क्या स्वास्थ्य के प्रति हमारा दृष्टिकोण वैज्ञानिक है?

क्या स्वास्थ्य के प्रति हमारा दृष्टिकोण वैज्ञानिक है?

अच्छी चिकित्सा पद्धति के मापदण्ड:-

                अच्छी चिकित्सा पद्धति शरीर को आरोग्य ही नहीं निरोग रखती है अर्थात् जिससे शरीर में रोग उत्पन्न ही न हो। रोग उत्पन्न होने का कारण आधि (मानसिक), व्याधि (शारीरिक), उपाधि (आत्मिक अथवा कर्मजन्य) का असंतुलन होता है। अतः अच्छी चिकित्सा पद्धति में तीनों को संतुलित रख समाधि प्राप्त करने का लक्ष्य रहता है। अच्छी चिकित्सा पद्धति के लिये आवश्यक हैं- रोग के मूल कारणों का सही निदान, तुरन्त एवं प्रभावशाली दुष्प्रभावों से रहित अहिंसात्मक स्थायी उपचार। उसके लिये आवश्यक है उपचार पद्धति सहज, सरल, सस्ती, स्वावलम्बी, अहिंसक, दुष्प्रभावों से रहित हो तथा जिसमें रोगों की पुनरावृत्ति न हो। जो सभी के लिये, सभी स्थानों पर, सभी समय उपलब्ध हो तथा जो शरीर के साथ-साथ मन और आत्मा के विकारों को दूर कर उन्हें भी सशक्त बनाती हो। जो चिकित्सा पद्धतियाँ इन मूल सिद्धान्तों की जितनी-जितनी पालना करती है वे उतनी ही अच्छी चिकित्सा पद्धतियाँ होती है।

रोग के प्रति जनसाधारण का दृष्टिकोणः-

                कोई भी रोग बाजार में नहीं मिलता। आकस्मिक दुर्घटनाओं अथवा जन्मजात रोगों को छोड़कर रोगों के लिये प्रायः रोगी ही जिम्मेदार होते हैं। जन्मजात अथवा पैतृक रोगों में भी गर्भकाल में माता-पिता द्वारा रखी गई असावधानी, असंयम, उपेक्षावृत्ति ही मूल कारण होते हैं। साधारण से बीज से भी अच्छी फसल प्राप्त करने के लिये किसान कितनी सावधानी, देख-रेख और पुरुषार्थ करता है, तब मनुष्य जैसे व्यक्तित्व के निर्माण के प्रति माता-पिता असजग, बेखबर, लापरवाह रहें तो वे अपने कत्र्तव्य के प्रति भी ईमानदार नहीं कहे जा सकते और उसका परिणाम होता है असक्त, रोगग्रस्त, दुर्बल व विकलांग संतान।

                अन्य रोगों के संबंध में हमारी गलत धारणाएँ हैं। दर्द हमारा सबसे बड़ा दोस्त है। जो हमें सजग करता है, चेतावनी देता है। हम स्वप्न में जी रहे है। बेहोशी में है। दर्द अथवा रोग के अन्य संकेत उस बेहोशी को भंग कर हमें सावधान करते हैं। परन्तु हमने उनको शत्रु मान लिया है। रोगी शरीर की आवाज को सुनना नहीं चाहता और दवा से उसको दबाकर खुश होने का असफल प्रयास करता है। रोग का कारण रोगी स्वयं हैं। परन्तु दवा अथवा डाॅक्टर से उस रोग को ठीक करना चाहता है। क्या उसका श्वास कोई दूसरा ले सकता है? क्या उसका खाना कोई दूसरा खा सकता है? दवा और चिकित्सक तो मात्र मार्गदर्शक अथवा सहयोग की भूमिका निभा सकते हैं। अतः स्वस्थ रहने के लिये स्वयं की सजगता, भागीदारी, जीवनचर्या एवं गतिविधियों पर पूर्ण संयम, अनुशासन तथा नियन्त्रण आवश्यक है। अच्छे से अच्छा डाॅक्टर और दवा इसके बिना उसे ठीक नहीं रख सकते। पीड़ा में मात्र राहत मिलना रोग का सम्पूर्ण उपचार नहीं हो सकता।

