बिना दवा हृदय रोगों का प्रभावशाली उपचार

बिना दवा हृदय रोगों का प्रभावशाली उपचार

 

 मानव शरीर दुनिया की सर्वश्रेष्ठ मषीनरी है। यदि शरीर के किसी भी भाग में कोई तीक्ष्ण कांटा, सुई अथवा पिन चुभ जाए तो उस समय तो आंख को अच्छे से अच्छा दृश्य देखना अच्छा लगता है और कानों को मन पसन्द गीत सुनना। यहां तक दुनिया भर में चक्कर लगाने वाला हमारा चंचल मन क्षण मात्र के लिए अपना ध्यान वहां केन्द्रित कर देता है। जिस शरीर में इतना समन्वय, तालमेल और अनुशासन हो, क्या उस शरीर में अकेला हृदय रोग उत्पन्न हो सकता है? मानव शरीर अपने आप में परिपूर्ण होता है। इसमें अपने आपको स्वस्थ रखने की पूर्ण क्षमता होती है। आवश्यकता है अपनी क्षमताओं को पहचानने की, समझने की तथा आवश्यकतानुसार उसका सही उपयोग करने की।

हृदय के कार्य एवं बनावट

 हृदय हमारे शरीर में माँसपेशियों से निर्मित एक लचीला चार प्रकोष्ठों वाला अंग होता है जो वक्षस्थल के बांयी तरफ तीसरी से छठी पसली के बीच में होता है। उसका आकार स्वस्थ व्यक्ति की अपनी बंद मुट्ठी के समान होता है। स्त्रियों की अपेक्षा पुरुषों में इसका आकार प्रायः बड़ा होता है। इसके मुख्य दो भाग होते हैं। बांया और दांया। जो फिर दो भागों में विभाजित होता है। ऊपरी भाग को एट्रियम (आलिन्द) एवं निचले भाग को वेन्ट्रिकल (निलय) कहते हैं। इस प्रकार दो आलिन्द और दो निलय मिलकर इसके चार प्रकोष्ठ होते हैं। हृदय का कार्य शरीर के दूषित रक्त को लेकर फेंफड़े में भेजना तथा वहाँ से शोधित शुद्ध रक्त को पुनः सारे शरीर में वितरण कर, रक्त की आवश्यकता की पूर्ति करने का होता है। हृदय में खुलने वाली सभी नाड़ियों के मुंह पर वाल्व होते हैं। इन वाल्वों की संरचना ऐसी होती है कि रक्त का बहाव एक ही तरफ हो सकता है। हृदय अपना कार्य बिना किसी विश्राम के दिनरात करता रहता है। हृदय के धड़कन की गति स्वस्थ व्यक्ति के प्रति मिनट 70 से 75 के लगभग होती है। निद्रा और आराम के समय इसकी गति कम हो जाती है, जबकि आवेग में इसकी गति बढ़ जाती है। हृदय में दो पंप होते हैं। एक की सहायता से रक्त को फेंफड़ों में प्रवाहित किया जाता है और दूसरे से रक्त को शरीर के अन्य भागों में भेजा जाता है।

 हृदय को दो कोरोनरी धमनियों में प्रवाहित रक्त से पोषण प्राप्त होता है। ये धमनियाँ (आर्टरी) छोटीछोटी शाखाओं वाले वृक्ष की तरह होती हैं, जिसका एक तना होता है। धमनियाँ ही हृदय का सर्वाधिक संवेदनशील भाग होती है। इसमें किसी प्रकार का रोग मृत्यु का कारण भी बन सकता है।

 धमनियों में अपचित वसा (काॅलेस्ट्रोल)के जमने के कारण धीरेधीरे इसमें रक्त का प्रवाह अवरूद्ध होने लगता है। धमनी में कभीकभी वसा का डाॅट भी बन सकता है। हृदय रोग की गंभीरता धमनी में अवरोध के आकार तथा धमनी में उसके स्थान पर निर्भर करती है।

