क्या हम अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग हैं?

क्या हम अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग हैं?


 

क्या शरीर में रोग अकेला सकता है?

                यदि हमारे शरीर के किसी भाग में कोई तीक्ष्ण वस्तु जैसे कांच, काँटा, सुई, पिन आदि चुभे तो सारे शरीर में छटपटाहट हो जाती है। आँखों में पानी आने लगता है, मुँह से चीख निकलने लगती है। शरीर की सारी इन्द्रियाँ एवं मन अपना कार्य रोक कर क्षण भर के लिये उस स्थान पर केन्द्रित हो जाते हैं। उस समय तो मधुर संगीत अच्छा लगता है और ही मन भावन सुन्दर दृश्य। हँसी मजाक अच्छी लगती है और अपने प्रियजनों से बातचीत अथवा खानापीना। हमारा सारा प्रयास सबसे पहले उस चुभन को दूर करने में लग जाता है। जैसे ही चुभन दूर होती है, हम राहत का अनुभव करते हैं। जिस शरीर में इतना आपसी, सहयोग, समन्वय, समर्पण एवं अनुशासन हो अर्थात् एक अंग के दुःख में शरीर के सभी अंग दुःखी हों तो क्या ऐसे शरीर में छोटेमोटे रोग विकसित हो सकते हैं। वास्तव में अप्राकृतिक जीवन जीने के कारण जब शरीर की अवरोधक क्षमता से अधिक विकार शरीर में पैदा होने लगते हैं, तब ही हमें रोग की अनुभूति होती है। अनेक रोगों की उत्पति के पश्चात् ही कोई रोग हमें परेशान करने की स्थिति में आता है। अतः हमें शरीर को स्वस्थ रखने के लिये उसकी अवरोधक क्षमता का नियन्त्रण करने वाले अवयवों की तरफ सर्वोच्य प्राथमिकता देनी चाहिये।

क्या रोगी डाॅक्टरों की प्रयोगशाला है?

                आज हमने उपचार हेतु शरीर को टुकड़ोंटुकड़ों में बाँट दिया है, जैसेएक अंग का दूसरे अंग से कोई सम्बन्ध ही हो। आँखों का डाॅक्टर भौतिक आँखों तक एवं कान का डाॅक्टर भौतिक कान तक ही सीमित रहकर शोध में व्यस्त है। जोजो दृश्य आँखों से हमने देखे हैं, स्मरण होते ही वे क्यों सामने दिखने लगते है? दूसरों की आँखें उन दृश्यों को क्यों नहीं देख सकती? क्या उन अप्रत्यक्ष दृश्यों के पड़ने वाले अनुकूल और प्रतिकूल प्रभाव आँख को प्रभावित नहीं करेंगे? रोगों के नामों की लम्बीलम्बी व्याख्या करने वाले डाॅक्टर अपना पूर्वाग्रह छोड़कर उपचार करते समय जब तक सारे शरीर को एक इकाई नहीं मानेंगे तथा समग्र दृष्टि से निदान एवं उपचार नहीं करेंगे, तब तक रोगी को पूर्ण रूप से स्वस्थ कैसे बना सकेंगे? एक रोग के दबने पर शरीर में दूसरा रोग प्रकट होगा।

