रूप से शुद्धावस्था को प्राप्त नहीं हो जाती, स्थूल शरीर ही नष्ट होता है, सूक्ष्म शरीर समाप्त नहीं होता। परन्तु अधिकांश आधुनिक प्रचलित चिकित्सा पद्धतियां उपचार को मात्र स्थूल शरीर तक ही सीमित रखती है। रोग के मूल कारण कर्मो तक उनका सोच प्रायः नहीं होता। इसी कारण जन्मजात रोगों एवं मृत्यु का रहस्य उनके पूर्ण समझ में नहीं आ पाता।

                इन तीनों शरीरों का स्वास्थ्य के साथ गहरा संबंध होता है। शक्तिशाली सूक्ष्म दर्शक यंत्रों की खोज से भी स्थूल शरीर के रहस्यों को तो जाना जा सकता है। परन्तु सूक्ष्म और सूक्ष्मतम शरीर को अभी भी नहीं देखा जा सकता। फिर भी उनका शरीर पर प्रभाव पड़ता है। जिसका प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता है। कर्म शरीर में जितने स्पन्दन होते हैं, वे स्थूल शरीर में अपना संबंध स्थापित करते हैं। स्थूल शरीर सूक्ष्म शरीर का संवादी होता है।

                जीवन से हमारा परिचय शरीर, वाणी और कार्यो के माध्यम से होता है। जिसका आधार मन और चित्त से भी परे हमारी आत्मा है। हमारी चेतना एक सूर्य के समान होती है और उसकी एक किरण का नाम होता है- ‘चित्त’ चैतन्य मय होता है तथा सूक्ष्म शरीर द्वारा संचालित होता है। अतः भाव, मन और वाणी चित्त द्वारा संचालित होते हैं। चित्त मन की भांति अस्थायी नहीं होता है। दीर्घ जीवी होता है। हमारी सारी चेतना का प्रवाह चित्त से ही होता है। चित्त मन की भांति अस्थायी नहीं होता है। दीर्घ जीवी होता है। हमारी सारी चेतना का प्रवाह चित्त से ही होता है। सूक्ष्म शरीर का दूसरा उत्पाद होता है, हमारा स्थूल शरीर एवं इन्द्रियाँ। हमारे मन का कोई भाव हम छिपाकर नहीं रख पाते। वह किसी न किसी रूप में प्रकट हो ही जाता है। परोक्ष रूप से छिपे हुए भाव भी हमारे अन्दर निरन्तर क्रियाशील रहते हैं और अपनी अभिव्यक्ति का मार्ग खोज निकालते है। शरीर में पनपने वाले असाध्य रोग भी हमारी छिपी भावनाओं को ही अभिव्यक्त करते हैं। हमारी अन्तःश्रावी ग्रन्थियाँ भाव के अनुसार ही शरीर में हारमोन्स अथवा रसायनों का निर्माण करती है। फलस्वरूप हम अच्छी या बुरी, करणीय अथवा अकरणीय प्रवृत्तियाँ करने लगते हैं। अतः अधिकांश रोगों का मूल कारण प्रायः भावनात्मक स्तर पर होता है और जब तक उसमें परिवर्तन नहीं आता, आरोग्य लाभ नहीं मिल सकता। क्षणिक आने वाले भाव तो हमें बहुत प्रभावित नहीं करते, परन्तु लम्बे काल तक बना रहने वाला भावात्मक असंतुलन संस्कार बन गहरा प्रभाव दिखाता है।

                सूक्ष्म शरीर से कर्म विपाक के अनुसार जो स्पन्दन आते हैं, वे चित्त को प्रभावित करते हैं। जिससे चित्त मस्तिष्क के साथ कार्य करने वाले भावों का निर्माण करता है तथा उन भावों की अभिव्यक्ति के लिये दो सहयोगी तंत्रों का निर्माण करता है और वे होते हैं, मन और वाणी। इस प्रकार मस्तिष्क-चित्त और स्थूल शरीर का संगम स्थल होता है। अतः मन और चित्त एक नहीं, अलग-अलग होते हैं। मन चंचल होता है। चित्त बुद्धि और विवेक से उस पर नियन्त्रण रखने की क्षमता रखता है। मन कुछ भी नहीं होता और सब कुछ भी होता है। मन का कोई स्थायी अस्तित्व नहीं होता परन्तु जब अस्तित्व में होता है तो सब कुछ बन जाता है, परन्तु यदि हम मन को पैदा न करें तो मन कुछ भी नहीं होता। मन को विराम दिया जा सकता है। स्वास्थ्य का संबंध मन के साथ बहुत कुछ जुड़ा होता है। मन स्वस्थ तो शरीर स्वस्थ और मन अस्वस्थ तो शरीर अस्वस्थ।

जीवन एवं स्वास्थ्य की सभी समस्याओं का मुख्य कारण कर्म होता है।

                कर्मो के प्रभाव से ज्ञान-अज्ञान हो जाता है, दर्शन मिथ्या हो जाता है। अतः जब तक आत्मा पर कर्मो का आवरण रहता है, तब तक सम्पूर्ण स्वास्थ्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। न मालूम कब वे कर्म उदय में आकर व्यक्ति को रोगी बना दे, कहा नहीं जा सकता।

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