 रक्त परिभ्रमण पर हृदय की पम्पिंग का जो दबाव पड़ता है उसे रक्तचाप (Blood Pressure) कहते हैं। सामान्य दबाव एक स्वाभाविक क्रिया होती है, परन्तु जब यह दबाव असामान्य हो जाता है तो रोग बन जाता है। जब किसी कारण से रक्त का दबाव बढ़ जाता है तो उसे उच्च रक्तचाप (Blood Pressure) और जब रक्त का दबाव सामान्य से कम हो जाता है तो उसे निम्न रक्त चाप (Low Blood Pressure) का रोग कहते हैं।

 जब हृदय अपने पास एकत्रित हुए रक्त को शरीर में भेजने के लिये सिकुड़ता है तो उस समय जो अधिकतम दबाव बनता है उसे सिस्टोलिक दबाव (Systolic Pressure) अर्थात् उच्च रक्तचाप कहते हैं। इसी समय शरीर में वापिस लौटे रक्त को ग्रहण करने के लिये हृदय ढ़ीला (Relex) होता है, उस समय जो रक्त का दबाव होता है, उसे डायस्टोलिक दबाव (Diastolic Pressure) अर्थात् निम्न रक्तचाप कहते हैं। रक्तचाप के दबाव की निम्न सीमा उच्च रक्तचाप की सीमा से अपेक्षाकृत अधिक महत्त्वपूर्ण होती है।

हृदय संबंधी रोग

 रक्त प्रवाह में किसी कारण अवरोध आने से हृदय को अपना कार्य पूर्ण क्षमता से करने में कठिनाई होती है। स्वयं हृदय की मांसपेशियाँ भी रक्त से पुष्ट होती हैं। परन्तु जब उन धमनियों में रुकावट पैदा हो जाती है तो,  हृदय की मांसपेशियाँ क्षतिग्रस्त हो जाती है। हृदय कमजोर हो जाता है जिसके कारण हृदय की धड़कन आवश्यकता से कम अथवा अधिक हो जाती है तथा कभीकभी धड़कन बंद भी हो जाती है। रक्तचाप कम अथवा ज्यादा रहने लगता है। अचानक सीने में दर्द होने लगता है। श्वास लेने में कठिनाई होने लगती है। व्यक्ति को थकान और चक्कर आने लगते हैं। हृदय और छोटी आंत मेरेडियन के मार्ग में आने वाले शरीर के भागों में दर्द होने लगता है। ये सब हृदय रोग के लक्षण होते हैं।

 धड़कन एवं रक्तचाप के असंतुलन के अतिरिक्त रक्त वाहिनियों का कड़ा पड़ जाना (Arterio Sclerosis), वाल्व का खराब हो जाना (Valvular Disorders), रक्त शिराओं का फूल जाना (Varicose Veins) रक्त संचार की कमी से हृदय में तीव्र वेदना होना (Angina Pectoris), हृदय का आकार बढ़ जाना (Heart Enlargement) हृदय के आसपास तरल पदार्थो का एकत्रित हो जाना (Pericardial Infusion) हृदय की मांसपेशियों का सिकुड़ना (Articular Fibrillation), हृदय की क्रिया की गति तीव्र होना (Articular Flutter), हृदय के अवरोध (Heart Block), हृदय की एक या अधिक धमनियों में अवरोध (Coronary Thrombosis), दिल का दौरा पड़ना (Heart Attack) हृदय की धड़कन बंद होना (Heart Failure) आदि रोग हृदय के रोगों के अन्तर्गत आते हैं।

