स्वास्थ्य हेतु स्वयं की सजगता आवश्यक

स्वास्थ्य हेतु स्वयं की सजगता आवश्यक


                पहला सुख निरोगी काया जानते-मानते और आवश्यक होते हुए भी आज का मानव कितना स्वस्थ एवं सुखी है?  यह जनसाधारण से छिपा हुआ नहीं है। प्रत्येक मनुष्य जीवन पर्यन्त स्वस्थ रहना चाहता है, परन्तु चाहने मात्र से तो स्वास्थ्य प्राप्त नहीं हो जाता। मृत्यु निश्चित है। जन्म के साथ आयुष्य के रूप में श्वासों का जो खजाना लेकर हम जन्म लेते हैं, वह धीरे-धीरे क्षीण होता जाता है। जीवन के अंतिम क्षणों तक उस संचित, संगृहित प्राण ऊर्जा के प्रवाह को संतुलित, नियन्त्रित एवं सही संचालित करके तथा उसका सही उपयोग करके ही हम शांत, सुखी एवं स्वस्थ रहकर दीर्घ जीवन जी सकते हैं।

स्वास्थ्य हेतु शरीर की रोग प्रतिकारात्मक क्षमता आवश्यक?

                शरीर की प्रतिकारात्मक शक्ति क्यों और कैसे कम होती है?  इसको बढ़ाने अथवा कम करने वाले तत्त्व कौन से हैं? वास्तव में प्राकृतिक नियमों का जाने अनजाने वर्तमान अथवा भूतकाल में उल्लंघन करने अर्थात् असंयमित, अनियमित, अनियन्त्रित, अविवेकपूर्ण, स्वछन्द आचरण के द्वारा शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक क्षमताओं का दुरुपयोग अथवा असंतुलन रोग होता हैं। जिसके परिणाम स्वरूप शरीर, मन और आत्मा ताल से ताल मिलाकर आचरण नहीं करते। शरीर की सभी क्रियाएँ, अंग, उपांग एवं अवयव अपना-अपना कार्य स्वतन्त्रतापूर्वक नहीं कर पाते। फलतः शरीर के अवांछित, विजातीय, अनुपयोगी विकारों का बराबर विसर्जन नहीं होता। उनमें अवरोध उत्पन्न होने से पीड़ा, दर्द, कमजोरी, चौतन्य-शून्यता, तनाव, बेचौनी आदि की जो स्थिति शरीर में उत्पन्न होती है, वही रोग कहलाती है।

रोग का कारण आत्म विकारों सेः-

                मनुष्य का शरीर अनन्त गुणधर्मी होता हैं। अतः हमें अनेकान्त दृष्टिकोण से उसको समझना होगा तथा रोग उत्पन्न करने वाले कारणों से बचना होगा। शक्ति की सबसे गहरी और प्रथम परत आत्मा पर होती है। पूर्वार्जित कर्मो के अनुसार ही इस जन्म में हमें प्रिय-अप्रिय, संयोग-वियोग, अनुकूल-प्रतिकूल, सुख-दुःख, शारीरिक स्थिति, चेतना का विकास, उच्च या नीच गोत्र, पीड़ाकारी अथवा रोग मुक्त, जीवन, सम्यक् या मिथ्या दृष्टि, सम्यक् ज्ञान या मिथ्या ज्ञान, वीतरागता अथवा आसक्ति, आयुष्य, बल, वीर्य, शारीरिक सहनन मिलते हैं। हमारी आत्मा अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन एवं अनन्त सुख से परिपूर्ण होती हैं, परन्तु कर्मो से आच्छादित होने के कारण उसका सही रूप प्रकट नहीं हो पाता। ज्ञानावरणीय कर्म के अनुसार हमारी प्रज्ञा होती है। दर्शनावरणीय कर्म के प्रभाव से हमें सोचने, समझने, विश्वास करने व चिन्तन की सही अथवा गलत दृष्टि मिलती हैं। वेदनीय कर्मो के अनुसार हमें साता-असाता, रोग-निरोग, सुख-दुःख की प्राप्ति होती हैं। आयुष्य कर्मो के आधार पर हमें आयुष्य मिलती है। मोहनीय कर्म राग द्वेश एवं आसक्ति अथवा अनासक्ति के भाव पैदा करता है। गोत्र कर्म के अनुसार हमें उच्च अथवा नीच कुल, जाति, परिवार, आसपास का वातावरण मिलता है। नाम कर्म के अनुरूप हमें शरीर का आकार एवं शक्ति प्राप्त होती है। शरीर का रंग, रूप, बनावट तथा शरीर, मन और इन्द्रियों की क्षमताएँ मिलती हैं। अन्तराय कर्मो का उदय विकास व सुखद उपलब्धियों में अवरोध उत्पन्न करता हैं। जिसके परिणाम स्वरूप सभी अनुकूलताएँ होते हुए भी इच्छित लक्ष्य-प्राप्ति में कुछ न कुछ बाधा उपस्थित हो जाती हैं।