                वस्तुतः व्यक्ति के एक रोग के साथ उसके सहयोगी अनेक रोग जुडे़ हुए हैं। जब कोई रोगी डाॅक्टर के पास पहुँचता है तो क्या उसके द्वारा कहा गया एवं चिकित्सक के द्वारा निदान किया गया एक ही रोग उसके शरीर में होता है, अन्य रोग नहीं? शरीर में अनेक रोग होते हुए भी किसी एक रोग की प्रमुखता हो सकती है। कोई रोगी एक साथ समस्त रोगों को प्रकट नहीं कर सकता। मानसिक असन्तुलन, पूर्वजन्म के उपार्जित अशुभ वेदनीय कर्मों की स्थिति, तनाव, संवेदना, आवेग, प्रेम, घृणा, द्वेष आदि सभी हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। क्या रोग के ये कारण भौतिक मशीनों अथवा रसायनिक परीक्षणों की पकड़ में पूर्ण रूप से सकते हैं? यह तोसमस्याकुछ और समाधान किसी अन्य का करने के समान है। आज दी जाने वाली अधिकांश दवाइयाँ हमारी संवेदनाओं को निष्क्रिय कर पीड़ा भुलाने का कार्य करती है। हम यह भूल जाते है जो दवा रोगी को संवेदना मिटाती है, वह हमारी कितनी ही सक्रिय कोशिकाओं को निष्क्रिय बना देती है। ये तो वैसा ही हुआ जैसे उपद्रवों को शान्त करने के लिये सरकार कफ्र्यू लगाती है, एवं उस समय पुलिस भले बुरे का ख्याल किये बिना स्वतन्त्र विचरण नहीं करने देती तथा जो भी सामने आता है उसको पकड़ लेती है। सारी गतिविधियाँ एवं आवागमन पर रोक लगा देती है फलतः शहर में शान्ति हो जाती है। दवाइयाँ शरीर में ऐसी ही शान्ति तो पैदा नहीं करती? उपद्रव का कारण मिटाया जावे तो वह शान्ति कितने दिन तक रहेगी? थोड़े समय पश्चात् दूसरे रूप में भड़केंगे, अशान्ति होगी। कफ्र्यू रख कर सारी शासन व्यवस्था कब तक चलायी जा सकेगी, ठीक उसी प्रकार हमेशा दवाइयाँ खाकर हम अपने आपको कैसे स्वस्थ रख सकेंगे? अतः जब तक रोग के मूल कारणों की उपेक्षा होगी तब तक रोग का सही निदान नहीं हो सकता। जब निदान ही संदिग्ध हो तो उपचार कैसे पूर्ण होगा?

                आज का विज्ञान प्रयोगों पर आधारित है तथा वह उसे सत्य मानता है। जिसे दिखाया जा सके, मापा जा सके एवं बारबार दुहराया जा सके, वही सत्य है, उससे परे वह कुछ भी स्वीकार करने को तैयार नहीं। मानसिक एवं आत्मिक शक्तियों की अनुभूतियों का ज्ञान उसकी सामथ्र्य से बाहर है। बाह्य लक्षणों पर आधारित अधूरे निदान के फलस्वरूप रोगी की असजगता के कारण प्रायः चिकित्सा के नाम पर जो प्रयोग किये जा रहे हैं, उनका उद्देश्य रोग को मिटाना नहीं दबाना है। भले ही भविष्य में उसके कितने ही दुष्प्रभाव क्यों हों। जिस दिन रोगी थोड़ी सी सहनशक्ति रखकर धैर्य के साथ अपने चिकित्सक से इतना पूछने का साहस जुटा लेगा किउसको क्या रोग है? उसके अलावा तो अन्य रोग नहीं? उपचार हेतु जो दवा अथवा इंजेक्शन दिये जा रहे हैं, उनका शरीर पर दुष्प्रभाव तो नहीं पडे़गा? जो रोगी इतने सजग होते हैं, वे चाहे जो उपचार की पद्धति अपनावें, शीघ्र रोग मुक्त हो जावेंगे। बाकी ने तो अपने आपको डाॅक्टरों की प्रयोगशाला बना रखा है, ऐसा समझा जावे तो भी आश्चर्य नहीं। आज गलत उपचार, अधूरे निदान से जितने रोगी बढ़ रहे हैं, उतने रोग के समय दवा लेने के उपरान्त भी रोगी नहीं बढ़ते।

क्या उपचार से पूर्व सही निदान आवश्यक हैं?