हृदय रोग के प्रमुख कारण

 हमारी अप्राकृतिक असंतुलित, असंयमित, अनियमित,तनावमय, जीवन शैली हृदय रोग का मुख्य कारण होती है। जैसे गलत खानपान, मादक दुव्र्यसनों का सेवन, भोजन, पानी और हवा के सेवन के सनातन नियमों का पालन करना, आवश्यक परिश्रम करना अथवा क्षमता से अधिक शारीरिक अथवा मानसिक श्रम करना। काम, क्रोध, चिन्ता, भय, शोक, मोह, लोभ आदि मानसिक तनावों से ग्रस्त रहने से हृदय रोग होने की संभावना बढ़ जाती है। मानसिक आवेग के समय मस्तिष्क को अत्यधिक रक्त की आवश्यकता होती है। गलत खानपान से आमाशय को पाचन हेतु अधिक रक्त की आवश्यकता होती है। क्षमता से अधिक कार्य करने से भी हृदय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। हृदय हमारे भावों का प्रतिनिधित्व करता है। अतः नकारात्मक सोच से हृदय की ऊर्जा का अपव्यय होता है। हृदय का संबंध ताप ऊर्जा से होता है। जिसकी अभिव्यक्ति वाणी के माध्यम से होती है। अतः अधिक तेज अथवा बिना मतलब अधिक बोलना हृदय  के लिये हानिकारक होता है।

 हृदय में प्राण ऊर्जा का प्रवाह हृदय मेरेडियन से संबंधित होता है। जब तक यह प्रवाह संतुलित और आवश्यकता के अनुरूप रहता है, तब तक रक्त नलिका में विजातीय तत्वों की उपस्थिति प्रभावहीन रहती है। परन्तु निरन्तर अधिक प्राण ऊर्जा की मांग के कारण हृदय मेरेडियन के मार्ग में आने वाले शरीर के अवयवों को अधिक कार्य करना पड़ता है। जिससे उनमें दर्द और पीड़ा की अनुभूति होने लगती है। अतः हृदय मेरेडियन के किसी भी भाग में किसी भी कारण से दर्द होने की स्थिति में रोगी को अधिक सजग और सतर्क रहना चाहिये।

 यिनयांग के सिद्धान्तानुसार हृदय और छोटी आंत जोड़ों में कार्य करते हैं और दोनों का संबन्ध ताप ऊर्जा से होता है। अतः जब दोनों अंगों की ऊर्जाओं में असंतुलन हो जाता है तो हृदय रोग के लक्षण प्रकट हो जाते हैं। जैसे गैस के ऊपर आने से हृदय में होने वाला दर्द अथवा छोटी आंत की मेरेडियन के क्षेत्र में आने वाले शरीर के भाग पर होने वाले दर्द को हृदय रोग का कारण समझ लिया जाता है। सही समय पर सात्विक भोजन करने तथा पाचन के नियमों का पालन करने से इस प्रकार होने वाले हृदय रोगों से सहज ही बचा जा सकता है।

 चीनी पंच तत्त्व के सिद्धान्तानुसार हृदय का नियन्त्रण गुर्दे से होता है और हृदय फेंफड़े को नियन्त्रित रखता है। अतः जब गुर्दे अथवा फेफड़ों में गड़बड़ी हो जाती है तो भी उसका प्रभाव हृदय पर पड़े बिना नहीं रहता। जैसे कभीकभी अकारण पसीना अधिक आने की स्थिति को हृदय रोग का कारण बतला दिया जाता है, परन्तु पसीना अधिक आने का कारण फेंफड़े, बड़ी आंत अथवा गुर्देमूत्राशय में असंतुलन से भी हो सकता है।

 लीवर, हृदय का मातृ अंग और तिल्ली हृदय का पुत्र अंग होता है अर्थात् हृदय ऊर्जा के उत्पादन में लीवर तथा तिल्ली की प्राण ऊर्जा के उत्पादन में हृदय का योगदान होता है। लीवर और तिल्ली की गड़बड़ी का भी हृदय पर प्रभाव पड़ता है। अतः रोगी को हृदय रोगी घोषित करने से पूर्व चिकित्सक को समग्र दृष्टिकोण से निदान करना चाहिये तथा रोग से विभिन्न अंगों पर पड़ने वाले प्रभावों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। सहयोगी अंगों में प्राण ऊर्जा का संतुलन कर हृदय के विभिन्न रोगों का उपचार बिना शल्य चिकित्सा प्रभावशाली ढ़ंग से किया जा सकता है।