                कर्मो की इन विसंगतियों का प्रभाव हम अपने आसपास के वातावरण में स्पष्ट अनुभव करते हैं। आत्मा पर आये इन कर्मो के आवरणों को मनुष्य जीवन में सम्यक् पुरुषार्थ द्वारा दूर किया जा सकता हैं। सारे कर्मो का क्षय होने से मनुष्य नर से नारायण, आत्मा से परमात्मा, भक्त से भगवान के रूप में सर्वज्ञ, सर्वदर्शी एवं अनन्त सुखी बन जाता है, अपने स्वभाव में स्थित हो जाता है। यही वास्तव में सम्पूर्ण स्वस्थता की अवस्था होती है। यही मानव जीवन का परम लक्ष्य होता है। जो आत्मोत्थान में जितना-जितना विकसित होता है, उतना-उतना ही आत्मबली बनता जाता है। रोगों की जड़ समाप्त होने लगती हैं, उपचार की आवश्यकताएं कम होती जाती हैं। आत्मा के विकार आत्मज्ञानी के मार्ग-निर्देशन में व्यक्ति के सम्यक् पुरुषार्थ एवं सम्यक् आचरण से ही दूर किये जा सकते हैं। अतः हमें स्वस्थ रहने के लिये आत्मा में विकार बढ़ाने वाली हिंसा, क्रूरता, अशांति, तनाव आदि अमानवीय पापकारी प्रवृत्तियों से बचना चाहियें।

रोग में मन की भूमिकाः-

                शक्ति एवं रोग की दूसरी परत मन से संबंधित होती है। मन का जितना विकसित स्वरूप मानव जीवन में प्राप्त होता है उतना अन्य किसी प्राणी में नहीं मिलता। मन से ही मनन, चिन्तन, कृति, विकृति, संकल्प, इच्छाओं, ऐशणाओं, भावनाओं का नियन्त्रण होता है। मन बड़ा चंचल होता है। उसकी स्वछन्द एवं अनियन्त्रित गतिविधियां अधिकांश रोगों की उत्पति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मन को संयमित, नियन्त्रित, अनुशासित रखने से अनेक रोगों से सहज ही बच जाते हैं। आज हम जितना ख्याल शारीरिक स्वच्छता, शुद्धता का रखते हैं, बाह्य पर्यावरण एवं प्रदूषण की चिन्ता करते हैं, क्या उतनी चिन्ता मन में उठने वाले क्रोध, मान, माया, लोभ आदि कषाय तथा घृणा, हिंसा, क्रूरता, तिरस्कार, वासना, ईश्र्या, द्वेश, निन्दा आदि बुरे विचारों के प्रदूषण की करते हैं? इन आवेगों से ही रोग बढ़ते हैं। मन का नियन्त्रण हमारी स्वयं की सजगता पर निर्भर करता है। इसी कारण एक जैसे रोग की स्थिति में एक व्यक्ति बहुत परेशान एवं बेचौन रहता है। हाय-हाय करता है जबकि दूसरा तनिक भी विचलित नहीं होता। स्वस्थ चिन्तन, मनन, स्वाध्याय, सकारात्मक सोच, सत्संगति, ध्यान एवं कार्योत्सर्ग द्वारा मन को अशुभ से शुभ, अनुपयोगी से उपयोगी प्रवृत्तियों में लगाया जा सकता है। जो स्वस्थ जीवन के लिये अति आवश्यक होता है।