उपचार हेतु रोगी की सजगता आवश्यकः-

                उपचार हेतु रोगी एवं उसके हितैषियों का प्रयास सर्वप्रथम यथा शक्ति, वर्तमान में सर्वमान्य समझी जाने वाली, तुरन्त राहत दिलाने वाली पद्धति से चिकित्सा करवाने का होता है। भले ही उसके दुष्प्रभाव क्यों न होते हों? भले ही जो अच्छी चिकित्सा पद्धति के मापदण्डों पर खरा नहीं उतरती हो? परन्तु कभी-कभी उपचार के बावजूद जब रोग से मुक्ति नहीं मिलती, तब एक के बाद दूसरी चिकित्सा पद्धितियों का आश्रय लेते रोगी को संकोच नहीं होता। परन्तु फिर भी जब रोग का उपचार न होने से वह निराश होकर ऐसी चिकित्सा पद्धति का भी आश्रय लेता है जिस पर उसका पूर्ण विश्वास नहीं, जिसका विज्ञापन नहीं। भले ही वह चिकित्सा के मापदण्डों के अनुरूप हो? प्रायः रोगी चिकित्सक के सामने सर्वप्रथम अपनी लम्बी अन्तर व्यथा सुनाते-सुनाते चिकित्सक से प्रश्न करता हैः-

                (1) क्या उस चिकित्सा पद्धति में उसके रोग का इलाज है?

                (2) आपने ऐसे कितने रोगियों का उपचार कर स्वस्थ किया है?

                (3) मैं कितने दिनों में रोग से मुक्त हो जाऊँगा?

                रोगी की ऐसी सजगता प्रशंसनीय है। यदि प्रारम्भ में ही निदान की सत्यता एवं उपचार से पड़ने वाले प्रभाव का स्पष्टीकरण ईमानदारी पूर्वक रोगी अपनी विश्वसनीय चिकित्सा वाले चिकित्सक से पूछने का साहस जुटा लेता तथा डाॅक्टर संतोषप्रद उत्तर से उसको संतुष्ट कर दे तो रोगियों पर जाने अनजाने अनावश्यक प्रयोग नहीं हो सकते। अतः रोगी को उपचार करते समय चिकित्सक से रोग का सही कारण क्या हैं? रोग कितना पुराना है? रोग का प्रारम्भ कब क्यों और कैसे हुआ? इसके सहयोगी रोग कौन-कौन से हैं? चिकित्सा द्वारा जो निदान व उपचार किया जा रहा है वह गलत तो नहीं है? उपचार से कोई दुष्प्रभाव की संभावना तो नहीं होगी आदि शंकाओं का समाधान आवश्यक हैं। चिकित्सा द्वारा जो निदान व उपचार किया जा रहा है वह गलत तो नहीं है? उपचार से कोई दुष्प्रभाव की संभावना तो नहीं होगी आदि शंकाओं का समाधान आवश्यक है? मात्र अपनी अज्ञानता के कारण डाॅक्टर पर अन्ध श्रद्धा कदापि बुद्धिमानी नहीं होती।

