स्वास्थ्य हेतु शरीर, मन और आत्मा का तालमेल आवश्यक

स्वास्थ्य हेतु शरीर, मन और आत्मा का तालमेल आवश्यक

बिना कारण कार्य नहीं होता

 आधुनिक वैज्ञानिकों द्वारा मान्य सर्वसम्मत वैज्ञानिक सिद्धान्त है कि बिना कारण कोई कार्य नहीं होता। प्रत्येक कार्य अथवा घटना के पीछे प्रत्यक्ष या परोक्ष कुछ कुछ कारण अवश्य होते हैं। बिना कारण कुछ भी घटित नहीं हो सकता। हमें जो मनुष्य की योनि के साथ में संयोगवियोग, सुखदुःख, अनुकूलताएँप्रतिकूलताएँ मिलती हैं, उसके पीछे हमारे पूर्व संचित कर्मो का प्रभाव होता है। यदि अच्छे का फल अच्छा और बुरे का फल बुरा मिले तो प्रकृति की सारी व्यवस्थाएँ ही डगमगा जाती है।

 पुनर्जन्म को मानने वाले दर्शन मृत्यु के साथ ही जीवन की समाप्ति मानते हैं। परन्तु जीव की विभिन्न योनियाँ और एक ही योनि में जैसेमानव योनि में प्रत्येक व्यक्ति के विकास, परिस्थितियों, संयोगवियोग, अनुकूलताप्रतिकूलता, सुखदुःख, स्वस्थरोग का जितना सूक्ष्म एवं तार्किक विश्लेषण कर्म सिद्धान्त में मिलता है, उतना तर्क संगत अन्यत्र नहीं मिलता। जब तक आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप को प्राप्त नहीं हो जाती, तब तक जन्ममरण से मुक्त नहीं हो सकती तथा इस लोक की विभिन्न योनियों में अपने कर्मो के अनुसार जीव परिभ्रमण करता रहता है। इसीलिये प्रत्येक आत्मदर्शन में विश्वास रखने वालों का अंतिम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति ही होता है। अतः पूर्व जन्म पर श्रद्धा एवं कर्मो के परिणाम को जानना, समझना जरूरी है। इस जीवन के भूतकाल अथवा पूर्व जन्म में किए गए शुभ या अशुभ कर्मो का परिणाम मिले बिना नहीं रहता। परिणामों के आधार पर उत्पन्न समस्याओं के मूल कारणों का सही पता लगाया जा सकता है। उन्हें समझा जा सकता है। साथ ही भविष्य में सजगता और सद् विवेक पूर्वक जीवन जीते हुए उन कारणों से सहज बचा जा सकता है। जो रोग का कारण होते हैं उन कारणों को दूर करने का सम्यक् पुरुषार्थ किया जा सकता है। यही स्वास्थ्य का राजमार्ग है। अतः आत्मा को समझे बिना तथा उसकी उपेक्षा करने से हम पूर्ण रूप से रोग मुक्त जीवन नहीं जी सकते।

 आत्मा को समझे बिना उसका मूल्य और महत्त्व कैसे पता लग सकता है? जीवन में उसकी उपेक्षा होना सम्भव है। आत्मा के विकार, मन,बुद्धि और वाणी को कैसे प्रभावित करते हैं? हमारे स्वास्थ्य को क्यों और कैसे बिगाड़ते हैं? आसानी से समझ में नहीं सकते। रोग के कारण बने रहने से पूर्ण स्वास्थ्य की भावना मात्र कल्पना बन कर रह जाती है। जिस प्रकार जड़ को सींचे बिना, मात्र फूल पत्ते को पानी पिलाने से वृक्ष सुरक्षित नहीं रह सकता, ठीक उसी प्रकार आत्मा को शुद्ध पवित्र, विकारमुक्त किए बिना शरीर, मन और मस्तिष्क स्वस्थ नहीं रह सकते। रोग की उत्पत्ति का मूल कारण आत्मा में कर्मों का विकार ही होते हैं। संचित कर्मो के अनुरूप व्यक्ति को शरीर, मन, बुद्धि, परिवार, समाज, क्षेत्र, पद, प्रतिष्ठा और भौतिक साधनों की उपलब्धि होती है। रोग की अभिव्यक्ति भी पहले भावों अथवा विचारों में होती है। तत्पश्चात् मन में, उसके बाद शरीर के अन्दर एवं अन्त में बाह्य लक्षणों के रूप में प्रकट होती है। व्यक्ति के हाथ में तो मात्र सम्यक् पुरुषार्थ करना ही होता है। परन्तु सभी पुरुषार्थ करने वालों को एक जैसा परिणाम क्यों नहीं मिलता? उसके पीछे पूर्व संचित कर्मो का ही प्रभाव होता है।

अस्तित्व और जीवन के बोध हेतु विवेक आवश्यक

 हमारे जीवन में दो स्थितियाँ हैप्रथम हमारा अस्तित्व अर्थात् आत्मा की उपस्थिति और दूसरा है जीवन। प्रायः हम आत्मा को भूल सारे जीवन को जानने और समझने का प्रयास करते हैं। जन्म और मृत्यु के कारणों को तो जानते हैं और अनेकान्त दृष्टि से उसको समझने और मानने के लिए अपने पूर्वाग्रहों के कारण मानसिक रूप से तैयार भी होते हैं। आहार, इन्द्रिय, श्वासोच्छवास, भाषा और मन आदि पर्याप्तियों के रूप में जो ऊर्जा के स्रोत मिले हैं, वे कैसे कार्य करते हैं? क्या आत्मा आहार करती हैं? आत्मा आहार नहीं करती, तो क्या शरीर आहार करता है? शरीर भी आहार नहीं करता, यदि ऐसा होता तो मृत्यु के बाद भी शरीर आहार करता। परन्तु जब आत्मा और शरीर के बीच कोई सम्बन्ध होता है तब ही ऊर्जा के सारे स्रोतपर्याप्तियाँ कार्य कर सकते हैं।

स्वास्थ्य हेतु समग्र दृष्टिकोण आवश्यक

 शरीर का चेतनआत्मा के साथ संयोग ही जीवन है और वियोग मृत्यु है। मृत्यु के पश्चात् शरीर, मन और इन्द्रियों की भांति आत्मा का अन्त नहीं होता। जिस प्रकार पुराने कपड़े को छोड़ कर नया कपड़ा पहना जाता है, ठीक उसी प्रकार भी जब तक उसके साथ उस योनि की आयु की सत्ता रहती है, तब तक आत्मा मानव शरीर में रहती है उसके पश्चात् पुराना शरीर छोड़कर अन्य योनियों में कर्मों की स्थिति के अनुसार नवीन शरीर धारण कर लेती है। जन्म और मृत्यु के द्वारा केवल शरीर बदला जाता है, आत्मा का कभी अन्त नहीं होता।

आत्मा और शरीर का सम्बन्ध

 जैसा कि बतलाया गया है कि आत्मा और शरीर अलगअलग हैं। जब तक दोनों साथसाथ में होते हैं, तभी तक स्वास्थ्य की समस्या होती हैं। दोनों के अलग होते ही शरीर की सारी गतिविधियाँ स्वतः समाप्त हो जाती हैं। शरीर की समस्त गतिविधियों के संचालन करने वाली चेतना (प्राण) और प्राण ऊर्जा भी दोनों से अलग होती है, जिसका निर्माण आत्मा और शरीर के सहयोग से होता है। बिना आत्मा अथवा शरीर प्राण और प्राण ऊर्जा का अस्तित्व नहीं होता। प्राण और प्राण ऊर्जा को भी प्रायः जनसाधारण एक ही समझते हैं, परन्तु दोनों अलगअलग होते हैं। ऊर्जा जो जड़ है, जबकि प्राण में चेतना होती है। गुब्बारे में हवा भरने से उसमें प्राण नहीं जाते और हवा निकालने से गुब्बारे के प्राण चले जाते हैं। ऊर्जा शरीर में बाहर से भीतर आती है या शरीर में श्वसन की प्रक्रिया से बनती है। जबकि प्राण शरीर में जन्म से विद्यमान होता है। प्राण अपने आप में शाश्वत होता है, जबकि प्राण ऊर्जा को श्वास का आलम्बन आवश्यक होता है। अतः प्राण कहें या चेतना, शरीर में आत्मा के ही अंश होते हैं तथा आत्मा शरीर में जिस शक्ति से निश्चित आयुष्य तक ठहरी हुई रहती है, उस शक्ति को प्राण ऊर्जा कहा जा सकता है।

 मानव जीवन में आहार, शरीर, इन्द्रिय, श्वासोचछवास, भाषा और मन में ऊर्जा के स्रोत माँ के गर्भ में आते ही मिल जाते हैं। आयुष्य प्राण के रूप में आत्मा के साथ किसी योनि में सीमित अवधि में रहने की ऊर्जा प्राप्त होती है। श्वसन उस ऊर्जा के प्रवाह को संचालित और नियन्त्रित करता है। जिस प्रकार पेट्रोल समाप्त होते ही कार रूक जाती है, ठीक उसी प्रकार आयुष्य प्राण के समाप्त होते ही जीवन का अन्त हो जाता है। जब तक आयुष्य प्राण रहता है तब तक आँख, नाक, कान, मुँह, स्पर्श आदि पाँचों इन्द्रियाँ और मन तथा वाणी भी अपनीअपनी प्राण ऊर्जाओं के अनुसार शरीर की गतिविधियों एवं प्रवृत्तियों के संचालन में सहयोग देते हैं। जिस प्रकार बिजली से प्रकाश, गर्मी, वाहन आदि उपकरणों के माध्यम से अलगअलग ऊर्जाएँ निर्मित होती है, ठीक उसी प्रकार आयुष्य बल प्राण और श्वसन प्राण के सहयोग से आँख में देखने, कान में सुनने, नाक में सुगन्ध लेने, जीभ में बोलने, मुँह में आहार करने, शरीर में स्पर्श ज्ञान की ऊर्जा उत्पन्न होती है। यदि हमारी कोई इन्द्रिय अथवा मन की प्राण ऊर्जा क्षीण हो जाती है तो व्यक्ति की वह इन्द्रिय अथवा मन निष्क्रिय हो जाता है। बाकी सभी इन्द्रियाँ अपना कार्य बराबर करती रहती है, परन्तु आयुष्य प्राण के बिना जीवन एक क्षण भी नहीं चल सकता।

स्वास्थ्य हेतु शरीर, मन और आत्मा का तालमेल जरूरी

 आज जीवन शैली का निर्धारण करते समय तथा स्वास्थ्य के सम्बन्ध में परामर्श देते समय प्रायः अधिकांश चिकित्सा पद्धतियों और चिकित्सकों का सोच मात्र शरीर तक ही सीमित होता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि हमारी गतिविधियों के संचालन में शरीर की प्रमुख भूमिका होती है। सभी कार्य और जीवन, शरीर के अस्तित्व के बिना असम्भव होते हैं। शरीर की अनुपस्थिति में, मन, बुद्धि और वाणी का भी अस्तित्व नहीं होता। फिर भी आत्मा की उपेक्षा कर मात्र शरीर का ख्याल करने का मतलब कार में पेट्रोल डाल, चालक को भूखा रखने के समान बुद्धिहीनता ही समझना चाहिए। ऐसी कार में निर्विध्न यात्रा सम्भव नहीं हो सकती। अतः जीवनयापन करते समय हम ऐसी प्रवृत्तियों से यथासम्भव बचे, जिससे आत्मा अपवित्र और विकारग्रस्त बनती हो। आत्मा को शुद्ध पवित्र एवं विकारों से मुक्त रखना हमारे जीवन की सर्वोच्य प्राथमिकता होनी चाहिए।

 स्वस्थ जीवन जीने के लिए शरीर, मन और आत्मा, तीनों की स्वस्थता आवश्यक होती है। तीनों एकदूसरे को प्रभावित करते हैं। तीनों के विकारों को दूर कर तथा सन्तुलित रख आपसी तालमेल द्वारा ही स्थायी स्वास्थ्य को जीया जा सकता है। अतः स्वास्थ्य की चर्चा करते समय जहाँ एकतरफ हमें यह समझना आवश्यक है कि शरीर, मन और आत्मा का सम्बन्ध क्या है? किसका कितना महत्त्व है? दूसरी तरफ जीवन की मूलभूत आवश्यक ऊर्जा स्रोतों का सम्यक् उपयोग करना होता है तथा दुरुपयोग अथवा अपव्यय रोकना पड़ता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *