अध्यात्म की उपेक्षा करने वाला स्वास्थ्य विज्ञान अपूर्ण

अध्यात्म की उपेक्षा करने वाला स्वास्थ्य विज्ञान अपूर्ण


                आज भौतिक विज्ञान के चमत्कारों से प्रभावित अधिकांश व्यक्ति वैज्ञानिक तथ्यों को ही सुनना, मानना, समझना और ग्रहण करना पसंद करते हैं, भले ही वे विज्ञान के मौलिक सिद्धान्तों से अपरिचित ही क्यों न हों। इसी कारण आज सनातन सिद्धान्तों की उपेक्षा विज्ञान के नाम पर हो रही है। आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान भी आज भ्रामक विज्ञापनों एवं मायावी आंकड़ों से प्रभावित हो रहा हैं।

विज्ञान क्या हैं?

                विज्ञान का मतलब है विशिष्ट ज्ञान, जो क्रमबद्ध एवं सूत्रबद्ध ढंग से प्राप्त किया जायें अथवा विज्ञान ज्ञान प्राप्त करने की वह विधि है, जिसमें तार्किक विधियों एवं प्रयोगों अथवा चेतना की अनुभूतियों के आधार पर सत्य के निष्कर्ष पर पहुँचा जाता है।

                किसी भी वस्तु के सूक्ष्मावलोकन व विश्लेषण से प्राप्त यथार्थ ज्ञान को विज्ञान कहते हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण का मतलब ऐसी क्षमता से कार्य करना होता है, जिसमें कम से कम निवेश में लाभ अधिक से अधिक हो तथा हानि और दुष्प्रभाव भी कम से कम हो। सत्य की खोज का नाम विज्ञान है अर्थात् विज्ञान का मतलब पूर्ण ज्ञान, सम्यक् ज्ञान होता है। विज्ञान सत्य को स्वीकारता है और झूठ को नकारता है। उसका एकमात्र आग्रह पूर्ण सत्य पर होता है। जैसे-जैसे आंशिक अथवा अधूरे सत्य की पोल खुलने लगती है, वर्तमान की वैज्ञानिक मान्यता को भविष्य में अवैज्ञानिक करार दे दिया जाता है अर्थात् जो सत्य को परिभाषित करता है, वही विज्ञान होता हैं। विज्ञान का आधार होता है सच्चा जो मेरा न कि मेरा जो सच्चा। वास्तव में जो सत्य है उसको स्वीकारने में किसको आपत्ति हो सकती है। परेशानी तो तब होती है जब विज्ञान के नाम पर आंशिक तथ्यों पर आधारित अधूरे सत्य को पूर्ण बतलाने हेतु मायावी आंकड़े, झूठे, भ्रामक विज्ञापनों एवं संख्या बल का सहयोग लिया जाता है तथा वास्तविकता एवं सनातन सत्य को नकारा जाता है। अपनी पद्धतियों को वैज्ञानिक तथा अन्य पद्धतियों को अवैज्ञानिक बतलाने का दुष्प्रचार किया जाता है। हमारा दृष्टिकोण संकुचित हो जाता है। विज्ञान के मूल मापदण्ड गौण होने लगते हैं। किसी भी तथ्य को वैज्ञानिक मानने के लिये अंतिम परिणामों की एकरूपता भी आवश्यक होती है, भले ही वह प्रयोग किसी के द्वारा कहीं पर भी क्यों न किया गया हो? अज्ञान का अर्थ ज्ञान का अभाव नहीं, परन्तु अल्प ज्ञान अथवा मिथ्याज्ञान भी होता है। अज्ञान से अविश्वास और भ्रान्ति पैदा होती है।

                प्रायः अधिकांश आधुनिक चिकित्सकों का अपनी खोजों की वैज्ञानिकता सिद्ध करने का दावा लगभग प्रायः ऐसा ही लगता है। विशेषकर स्वास्थ्य के नाम पर आयोजित होने वाले अधिवेशनों में प्रस्तुतिकरण का ऐसा ही आधार होता है। वैज्ञानिक शोध का आधार होना चाहिये अंतिम परिणामों का स्पष्ट प्रकटीकरण। अर्थात लाभ और हानि का सही विश्लेषण। प्रत्येक चिकित्सक अपनी उपलब्धियों को तो बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत करते हैं, प्रचारित करते हैं, परन्तु जहां अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते अथवा जो दुष्प्रभाव होते हैं, उनकी उपेक्षा करते हैं, छिपाते हैं, प्रकट नहीं करते हैं तथा उनके कारणों का विश्लेषण तक नहीं करते हैं। स्वास्थ्य विज्ञान की शोध के आधार में एकरूपता होनी चाहिए अर्थात् जिन रोगियों अथवा प्राणियों पर दवाओं अथवा उपचार के जो प्रयोग किये जाते हैं, उसका खान-पान, रहन-सहन, स्वभाव, मानसिकता, आचार-विचार, सोच, चिन्तन-मनन की प्रक्रिया, पारिवारिक समस्याएं तथा शरीर में अप्रत्यक्ष एवं सहयोगी रोगों की एकरूपता भी होनी चाहिए, क्योंकि यही कारण रोग से संबंधित होते हैं। ऐसी परिस्थितियां सभी रोगियों में एक सी होना कभी भी सम्भव नहीं होती। अतः उसके अभाव में प्रस्तुत परिणाम कैसे वैज्ञानिक और सत्य पर आधारित समझे जा सकते हैं, चिन्तन का प्रश्न हैं?

जीवन में चेतना का महत्त्वः-

                सारा शरीर मुख्यता दो प्रकार की ऊर्जाओं से संचालित होता है। प्रथम भौतिक ऊर्जा तथा दूसरी चैतन्य ऊर्जा। किसी एक के पूर्ण अभाव में मानव जीवन चल ही नहीं सकता। भौतिक ऊर्जा शरीर के अंगों, उपांगों, अवयवों, तंत्रों आदि के निर्माण हेतु आवश्यक साधन उपलब्ध करने में सहायक होती है और चैतन्य ऊर्जा उन उपलब्ध साधनों से उनका निर्माण, संचालन और नियंत्रण करती है। चैतन्य ऊर्जा के अभाव में न तो शारीरिक अवयवों आदि का निर्माण ही सम्भव है और न ही जीवन। आधुनिक चिकित्सकों को आज तक नाखून, आंसू एवं पसीने की एक बूंद आदि का निर्माण करने में सफलता क्यों नहीं मिली? इसी कारण भौतिक विज्ञान के विकास के बावजूद चैतन्य ऊर्जा के अभाव में अभी तक शरीर के लिये आवश्यक कोशिकाओं, रक्त अस्थियों, मांस पेशियों, नाड़ियों, वीर्य आदि अवयवों तथा आँख, कान, नाक जैसी इन्द्रियों एवं हृदय, फेंफड़े, गुर्दे, लीवर जैसे अंगों का निर्माण प्रयोगशालाओं में सम्भव नहीं हो सकता। चैतन्य ऊर्जा का विकास आत्मा की पवित्रता के अनुसार होता है। अतः उपचार करते समय जो चिकित्सा पद्धतियाँ भौतिक और चैतन्य ऊर्जाओं को ठीक रखने, सन्तुलित रखने के सिद्धान्तों पर कार्य करती है, वे ही अपने आपको वैज्ञानिक बतलाने का वास्तव में दावा कर सकती है।

भौतिक विज्ञान की सीमाएँ-

                भौतिक विज्ञान का आधार वही पदार्थ होता है, जिसे दिखाया जा सके, जो मांपा जा सके, जो प्रयोगों, परीक्षणों से प्रमाणित किया जा सके। ऐसे परिणाम जो तथ्य, तर्क एवं आंकड़ों से लिपिबद्ध किये जा सकें। जिसका आधार, निरीक्षण, विश्लेषण, निश्चित प्रक्रिया पर आधारित व्यवस्थित आंकड़ों तथा संकलित एवं प्रमाणित हों। जिसका उपयोग, संचालन, नियंत्रण प्रायः व्यक्ति स्वयं अथवा अन्य कोई व्यक्ति द्वारा निश्चित विधि का पालन कर बिना किसी बाह्य भेदभाव कहीं भी किया जा सके। जैसे विज्ञान द्वारा विकसित सभी सुविधाओं के साधन, उपकरण, यंत्र आदि का उपयोग कोई भी कर सकता है। उपर्युक्त मापदण्डों को जो पूर्ण न करते हों, उनको आज का मानव वैज्ञानिक तथ्य के रूप में स्वीकार करते संकोच करता है, भले ही वह अनुभूतियों द्वारा प्रमाणित ही क्यों न हों? उपर्युक्त मापदण्डों के आधार पर विज्ञान के नाम पर आज तक जो कुछ उपलब्धियाँ विकसित हुई है अथवा हो रही है, उन सभी का सम्बन्ध प्रायः भौतिक विज्ञान तक ही सीमित होता है। अनुभूति चेतना की ऊर्जा का मांप और उनसे अप्रत्यक्ष पड़ने वाले प्रभाव उसमें उपेक्षित होते हैं, क्योंकि सभी अदृश्य, अरूपी पदार्थ उसकी पकड़ में नहीं आते।

जड़ विज्ञान और आध्यात्मिक विज्ञान में भेदः-

                भौतिक ज्ञान विज्ञान के लिये आवश्यक है। फिर भी भौतिक ज्ञान तो वही तक हमारा साथ दे सकता है जहां तक वह जानता है और सिद्ध कर सकता है। इन्द्रिय ज्ञान से पार अतिन्द्रिय ज्ञान का भी अस्तित्व होता है, जिसे आध्यात्मिक विज्ञान अथवा आत्म ज्ञान कहा जा सकता है। टेप से आवाज ग्रहण कर पुनः सुना जा सकता है। रेडियों, टी.वी., वी.सी.आर, कम्प्यूटर, रोबोट आदि मनुष्य की आज्ञानुसार कार्य करते हैं, परन्तु स्वतः संचालित नहीं होते। आपत्तिकाल में आवश्यक स्वतंत्र निर्णय लेने में सक्षम नहीं होते।

                जड़ विज्ञान का कार्य क्षेत्र होता है भौतिक विकास, भौतिक सफलताएं, भौतिक उपलब्धियाँ आदि। उसका आधार होता है परावलम्बन, जबकि आध्यात्मिक विज्ञान से आत्मविकास का मार्ग प्रशस्त होता है। उसका आधार होता है स्वावलम्बन अर्थात् स्वयं के द्वारा स्वयं का निरीक्षण,परीक्षण, नियंत्रण, संचालन। उसका परिणाम होता है आत्मानुभूति। मनोबल और आत्मबल का विकास, अर्थात् भौतिक विज्ञान व्यक्ति को विशिष्ट बनाता है, जबकि आध्यात्मिक ज्ञान मानव को स्वाभाविक बनाता है।

                भौतिक विज्ञान प्रयोग में विश्वास करता है, जबकि अध्यात्म विज्ञान योग में। विज्ञान शक्ति की खोज करता है, जबकि अध्यात्म शान्ति की। जिस प्रकार बिजली का तार और उसमें प्रवाहित विद्युत अलग-अलग होती है। उसी प्रकार जड़ से संबंधित शरीर और चेतना से संबंधित आत्मा अलग-अलग होती है। अतः दोनों से संबंधित ज्ञान का लक्ष्य भी अलग-अलग होता है।

आध्यात्मिक साधकों की प्राथमिकताः-

                स्वास्थ्य एवं जीवनयापन की दृष्टि से आत्म साधकों का जीवन प्राणी मात्र के प्रति करुणा, दया और अनुकम्पा, ‘’सर्व जीव हिताय, सर्व जीव सुखाय” की लोकोक्ति को सार्थक करने वाला होता है। उनके शोध और साधना का मूल उद्देश्य आत्मा को निर्मल, शुद्ध, पवित्र बनाना होता है। अर्थात् आत्म पोषण का होता है, भले ही उन्हें कभी-कभी उसके लिए शरीर का कष्ट ही क्यों न सहना पड़े। उनके जीवन में क्रोध, मान, माया, लोभ रूपी कषायों की मन्दता होने से वे अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों में परेशान नहीं होते। उनमें प्रायः मानसिक आवेग नहीं आते, जो हमारी ग्रन्थियों को प्रभावित कर रोग का मुख्य कारण होते हैं। आचरण में अहिंसा, सत्य, नैतिकता, संयम की प्राथमिकता होती है। प्रायः ऐसे व्यक्ति सहनशील, सहिष्णु, निर्भिक और धैर्यवान होते हैं। वाणी में विवेक और मधुरता का सदैव ख्याल रखते हैं। उनका उद्देश्य होता है जीवन में चिरस्थायी आनन्द, शक्ति एवं स्वाधीनता की प्राप्ति। वे स्वयं के द्वारा स्वयं का आत्मावलोकन, निरीक्षण परीक्षण करते हैं। वे स्वयं के द्वारा स्वयं से अनुशासित होते हैं। उनका जीवन, शान्त, संतोषी, संयमी, सहज, संतुलित एवं सरल होता है। विचारों में अनेकान्तता, भावों में मैत्री, करूणा, प्रमोद तथा मध्यस्थता अर्थात् सहजता, स्वदोष-दृष्टि, सजगता, सहनशीलता, सहिष्णुता, दया, सरलता, सत्य, विवेक, संयम, नैतिकता आदि गुणों का प्रादुर्भाव होता है, जिसके परिणाम स्वरूप व्यक्ति के जीवन में अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों में समभाव, निस्पृहता, अनासक्ति विकसित होती है। व्यक्ति निर्भय, तनाव मुक्त बन सकता है। वाणी में सत्य के प्रति निष्ठा, सभी जीवों के प्रति दया, करुणा, मैत्री, परोपकार जैसी भावना और मधुरता प्रतिध्वनित होने लगती है। व्यक्ति का मनोबल और आत्मबल विकसित होने लगता है। व्यक्ति स्वावलम्बी, स्वाधीन बनने लगता है।

अध्यात्म से शून्य स्वास्थ्य विज्ञान अपूर्ण:-

                जिस चिकित्सा में शारीरिक स्वास्थ्य ही प्रमुख हो, मन, भावों अथवा आत्मा के विकार जो अधिक खतरनाक, हानिकारक होते हैं, गौण अथवा उपेक्षित होते हों या बढ़ते हों, ऐसी चिकित्सा पद्धतियों को ही वैज्ञानिक समझने वाले विज्ञान की बातें भले ही करते हों, विज्ञान के मूल सिद्धान्तों से अपरिचित लगते हैं। विज्ञान शब्द का अवमूल्यन करते हैं। सनातन सत्य पर आधारित प्राकृतिक सिद्धान्तों को नकारते हैं।

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