शारीरिक लक्षणों पर आधारित रोग का निदान अपूर्णः-

                आत्मा और मन के पश्चात् रोग व शक्ति की तीसरी परत होती है शरीर की आन्तरिक क्रियाओं पर और अन्त में उनके लक्षण बाह्य रूप से प्रकट होते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि जितने रोग अथवा उनके कारण होते हैं उतने हमारे ध्यान में नहीं आते। जितने ध्यान में आते हैं, उतने हम अभिव्यक्त नहीं कर सकते। जितने रोगों को अभिव्यक्त कर पाते हैं, वे सारे के सारे चिकित्सक अथवा अति आधुनिक समझी जाने वाली मशीनों की पकड़ में नहीं आते। जितने लक्षण स्पष्ट रूप से उनकी समझ में आते हैं, उन सभी का वे उपचार नहीं कर पाते। परिणाम स्वरूप जो लक्षण स्पष्ट रूप से प्रकट होते हैं, उनके अनुसार आज रोगों का नामाःकरण किया जा रहा है तथा अधिकांश प्रचलित चिकित्सा पद्धतियों का ध्येय उन लक्षणों को दूर कर रोगों से राहत पहुंचाने मात्र का होता है। विभिन्न चिकित्सा पद्धतियां और उनमें कार्यरत चिकित्सक आज असाध्य एवं सक्रामक रोगों के उपचार के जो बड़े-बड़े दावे और विज्ञापन करते हैं, वे कितने भ्रामक, अस्थायी होते हैं, जिस पर पूर्वाग्रह छोड़कर सम्यक् चिंतन करना आवश्यक हैं। जब निदान ही अधूरा हो, अपूर्ण हो तब प्रभावशाली उपचार के दावे छलावा नहीं तो क्या हैं? अतः उपचार करते समय जो चिकित्सा पद्धतियां शारीरिक व्याधियों को मिटाने के साथ-साथ मन व आत्मा के विकारों को दूर करती हैं, उन्हीं चिकित्सा पद्धतियों द्वारा स्थायी एवं प्रभावशाली उपचार संभव हो सकता हैं, इस तथ्य में हमें तनिक भी संदेह नहीं होना चाहिये। सत्य सनातन होता हैं। करोड़ों व्यक्तियों के कहने से दो और दो पांच नहीं हो जाते हैं। दो और दो तो चार ही होते हैं। अतः जिन्हें स्थायी रूप से रोग मुक्त बनना हो,  उन्हें शरीर, मन और आत्मा को रोग ग्रस्त एवं विकारी बनाने वाले सभी कारणों से यथा संभव बचना चाहिये एवं दुष्प्रभावों तथा शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कम करने वाले उपचार से दूर रहना चाहिये।

उपचार हेतु रोगी का दृष्टिकोणः-

                आज चिकित्सा के बारे में असमंजस की स्थिति है। कोई रोग का कारण रासायनिक असंतुलन व वायरस अथवा विषैले कीटाणुओं को मानते हैं, तो कुछ वात, कफ एवं पित्त के असंतुलन को ही रोग का आधार बतलाते हैं। अधिकांश चिकित्सा पद्धतियों में चिकित्सक प्रायः एक पक्षीय चिन्तन के पूर्वाग्रहों से ग्रसित होते हैं। उनके चिन्तन में समग्रता व व्यापक दृष्टिकोण का अभाव होता है। जनसाधारण से ऐसी अपेक्षा भी नहीं की जा सकती कि वे शरीर, स्वास्थ्य एवं चिकित्सा पद्धतियों के बारे में विस्तृत जानकारी रखें। अधिकांश रोगियों को न तो रोग के बारे में सही जानकारी होती है और न वे अप्रत्यक्ष रोगों को रोग ही मानते हैं। जब तक रोग के स्पष्ट लक्षण प्रकट न हों, रोग सहनशक्ति से बाहर नहीं आ जाता, रोग की तरफ उनका ध्यान ही नहीं जाता। रोगी का एक मात्र उद्देश्य येन-केन प्रकारेण उत्पन्न लक्षणों को हटा अथवा दबाकर शीघ्रातिशीघ्र राहत पाना होता है। जैसे ही दर्द से आराम मिलता है, वह अपने आपको स्वस्थ समझने लग जाता है। रोगी रोग का कारण स्वयं को नहीं मानता और न अधिकांश चिकित्सक उपचार में रोगी की सजगता और पूर्ण भागीदारी की आवश्यकता भी नहीं समझते हैं। विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों की प्रभावशालीता के भ्रामक विज्ञापन एवं डाॅक्टरों के पास रोगियों की पड़ने वाली भीड़ के आधार पर ही रोगी उपचार हेतु चिकित्सक का चयन कर उसके पास अपना आत्म समर्पण कर देता है। डाॅक्टर पर उसका इतना अधिक अन्ध विश्वास हो जाता है कि रोग का सही कारण अथवा निदान की सत्यता मालूम किये बिना उपचार प्रारम्भ करवा शीघ्रातिशीघ्र राहत पाना चाहता है। रोगी चिकित्सक के द्वारा बताये पथ्य व परहेज और मार्गदर्शन का पूर्ण निष्ठा के साथ पालन भी करता है। परन्तु शरीर, मन और आत्मा पर उपचार से पड़ने वाले सूक्ष्मतम परिवर्तनों की तरफ पूर्ण रूप से उपेक्षा रखने के कारण, उपचार के बावजूद कभी-कभी शारीरिक रूप से भी स्वस्थ नहीं हो पाता और कभी तो दवा उसके जीवन का आवश्यक अंग भी बन जाती है।

उपचार हेतु रोगी की सजगता आवश्यकः-

                वर्तमान में प्रायः उपचार हेतु रोगी एवं उसके हितेशियों का सर्वप्रथम प्रयास यथा शक्ति, सर्वमान्य प्रभावशाली समझी जाने वाली, तुरन्त राहत दिलाने वाली पद्धति से चिकित्सा करवाने का होता हैं। भले ही उसके दुष्प्रभाव पड़ते हों और अच्छी चिकित्सा पद्धति के मापदण्डों पर जो खरा नहीं उतरती हो? परन्तु कभी-कभी उपचार के बावजूद जब रोग से मुक्ति नहीं मिलती, तब एक के बाद दूसरी चिकित्सा पद्धतियों का आश्रय लेते रोगी को संकोच नहीं होता। परन्तु फिर भी जब रोग का उपचार न होने से वह निराश होकर ऐसी चिकित्सा पद्धति का भी आश्रय लेता है जिस पर उसका पूर्ण विश्वास नहीं, जिसका विज्ञापन नहीं। भले ही वह चिकित्सा के मापदण्डों के अनुरूप ही क्यों न हो? प्रायः ऐसे रोगी चिकित्सक के सामने सर्वप्रथम अपनी लम्बी अन्र्तव्यथा सुनाते-सुनाते प्रश्न करता है-

  1. क्या उस वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति में उसके रोग का इलाज संभव है?
  2. आपने ऐसे कितने रोगियों का उपचार कर स्वस्थ किया है?
  3. मैं कितने दिनों में रोग से मुक्त हो जाऊँगा?

                रोगी की ऐसी सजगता प्रशंसनीय है। यदि ऐसे ही स्पष्टीकरण ईमानदारी पूर्वक रोगी अपनी विश्वसनीय चिकित्सा वाले चिकित्सक से पूछने का साहस प्रारम्भ में ही जुटा लेता तथा डाॅक्टर सन्तोषप्रद उत्तर से उसको संतुष्ट कर दें तो रोगियों पर जाने-अनजाने अनावश्यक प्रयोग नहीं हो सकते।