 हृदय शरीर का प्रमुख अंग है तथा उसके कार्य करते ही मृत्यु हो जाती है। जिस प्रकार परिवार के किसी सदस्य के असाध्य रोग से पीड़ित होने पर अभिभावक चिन्तित रहता है तथा दूसरा अभिभावक अपने स्वयं के रोग से पीड़ित होने के कारण चिन्तित रहता है। बाह्य रूप से दोनों  चिन्तित रहते हैं,  परन्तु  दोनों की चिन्ता का कारण और निवारण का उपाय अलगअलग होता है। ठीक उसी प्रकार शरीर के अन्य महत्वपूर्ण अंगों में खराबी के कारण हृदय पर पड़ने वाले अतिरिक्त कार्यभार तथा हृदय के अवयवों में गड़बड़ी होने से उत्पन्न स्थिति का अलगअलग विश्लेषण और उपचार आवश्यक होता है। समस्या का मूल कारण मालूम करना जरूरी होता है। अतः जब तक समग्र दृष्टिकोण से हृदय रोग के लक्षण प्रकट हों तो रोगी को बाह्य लक्षणों की रिपोर्ट के आधार पर हृदय रोगी घोषित करना न्याय संगत नहीं कहा जा सकता। हृदय रोग व्यक्ति को जितना  परेशान नहीं करता, उससे ज्यादा हृदय रोग बतलाने के पश्चात् रोगी की मानसिकता, परिजनों की सजगता से रोगी को निरन्तर आवश्यक परहेज रखने हेतु आदेश एवं निर्देश आग में घी का कार्य करता है। जीवन के प्रति उत्साह समाप्त होने लगता है। मृत्यु का भय प्रतिक्षण लगने लगता है। चिन्ता, दुःख, तनाव, भय आदि नकारात्मक चिन्तन से शरीर में पंच ऊर्जाओं का असंतुलन बढ़ने लगता है और धीरेधीरे व्यक्ति वास्तव में हृदय रोगी बन जाता है। आजकल पचास प्रतिशत से अधिक हृदय रोग का उपचार करवाने वाले व्यक्ति प्रारम्भिक अवस्था में हृदय रोग से पीड़ित नहीं होते, परन्तु चिकित्सकों द्वारा हृदय रोगी बतला देने के कारण  मानसिक रूप से हृदय रोग से पूर्णतः ग्रसित हो जाते हैं।

हृदय रोगों में विविध सुरक्षात्मक उपचार

 आधुनिक विज्ञान ने हृदय रोग में राहत हेतु बाईपास सर्जरी, वाल्व परिवर्तन, पेसमेकर जैसी अनेक अत्यन्त खर्चीली सुविधाएँ उपलब्ध की हैं, परन्तु उनका उपयोग साधारण रोगी नहीं कर सकता। साथ ही शल्य चिकित्सा के पश्चात् सदैव दवाईयां की दासता और उनसे पड़ने वाले दुश्प्रभावों के कारण अन्य रोगों का सामना भी करना पड़ सकता है। अतः स्वावलंबी प्रभावशाली चिकित्सा आधुनिक युग की सर्वाधिक आवश्यकता है। जब आवश्यकतानुसार अनेक स्वावलम्बी उपचार एक साथ किए जायें तो रोग तुरन्त नियन्त्रित हो जाता है। लेखक ने स्वयं हृदय रोग से पीड़ित होने पर, बिना किसी दवा स्वावलम्बी चिकित्साओं द्वारा अपने आपको स्वस्थ करने का अनुभव किया है।

