बिना दवा दमा का प्रभावशाली उपचार

बिना दवा दमा का प्रभावशाली उपचार

 

स्वास्थ्य हेतु सही श्वसन क्रिया आवश्यक

 यदि किसी भिखारी को लाखों रुपये देने के बदले दस से पन्द्रह मिनट तक श्वास रोकने के लिये कहते है तो वह उसके लिये तैयार नहीं होता। ऐसी अमूल्य श्वसन क्रिया हमारे स्वयं के द्वारा जन्म से अनवरत संचालित होती है। परन्तु हम उसका महत्त्व नहीं समझते। क्या हम उस अमूल्य श्वास का उपयोग बराबर कर रहे हैं? स्वास्थ्य के प्रति सजग व्यक्तियों के चिंतन की अपेक्षा है।

 हमारा श्वसन इतनी स्वाभाविक और सहज क्रिया है कि हमारी असजगता में भी स्वतः सदैव चालू रहती है। चाहे हम निद्रा में हों अथवा जागृत अवस्था में, हमारी श्वसन क्रिया अविराम गति से निरन्तर चलती रहती है।

 दो श्वासों के बीच का समय ही जीवन होता है। प्रत्येक व्यक्ति के श्वासों की संख्या निश्चित होती है। जो व्यक्ति आधा श्वास लेता है वह आधा जीवन ही जीता है। जो सही ढंग से गहरा ओर पूरा श्वास लेता है, वही पूर्ण जीवन जीता है। अतः जो व्यक्ति जितनी धीमी और दीर्घ/गहरी श्वास लेता है, उसकी आयु उतनी ही ज्यादा होती है। जो तेज, अधूरी और जल्दीजल्दी श्वास लेते हैं, उनकी आयुष्य कम होती है। अधूरी श्वास लेने वालों के फेंफड़ों का बहुत सा भाग निष्क्रिय पड़ा रहता है। जिन मकानों की सफाई नहीं होती, उनमें गन्दगी जमा होने लगती हैं ठीक उसी प्रकार फेंफड़ों के जिन वायु कोषों में श्वास नहीं पहुँचती वहां फेंफड़ों को क्षति पहुँचाने वाले विजातीय तत्व जमा होने लगते हैं और धीरेधीरे बढ़तेबढ़ते वे इतने अधिक बढ़ जाते हैं कि, उनको वहाँ से दूर हटाना आसान नहीं होता। परिणाम स्वरूप श्वसन संबंधी रोगों से शरीर पीड़ित हो जाता है। अतः श्वसन क्रिया में फेंफड़ों का जितना ज्यादा प्रसारण और संकुचन होता है, श्वसन उतना ही उपयोगी एवं प्रभावशाली होता है।

दमा क्या है?

 हमारे शरीर में फेंफड़ा एक लचीला, हल्का स्पोन्जी और रबड़ की तरह फैलने वाला अंग होता है। जिसका प्रमुख कार्य श्वास के माध्यम से वायु के साथ आक्सीजन को ग्रहण करना तथा रक्त शुद्धि के पश्चात् जो कार्बन डाईआक्साईड बनती है, उसे निःश्वास द्वारा बाहर फेंकने का होता हैं। जब हम श्वास लेते हैं तो फेंफड़ा फूल जाता है और जब श्वास निकालते हैं तो संकुचित हो जाता है। फेंफड़े दो होते हैं। दाहिना फेंफड़ा बांयें फेंफड़े से कुछ बड़ा होता  है।

 श्वास नली तथा उसके बाद छोटीछोटी श्वास नलियों द्वारा हवा फेंफड़ों में पहुँचती हैं। जब किसी कारण से श्वास नलियों के छिद्र सिकुड़ जाते हैं अथवा उनमें श्लेष्मा भर जाने से बंद हो जाते हैं तो उनमें से होकर वायु का फेंफड़ों तक नियमित रूप से आवागमन प्रभावित होने लगता हैं। फेंफड़ों को आवश्यकता के अनुसार आक्सीजन लेने के लिए अधिक ताकत लगानी पड़ती है और उसके कारण श्वास लेने में कठिनाई होने लगती है। शरीर की ऐसी अवस्था को श्वास रोग अथवा अस्थमा या दमा कहते हैं।

दमा क्यों होता है?