रोग के विभिन्न प्रभाव एवं लक्षणः-

                रोग स्वयं की गलतियों से उत्पन्न होता है, अतः उपचार में स्वयं की सजगता और सम्यक् पुरुषार्थ आवश्यक है। जब तक रोगी रोग के कारणों से नहीं बचेगा, उसकी गम्भीरता को नहीं स्वीकारेगा तब तक पूर्ण स्वस्थ कैसे हो सकेगा? रोग प्रकट होने से पूर्व अनेकों बार अलग-अलग ढंग से चेतावनी देता है। परन्तु रोगी उस तरफ ध्यान ही नहीं देता। इसी कारण उपचार एवं परहेज के बावजूद चिकित्सा लम्बी, अस्थायी, दुष्प्रभावों वाली हो तो भी आश्चर्य नहीं? अतः रोग होने की स्थिति में रोगी को स्वयं से पूछना चाहिये कि उसको रोग क्यों हुआ? रोग कैसे हुआ? कब ध्यान में आया? रोग से उसकी विभिन्न, शारीरिक प्रक्रियाओं तथा स्वभाव में क्या परिवर्तन हो रहे हैं? इस बात की जितनी सूक्ष्म जानकारी रोगी को हो सकती है, उतनी अन्य को नहीं। उसके मल के रंग, बनावट व गंध में तो परिवर्तन नहीं हुआ? कब्जी, दस्त या गैस की शिकायत तो नहीं हो रही है? पेशाब की मात्रा एवं रंग और स्वाद में बदलाव तो नहीं हुआ? भूख में परिवर्तन,  प्यास अधिक या कम लगना, अनिद्रा या निद्रा और आलस्य ज्यादा आना, पांच इन्द्रियों के विषयों रंग, स्वाद, स्पर्श, श्रवण, वाणी एवं दृष्टि की क्षमताओं में तो कमी नहीं आयी? रुचि-अरुचि में विशेष परिवर्तन तो नहीं हुआ? श्वसन में कोई अवरोध तो नहीं हो रहा है? स्वभाव में चिड़चिड़ापन, निराशा, क्रोध, भय, अधीरता, घृणा, क्रूरता, तनाव, अशान्ति तो नहीं बढ़ रही है? आलस्य एवं थकान की स्थिति तो नहीं बन रही है। दर्द कब, कहां और कितना होता है? क्या चौबीसों घंटे दर्द एकसा रहता है? सर्वाधिक और निम्नतम दर्द कब होता है? मन में संकल्प विकल्प कैसे आ रहे हैं, इत्यादि सारे रोग के लक्षण हैं। उपचार के तुरन्त पड़ने वाले प्रभाव की सूक्ष्मतम जानकारी रोगी की सजगता से ही प्राप्त हो सकती है तथा इन सभी लक्षणों में जितना-जितना सुधार और संतुलन होगा उतना ही उपचार स्थायी और प्रभावशाली होता है। मात्र रोग के बाह्य लक्षणों के दूर होने अथवा पीड़ा और कमजोरी से राहत पाकर अपने आपकों स्वस्थ मानने वालों को पूर्ण उपचार न होने से नये-नये रोगों के लक्षण प्रकट होने की संभावना बनी रहती है।

स्वास्थ्य के प्रति सरकारी उपेक्षाः-

                आज हमारे स्वास्थ्य पर चारों तरफ से आक्रमण हो रहा है। स्वास्थ्य मंत्रालय की नीतियों में स्वास्थ्य गौण हैं। भ्रामक विज्ञापनों तथा स्वास्थ्य के लिये हानिकारक प्रदूषित, पर्यावरण, दुव्र्यसनों एवं दुष्प्रवृत्तियों पर प्रभावशाली कानूनी प्रतिबंध नहीं हैं, अपितु वे सरकारी संरक्षण में पनप रही है। आज राष्ट्रीयता, नैतिकता, स्वास्थ्य के प्रति सजगता थोथे नारों और अन्धाःनुकरण तक सीमित हो रही है। परिणाम स्वरूप जो मांसाहार एवं Fast Food नहीं खिलाना चाहिये व खिलाया जा रहा है। जो शराब एवं ठण्डे पेय नहीं पिलाना चाहिये उसे सरकार पैसे के लोभ में पिला रही है। जो काम-वासना, क्रूरता, हिंसा आदि के दृश्यों को सार्वजनिक रूप से टी.वी. पर नहीं दिखाया जाना चाहिये, मनोरंजन के नाम पर दिखाया जा रहा हैं। जो नहीं पढ़ाना चाहिये वह भी कभी-कभी पढ़ाया जा रहा है एवं जो हमारी संस्कृति, समाज एवं राष्ट्र के लिये Sex Education (यौन-शिक्षा) जैसी घातक, गतिविधियाँ हैं, वे निसंकोच करवाई जा रही है। आज रक्षक ही भक्षक हो रहे हैं। खाने में मिलावट, आम बात हो गयी हैं। सारा वातावरण पाश्विक वृत्तियों से दूषित हो रहा हैं। सरकारी तंत्र को सच्चाई जानने, समझने व उसकी क्रियान्विति में कोई रूचि नहीं है। सारे सोच का आधार है भीड़ एवं संख्या बल। क्योंकि जनतंत्र में उसी के आधार पर नेताओं का चुनाव और नीतियां निर्धारित होती हैं। फलतः उनके माध्यम से राष्ट्र विरोधी, जन साधारण के लिये अनुपयोगी, स्वास्थ्य को बिगाड़ने वाली कोई भी गतिविधि व्यक्तिगत स्वार्थवश आराम से चलायी जा सकती हैं। जन्म से पूर्व डाॅक्टरों की दवा लेने वाले, विभिन्न जांच प्रक्रियाओं से रोग होने पर बचपन से ही गुजरने वाले, भविष्य में संक्रामक एवं असाध्य रोगों से क्यों पीड़ित हो जाते हैं?उनकी रोग प्रतिकारात्मक क्षमता क्यों क्षीण हो जाती है? इस संबंध में आधुनिक चिकित्सकों का स्पष्टीकरण क्या है एवं उसमें कितनी यथार्तता है?