                आज चेतनाशील प्राणियों में मानव का प्रतिशत 0.1 से भी कम है। 99.9 प्रतिशत जीव अपना सहज जीवन जीते हैं। वास्तव में अनन्त पुण्यों से प्राप्त इस मानव तन में स्वतः स्वस्थ रहने की क्षमता है, परन्तु हमारी निरन्तर अप्राकृतिक जीवनशैली के कारण हमारी शारीरिक तथा मानसिक स्थिति असन्तुलित होने लगती है, जिससे शरीर में विजातीय तत्त्व जमा होने लगते हैं एवं वे शारीरिक प्रक्रियाओं में अवरोध उत्पन्न करने लगते हैं अर्थात् रोगों की उत्पति होने लगती है। शरीर की यह विशेषता है कि वह अपने उपयोगी तत्त्व को रख लेता है और अनुपयोगी तत्त्वों को शरीर के बाहर भेज देता है। परन्तु असन्तुलन की स्थिति में अनुपयोगी तत्त्वों का पूर्ण विसर्जन नहीं हो पाता एवं शरीर में वे एकत्रित होने लगते हैं, जो रोग का मूल कारण है। प्रारम्भ में हमारा ध्यान रोग की तरफ जाता ही नहीं, क्योंकि शरीर में स्वयं उनसे लड़ने की क्षमता होती है, परन्तु हमारी निरन्तर उपेक्षा से धीरेधीरे शरीर में प्रत्यक्षअप्रत्यक्ष अनेक रोग फैलने लगते हैं, तब कहीं उन रोगों के लक्षण हमें अनुभव होने लगते हैं। अतः वास्तव में जिन रोगों का निदान किया जाता है, वे अकेले रोग नहीं होते, बल्कि रोगों के नेता होते हैं। जिनको सैकड़ों अप्रत्यक्ष रोगों का सहयोग प्राप्त होता है, परन्तु आश्चर्य यह है कि प्रायः उन अप्रत्यक्ष रोगों को हम रोग मानते ही नहीं, तथा हमारा उद्देश्य नामधारी रोग को मिटाने मात्र का होता है। जनतन्त्र  में नेता को हटाने का एक उपाय है। जिस सहयोग एवं समर्थन से नेता बनता है, उसकी ठीक विपरीत प्रक्रिया द्वारा (असहयोग एवं विरोध से) उसको हटाया जा सकता है। बिना समर्थकों को अलग किये जैसे नेता को हटाना कठिन होता है, ठीक उसी प्रकार अप्रत्यक्ष सहयोगी रोगों की उपेक्षा कर पूर्ण रूप से रोगमुक्त नहीं बना जा सकता। एक रोग की समाप्ति दूसरे को सामने लाएगी एवं रोगी पराधीन बनकर सदैव डाॅक्टरों अथवा दवाइयों पर आश्रित रहने लगेगा। जिन्दगी का बाकी समय पीड़ादायक, तनावग्रस्त, परतन्त्र एवं दुःखी हो जावेगा।

क्या दो रोगी एक जैसे हो सकते हैं?

                क्या दुनियां में कोई दो प्राणी शतप्रतिशत एक जैसे हो सकते है? नहीं। तब दो रोगी एक जैसे कैसे हो सकते हैं? दो रोगियों का उपचार एक जैसा कैसे होगा? क्या बाजार में उपलब्ध दवाइयाँ अथवा इंजेक्शन रोगी विशेष के अनुरूप बनाये जाते हैं? दवा कैसे बनती है? उसमें कौनकौन से तत्त्व कितनीकितनी मात्रा में होते हैं, इस बात की जानकारी क्या सभी डाॅक्टरों को होती है? दवा की आवश्यकता का निर्धारण एवं मात्रा का मापदण्ड वे कैसे निश्चित करते हैं? क्या उसके विपरीत कम या अधिक मात्रा शरीर में असन्तुलन और दुष्प्रभाव तो नहीं बढ़ाती? अपने आपको सर्वश्रेष्ठ, बुद्धिमान् मानने वाले मानव को गम्भीरता पूर्वक चिन्तन करना होगा कि उन पर उपचार के नाम पर अनावश्यक प्रयोग तो नहीं हो रहे हैं? क्या चिकित्सक शीघ्र राहत पहुँचाने के लिये, रोग मिटाने हेतु रोग को दबाने का प्रयास तो नहीं कर रहे हैं? हमारी अधिकांश मान्यताओं का आधार प्रायः स्वचिन्तन तथा स्वविवेक होकर डाॅक्टरों की लम्बीलम्बी डिग्रियाँ, विज्ञापन एवं उनके पास होने वाली भीड़ का अन्धानुकरण है। रोगी में धैर्य एवं सहनशीलता का अभाव होता जा रहा है। शारीरिक श्रम के प्रति अज्ञान, असजगता एवं नासमझी है। इसी के परिणाम स्वरूप प्रायः अधिकांश रोगी एवं उनके हितचिन्तक माने जाने वाले दीर्घ दृष्टि का ध्यान रखे बिना रोगी का भला बुरा नहीं सोचते। तुरन्त राहत के नाम पर जानेअनजाने रोगी के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करवाने में सहयोग कर रहे हैं। रुई में लगी आग को कब तक छिपाये रखा जा सकेगा? आज उपचार के नाम पर मूल में भूल हो रही है। प्रायः रोगों के मूल कारणों की उपेक्षा कर उन्हें दूर करने के बजाय मात्र बाह्य लक्षणों को दबाया जा रहा है। गन्दगी को सफाई के नाम पर दबाकर अथवा छिपाकर रखने से उसमें दुर्गन्ध ही बढ़ेगी। उसी प्रकार शरीर में रोग को दबाने से भविष्य में वे विकराल रूप ले सकते हैं, अथवा असाध्य बनकर अधिक परेशानी और संकट का कारण बन सकते हैं। दीमक लगी लकड़ी में रंगरोगन से बाहर तो चमक सकती है, परन्तु मजबूती नहीं। उसी प्रकार रोगों के कारणों को हटाये बिना कोई व्यक्ति लम्बे समय तक रोगमुक्त नहीं रह सकता।

रोग क्यों होते हैं?

                उपचार करने से पहले सही निदान आवश्यक हैं एवं रोगों के कारणों को जानना तथा उन परिस्थितियों से बचना आवश्यक है। रोग होने के अनेक कारण हो सकते हैं, जैसेपूर्वजन्म के संचित असाता (कर्म), वेदनीय कर्मों का उदय, पैतृक संस्कार, दुर्घटनायें, असाध्य अथवा संक्रामक रोगों के प्रति प्रारम्भ में रखी गयी उपेक्षावृत्ति, अनावश्यक दवाओं का सेवन, शरीर में प्रतीकारात्मक शक्ति का होना अथवा पूर्व में ली गयी शारीरिक क्षमताओं को क्षीण करने वाली दवाइयों और इंजेक्शनों का दुष्प्रभाव। दूषित अथवा असात्त्विक खानपान, आचारविचार, रहनसहन, दुव्र्यसनों का निःसंकोच सेवन, प्रदूषित वातावरण, प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन, पाश्विक वृत्तियाँ, असंयम, अविवेक, आलस्य, अशुभ चिन्तन, अज्ञान, असजगता एवं रागद्वेष बढ़ाने वाली कषायों से जीवन में तनाव की बहुलता आदि प्रमुख कारण हैं। इन  कारणों का परिणाम होता है रोगग्रस्त भाग में चेतना का असंतुलन। कहीं सक्रियता आवश्यकता से अधिक हो जाती है तो कुछ भाग चेतना की असक्रियता के कारण आंशिक अथवा पूर्ण रूपेण निष्क्रिय होकर अपना कार्य बराबर नहीं करते तथा हम रोग ग्रस्त हो जाते हैं। यदि किसी भी विधि द्वारा  चेतना को पुनः सन्तुलित कर दिया जावे तो चेतना का प्रवाह बराबर होने लगता है तथा रोग दूर हो जाता है।

क्या हम स्वस्थ हैं?

                स्वस्थ का अर्थ है स्व में स्थित रहना (स्थितिप्रज्ञ) अर्थात् अनुकूलता एवं प्रतिकूलता दोनों स्थितियों में समभाव में रहना, सन्तुलित रहना, रागद्वेष से परे हो वीतरागी बन जाना। जब तक उस स्थिति को हम प्राप्त नहीं कर लेते तब तक पूर्ण रूपेण सदैव के लिये स्वस्थ नहीं रह सकते। स्वस्थता की स्थिति प्राप्त करने के लिये शारीरिक मानसिक एवं आध्यात्मिक सन्तुलन आवश्यक है, परन्तु आज हमारा सारा चिन्तन एवं प्रयास शारीरिक स्वास्थ्य तक ही सीमित हो रहा है। उसके लिए भी हमें समझना होगा कि आरोग्य क्या है? नीरोग कौन है? जिसका पाचन एवं श्वसन ठीक हो, भूख प्राकृतिक लगती हो, नींद स्वाभाविक आती हो, चेहरे एवं आखों में चमक हो, नाड़ी संस्थान शक्तिशाली हो, विजातीय तत्त्वों का विसर्जन बराबर हो, जो आत्मविश्वासी, दृढ़ मनोबली, सहनशील, धैर्यवान, साहसी हो, जिसका स्वचिन्तन एवं स्वविवेक जाग्रत हो तथा जो प्राकृतिक नियमों का पालन करता हो।

स्वास्थ्य का आधार क्या है?

