स्वावलंबी चिकित्सा पद्धतियाँ क्यों विश्वसनीय?

स्वावलंबी चिकित्सा पद्धतियाँ क्यों विश्वसनीय?

 

क्या स्वास्थ्य हेतु समान मापदण्डों का निर्धारण संभव है?

 दुनियां में कोई भी दो व्यक्ति सम्पूर्ण रूप से एक जैसे नहीं हो सकते। उनके जीवन का लक्ष्य, प्राथमिकताएँ, खानपान, रहनसहन, आचारविचार, आवास एवं व्यवसाय का वातावरण तथा परिस्थितियाँ, बाह्य रूप से कुछ लक्षणों में समानता होने के बावजूद किसी एक रोग के नाम से रोगी का परिचय करना कहां तक सही होता है? पांचों ज्ञानेन्द्रियों के विषय जैसे देखना, सुनना, बोलना, गंध लेना, स्पर्श करना, समझना आदि एक जैसी परिस्थितियों का अलगअलग प्रभाव क्यों पड़ता है? कहने का आशय यह है कि प्रत्येक व्यक्ति स्वास्थ्य के अलगअलग स्तर पर जीता है।

 रोग के निदान हेतु जो भी रोगी से पूछा जाता है और रोगी अभिव्यक्त करता है अथवा जो यंत्रों एवं पेथालोजिकल रिपोर्ट के परीक्षण से प्राप्त होता है वह सत्यांश ही होता है। अतः स्वस्थ रहने हेतु व्यक्ति को निदान और उपचार की यथार्तता के प्रति स्वयं की सजगता और विवेक आवश्यक होता है।

स्वावलम्बी चिकित्सा के मूलभूत सिद्धान्तः

 प्रभावशाली स्वावलंबी चिकित्सा पद्धतियाँ व्यक्ति को स्वस्थ रखने एवं रोग का उपचार करते समय निम्न तथ्यों की उपेक्षा नहीं करती।

1.  पूर्ण शरीर, मन और आत्मा को एक इकाई मानकर निदान और उपचार करती है, जिससे केवल शरीर ही रोग मुक्त होता है अपितु मन सजग और आत्मा विकार मुक्त होती है।

2.  पूर्ण शरीर का निदान एवं उपचार करने से अप्रत्यक्ष, सहयोगी रोगों की उपेक्षा नहीं होती।

3.  शरीर में स्वयं को स्वस्थ रखने की क्षमता होती है। भोजन, पानी, हवा, सूर्य के प्रकाश के सम्यक् उपयोग तथा आवश्यक श्रम एवं विश्राम द्वारा शरीर की क्षमताओं का पूर्ण उपयोग लेती है।

4  उपचार पूर्णतः सहज, सरल, सस्ता, स्थायी, अहिंसक, दुष्प्रभावों से रहित एवं प्रभावशाली होने के साथसाथ रोगी की सजगता होने से अंधेरे में नहीं होता।

5.  शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो, अपितु उसमें वृद्धि हो, इस हेतु प्राथमिकता और सजगता होने से वायरस और कीटाणु से व्यक्ति प्रभावित नहीं होता।

पशु जगत का उपचार कौन करता है?

 जब से मानव सभ्यता का विकास हुआ, तभी से स्वास्थ्य वैज्ञानिक, चिकित्सक इस प्रयास में व्यस्त है कि मानव रोग मुक्त जीवन कैसे जी सके? यथार्थता यह है कि इतनी प्रगति के बावजूद भी आज रोग और रोगियों की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि क्यों होती जा रही है?