 शरीर में किसी भी रोग का एक प्रमुख कारण होता है आवश्यक प्राण शक्ति का अभाव। अतः रोगी को अनावश्यक कार्यों में अपनी प्राण ऊर्जा व्यय नहीं करनी चाहिए। वीर्य आरोग्य का मूल आधार होता है। अतः संयमित जीवन शैली अपना उसकी सुरक्षा करनी चाहिए। स्वाध्याय, ध्यान, मंत्र, जप, तप, भक्ति एवं प्रार्थना द्वारा भी प्राण ऊर्जा प्राप्त होती है। शरीर का आभामण्डल शुद्ध होता है एवं हृदय रोग ठीक होता है।

1. सूर्य मुखी तेल द्वारा गंडूस सूर्यमुखी तेल में रक्त के विकारों को रक्त से अलग करने की क्षमता होती है। अतः एक चम्मच सूर्यमुखी तेल को मुंह में भरकर 15-20 बार घूमाने से चेहरे की समस्त मांसपेशियाँ सक्रिय होने लगती है। जब रक्त मुंह की नाड़ियों से होकर गुजरता है तो तेल उसमें उपस्थित रोगाणुओं एवं विकारों को अपनी तरफ आकर्षित कर लेता है और रक्त शुद्धि में सहयोग देता है। 15-20 मिनट गंडूस के पश्चात् तेल को थूक मुंह एवं उस स्थान को साफ कर लेना चाहिए। रोग की स्थिति अनुसार यह प्रक्रिया दिन में एक से अधिक बार की जा सकती है। रक्त विकार हृदय रोगों का प्रमुख कारण होता है एवं उसकी शुद्धि होते ही हृदय संबंधी रोग ठीक होने लगते हैं।

2. दाणा मैथी स्पर्श द्वारा उपचार दाणा मैथी रक्त षोधक, पित्त नाषक तथा कफ और वात का षमन करती है। अतः हृदय में जिस स्थान पर दर्द अथवा भारीपन हो उस स्थान पर कागज की टेप पर मेथी दाणा चिपका कर लगा दें। अतः जिस स्थान पर मैथी का स्पर्श किया जाता है, वहां वात और कफ विरोधी कोशिकाओं का सृजन होने लगता हैं, शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने लगती है। दर्द वाले अथवा कमजोर भाग में विजातीय तत्वों की अधिकता के कारण शरीर के उस भाग का आभा मंडल विकृत हो जाता है। मैथी अपने गुणों वाली तरंगें शरीर के उस भाग के माध्यम से अन्दर में भेजती है। जिसके कारण शरीर में उपस्थित विजातीय तत्व अपना स्थान छोड़ने लगते हैं और प्राण ऊर्जा का प्रवाह संतुलित होने लगता है। फलतः रोगी स्वस्थ होने लगता है।

3.  स्वमूत्र चिकित्सा हृदय रोगियों को अपने स्वमूत्र का पान अवश्य करना चाहिए क्योंकि शिवाम्बु में शरीर के लिए सैकड़ों उपयोगी रसायन होते हैं, जो रक्त के शुद्धिकरण, भोजन के पाचन एवं श्वसन क्रियाओं को सुव्यवस्थित, नियंत्रित और संतुलित रखने के साथसाथ शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं। आधुनिक चिकित्सकों द्वारा हृदय घात के समय दिया जाने वाला युरोकाइन इंजेक्क्षन भी मानव मूत्र से ही बनता है। शिवाम्बु के सेवन से रक्त वाहिनियों की सफाई हो जाती है और बहुत बार शल्य चिकित्सा की आवश्यकता नहीं होती।

4.  चुम्बक चिकित्सा हृदय पर कुछ समय के लिए जब तक सिर में भारीपन अथवा चक्कर आयें चुम्बक का दक्षिणी ध्रुव को स्पर्श करना चाहिए, जिससे हृदय ताकतवर होने लगता है। साथ ही हृदय बियोल मेरेडियन में प्राण ऊर्जा बढ़ाने से हृदय शक्तिशाली होता है।

5.  एक्युप्रेशर हृदय रोगियों को पगथली और हथेली में हृदय, छोटी आंत, तिल्ली, गुर्दो, फेफड़ों, यकृत, मेरूदण्ड, मस्तिष्क एवं सभी अन्तःश्रावी ग्रन्थियों के मुख्य प्रतिवेदन बिन्दुओं पर नियमित दबाव देने के साथ अन्य पीड़ा ग्रस्त प्रतिवेदन बिन्दुओं पर भी एक्युप्रेशर करना चाहिए। साथ ही हाथ एवं पैर की अंगुलियों के अंतिम सिरे पर दर्दस्थ प्रतिवेदन बिन्दुओं पर भी दबाव देने से सभी अंगों की मेरेडियनों में प्राण ऊर्जा संतुलित होने लगती है।

6.  स्वर परिवर्तन से उपचार हृदय रोगियों को कार्य के अनुरूप स्वर संचालन हेतु विशेष सजगता रखनी चाहिये। अचानक हृदय घात होते ही, जो स्वर चलता है उसमें परिवर्तन करने से तुरन्त लाभ होता है।

7. उषापान उषापान से आमाशय और आंतों की सफाई होती है। जिससे पाचन तंत्र बराबर कार्य करने लगता है एवं हृदय को आवश्यकता से अधिक कार्य नहीं करना पड़ता।

8.  मौन हंसी द्वारा रोगोपचार रोगी को प्रातःकाल प्रकृति के शुद्ध आक्सीजन युक्त वातावरण में खुलकर 10 से 15 मिनट तक हंसना चाहिए, जिससे शरीर में रक्त का प्रवाह तेजी से होने लगता है और रक्त नलिका में जमे हुए विकार अपना स्थान छोड़ने लग जाते हैं तथा रक्त का प्रवाह संतुलित होना प्रारम्भ हो जाता है। नाक में शुद्ध देशी गाय का घी की बूंदें डालने से श्वसन क्रिया में लाभ होता है।

9. मुस्कान का अभ्यास प्रातः 15-20 मिनट मुस्कुराता हुआ चेहरा रखने का अभ्यास करने से मानसिक तनाव, आवेग, अधीरता, भय, चिंता आदि दूर होते हैं। सकारात्मक सोच विकसित होता है। अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ सक्रिय होती है जिससे शुद्ध हारमोन्स का निर्माण होता है। मानसिक संतुलन बना रहता है। दुःखी, चिन्तित, तनावग्रस्त, भयभीत, निराश, क्रोधी आदि मुस्करा नहीं सकते और यदि उन्हें किसी भी कारण से चेहरे पर मुस्कराहट आती है तो तनाव, चिंता, भय, दुःख, क्रोध आदि उस समय उनमें रह नहीं सकते, क्योंकि दोनों एक दूसरे के विरोधी स्वभाव के होते हैं। अतः किसी भी आकस्मिक स्थिति में रोग सहनशक्ति के बाहर हो तथा दवा लेना आवश्यक हो उस समय चन्द मिनटों तक मुस्कराता चेहरा बनाने मात्र से तुरन्त राहत मिलती है।

10. सूक्ष्म अंग व्यायाम शरीर के प्रत्येक अंग, उपांग एवं जोड़ों को जितना संभव हो आगेपीछे, दांयेबांये, ऊपरनीचे घुमाने, खींचने, दबाने, सिकोड़ने, फैलाने अथवा हथैली से मसाज करने से संबंधित मांसपेशियों एवं जोड़ों में जमा विजातीय तत्व दूर होने से रक्त परिभ्रमण नियमित होने लगता है।

11. सूर्योदय दर्शन सूर्योदय के समय वायुमण्डल में अदृश्य परा बैंगनी किरणों (Ultra Violet Rays) का विशेष प्रभाव होता है, जो विटामीन डी का सर्वोत्तम स्रोत होती है। ये किरणें रक्त में लाल और श्वेत कणों की वृद्धि करती है। श्वेत कण बढ़ने से शरीर में रोग प्रतिकारात्मक शक्ति बढ़ने लगती है। जिससे सभी आवश्यक तत्वों का पोषण होता है एवं हृदय रोग ठीक होने लगता है।

12. एकाग्रता से रोगोपचार प्रातःकाल जितना जल्दी उठ सकें, निद्रा त्यागकर शांत एकान्त खुले स्वच्छ वातावरण में आंखें एवं मुंह बंद कर हृदय पर मसाज करने से सारी चेतना वहाँ पर केन्द्रित होने लगती है, जिससे हृदय शक्तिशाली होने लगता है।

13.  हृदय और छोटी आंत बियोल मेरेडियन में ऊर्जा के प्रवाह को संतुलित रखना चाहिए। जिससे हृदय की कार्य क्षमता बढ़ती है। शरीर के अन्य भागों में सहयोगी रोगों के लक्षण प्रकट होते हों उसके अनुरूप उस भाग से प्रवाहित होने वाली मेरेडियन की संबंधित असंतुलित ऊर्जा का संतुलन करने से हृदय रोग के दुष्परिणामों से सहज बचा जा सकता है। यदि शरीर के किसी भाग में जलन हो तो ताप ऊर्जा को कम करना, अवरोध गया हो तो वायु एवं नमी ऊर्जा को बढ़ाना, चर्म रोग हो गये हों तो शुष्क ऊर्जा घटाना, अचेतना हो तो ताप ऊर्जा बढाना, असहनीय दर्द अथवा गांठ हो तो ठण्डक ऊर्जा घटाना, कंपन हो तो संबंधित बियोल मेरेडियन की वायु ऊर्जा को कम करने से तुरन्त अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं।

14.  यदि हृदय और धमनियों में अवरोध गया हों तो, हृदय बियोल मेरेडियन की नमी ऊर्जा बटन चुम्बक का दक्षिणि ध्रुव स्पर्श कर बढ़ानी चाहिए जिससे रक्त पतला होने लगता है।

15.  यदि हृदय कमजोर हो गया हो अथवा उसकी कार्य क्षमता मंद हो गई हो तो, हृदय की ठण्डक ऊर्जा को घटाना और ताप ऊर्जा बढ़ानी चाहिए।

16.  हृदयघात होने पर हृदय, पेरिकार्डियन एवं कण्ट्रोलिंग वेसल बियोल मेरेडियन की ताप ऊर्जा बढ़ाने, तिल्ली बियोल मेरेडियन की नमी ऊर्जा बढ़ाने एवं यकृत बियोल मेरेडियन की वायु ऊर्जा बढ़ाने तथा गुर्दे की ठंडक ऊर्जा कम करने से हृदय के कार्य में अन्य अंगों का सहयोग मिलने से हृदय को आराम मिल जाता है, जिससे हृदय रोग में काफी राहत मिलती है।

17.  हृदय रोगियों को मेडुला मसाज नित्य करना चाहिये जिससे रक्तचाप एवं तनाव में तुरन्त राहत मिलती है।             

18.  हृदय रोगियों का नाभि केन्द्र प्रायः विकार ग्रस्त हो जाता है। स्पन्दन केन्द्र में नहीं रहता। अतः नाभि केन्द्र को स्वस्थ रखना आवश्यक होता है। जब तक नाभि ठीक हो जाए, नियमित नाभि का संतुलन करना चाहिए।

19.  हृदय संबंधी रोगियों को अपने पैरों, गर्दन और मेरूदण्ड का संतुलन नित्य परीक्षण कर ठीक रखना चाहिए।

20.  हृदय रोगियों को नियमित शुद्ध हवा में टहलना, विभिन्न प्राणायाम करना, पर्यावरण एवं प्रदूषण रहित वातावरण में रहना अति आवश्यक होता है। विशेषरूप से नाड़ी शोधन एवं कपालभांति प्राणायाम नियमित करना चाहिए।

21.  हृदय पर कपिंग द्वारा कुछ समय सहनीय खिंचाव चिकित्सा करनी चाहिये।

22.  हृदय रोगियों को चिंता, तनाव, भय, क्रोध जैसे आवेग पैदा करने वाली परिस्थितियों से यथा संभव बचना आवश्यक है। अत्यधिक खुशी और दुःख के समाचार उन्हें तुरन्त नहीं बतलाने चाहिये। अत्यधिक भावुक एवं अधीर होने के कारण ऐसे समाचार सुनते ही कभीकभी हृदयघात हो सकता है। उस हेतु नियमित संयमित जीवनशैली, आत्म चिंतन, स्वाध्याय, ध्यान, सद्साहित्य का अध्ययन, प्रेरणात्मक भजनों का गायन एवं श्रवण, सकारात्मक सोच, सप्ताह में एक उपवास करना चाहिए। तुरन्त प्रतिक्रिया करने से यथा संभव बचना चाहिए।

23.  हृदय रोगियों को अपान वायु मुद्रा एवं नमस्कार मुद्रा का अधिक से अधिक अभ्यास करना चाहिए।

24.  हृदय रोग का वाणी से सीधा संबंध होता है। अतः कम बोलना, मौन रखना हृदय रोगियों के लिए बहुत आवश्यक है।

हृदय रोग का दौरा पड़ने पर क्या करें?

 हृदय रोग के कारण अचानक हृदय की धड़कन बंद हो जाये तो प्रारम्भिक चन्द मिनटों की सजगता से किया गया उपचार रोगी का जीवन बचा सकता है। सर्व प्रथम रोगी का मुँह खोलकर जीभ को खींचकर सीधा करें। फिर मुख पर हलका कपड़ा रख अपने मुँह को रोगी के मुँह से हाथ के सहारे सटा दें और मुँह में श्वास भरकर जोर से फूंकें। साथ ही दूसरे व्यक्ति से रोगी के सीने पर दोनों हाथों से दबाव देकर कृत्रिम श्वास हेतु पम्पिंग करें तथा दोनों हथैलियों एवं पगथलियों जो ठण्डी हो जाती है उन पर तेज गति से मसाज करें।  यह प्रक्रिया तब तक करें जब तक रोगी की श्वसन क्रिया पुनः प्रारम्भ हो जाए।

 इस प्रक्रिया से हृदय मेरेडियन में प्राण ऊर्जा का प्रवाह नियमित होने लगता है और रोगी की श्वसन क्रिया यानी हृदय  का धड़कना प्रारम्भ हो जाता है। उसके पश्चात् रोगी को चन्द दिनों तक पूर्ण आराम और मौन में रहकर आवश्यक उपचार करने से भविष्य में हृदय रोग होने की संभावना कम हो जाती है।

 यदि हृदय रोगी उपर्युक्त बातों का पालन कर अनावश्यक कार्यो एवं चिन्तन में ऊर्जा का अपव्यय करें, खाने, पीने वाणी का संयम रखें, वाणी का प्रयोग कम से कम करें, अधिक समय मौन में रहें, तनाव, चिन्ता, भय दूर करने वाले सद्साहित्य का अध्ययन करें, प्रेरणात्मक भजनों अथवा गीतों का श्रवण या गायन करें तो, हृदय रोग तुरन्त ठीक हो सकता है हृदय रोगी बिना शल्य चिकित्सा स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर सकते हैं। अतः हम दवाओं और शल्य चिकित्सा द्वारा जीवन भर परावलम्बी जीवन जीएं अथवा प्रभावशाली स्वावलम्बी जीवन जीएं, हमारे स्वयं के विवेक पर निर्भर करता है। विस्तृत एवं अधिक जानकारी हेतु लेखक द्वारा लिखित पुस्तक ‘‘आरोग्य आपकाका अध्ययन करें, जो हमारी Website पर उपलब्ध है।

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