                आज जापान में दो वर्ष से कम आयु वाले बच्चों पर इंजेक्शन लगाने पर क्यों प्रतिबंध है? विदेशों में जबरदस्ती दवा पिलाने और इंजेक्शन लगाने के विरूद्ध स्वयं सेवी संस्थाएं राष्ट्रीय आन्दोलन चला रही है। दवाओं के दुष्प्रभावों की क्षतिपूर्ति देने के कारण दवा कारखाने बंद हो रहे हैं। सरकारी अनदेखी के कारण हमारे यहां वे ही राष्ट्रीय कार्यक्रमों के रूप में सरकारी संरक्षण में नागरिकों की दुष्प्रभावों के प्रति असजगता के कारण तीव्र गति से चल रहे हैं। आज 80 प्रतिशत से अधिक बच्चों को पोलियों जन्म से नहीं होता परन्तु बुखार में आधुनिक डाॅक्टरों की उपेक्षावृत्ती स्वरूप दी जाने वाली गलत दवा होती है। पोलियो पल्स का व्यापक अभियान हो या स्वास्थ्य हेतु आयोडीन युक्त नमक की अनिवार्यता एवं प्रभावशालीता का टी.वी. पर भ्रामक प्रचार, उचित नहीं। क्या कभी किसी ने उनके मूल अवयवों की प्राप्ति के स्रोतों को जानने का प्रयास किया? उनसे पड़ने वाले दुष्प्रभावों का अध्ययन किया? जहाँ साधन, साध्य और सामग्री अशुद्ध हो, अपवित्र हो, वहां दुष्प्रभाव न हो, यह कैसे संभव है? बचपन से ही रोग प्रतिकारात्मक क्षमता नष्ट करने का षडयंत्र चलाया जा रहा है। सरकार को स्पष्ट करना चाहिये कि पोलियों पल्स और आयोडिन नमक में क्या जानवरों के अवयवों का समावेश तो नहीं होता है? अहिंसक शाकाहारी प्रजा को जबरदस्ती मांसाहारी बनाने का प्रयास निंदनीय है। भ्रामक विज्ञापनों को सरकारी प्रचार-प्रसार अथवा संरक्षण मिल जाने मात्र से असत्य सत्य नहीं बन जाता। हमारा यह दुर्भाग्य है कि झूठे विज्ञापनों के प्रसारण पर इस देश में कोई कानूनी प्रतिबंध नहीं है। शाकाहारी गायों को मांसाहार खिलाने से चन्द वर्ष पूर्व इंगलैण्ड में Mat Cow रोग फैला, लाखों मुर्गियों का कत्ले आम करने का परिणाम चिकनगुनियां के रूप में सामने आया। आज एड्स बढ़ाने में कबूतरों का योगदान बताकर स्वार्थी  लोगों द्वारा शांत प्रिय कबूतरों को समाप्त करने की योजनाएं बनायी जा रही है। दवाओं के दुष्प्रभावों से पीड़ित लोगों की राहत के लिये कानूनी प्रावधान नहीं है। अन्य देशों से प्रतिबंधित दवाओं को बेचने पर कोई कानूनी रोक एवं दंड की व्यवस्था नहीं है। आयोडिन नमक का प्रचार हो अथवा पोलियों निवारण कार्यक्रम स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा चलाये जा रहे रोग नियन्त्रक कार्यक्रमों से पड़ने वाले दुष्प्रभावों की निष्पक्ष न्यायिक जांच एवं क्षतिपूर्ति आवश्यक है।

सच्चा वैज्ञानिक कौन?

                आज के वैज्ञानिकों की ऐसी मान्यता है कि अधिकांश मनुष्य अपने ज्ञान का शतांश भाग भी विकसित नहीं कर पाते। हम अपनी क्षमताओं से कितने अपरिचित हैं जो चिंतन का प्रश्न है? शरीर मात्र ढ़ाचा ही नहीं, उसके साथ मन और आत्मा भी जुड़े हैं। मन और आत्मा का संचालन, नियन्त्रण चेतना से होता है। हमारी संवेदनाएँ, भाव, विचार, सोच, कर्म, नियति, स्वभाव, चिंतन, काल तथा जीवनचर्या उसे प्रभावित करते हैं। आत्मिक बल को भौतिक यंत्रों से नहीं मांपा जा सकता। इस कारण उस अनुभूत सत्य को नकारना, गलत, असत्य अवैज्ञानिक तत्वहीन मानना कौनसी बुद्धिमता है? आत्मा को प्रभावित करने वाले तथ्यों की उपेक्षा करने वाला अपूर्ण ज्ञान अपने आपको कैसे पूर्ण प्रभावशाली स्वास्थ्य विज्ञान होने का दावा कर सकता है?

                अनुभूतियां स्वयं अपने आप में प्रमाण होती है जिन्हें भौतिक प्रयोग एवं परीक्षणों से नहीं परखा जा सकता। पानी पीने से प्यास बुझती है। अतः जन साधारण के लिये यह जानना आवश्यक नहीं कि प्यास क्यों और कैसे बुझती है? अतः जब तक चिकित्सक का दृष्टिकोण शरीर को स्वस्थ करने के साथ मन और आत्मा को स्वस्थ बनाने का नहीं होगा, उपचार अधूरा होगा। ऐसे उपचार और दृष्टिकोण को वैज्ञानिक मानना स्वयं के साथ विश्वासघात होगा जो कदापि उचित नहीं।

                जो स्वयं अपूर्ण है व पूर्णता की बात करने का दावा कैसे कर सकता है? उसमें तो विरोधाभास ही होगा। जहाँ विरोधाभास होगा वहाँ हानि की संभावना रहेगी। हमें हमारा विवेक जाग्रत रखना है। हानि-लाभ, उपयोगी-अनुपयोगी, करणीय-अकरणीय की प्राथमिकताओं के आधार पर चिंतन कर आचरण करना होगा। स्वास्थ्य के प्रति यही सच्चा वैज्ञानिक दृष्टिकोण होता है।

उपचार हेतु रोगी की सजगता एवं सम्यक् पुरुषार्थ आवश्यकः-

                ऐसी परिस्थितियों में हमें अपने स्वास्थ्य का खयाल स्वयं रखना होगा। अपनी क्षमताओं को समझ उनका सदुपयोग कर डाॅक्टरों की पराधीनता को छोड़ना होगा। क्या हमारा श्वास कोई दूसरा ले सकता है? खाना अन्य कोई पचा सकता है? प्यास दूसरों के पानी पीने से शांत हो सकती है? हमारी निद्रा अन्य कोई ले सकता है? शरीर से निकलने वाले मल, मूत्र आदि अवांछित तत्वों का विसर्जन दूसरा कर सकता है? हमारा रक्त, मांसपेशियां, कोशिकाएँ, हड्डियाँ जैसी प्रतिक्षण बनने वाली वस्तुएँ भी शरीर स्वयं बनाता है। शरीर जब हृदय, फेंफड़े, गुर्दे, लीवर, पाँचों इन्द्रियों का निर्माण स्वयं कर सकता है तब क्या उसे स्वस्थ नहीं रख सकता? मानव जीवन अमूल्य है। अतः अज्ञानवश उसके साथ छेड़छाड़ न हों। वर्तमान की उपेक्षा भविष्य की समस्या न बने। इस हेतु हमें अपने प्रति सजग, विवेकशील और ईमानदार बनना होगा। जो स्वयं लापरवाह, बेखबर है उसकी चिन्ता दूसरा कैसे कर सकता है?

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