 दुनियां में चेतनाशील प्राणियों में मानव का प्रतिशत तो एक प्रतिशत से भी कम है, बाकी 99 प्रतिशत जीव अनादिकाल से सहज जीवन जी रहे हैं, जिन्हें किसी भी प्रकार की चिकित्सा पद्धति का तो कोई ज्ञान होता है और अनुभवी चिकित्सकों का सान्निध्य ही मिलता है। क्या वे रोगी नहीं होते? वे पुनः कैसे स्वस्थ होते है? दूसरी तरफ स्वच्छ वातावरण में रहने वाले, पौष्टिक आहार का सेवन करने वाले, शुद्ध निर्मल मिनरल वाटर पीने वाले भी रोगी हो जाते हैं, आखिर क्यों? इस पर बिना किसी पूर्वाग्रह के स्वतंत्र एवं निष्पक्ष सम्यक् चिन्तन आवश्यक है।

मानव शरीर में अच्छा तालमेलः

 मानव शरीर दुनियां की सर्वश्रेष्ठ मशीन है जो पाँच इन्द्रियों और मन जैसी अमूल्य सम्पदाओं से केवल परिपूर्ण ही होता है अपितु उसके सारे अंगउपांग पूर्ण तालमेल एवं आपसी सहयोग समन्वय से अपनाअपना कार्य करते हैं। यदि शरीर के किसी भी भाग में कोई तीक्ष्ण कांटा, सुई अथवा पिन चुभ जाये तो उस समय तो आँख को अच्छे दृश्य देखना अच्छा लगता है और कानों को मनपसन्द गीत सुनना। यहाँ तक कि दुनियां भर में चक्कर लगाने वाला हमारा चंचल मन क्षणमात्र के लिए अपना ध्यान वहाँ केन्द्रित कर देता है। जिस शरीर में इतना तालमेल और अनुशासन हो, क्या उस शरीर में कोई अकेला नामधारी रोग उत्पन्न हो सकता है?

शरीर में स्वयं की आवश्यकताओं को पूर्ण करने की क्षमता होती हैः

 हमें चिन्तन करना होगा कि जो शरीर अपनी कोशिकाएँ, रक्त, माँस, मज्जा, हड्डियाँ, चर्बी, वीर्य आदि अवयवों का निर्माण स्वयं करता है, जिसे आधुनिक विकसित स्वास्थ्य विज्ञान पूरी कोशिश के बावजूद अभी तक नहीं बना सका, ऐसे स्वचालित, स्वनिर्मित, स्वनियन्त्रित शरीर में स्वयं के रोग को दूर करने की क्षमता हो, यह कैसे संभव है? अनुभवी चिकित्सक एवं अच्छी से अच्छी दवा शरीर को अपना उपचार स्वयं करने की प्राकृतिक विधि में सहायक मात्र होते हैं। शरीर के सहयोग के बिना सारे उपचार निष्क्रिय हो जाते हैं।

दुष्प्रभावों की उपेक्षा हानिकारकः

 अधिकांश व्यक्ति रोग होने में स्वयं की गलती को स्वीकार नहीं करते। इसी कारण रोग को समझे बिना, निदान के बारे में अपनी शंकाओं का समाधान प्राप्त किये बिना, डाॅक्टरों के पास पड़ने वाली भीड़ के अन्धानुकरण के कारण, चिकित्सा से भविष्य में पड़ने वाले दुष्प्रभावों की उपेक्षा करते हुए अपने आपको डाॅक्टरों की प्रयोगशाला बनाते प्रायः संकोच नहीं करते। वे इस बात का चिन्तन तक नहीं करते कि दवाओं के अधिक अथवा अनावश्यक सेवन से शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति क्षीण होने लगती है।

चिकित्सा में हिंसा को प्रोत्साहन अनुचितः

 आत्मा को अशुभकर्मो से भारी करने में सबसे ज्यादा कारण हिंसा, क्रूरता, निर्दयता का आचरण होता है। दुनियां में कोई भी जीव मरना नहीं चाहता। भले ही उसे चाहते हुए भी मरना क्यों पड़े। जीयो और जीने दो पर आधारित जीवनचर्या ही मानवता का प्रतीक होती है। अपने स्वार्थ के लिए अन्य जीवों को कष्ट पहुँचाना पाश्विकता का लक्षण है। हमें तो पिन अथवा सूई की चुभन भी सहन हो, परन्तु अज्ञानवश पोष्टिकता एवं स्वाद, शिक्षा, दवाओं के निर्माण एवं परीक्षण अथवा उपचार आदि के लिए अन्य जीवों के साथ क्रूरता अथवा उनका वध करना या उन्हें परेशान और पीड़ित करना, स्वयं के लिए दुःखों, कष्टों, रोगों को आमंत्रण देना है। उन मूक बेजुबान, असहाय जीवों की बद्दुआएं, हृदय से निकली चीत्कारें उनको पीड़ित करने में प्रत्यक्षअप्रत्यक्ष रूप से सहयोग करने वालों को कभी शान्त, सुखी एवं स्वस्थ नहीं रहने देगी। भले ही पूर्व पुण्य के प्रभाव से स्वार्थी मानव को उसका तत्काल दुष्फल भी मिले।