 श्वास हमारे जीवन की मुख्य प्रक्रिया है। श्वास प्राणों का आधार होता है। श्वास से रक्त की शुद्धि होती है। जो वायु हम श्वास द्वारा ग्रहण करते हैं वह नाक, गला, स्वर यंत्र, श्वास नलिका से होती हुई छोटीछोटी श्वास नलियों द्वारा फेंफड़ों में पहुँचती है। अतः जब श्वसन तंत्र से संबंधित शरीर के इन अवयवों के कार्य में प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष कारणों से, अवरोध उत्पन्न होने लगता हैं तो श्वसन क्रिया प्रभावित होने लगती है।

 दूसरी बात प्रदूषित अथवा आक्सीजन की कमी वाले वातावरण में श्वास लेने से फेंफड़ों में पूर्ण रूप से रक्त की शुद्धि नहीं हो पाती और रक्त के विकार बढ़ने लगते हैं। हमारे गलत खानपान एवं अप्राकृतिक जीवन शैली से भी हमारी प्राण ऊर्जा का अनावश्यक दुरुपयोग अथवा अपव्यय होता है तथा रक्त में विकार बढ़ने लगते हैं। जब ऐसा विकार युक्त रक्त शुद्धिकरण हेतु फेंफड़ों की श्वास नलियों में पहुँचता है तो नलियों में दूषित विकारों के जमा होने से श्वास नलियाँ सिकुड़ने लगती है। श्वास नली भी कमजोर और दोषयुक्त हो जाती है और अस्थमा के लक्षण प्रकट होने लगते हैं।

 फेंफड़ों में पहुँचने के पहले श्वसन द्वारा ग्रहण वायु का शुद्धिकरण और शरीर के तापक्रम के अनुरूप गर्मी और नमी की आवश्यकता होती है। नाक में वायु को नम बनाने के लिये नमी का उत्पादन करने वाली ग्रन्थियाँ एक निश्चित मात्रा में द्रव का उत्पादन करती है। परन्तु यदि हम मुँह से श्वास लेते हैं तो वायु सीधी फेंफड़ों में चली जाती है। अतः श्वास हमेशा नाक से ही लेनी चाहिए। अन्यथा दमा होने की संभावनाएँ बढ़ सकती है।

 फेंफड़े मेरेडियन में ऊर्जा का प्रवाह असंतुलित होने से फेंफड़े की कार्यक्षमता कम हो जाती है। जिससे भी दमा का रोग हो सकता है। अतः शरीर में जिस मार्ग से फेंफड़े की मेरेडियन प्रवाहित होती है, वहाँ पर भी दमा के साथसाथ अन्य रोगों के लक्षण प्रकट हो सकते हैं। परिणाम स्वरूप फेंफड़े मेरेडियन के एक्युप्रेशर प्रतिवेदन बिन्दुओं पर दबाव देने से पीड़ा होने लगती है।

दमा के प्रकारः

 दमा मुख्यतयाः दो प्रकार का होता है– 1. श्वास नली में सूजन से होने वाला दमा एवं 2. एलर्जिक अस्थमा

श्वास नली में सूजन से होने वाला दमाः

 श्वास नली में सूजन से होने वाले अस्थमा का कारण प्रायः सर्दी, अधिक नमी वाला वातावरण या मौसम परिवर्तन से होता है। जिसका प्रारम्भ प्रायः सर्दी, जुकाम, खांसी, गले में संक्रमण आदि से होता है। समुद्र के आसपास रहने वाले अथवा वर्षा के मौसम में अधिक नमी वाले वातावरण में रहने वाले बहुत से व्यक्ति जिनका श्वसन तंत्र कमजोर होता है, अस्थमा होने की संभावना रहती हैं। जैसे ही वे बिना नमी वाले शुष्क वातवारण में चले जाते हैं, उनको अस्थमा से स्वतः राहत मिल जाती हैं।

एलर्जिक अस्थमाः

 हमारा शरीर शब्द, रंग, रस, गंध एवं स्पर्श के माध्यम से प्रकृति के पुद्गलों को ग्रहण करता है। कुछ  पुद्गलों का सेवन अनुकूल अथवा अच्छा लगता है तो कुछ का प्रतिकूल यानी नापसन्द। ऐसे ही कुछ नापसन्द पुद्गलों के शरीर में प्रवेश के साथ ही तुरन्त प्रतिक्रिया होने लगती है। गंध के ऐसे ही पुद्गलों जिनको हमारा श्वसन तंत्र स्वीकार करते समय प्रतिक्रिया करता है, उसे एलर्जी कहते हैं तथा उसके कारण श्वसन तंत्र को क्षमता से अधिक कार्य करने के कारण होने वाले अस्थमा को एलर्जिक अस्थमा कहते हैं।

 एलर्जी का प्रमुख कारण शरीर का असंतुलन, विभिन्न तंत्रों में तालमेल का अभाव एवं शरीर की प्रतीकारात्मक क्षमता में कमी होता है। किसी गंध के प्रति अत्यधिक नापसंद संवेदनशीलता भी इसका मुख्य कारण होती है। अतः जिन पदार्थो की गंध शरीर सहन नहीं कर सकता, उस वातावरण से अलग होते ही अस्थमा ठीक होने लगता है। अस्थमा का जैसा कारण होता है, उसके निवारण से ही दमा से मुक्ति मिल सकती है।

दमा होने के और भी कई कारण हो सकते हैं

 आजकल दमा के रोग में उपचार करते समय प्रायः फेंफड़ों की खराबी को ही प्रधानता दी जाती है और दमा का उपचार करते समय सारा ध्यान फेंफड़ों तक ही सीमित रखा जाता है।

 यदि रोग का कारण फेंफड़ों की खराबी तक ही सीमित हो, तब तो उपचार से रोग ठीक हो सकता है, परन्तु यदि रोग का मूल कारण फेंफड़े से संबंधित अन्य सहयोगी अंग में हो तो रोग से मुक्ति प्रायः नहीं मिलती। फिर भी आजकल प्रायः दमा से पड़ने वाले अन्य अंगों पर प्रभाव की उपेक्षा होती है। इसी कारण कभीकभी लम्बे उपचार के बावजूद दमा से मुक्ति नहीं मिलती। मात्र थोड़े समय के लिये राहत मिल सकती है। दवा जीवन की आवश्यकता हो जाती है।

 शरीर अपने आप में पूर्ण समन्वय से कार्य करता है। किसी भी अंग के रोग ग्रस्त हो जाने पर अन्य अंगों में प्रत्यक्ष परोक्ष रूप से कुछ कुछ अवश्य प्रभाव पड़ता है। अन्य अंगों में होने वाले असंतुलन को शीघ्र एवं सरलता से दूर किया जा सकता है। अन्य सहयोगी कारण दूर हो जाने से रोग शीघ्र नियन्त्रण में जाता है और उसका स्थायी रूप से निवारण किया जा सकता है।

 यिन यांग के सिद्धान्तानुसार बड़ी आंत फेंफड़े का पूरक अंग होती है। अतः कभीकभी जब बड़ी आंत बराबर कार्य नहीं करती है, तो फेंफड़ों की कार्य क्षमता भी घट जाती है और अस्थमा के लक्षण प्रकट होने लगते हैं। ऐसी स्थिति में प्रायः अधिकांश चिकित्सा पद्धतियाँ उसका कारण फेंफड़ों में ही ढूढ़ती है। परन्तु लम्बे उपचार के बावजूद रोगी को अस्थमा से राहत नही मिलती। जिस प्रकार कोई व्यक्ति अपनी पत्नि की बीमारी के कारण तनाव ग्रस्त हो तो उस व्यक्ति के तनाव का उपचार तब तक लाभप्रद नहीं होगा, जब तक कि उसकी पत्नी रोग मुक्त हो जाये, जिसके कारण वह व्यक्ति तनावग्रस्त है। ठीक उसी प्रकार जब तक बड़ी आंत बराबर कार्य नहीं करेगी, फेंफड़ों का उपचार करने से दमा ठीक नहीं हो सकता। फेंफड़े और बड़ी आंत में आपसी समन्वय, संतुलन और तालमेल होते ही लम्बे समय से पीड़ित अस्थमा के रोगी चन्द दिनों में दमा के रोग से छुटकारा पा सकते हैं।

 जो व्यक्ति देर से निद्रा त्यागते हैं, वे जब बड़ी आंत सक्रिय होती है तब मल नहीं त्याग सकते। परिणाम स्वरूप अपेक्षाकृत उन्हें कब्ज की शिकायत ज्यादा होती है। बड़ी आंत और फेंफड़ों में असंतुलन रहने लगता है जिससे फेंफड़ों और बड़ी आंत संबंधी अन्य रोगों के होने की अधिक संभावना रहती है।

 फेंफड़े मेरेडियन में प्राण ऊर्जा का प्रवाह तिल्ली मेरेडियन से होता है। तिल्ली हमारे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता का नियन्त्रण करती है। उसके बराबर कार्य करने के कारण ही शरीर को एलर्जी की शिकायत होती है। अतः यदि तिल्ली एवं फेंफड़ों की मेरेडियन में प्राण ऊर्जा का प्रवाह बढ़ा दिया जाये तो एलर्जिक अस्थमा से राहत मिल सकती है।

 यिन यांग सिद्धान्तानुसार तिल्ली का पूरक अंग आमाशय होता है। अतः तिल्ली के बराबर कार्य करने का मुख्य कारण पाचन तंत्र की गड़बड़ी भी हो सकता है। अतः अस्थमा के रोगियों के लिये पाचन के नियमों का पालन भी उसका उपचार है।

 पंच तत्त्व के सिद्धान्तानुसार तिल्ली फेंफड़े का मातृ अंग होता है। अतः जब माता से पुत्र को पूर्ण पोषण नहीं मिलता है तो पुत्र वंशानुगत रोग से भी प्रभावित हो सकता है। अतः तिल्ली पर दक्षिणी ध्रुव का चुम्बक अथवा दाणा मेथी लगाने से तिल्ली सशक्त होती है और एलर्जिक अस्थमा हों या वंशानुगत कारणों से अस्थमा हों, प्रायः निश्चित राहत मिलती है।

 पंच तत्त्व के सिद्धान्तानुसार गुर्दे, फेंफड़ों के पुत्र अंग होते हैं। परन्तु फेंफड़ों के पूर्ण क्षमता से कार्य करने के कारण गुर्दो को रक्त शुद्धिकरण के लिये अधिक क्रियाशील होना पड़ता है। इसी प्रकार हृदय फेंफड़ों के कार्यो पर नियन्त्रण रखता हैं और यकृत, फेंफड़ों से नियन्त्रित होता है। अतः हृदय और यकृत भी फेंफड़े की कार्य क्षमता बराबर होने से प्रभावित हुए बिना नहीं रहते। पेरिकार्डियन (मस्तिष्क) सभी यिन यांग अंगों के संचालन में तालमेल रखता है परन्तु दमा के कारण उसके कार्यो पर भी प्रभाव पड़ता है। इस प्रकार सारा शरीर पूर्ण समन्वय और तालमेल से कार्य करता है और किसी एक की खराबी का प्रत्यक्ष परोक्ष दूसरे अवयव पर भी प्रभाव पड़ता है। जितना और जैसा प्रभाव पड़ता है वैसे ही अन्य रोगों के लक्षण प्रगट होने लगते हैं। इसी कारण सभी अस्थमा के रोगियों के सभी लक्षण एक जैसे नहीं होते हैं। जो अंग जितनाजितना प्रभावित होता है उसके अनुरूप उससे संबंधित रोग के लक्षण प्रकट होते हैं। अतः लक्षणों के अनुरूप बियोल मेरेडियन में ऊर्जाओं का संतुलन करने से दमा शीघ्र ठीक होने लगता है। फिर भी उपचार करते समय निम्न सामान्य बातों का आचरण आवश्यक हैं।             

दमा का उपचारः 

1.  प्राणायाम जिस प्रकार बाह्य शरीर की शुद्धि के लिए स्नान की जाती है, उसी प्रकार शरीर की आन्तरिक अवयवों की शुद्धि के लिए प्राणायाम का बहुत महत्त्व होता है। प्राणायाम ही सम्यक् प्रकार से श्वसन क्रिया को संचालित, नियन्त्रित करने की विधि होती है। प्राणायाम से फेंफड़े मजबूत होते हैं। रक्त विकार दूर होते हैं। इसके समान स्वास्थ्य सुरक्षा की सहज, सरल, स्वावलंबी, प्रभावशाली अन्य विधि प्रायः संभव नहीं होती। छाती का कमजोर और कम चौड़ा होना स्वास्थ्य के लिये एक अभिशाप होता है, जिसका कारण हमारी अधूरी श्वसन क्रिया होती है। अपनी दोनों हथैलियों की मुट्ठी बंद कर नाभि के दोनों तरफ एक से डेढ़ इंच स्पर्श करने से श्वसन  पूरा नाभि तक होने लगता है।

2.  एक्युप्रेशर रोग निरीक्षण, परीक्षण और निदान की सर्वश्रेष्ठ पद्धतियों में से एक है। अतः दबाव देने का तरिका सीख स्वयं को ही हथेली और पगथली के दर्दस्थ बिन्दुओं का पता लगाकर, उन पर दबाव देना चाहिए। जिससे शरीर में सहायक रोग पहले दूर हो जाने से श्वसन तंत्र को अधिक प्राण ऊर्जा मिलने लगती है।

 रोग की अवस्था में फेंफड़ों के प्रमुख प्रतिवेदन केन्द्रों, अन्तःस्रावी ग्रन्थियों, मेरूदण्ड, डायाफ्राम, हाथ और पैर की अंगुलियों के अंतिम किनारे पर स्थित जोनल प्रतिवेदन बिन्दुओं पर तो विशेष एकाग्रता पूर्वक एक्युप्रेशर का विधिवत् अवश्य उपचार करना चाहिए।

3.  प्रातःकाल शिवाम्बु का पान, शिवाम्बु से नेति क्रिया करने एवं उसके आधा घंटें पश्चात् उषापान करने से आंतों में जमा मल आसानी से बाहर निकल जाता है। बड़ी आंत फेंफड़े का यांग अंग होता है। अतः दमा के रोगियों को आंतों की सफाई हेतु विशेष सजग और सावधान रहना चाहिए। रात्रि में निद्रा लेने से पूर्व शिवाम्बु पान भी काफी उपयोगी होता है, जिससे रातभर में शिवाम्बु शरीर की आन्तरिक सफाई आसानी से कर देता है। अधिकांश शिवाम्बु चिकित्सक दमा के रोगियों को लम्बे उपवास के साथ शिवाम्बु कल्प का परामर्श देते हैं। शिवाम्बु को नासाग्र से पीने से दमा में तीव्र गति से लाभ होता है। परन्तु शिवाम्बु को चुम्बक ऊर्जा से ऊर्जित करने, रंगीन बोतलों में आवश्यकतानुसार सूर्य  ऊर्जा से ऊर्जित करने, पिरामीड में रखने से उसका प्रभाव अनेक गुणा बढ़ जाता है।

4.  दाणा मेथी वात और कफ नाशक है। अतः श्वास लेने अथवा खांसी आने पर सीने के  जिस भाग में कठिनाई अथवा भारीपन हों, दाणा मेथी स्पर्श कर रखने से तुरन्त चामत्कारिक राहत मिलती है। कंधों के नीचे पीछे उभरे भाग पर, कमर के पीछे गुर्दे के ऊपर एड्रीनल ग्रन्थि के स्थान पर, मेथी लगाने से दमा के रोगियों को शीघ्र आराम मिलने लगता है। जिनको एलर्जिक अस्थमा हों, उन्हें तिल्ली पर भी मेथी लगानी चाहिए, जिससे तिल्ली सशक्त होती है और एलर्जी का प्रभाव कम होने लगता है।

5.  फेंफड़ों की खराबी से रक्त का शुद्धिकरण बराबर नहीं हो पाता। फलतः हृदय और गुर्दों को भी अपनी क्षमता के अधिक कार्य करना पड़ता है। अतः सूर्य मुखी तेल का गंडूस नियमित करना चाहिए। जिससे रक्त में विकार कम होने लगते हैं।

6.  दमा के रोगियों को दिन में 2-3 बार शक्तिशाली चुम्बकों को विधि अनुसार दोनों पगथलियों, दोनों हथेलियों के नीचे रखना, चुम्बक के दक्षिणी ध्रुव का पानी पीना तथा सीने और पीठ पर दक्षिणी ध्रुव को फेरने से श्वसन तंत्र ताकतवर होता है। सीने और पीठ पर चुम्बकीय वाइब्रेटर फेरने से भी जमें हुए कफ वहाँ से तुरन्त दूर होने लगते हैं।

7.  दमा के रोगियों को अपने स्वरों के चलन की सप्ताह भर की तालिका बना लेना चाहिए। रोग की अवस्था में चन्द्र और सूर्य स्वरों में असंतुलन हो जाता है। दमा के रोगियों के प्रायः चन्द्र स्वर अधिक चलता है। अतः जिस स्वर में जिस कार्य को करना चाहिए, उसके अनुरूप स्वर संचालन हेतु विशेष सजगता रखनी चाहिए। अचानक कभी किसी भी रोग की असहनीय स्थिति हो जाये तो तुरन्त जो स्वर चलता है, उसको बदलने से तुरन्त राहत मिलती है।

8.  शरीर में किसी भी रोग की स्थिति में उसके बाह्य संतुलन जैसे नाभि, पैर, मेरू दण्ड आदि प्रायः असंतुलित हो जाते हैं। अतः उपचार के पूर्व उनका निरीक्षण अवश्य कर लेना चाहिए। उनके संतुलित होते ही रोग शरीर में अधिक दिनों तक नहीं रह सकता।

9.  स्वचालित श्वसन क्रिया के नियन्त्रण में मेरूरज्जू एवं मस्तिष्क का जो मिलन केन्द्र मेडूला ओब्लंगेटा (M.O.) का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। हमारी विविध गतिविधियों के लिये अलगअलग मात्रा में शुद्ध प्राण वायु की आवश्यता होती है। उसी के अनुरूप एम.. द्वारा फेंफड़ों की क्षमता के अनुसार श्वसन की गति निर्धारित होती है। एम.. को श्वसन नियामक भी कहते हैं। अतः श्वसन संबंधी रोगों में एम.. पर हल्का दबाव कुछ मिनटों तक देना बहुत लाभदायक होता हैं।

10.  प्रातः उदित सूर्य को नंगी आंखों से निहारना, खुले बदन सूर्य की आतापना लेना, कुछ समय नंगे पांव धूप में चलना, सूर्य तप्त सफेद बोतल का पानी पीना एवं हवा से श्वास लेना बहुत लाभदायक होता है।

11.  शुद्ध देशी गाय का घी आॅक्सीजन का प्रभावशाली स्रोत होता है। अतः रात्रि में निद्रा लेते समय नासाग्र में घी की चंद बूंदे डालने से श्वसन में आक्सीजन की पूर्ति हो जाती है और दमा का प्रभाव कम होने लगता है।

12.  दमा के रोगियों का नाड़ी तंत्र प्रायः पूर्ण क्षमता से कार्य नहीं करता। सीने की मांसपेशियों में भी लचीलापन कम हो जाता है। रीढ़ के घुमावदार व्यायाम उनके लिये बहुत ही लाभप्रद होते है। जिससे सारा नाड़ी तंत्र सक्रिय होने लगता है। ताड़ासन से मांसपेशियों में लचीलापन आता है तथा विभिन्न बंधों के प्रयोग से श्वसन तंत्र, पाचन तंत्र और विसर्जन तंत्र सक्रिय होते हैं। अतः दैनिक कार्यक्रमों में इनका समावेश बहुत आवश्यक है। खुली हवा में टहलना, जोगिंग एवं श्वसन संबंधी अन्य क्रियाएँ भी लाभप्रद होती हैं।

13.  प्रातः जल्दी निद्रा त्याग, शान्त, एकान्त खुले वातावरण में पूर्ण श्वास लेते हुए फेंफड़ों पर हल्के हाथ से मसाज करते हुए चैतन्य चिकित्सा करने से फेंफड़ें शीघ्र सशक्त होने लगते हैं।

14. प्रातःकाल दोनों हथेलियों को आपस में मिला, दोनों अंगूठों से नाक के दोनों नथूनों को पूरा दबाकर, मुंह को फूलाकर, श्वास को बाहर निकालने का जितना सहन हो सके नियमित प्रयास करने से गले, नाक एवं कान में जमे विजातीय तत्व दूर होने लगते हैं। संबंधित कोशिकाएँ सक्रिय होने लगती है, तथा इनसे संबंधित रोग होने की संभावनाएँ कम हो जाती है। जुकाम, श्वसन, थायरोयड एवं पेराथायरोइड, गले तथा कान के रोग प्रायः नहीं होते हैं।             

15. दमें में सूर्य भेदी प्राणायाम, अपान वायु, प्राण, नमस्कार मुद्रा, सूर्य, लिंग एवं शंख मुद्रा बहुत ही लाभकारी होता है। 

16. दमा के रोगियों को प्रातः गले से कबूतर की भांति आवाज निकालने का प्रयास करने से गला साफ होता है, जिससे गले एवं श्वसन तंत्र बराबर कार्य करने लगता है एवं इससे दमें के रोगियों के लिए लाभदायक होता है। दमा का दौरा पड़ने पर मुख से निःश्वास करने से तुरन्त राहत मिलती है।

17.  फेंफड़ों पर खिंचाई वाले कप लगाने से रक्त का प्रवाह बढ़ता है और श्वसन तंत्र मजबूत होता है।

18.  दमा के रोगियों को अपनी दिनचर्या का निर्धारण इस प्रकार करना चाहिए जिससे प्रत्येक अंग जब अधिक सक्रिय हों तो उससे संबंधित कार्यो को प्राथमिकता दी जाये और जब किसी अंग में प्राण ऊर्जा का प्रवाह निम्नतम हों तो, उस अंग में कम से कम कार्य लिया जाये।

19. दमा के साथ यदि सुखी खांसी हो तो जल, आकाश एवं सूर्य मुद्रा एक साथ करने से चन्द दिनों में ही रोग से मुक्ति मिल जाती है।

20.  दमा के रोगियों को ठण्डे खाद्य एवं पेय पदार्थो का सेवन यथा संभव नहीं करना चाहिए। पीने योग्य जितना गर्म पानी पी सकते हैं, प्यास लगने पर अथवा दमा का दौर आने पर पीने से तुरन्त राहत मिलती है।

21.  रंग चिकित्सा के अनुसार बैंगनी रंग फेंफड़े का पोशक रंग है और रोगाणुनाशक भी है। अतः एलर्जिक अस्थमा में बैंगनी रंग की किरणें फेंफड़ों पर डालने से फेंफड़े ताकतवर होते हैं।

22.  चीनी पंच तत्त्व के सिद्धान्तानुसार फेंफड़े और बड़ी आंत की गड़बड़ी वाले अपेक्षाकृत जल्दी दुःखी होते हैं। उनकी अभिव्यक्ति में प्रायः दुःख झलकता है। अतः उन्हें आत्म चिंतन, ध्यान, स्वाध्याय, सद्साहित्य का अध्ययन, सकारात्मक सोच हेतु विशेष सजग रहना चाहिए एवं आवेंगों, नकारात्मक सोच से बचनें का अभ्यास करना चाहिए। मस्तिष्क शोधन की प्रक्रिया एवं खुलकर हंसने का अभ्यास बहुत ही लाभप्रद होता है।

23.  बियोल मेरेडियन सिद्धान्तानुसार तिल्ली और फेंफड़ों में प्राण ऊर्जा का प्रवाह बढ़ाने से दोनों अंगों की कार्य क्षमता बढ़ती है।

24.  दमा का कारण यदि सर्दी हो तो फेंफड़े बियोल मेरेडियन की ठण्डक ऊर्जा को घटाने का आधार बना अन्य संबंधित ऊर्जाओं को संतुलित करने से तुरन्त लाभ होता है।

25.  दमा का कारण यदि नमी का वातावरण हों तो फेंफड़े की नमी ऊर्जा को घटाना चाहिए।

26.  दमा के सहयोगी रोगों के रूप में शरीर के किसी भाग में यदि अन्य रोगों के लक्षण प्रकट हो गये हों तो उस भाग से गुजरने वाली मेरेडियन की संबंधित ऊर्जा को संतुलित करने से सहायक रोग शान्त हो जाते हैं, और दमा में भी राहत मिलती है।             

 उपर्युक्त नियमों का पालन करने से प्रायः सभी प्रकार के दमा रोगी शीघ्र स्थायी रूप से स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर सकते हैं। विस्तृत जानकारी हेतु पुस्तक ‘‘आरोग्य आपकाका अध्ययन करे। जो हमारी Website पर उपलब्ध है।

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