अंग्रेजी चिकित्सा पद्धति की विशेषता:-

                अंग्रेजी चिकित्सा पद्धति के पास जन साधारण को आकर्षित करने हेतु सशक्त तर्क, निदान एवं उपचार हेतु काम में लिये जाने वाले नवीनतम वैज्ञानिक उपकरणों की सुविधाएँ तथा रोग को शीघ्र दबाकर राहत पहुँचाने वाली कला है। अपने प्रयोगों, परीक्षणों के परिणामों की सफलता एवं उपलब्धियों के आंकड़ों को व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुतिकरण करने का सम्बल है। प्रत्यक्ष को प्रमाण की क्या आवश्यकता? शल्य चिकित्सा के क्षेत्र में तो उन्होंने अद्वितीय प्रगति की है। जिसके परिणामस्वरूप आंखों की पुतलियों, गुर्दों, हृदय एवं शरीर के किसी भी खराब अनुपयोगी अंगों का प्रत्यारोपण संभव हो सका है। कृत्रिम ढंग से शारीरिक क्षमताओं को बढ़ाने तथा प्रक्रियाओं के संचालन में भी उन्होंने आंशिक सफलता प्राप्त की है। जैसे चश्मों के उपयोग से देखने की क्षमता सुधारना, श्रवण यंत्रों से सुनने की ताकत बढ़ाना, डायलासिस द्वारा रक्त का शुद्धिकरण, इंजेक्शन द्वारा शरीर में सीधे आवश्यक तत्त्व पहुँचाना, आक्सीजन द्वारा फेंफड़ों के कार्यों में सहयोग देना कृत्रिम दांत अथवा हाथ या पैर लगाना आदि सुविधाएँ हैं, जो अन्य चिकित्सा पद्धतियों में इतनी सरल नहीं। स्पष्ट है अंग्रेजी चिकित्सा पद्धतियों की उपलब्धियों को नकारा नहीं जा सकता।

अंग्रेजी चिकित्सा की पोषक सरकारी नीतियां:-

                उपरोक्त विशेषताओं के कारण ऐलोपेथिक चिकित्सा पद्धति भारत सहित अधिकांश देशों में सर्वमान्य हो रही है। उसे पूर्णतः वैज्ञानिक समझा जा रहा है। उन्हें सरकारी मान्यता, संरक्षण एवं पूर्ण सहयोग प्राप्त है। स्वास्थ्य मंत्रालय एवं चिकित्सा संबंधित नीति निर्माता एवं संचार माध्यम उनके प्रति रूचि लेकर खुलम-खुला प्रचार कर रहे हैं। दवा निर्माताओं के लुभावने, मायावी, भ्रामक विज्ञापनों एवं दबाव के कारण स्वास्थ्य मंत्रालय जन साधारण के स्वास्थ्य की चिंता छोड़, ऐलोपेथिक चिकित्सा के हितो का पोषक बन कर रह गया है। भ्रामक विज्ञापनों एवं सरकारी प्रचार-प्रसार अथवा संरक्षण मिल जाने से पत्थर पारस नहीं बन जाता। हमारा यह दुर्भाग्य है कि झूठे विज्ञापनों के प्रसारण पर इस देश में कोई प्रतिबंध नहीं है। दवाओं के दुष्प्रभावों से पीडि़त लोगों की राहत के लिये कोई कानूनी प्रावधान नहीं है। अन्य देशों से प्रतिबंधित दवाओं को बेचने पर कोई कानूनी रोक एवं दंड की व्यवस्था नहीं है।

                स्वास्थ्य पर करोड़ों रूपयों का खर्च करने के बावजूद आज रोग और रोगियों की संख्या, निरन्तर क्यों बढ़ रही है? इस समस्या की तरफ उनका चिंतन सुसुप्त है। अंग्रेजी विदेशी चिकित्सा पद्धति को आवश्यक, उपयोगी, वैज्ञानिक, विकासोन्मुख, प्रभावशाली तथा पौराणिक भारतीय चिकित्सा पद्धतियों को वैकल्पिक, अनावश्यक, अनुपयोगी, अवैज्ञानिक, अविकसित, सहयोगी चिकित्सा के रूप में बतलाने की साजिश हो रही है। अंग्रेजी चिकित्सा पद्धतियों की उपलब्धियों को बड़ा चढ़ाकर प्रचारित किया जा रहा है तथा उसके दुष्प्रभावों को छिपाया जा रहा है। जो समस्याएँ एवं नये-नये रोग अंग्रेजी चिकित्सा के दुष्प्रभावों से उत्पन्न हो रहे हैं उनका समाधान उन्ही से पूछा जा रहा है। मानों चोर को ही चोरी का पता लगाने का कार्य सौंपा गया है। स्वास्थ्य मंत्रालय का पूर्वाग्रह से ग्रसित ऐसा आचरण कैसे बुद्धिमत्तापूर्ण स्वीकारा जा सकता है? बिना कारण कार्य नहीं होता। आज अधिकांश रोगों की जड़ अकारण शारीरिक क्रियाओं से छेड़छाड़ करना, रोग निरोधक दवाओं और इंजेक्शनों का अनावश्यक प्रयोग, सही निदान का अभाव, गलत दवाओं से पड़ने वाले दुष्प्रभावों के प्रति हमारी उपेक्षावृत्ति है। आज शल्य चिकित्सा आम बात हो गई है। प्रजनन तक सहज नहीं होता। शरीर में कोई अंग या उपांग व्यर्थ नहीं होता। शल्य चिकित्सा द्वारा उसके साथ छेड़छाड़ परावलम्बन का प्रारम्भ है। ऐसे व्यक्तियों को जीवन पर्यन्त डाॅक्टरों एवं दवाओं की दासता स्वीकार करनी पड़ती है। दवा उनके जीवन का आवश्यक अंग बन जाती है। जब तक रोग असाध्य नहीं हो जाता, प्रायः बिना दवा उपचार करने वाले अनुभवी चिकित्सकों से परामर्श करना भी उचित नहीं समझते।

प्रभावशाली बिना दवा उपचार की चिकित्सा पद्धतियों पर चिन्तन आवश्यक:-

                ऐसी परिस्थितियों में जन साधारण भारत की पौराणिक एवं अन्य प्रभावशाली चिकित्सा पद्धतियों को संदेहास्पद समझें तो आश्चर्य नहीं। कोई चिकित्सा पद्धति अपने आप में पूर्ण नहीं होती और न कोई भी चिकित्सा पद्धति ऐसी है जिसमें कोई विशेषता ही न हो अर्थात जो अंग्रेजी चिकित्सा पद्धति के सिद्धान्त, मान्यताएँ, धारणाएँ हैं, वे ही संपूर्ण सत्य हो। बाकी सभी चिकित्सा पद्धतियों को अवैज्ञानिक, अविकसित, अनुपयोगी, अनावश्यक बतलाकर उपेक्षा करना कदापि उचित नहीं। किसी तथ्य को बिना सोचे समझे स्वीकारना मूर्खता है तो किसी अनुभूत सत्य को बिना सोचे समझे नकारना भी बुद्धिमत्ता नहीं कहीं जा सकती? हम किसी बात पर विश्वास न करें परन्तु उस संबंध में बिना पूर्ण जानकारी अविश्वास करना भी उचित नहीं? ऐसे व्यक्तियों कें चिन्तन को वैज्ञानिक नहीं कहा जा सकता। जिस प्रकार यदि कोई गांव का अशिक्षित व्यक्ति डाॅक्टरों की भरी सभा में चिकित्सा विषयों पर अधिकारपूर्वक बोले तो उसकी बात का क्या महत्त्व, उसकी क्या सार्थकता? उसी प्रकार जिस विषय का ज्ञान न हो उस पर अभिमत देना नासमझी है। कारण चाहें जो हो तथाकथित अन्य चिकित्सा पद्धतियां वर्तमान में सरकारी उपेक्षा की शिकार है। सरकार द्वारा न तो उन पर शोध को प्रोत्साहन दिया जा रहा है और न उनके प्रशिक्षण एवं उपचार व्यवस्था की तरफ सरकार का विशेष ध्यान ही जा रहा है। सरकारी मान्यता और सहयोग का तो प्रश्न ही नहीं। उनकी प्रभावशीलता, अच्छाइयों को बिना सोचे समझें, बिना अध्ययन किये नकारा जा रहा है। भले ही वे चिकित्सा के मापदंडों में सरकारी मान्यता प्राप्त वैज्ञानिक समझी जाने वाली आधुनिक अंग्रेजी चिकित्सा पद्धति से काफी आगे हो। मानों परीक्षा में 25 अंक प्राप्त करने वालों को सर्वश्रेष्ठ तथा 60 से 70 अंक प्राप्त करने वालों को अयोग्य घोषित किया जा रहा ह। मैट्रिक पास व्यक्ति एम.ए. वालों को पढ़ाने की भूमिका निभा रहा हो। क्या स्वास्थ्य मंत्रालय से संबंधित नीति-निर्माताओं ने उन पद्धतियों के विशेषज्ञों से परामर्श कर समझने का प्रयास किया? प्रकृति का यह मौलिक सिद्धान्त है कि रोग जिस स्थान, वातावरण एवं परिस्थितियों में उत्पन्न होता है उसका उपचार उसी वातावरण, परिस्थितियों एवं धरती के अवयवों में समाहित होता है। अतः स्वावलंबी चिकित्सा पद्धतियों के सिद्धान्त, उपचार का तरीका भारत की जलवायु, संस्कृति एवं वातावरण के ज्यादा अनुकूल होना चाहिये। जिस पर पूर्वाग्रह छोड़ अनेकान्त दृष्टि से वर्तमान परिपेक्ष्य में पुनः शोध एवं व्यापक चिंतन आवश्यक है। आधुनिक चिकित्सों को अन्य प्रभावशाली स्वावलंबी चिकित्सा पद्धतियों का सिद्धान्तिक ज्ञान कराया जाना चाहिये जिससें रोगी डाॅक्टरों की प्रयोगशाला होने से बच सकें एवं चिकित्सकों का चिंतन बहुपक्षीय हो सके।

