मानव शरीर स्वयं में परिपूर्ण

मानव शरीर स्वयं में परिपूर्ण

मानव का शरीर दुनियाँ की श्रेष्ठतम मशीन

                मानव शरीर की संरचना विश्व का एक अद्भुत आश्चर्य है। उसके रहस्य को दुनियां का बड़े से बड़ा डाॅक्टर और वैज्ञानिक पूर्ण रूप से समझने में असमर्थ है। शरीर के ऊपर यदि त्वचा न होती तो हमारी कैसी स्थिति होती? क्या हमने कभी कल्पना की? मस्तिष्क जैसा सुपर कम्प्यूटर, फेफड़े एवं गुर्दे जैसा रक्त शुद्धिकरण यंत्र, हृदय जैसा निरन्तर गतिशील रक्त का पम्प, आमाशय, तिल्ली, लीवर जैसा रासायनिक कारखाना, आंख के समान कैमरा, कान के समान श्रवण यंत्र, जीभ के समान वाणी एवं स्वाद यंत्र, लिंफ प्रणाली जैसी नगर निगम के समान सफाई व्यवस्था, नाड़ी तंत्र के समान मीलों लम्बी संचार व्यवस्था, अन्तःश्रावी ग्रन्थियों के समान सन्तुलित, नियंत्रित, संयमित, न्यायिक, प्रशासनिक व्यवस्था, अवांछित तत्वों के विसर्जन की व्यवस्था, प्रकाश से भी तेज गति वाला मन इत्यादि अन्यत्र निर्मित उपकरणों अथवा अन्य चेतनाशील प्राणियों में एक साथ मिलना असंभव होता है।

                शरीर अपने लिये आवश्यक रक्त, मांस, मज्जा, हड्डियां, वीर्य आदि अवयवों का निर्माण चेतना के सहयोग से स्वयं करता है, जिसे अन्यत्र प्रयोगशालाओं में बनाना अभी तक संभव नहीं हुआ है। हमारे शरीर में पसीने द्वारा त्वचा के छिद्रों से पानी तो आसानी से बाहर आ सकता है, परन्तु पानी में त्वचा को रखने से, उन छिद्रों से पानी भीतर नहीं जा सकता। प्रत्येक शरीर का कुछ न कुछ वजन होता है, परन्तु चलते-फिरते किसी को अपना वजन अनुभव नहीं होता है। हमारे शरीर का तापक्रम साधारणताया 98.4 डिग्री फारेहनाइट होता है, भले ही बाहर कितनी ही सर्दी अथवा गर्मी क्यों न हो? चाहे, बर्फीले दक्षिणी अथवा उत्तरी ध्रुव पर जावें अथवा गर्मी में सहारा मरुस्थल जैसे गर्म स्थानों पर, शरीर का तापक्रम 98.4 डिग्री फारेहनाइट ही रहता है। हम देखते हैं जब कभी आंधी या तेज हवा चलती है, तब हल्के पदार्थ एक स्थान से दूसरे स्थान पर उड़कर चले जाते हैं। परन्तु हलन-चलन, उठने-बैठने एवं दौड़ने के बावजूद शरीर की पतली से पतली कोई भी नाड़ी अपना स्थान नहीं छोड़ती। यदि हम शीर्षासन करें तो हृदय अथवा कोई भी अंग अपना स्थान नहीं छोड़ता। शरीर के सभी अंग, उपांग, नाड़ियां, हड्डियां, हलन-चलन के बावजूद कैसे अपने स्थान पर स्थिर रहते हैं? वास्तव में क्या यह आश्चर्य नहीं है?

शारीरिक क्षमताओं का दुरुपयोग अनुचितः-

                यदि कोई लाखों रुपये के बदले आपके शरीर का कोई अंग, उपांग अथवा इन्द्रियां आदि लेना चाहे तो यथा संभव कोई व्यक्ति नहीं देना चाहता, क्योंकि पैसों से उन अंगों को पुनः प्राप्त नहीं किया जा सकता। यहां तक लाखों रुपयों के बदले यदि आपको 15 मिनट श्वास रोकने का आग्रह करे तो क्या आप ऐसा करना चाहेंगे? नहीं! क्दापि नहीं। मृत्यु के पश्चात् उस पैसे का क्या उपयोग? क्या हमने कभी सोचा कि ऐसी अमूल्य श्वास जो हमें प्रतिक्षण निःशुल्क मिल रही है, उसे हम बराबर तो ले रहे हैं? अथवा नहीं। इतने अमूल्य मानव जीवन का उपयोग हम कैसे कर रहे हैं? यदि कोई रुपयों के नोटों के बंडल को चाय बनाने के लिए ईंधन के लिए जलादे तो हम उसे मूर्ख अथवा पागल कहते हैं। तब इस अमूल्य मानव जीवन की क्षमता का दुरुपयोग अथवा अपव्यय करने वालों को क्या कहा जाए? बुद्धिमान व्यक्ति के लिये चिन्तन का प्रश्न है? कहीं हमारा आचरण अज्ञानवश अपने आपको गरीब, दरिद्र मान अरबपति बाप के भिखारी बेटे की तरह दर-दर भीख मांगने जैसा तो नहीं है? अतः ठीक उसी प्रकार जिस शरीर में इतने अमूल्य उपकरण हों, उस शरीर में अपने आपको स्वस्थ रखने की व्यवस्था न हो, क्या यह संभव है?

                जरा चिन्तन करें, कहीं मानव जीवन रूपी दुनियां की सर्वश्रेष्ठ गाड़ी, हमारी स्वच्छन्द मनोवृत्तियों रूपी अनाड़ी ड्राइवर के हाथों में तो नहीं हैं? पेट्रोल की गाड़ी को केरोसिन से कब तक ढंग से चलाया जा सकता है? ठीक उसी प्रकार जीवन में सद्गुणों रूपी ऊर्जा के रूप में उपलब्ध सनातन सिद्धान्तों पर आधारित प्राकृतिक जीवन शैली रूपी पेट्रोल के स्थान पर दुर्गुणों और अप्राकृतिक जीवन जी कर कैसे स्वस्थ रहा जा सकता है? स्वास्थ्य के प्रति सजग व्यक्तियों के लिए चिन्तन का प्रश्न है?

शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता होती हैः-

                प्रत्येक अच्छे स्वचलित यंत्र में खतरा उपस्थित होने पर स्वतः उसको ठीक करने की व्यवस्था प्रायः होती है। जैसे बिजली के उपकरणों के साथ ओवरलोड, शार्ट सर्किट, अर्थ फाल्ट आदि से सुरक्षा हेतु फ्युज, रिले आदि होते हैं। प्रत्येक वाहन में ब्रेक होता है ताकि आवश्यकता पड़ने पर वाहन की गति को नियंत्रित किया जा सके। ठीक उसी प्रकार मनुष्य के शरीर में जो दुनियां की सर्वश्रेष्ठ स्वचलित, स्वनियंत्रित मशीन होती है, उसमें रोगों से बचने की सुरक्षात्मक व्यवस्था न हो तथा रोग होने की अवस्था में पुनः स्वस्थ बनाने की व्यवस्था न हो, यह कैसे संभव हो सकता है? आवश्यकता है, हमें अपनी क्षमताओं को जानने, और समझने की तथा स्वविवेक, धैर्य, सहनशीलता एवं सद्बुद्धि द्वारा उसका सही उपयोग करने की। हम जानते हैं कि स्वचलित उपकरणों में जितनी ज्यादा अनावश्यक छेड़छाड़ की जाती है उतनी ही उसके खराब होने की संभावनाएँ बढ़ जाती है। ठीक उसी प्रकार साधारण रोगों में दुष्प्रभावों वाली दवाओं का सेवन कर हम स्वयं के लिए कहीं भविष्य में परेशानी का कारण तो नहीं बन रहे हैं?

सही निदान हेतु पूर्ण शरीर, मन और आत्मा को एक इकाई मानना आवश्यक-

                आज हमने उपचार हेतु शरीर को कई टुकड़ों में बांट दिया है। जैसे एक अंग का दूसरे किसी अंग से संबंध ही न हो। आंख का डाॅक्टर अलग, कान, नाक, गला, दांत, हृदय, फेफड़ा, गुर्दा, मस्तिष्क आदि सभी के विशेषज्ञ डाॅक्टर अलग-अलग होते हैं। उपचार करते समय जब तक पूर्ण शरीर, मन व आत्मा को एक इकाई के रूप में स्वीकार न किया जायेगा, तब तक स्थायी प्रभावशाली उपचार, एक कल्पना मात्र होगी। आंखों के डाॅक्टर एवं कान का डाॅक्टर भौतिक कान तक सीमित रह उस पर गहनतम शोध में व्यस्त है। चेतना के मूल स्रोत पर उसका नियंत्रण नहीं है। चींटी और कुत्ते की घ्राणेन्द्रिय (सूंघने की शक्ति) इतनी तीक्ष्ण क्यों होती है? गिद्ध दृष्टि जैसी प्रत्येक मानव की दृष्टि क्यों नहीं होती? कोयल जैसी मधुरता प्रत्येक व्यक्ति की वाणी में क्यों नहीं विकसित होती? जब आँख बैठे-बैठे पूर्व में देखे गये अप्रत्यक्ष दृश्यों का स्मरण होते ही बन्द आंखों से देख सकती है, तो क्या उन दृश्यों के चिंतन से पड़ने वाले अनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव आँखों को प्रभावित नहीं करेंगे? आँख, कान अथवा शरीर का सूक्ष्म से सूक्ष्म भाग इन्द्रियां मात्र भौतिक उपकरण ही नहीं हैं, परन्तु उसके साथ शरीर की जीवन्त चेतना, संवेदनाएँ और मन की स्मृति, कल्पनाएँ, अनुभूति आदि भी जुड़े हुए होते हैं, उसके ज्ञान के बिना आंख और कान जैसे शरीर के किसी भी भाग की सूक्ष्मतम जानकारी अधूरी ही होती है।

स्वास्थ्य हेतु स्वयं की सजगता सर्वाधिक आवश्यक-

                सजग व्यक्तियों को अपने रोग के कारणों की जितनी सूक्ष्मतम जानकारी होती है उतनी किसी भी चिकित्सक को नहीं हो सकती। इसी कारण बहुत से व्यक्ति उपचार करवाने के बावजूद पुनः स्वस्थ नहीं होते, जबकि चन्द रोगी बिना उपचार करवाए, प्राकृतिक नियमों का पालन कर स्वतः स्वस्थ हो जाते हैं। शरीर में रोग के अनुकूल दवा बनाने की क्षमता होती है और यदि उन क्षमताओं को बिना किसी बाह्य दवा के विकसित कर दिया जाए तो उपचार अधिक प्रभावशाली, स्थायी एवं भविष्य में पड़ने वाले दुष्प्रभावों से रहित होता है। अतः अच्छे स्वास्थ्य हेतु दवा और जीवनचर्या व गतिविधियों पर पूर्ण संयम, अनुशासन और नियंत्रण आवश्यक होता है।

शरीर में स्वयं को स्वस्थ रखने की क्षमता होती हैः-

                हम देखते हैं कि जब किसी व्यक्ति की हड्डी अपना स्थान छोड़ देती है तो डाॅक्टर उसको ठीक स्थान पर पुनः स्थित कर छोड़ देता है। जोड़ने का कार्य तो शरीर स्वयं ही करता है। शरीर अपने लिए आवश्यक रक्त का निर्माण स्वयं करता है। आज तक अति आधुनिक प्रयोगशालाओं में भी शरीर के लिए आवश्यक तत्वों का निर्माण संभव नहीं हो सका। मां के गर्भ में जब बच्चे का विकास होता है तो पूरे शरीर का निर्माण स्वयं शरीर के द्वारा ही होता है। ये सभी तथ्य हमें सोचने तथा चिंतन करने के लिए प्रेरित करते हैं कि शरीर में स्वयं को स्वस्थ रखने की क्षमता अवश्य होनी चाहिए। क्या मानव कभी चिंतन करता है कि मनुष्य के अलावा अन्य चेतनाशील प्राणी अपने आपको कैसे स्वस्थ रखते हैं? बहुत से रोगी बिना दवा लिए अपने आपको कैसे रोग मुक्त बना लेते हैं? इसका स्पष्ट मतलब है कि शरीर में स्वयं को स्वस्थ रखने की क्षमता होती है। चिकित्सा विज्ञान में इतने विकास के बावजूद रोग और रोगियों की संख्या में निरन्तर वृद्धि क्यों हो रही है? वास्तव में इस बात पर विश्वास करना होगा कि शरीर ही अपने आपको स्वस्थ रख सकता है। अच्छे से अच्छा अनुभवी चिकित्सक और दवा उसके बिना रोगी को ठीक नहीं रख सकते। अच्छी से अच्छी दवा और चिकित्सक तो शरीर को अपना कार्य स्वयं करने में सहयोग मात्र देते हैं। पीड़ा में राहत मिलना मात्र रोग का सम्पूर्ण उपचार नहीं होता। जिसका शरीर सहयोग करेगा, वही स्वस्थ होगा। स्वास्थ्य के प्रति स्वयं की सजगता व्यक्ति की पहली आवश्यकता है। यही सोच, स्वाललंबी चिकित्सा पद्धतियों द्वारा स्वास्थ्य प्राप्त करने का मूलाधार होता है।

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