 जब पूज्य पुरुषों का आशीर्वाद हमें शान्ति पहुँचा सकता है तो दुःखी प्राणी की आहें अपना प्रभाव क्यों नहीं दिखाएँगी, चिन्तन का प्रश्न है। क्या हिंसा द्वारा निर्मित और क्रूरता द्वारा परीक्षण की गई दवाओं द्वारा उपचार करवाने वालों को अशुभकर्मो का बन्ध नहीं होता है? प्रकृति का दण्ड देने का विधान पूर्ण न्याय पर आधारित होता है। वहाँ देर भले ही हो सकती है, अंधेर नहीं हो सकती।

 अतः जहां कोई विकल्प हो और रोग सहनशक्ति के बाहर हो, उसी अवस्था में लाचारीवश ही ऐसा उपचार लेकर प्रायश्चित्त लेना चाहिए। अतः हिंसा को प्रोत्साहन देकर आत्मा को विकारी बनाने वाली चिकित्सा पद्धतियाँ पूर्ण रूप से प्रभावशाली कदापि नहीं हो सकती?

स्वावलम्बी चिकित्सा को प्रभावशाली बनाने हेतु रोगी से अपेक्षाएँ

 स्वावलंबी चिकत्सा पद्धति से उपचार करते समय रोगी को निम्न बातों का विशेष ध्यान रखना आवश्यक होता है।

1.  रोग के कारणों को जानने एवं समझने की जिज्ञासा, परामर्श देने वाले चिकित्सक से निदान और उपचार के बारें में शंकाओं का निराकरण करना तथा स्वयं की भूमिका का सम्यक् चिन्तन कर उसके अनुरूप पुरुशार्थ करना।

2.  रोगी की स्वस्थ होने की तीव्र उत्कण्ठा, दृढ़ इच्छा शक्ति, सजगता, निश्चय, मनोबल, सम्यक् श्रद्धा, तर्क पूर्ण चिन्तन तथा दुष्प्रभावों के प्रति उपेक्षावृति होना।

3.  शरीर, मन एवं आत्मा की क्षमताओं का सम्यक् चिन्तन एवं प्राथमिकता के अनुसार उपयोग करना अर्थात् प्राण एवं प्राणऊर्जा के मूल स्रोत पर्याप्तियों का दुरुपयोग करना।

4.  आत्मबल बढ़ाने हेतु नियमित प्रार्थना, स्वाध्याय, ध्यान, कार्योत्सर्ग एवं तप करना। प्राण और पर्याप्तियों के संयम का अभ्यास करना।

5.  मन, वचन और काया का यथा संभव संयम रखना।

6.  प्राणी मात्र के प्रति दया, करुणा, मैत्री एवं प्रेम का भाव रखना तथा प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से उन पर क्रूरता, अत्याचार, निर्दयता, हिंसा आदि का व्यवहार तो स्वयं करना और करने वालों को सहयोग देना।

7.  उपचार में नियमितता, निरन्तरता, समयबद्धता, एकाग्रता एवं स्वयं की भागीदारी की उपेक्षा नहीं करना।

 रोगी जितनाजितना उपरोक्त नियमों का पालन करेगा, उतना जल्दी ही वह रोग मुक्त हो जायेगा। यदि वह स्वस्थ है तो रोग उसको परेशान नहीं करेगा। उपरोक्त सारी बातें व्यक्ति के स्वयं के नियंत्रण में होती हैं।

स्वावलम्बी चिकित्सा क्यों प्रभावशाली?