क्या स्वास्थ्य के लिये आध्यात्मिकता की उपेक्षा उचित है?

                विज्ञान एवं विज्ञापनों की चकाचौध में आज प्रायः मानव का आध्यत्मिक चिंतन सुषुप्त होता जा रहा है। चिकित्सक और दवा निर्माता रोग मिटाने के बड़े-बड़े दावें प्रस्तुत कर रहे हैं। फलतः जनसाधारण की भीड़ उनसे भ्रमित हो बिना सोचे समझे उनका अंधानुकरण करती है।

                आज जनसाधारण को जितना डाॅक्टर पर विश्वास है उतना भी अपनी अमूल्य क्षमताओं पर से विश्वास प्रायः नहीं हो रहा है। वे प्रायः प्रत्येक सिद्धान्त, सत्य, तथ्य अनुभूति को तब तक स्वीकार नहीं करता, जब तक कि वे भौतिकता तक सीमित आधुनिक वैज्ञानिक मापदंडों पर खरा नहीं उतरते। प्रश्न खड़ा होता है कि क्या आज का विज्ञान सम्पूर्ण है? क्या चेतना का संचालन उसके नियन्त्रण में है? मृत्यु के पश्चात शरीर में सभी अंग अवयव उपस्थित होने के बावजूद वह निष्क्रिय क्यों हो जाता है? विज्ञान की दुहाएँ देने वाले अपने शरीर में रक्त की बूंद अथवा कोशिकाएँ बनाने में अपने आपको क्यों असहाय मानते हैं। जो प्रत्येक प्राणी में सहज बनता है। चाहे वह छोटा हो या बड़ा, शिक्षित हो यो अशिक्षित, सभ्य हो या पागल, गोरा हो या काला। जो सबके लिये आवश्यक है तथा शरीर स्वयं जिसका निर्माण करता है। ऐसे अधूरे विकास के अहम् में वैज्ञानिकता के नाम पर अनुभूत सत्य को अस्वीकारना अज्ञान नहीं तो क्या है?

                विज्ञान का आधार होता हैं सत्य दृष्टि, समग्र दृष्टि। जिसमें आग्रह है, दुराग्रह है, एकान्त मान्यताओं एवं धारणाओं का पोषण नहीं है, मायावी आचरण हैं, वहाँ कितना ही विज्ञापन क्यों न हो, विज्ञान नहीं हो सकता। विज्ञान की शर्त है, ‘‘सच्चा सो मेरा, न कि मेरा जो सच्चा’’ प्राप्त सूचनाओं प्रमाणों तथा प्रयोगों एवं परीक्षणों से उपलब्ध आंकड़ों का व्यवस्थित लिपिबद्ध संकलन और प्रस्तुतिकरण विज्ञान का एक पक्ष मात्र है। जब तक धर्म, कर्म, नियति, स्वभाव एवं काल के प्रभावों को नकारा जावेगा, सत्य समझ में नहीं आयेगा। आध्यात्म के बिना विज्ञान अधूरा है। अपूर्ण है। सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन और सम्यक आचरण ही सच्ची वैज्ञानिकता के मापदण्ड होते हैं।

शरीर से आत्मा का महत्त्व ज्यादाः-

                आज मानव का सारा सोच शरीर को स्वस्थ रखने तक सीमित हो गया है। मनोबल एवं आत्मबल की क्षमताओं से अपरिचित होने के कारण उसका अवमूल्यन कर दुरुपयोग कर रहा है। जिस व्यक्ति को वृद्धावस्था में चलने-फिरने में भी कष्ट होता है, वहीं व्यक्ति जब मारणान्तिक कष्ट उपस्थित होता है तो उससे बचने के लिये दौड़ने लगता है? अपरिग्रही आधुनिक भौतिक सुख-सुविधाओं को त्याग संयम पथ पर चलने वाले आत्मबली अध्यात्म योगी संत-मुनि जन इतने तनाव-मुक्त, प्रसन्नचित, शांत, सुखी, संतोषी कैसे रहते हैं? आज सबसे बड़ी समस्या अपने आप पर अनास्था की है। सम्यक् चिन्तन और स्वविवेक के अभाव की है। स्वालम्बन और सम्यक् पुरुषार्थ के अभाव की है। करोड़ों सूर्यों की अपेक्षा व्यक्ति के लिए आंख का महत्त्व अधिक होता है। आज मानव इस सत्य को नहीं समझ पा रहा है। मानव का चिंतन वर्तमान की क्षणिक उपलब्धियों, लाभ, राहत आदि तक सीमित हो रहा है। न तो भूत से शिक्षा ले रहा है न भविष्य का चिंतन। अतः उसका सोच अपूर्ण होता है।

सच्चा वैज्ञानिक कौन?

                आज कि वैज्ञानिकों की ऐसी मान्यता है कि अधिकांश मनुष्य अपने ज्ञान का शतांश भाग भी विकसित नहीं कर पाते। हम अपनी क्षमताओं से कितने अपरिचित हैं? चिंतन का प्रश्न है। शरीर मात्र ढांचा ही नहीं, उसके साथ मन और आत्मा का संचालन, नियन्त्रण चेतना से होता है। हमारी संवेदनाएँ, भाव, विचार, सोच, कर्म, नियति, स्वभाव, चिंतन, काल तथा जीवनचर्या उसे प्रभावित करते हैं। भौतिक एवं आत्मिक बल को भौतिक यंत्रों से नहीं मापा जा सकता। इस कारण उस अनुभूत सत्य को नकारना, गलत, असत्य अवैज्ञानिक, तत्त्वहीन मानना कौनसी बुद्धिमत्ता है? आत्मा को प्रभावित करने वाले तथ्यों की उपेक्षा करने वाला अपूर्ण ज्ञान अपने आपको कैसे पूर्ण प्रभावशाली स्वास्थ्य विज्ञान होने का दावा कर सकता है?

                अनुभूतियां स्वयं अपने आप में प्रमाण है जिन्हें भौतिक प्रयोग एवं परीक्षणों से नहीं परखा जा सकता। पानी पीने से प्यास बुझती है। अतः जनसाधारण के लिये यह जानना आवश्यक नहीं कि प्यास क्यों और कैसे बुझती है? जिस प्रकार रत्न की पहचान के लिये जौहरी के पास जाना पड़ता है उसी प्रकार जो शरीर मन और आत्मा के विशेषज्ञ है उनके परामर्श, मार्गदर्शन प्राप्त कर परामर्श की पालना, सम्पूर्ण स्वास्थ्य के लिये आवश्यक होती है तथा उपेक्षा रोग का कारण। आधि-व्याधि-उपधि की समाप्ति से ही समाधि प्राप्त होती है, जो सनातन सत्य है।

                आत्म-साधना, संयम, व्रत एवं ध्यान-योग के द्वारा जैसे-जैसे और जितना-जितना सम्यक् आचरण होगा, आत्मा पर आये कर्मों के आवरण दूर होते जायेंगे, उतनी-उतनी आत्मा शुद्ध, निर्मल, पवित्र, स्वच्छ बनती जायेगी। जब मानव राग-द्वेष पर पूर्ण विजय प्राप्त कर लेता है तो संसार की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष घटनाएँ दर्पण की भांति प्रतिबिम्बित होने लगती हैं। आत्म परमात्मा बन जाती है। जैन धर्म में ऐसी अवस्था को केवल ज्ञान कहते हैं। जहाँ सारा अज्ञान दूर हो जाता है केवल ज्ञान ही शेष रहता है। सम्पूर्ण आत्मानुभूति की अवस्था में आज की भौतिक जानकारी तो होती ही है परन्तु उससे भी आगे ब्रह्माण्ड के वर्तमान, भूत एवं भविष्य की सूक्ष्मतम एवं सम्पूर्ण जानकारी भी होती है। वे ही वास्तव में सच्चे एवं बड़े वैज्ञानिक होते हैं। सत्य के प्रेरणा स्रोत होते हैं। उनका उपदेश न केवल भौतिक उपलब्धियों तक ही सीमित रहता है। अपितु जीवन के परम लक्ष्य तक का मार्गदर्शन करता है। उसमें नर को नारायण, भक्त को भगवान एवं आत्मा को परमात्मा बनाने की क्षमता होती है। मानसिक और आत्मिक स्वास्थ्य तथा शांति के लिये ऐसे महापुरुषों के निर्देशानुसार विवेकपूर्ण जीवनचर्या आवश्यक है। इसके विपरीत आचरण कर शरीर को स्वस्थ रखने की कल्पना शारीरिक रोगों से भले ही क्षणिक, आंशिक राहत दिला दे, अन्ततोःगत्वा हानिकारक ही होती है। कष्टदायक है। घाटे का सौदा है।

स्वास्थ्य के प्रति सच्चा दृष्टिकोण:-

                अतः जब तक चिकित्सक का दृष्टिकोण शरीर को स्वस्थ करने के साथ मन और आत्मा को स्वस्थ बनाने का नहीं होता, उपचार अधूरा ही होता है। ऐसे उपचार और दृष्टिकोण को वैज्ञानिक मानना स्वयं के साथ विश्वासघात करना है, जो कदापि उचित नहीं।

                जो स्वयं अपूर्ण है वह पूर्णता की बात करने का दावा कैसे कर सकता है? उसमें विरोधाभास होगा। जहाँ विरोधाभास होगा वहाँ नुकसान की संभावना रहेगी। हमें हमारा विवेक जाग्रत रखना है। हानि-लाभ, उपयोगी-अनुपयोगी, करणीय-अकरणीय की प्राथमिकताओं के आधार पर चिंतन कर आचरण करना होगा स्वास्थ्य के प्रति यही सच्चा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण है।

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