                प्रकृति के साथ असहयोग की सजा रोग है। अतः नीरोग रहने के लिये आवश्यक है कि यथासम्भव हम प्राकृतिक नियमों का पालन करें। श्वास कब, कितना, कैसे लेवें अथवा छोड़ें? पानी कब, कितना, कैसे पीवें? खाना कब, कितना कैसे, कहां खावें? नियमित धूप सेवन का महत्त्व समझें एवं उसके अनुरूप ऊर्जा के मूल स्रोत हवा, पानी, भोजन एवं धूप का नियमित उपयोग करें। आवश्यक व्यायाम, ध्यान, स्वाध्याय, सद्चिन्तन हों, हमारी प्रवृतियाँ सात्त्विक हों तथा प्राणी मात्र को सुख पहुँचाने वाली हों। प्रकृति का अटल सिद्धान्त हैदुःख देने से दुःख मिलता है और सुख देने से सुख। अतः यदि हम शान्त, सुखी स्वस्थ रहना चाहते हैं तो प्राणी मात्र के प्रति हमें दया, करुणा, संवेदना का भाव विकसित करना होगा। अपने सुख एवं स्वास्थ्य के लिये दूसरों को कष्ट पहुँचाकर हम लाख प्रयास करने के बावजूद पूर्ण स्वस्थ नहीं रह सकते। इन नियमों की उपेक्षा कर अपने आपको स्वस्थ रखने की कल्पना करना, आग लगाकर शीत प्राप्त करने के समान होगा। फूटे हुए घड़े को सात समुद्रों का पानी भी भरा हुआ नहीं रख सकता। मन के लंगड़े व्यक्ति को स्वर्ग के हजारों देवता भी नहीं चला सकते, ठीक उसी प्रकार जब तक चिकित्सा में साधन, साध्य एवं सामग्री की पवित्रता नहीं होगी, तब तक हमें दीर्घकाल तक शारीरिक स्वस्थता भी प्राप्त नहीं हो सकती। आध्यात्मिक एवं मानसिक स्वस्थता का तो प्रश्न ही नहीं। अपनेआपको स्वस्थ रखने की भावना वालों को सन्तुलन के इस सिद्धान्त का पालन करना आवश्यक है।

ग्रन्थियों का संतुलन स्वास्थ्य के लिये परमावश्यक है।

                अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ हमारे मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को सक्रिय एवं सजग रखती हैं। चिन्तन, मनन, विचार, वाणी, नेतृत्व एवं निर्णयात्मक क्षमता को नियन्त्रित करती हैं। हमारे स्वभाव संवेदना एवं संकल्पशक्ति को प्रभावित करती हैं। हमारा विवेक जागृत करने, सुख दुःख का अनुभव करने, भला बुरा जानने की क्षमता प्रदान करती है। जीवन की गतिविधियों जैसे शक्ति, स्थिरता, व्यक्तित्व, हलनचलन, शरीर के संतुलित विकास, तापक्रम के नियन्त्रण, प्रजनन प्रक्रिया, रक्त, मांस, मज्जा, वीर्य, हड्डियों आदि के निर्माण में प्रमुख भूमिका निभाती है। श्वसन, पाचन, मांस पेशियों का संकुचन अथवा फैलाव, अनावश्यक पदार्थों के शरीर से निष्कासन आदि क्रियाओं में महत्त्वपूर्ण योगदान देती हैं एवं हमारी अवरोधक क्षमता का नियन्त्रण करती हैं। शरीर में आवश्यक सभी तत्त्वों का निर्माण करने में सहयोग करती हैं। इसके बराबर कार्य करने से ही कोई रोग हो सकता है। ग्रन्थियों को सुव्यवस्थित एवं संतुलित किये बिना लाख प्रयास करने के बावजूद हम पूर्णयता रोग मुक्त नहीं हो सकते। तनाव, चिन्ता, भय, निराशा, आवेग एवं दवाइयों के अनावश्यक सेवन से ग्रन्थियाँ निष्क्रिय हो जाती हैं, शरीर की प्रतिकारात्मक शक्ति घटने लगती है। अतः स्वस्थता की कामना रखने वालों को इन ग्रन्थियों की सजगता एवं संतुलन का विशेष ध्यान रखना चाहिये तथा जो उपचार पद्धतियाँ ग्रन्थियों को प्रभावशाली ढंग से सरलता पूर्वक स्वस्थ रख सकें उन्हीं को अपनाना चाहिये।

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