 स्वावलम्बी अहिंसात्मक चिकित्सा पद्धतियाँ रोग के मूल कारणों को दूर करती है। शरीर, मन और आत्मा में तालमेल एवं सन्तुलन स्थापित करती है। शरीर की क्षमताओं और उसके अनुरूप आवश्यकताओं में सन्तुलन रखती है। स्वावलंबी चिकित्सा पद्धतियाँ व्यक्ति में धैर्य, सहनशीलता, सजगता, विवेक, स्वदोष दृष्टि एवं आत्मविश्वास विकसित करती है।

 व्यक्ति रोग तो स्वयं पैदा करता है, परन्तु दवा और डाॅक्टर से ठीक करवाना चाहता है। क्या हमारा श्वास अन्य व्यक्ति ले सकता है? क्या हमारा खाया हुआ भोजन दूसरा व्यक्ति पाचन कर सकता है? प्रकृति का सनातन सिद्धान्त है कि जहाँ समस्या होती है उसका समाधान उसी स्थान पर अवश्य होता है। अतः जो रोग शरीर में उत्पन्न होते हैं उनका उपचार शरीर में अवश्य होना चाहिये। शरीर का विवेकपूर्ण एवं सजगता के साथ उपयोग करने की विधि स्वावलम्बी जीवन की आधारशिला होती है। मानव की क्षमता, समझ और विवेक जागृत करना उसका उद्देश्य होता है। स्वावलम्बी चिकित्सा में निदान और उपचार में रोगी की भागीदारी एवं सजगता प्रमुख होती है। अतः रोगी उपचार से पड़ने वाले सूक्ष्मतम प्रभावों के प्रति अधिक सजग रहता है, जिससे दुष्प्रभावों की संभावना प्रायः नहीं रहती। ये उपचार बालवृद्ध, शिक्षितअशिक्षित, गरीबअमीर, शरीर विज्ञान की विस्तृत जानकारी रखने वाला साधारण व्यक्ति भी आत्म विश्वास से चिकित्सक के परामर्श से स्वयं कर सकता है।

 स्वावलम्बी चिकित्सा पद्धतियाँ हिंसा पर नहीं, अहिंसा पर; विषमता पर नहीं समता पर; साधनों पर नहीं साधना पर, परावलम्बन पर नहीं स्वावलम्बन पर, क्षणिक राहत पर नहीं, अपितु अन्तिम प्रभावशाली स्थायी परिणामों पर आधारित होती हैं। रोग के लक्षणों की अपेक्षा रोग के मूल कारणों को दूर करती है। शरीर, मन और आत्मा में संतुलन और तालमेल स्थापित करती है। जो जितना महत्त्वपूर्ण होता है, उसको उसकी क्षमता के अनुरूप महत्त्व एवं प्राथमिकता देती है। स्वस्थ जीवन जीने हेतु जो अनावश्यक, अनुपयोगी प्रवृत्तियां है उन पर नियंत्रण रखने हेतु सचेत करती है। इस प्रकार आधि, व्याधि और उपाधि के संतुलन से समाधि, शान्ति और स्वस्थता शीघ्र प्राप्त होती है। अतः स्वावलंबी चिकित्सा पद्धतियाँ अन्य चिकित्सा पद्धतियों से अधिक प्रभावशाली होती है। साधन, साध्य एवं सामग्री तीनों पवित्र होते हैं। उपचार से पूर्व रोगी उपचार से पड़ने वाले दुष्प्रभावों के प्रति पूर्ण सावधान रहता है और उसका उपचार अज्ञानता में होने से वह गलत एवं हिंसक दवाओं के सेवन से अपने आपको सहज बचा लेता है। अतः जो चिकित्सा पद्धतियाँ जितनी अधिक स्वावलम्बी होती हैं, रोगी की उसमें उतनी ही अधिक सजगता, भागीदारी होने से वे पद्धतियाँ उतनी ही अधिक प्रभावशाली होती हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *