अहिंसक जीवन शैली हेतु जीव-अजीव के भेद का ज्ञान आवश्यक?

अहिंसक जीवन शैली हेतु जीवअजीव के भेद का ज्ञान आवश्यक?

 

हिंसा हेतु वर्तमान परिस्थितियों को दोष देना उचित नहीं:-

 जीवन जीना भी एक कला हैं। मानव जीवन का परम लक्ष्य क्या? उसको कैसे प्राप्त किया जाए? जीवन की प्राथमिकताएँ क्या हो? क्या वर्तमान परिस्थितियों में अहिंसा का पालन संभव है? जहाँ जीवन है वहाँ हिंसा अनिवार्य है। अल्पतम अतिआवश्यक लाचारी से होने वाली हिंसा के अलावा अनावश्यक हिंसा से हम कैसे बचें, यही चिन्तन का विषय है? जीओं और जीने दो पर आधारित जीवन ही मानवता का प्रतीक है। अपने स्वार्थ के लिये अन्य जीवों को कष्ट पहुँचाना पाश्विकता का लक्षण है। शराब की बोतल देखने अथवा पास में होने मात्र से नशा नहीं आता। नशा तो शराब के घूंट लेने से ही आता है। अतः हिंसा के लिये वर्तमान परिस्थितियों को दोष देना उचित नहीं। अहिंसक जीवन जीने के लिये किसी भी काल में परिस्थितियां शतप्रतिशत अनुकूल नहीं रही। अहिंसक जीवन जीने के लिये हमें हमारी प्रवृत्तियों को संयमित, नियमित, नियन्त्रित रखना होगा। मन, वचन, काया के अशुभ योगों से बचना होगा। जीव अजीव के भेद को जानकर जीवन में अहिंसा के महत्त्व को समझना होगा। जब उसका महत्त्व समझ में जायेगा तब हमारी सारी प्राथमिकताएँ अहिंसापालन के लिये हो जायेगी। कष्ट की अनुभूति नहीं होगी तथा हिंसक प्रवृत्तियों के प्रति हम सजग, सतर्क, सचेत, सावधान होकर बिना किसी को दोष दिये बचने लग जायेंगे।

क्षमताओं का अधिकतम सदुपयोग मानव जीवन में आवश्यक:-

 जन्म के साथ मृत्यु निश्चित है। इस जन्ममरण के परिभ्रमण का कारण आत्मा पर आये कर्मों का आवरण होता है। मानव योनि ही एकमात्र ऐसी योनि है जिसमें इतनी क्षमता है कि आत्मा पर जमें समस्त कर्मों को क्षय कर मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है। नर से नारायण और आत्मा से परमात्मा बना जा सकता है। यही मानव जीवन का मुख्य उद्देश्य होता है। जो इस लक्ष्य प्राप्ति में जितनाजितना आगे बढ़ता है, उसी का जीवन सार्थक होता है। इसके विपरीत जो अपनी क्षमताओं का दुरुपयोग अथवा अपव्यय करता है, उसका जीवन व्यर्थं होता है, अधोगति की तरफ ले जाने वाला होता है। विवेक बुद्धि की अल्पता और अज्ञान ही संसार परिभ्रमण के दो मुख्य कारण हैं, जिसके कारण मानव अपनी क्षमताओं को नहीं पहचान पाता। क्या कोई व्यक्ति लाखों रुपयों के बदले अपने शरीर का कोई अंग, जैसेआँख, कान, जीभ, नाक आदि बेचना चाहता है? कदापि नहीं। प्रश्न खड़ा होता है कि ऐसे अमूल्य मानव जीवन का ध्येय कहीं हम खानेपीने, मौजशौक अथवा परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी तक ही सीमित समझने की भूल तो नहीं कर रहे हैं? जो वस्तु जितनी मूल्यवान होती हैं, उसका उपयोग कैसे करना? भौतिक जगत में हम जानते हैं। लाखों रुपये का वेतन लेने वाले मैनेजर से झाड़ू नहीं निकलवाते। महिलाओं में इतना विवेक होता है कि कीमती साड़ी पहनकर घर की सफाई अथवा भोजन नहीं बनाती। परन्तु क्या कभी हमने अपने जीवन के तौरतरीके को देखा? क्या हम हमारे मन और इन्द्रियों का सदुपयोग कर रहे हैं? कहीं मुँह से अपशब्द तो नहीं बोलते ? निन्दा, चुगली, आरोप, प्रत्यारोप, असत्य तो नहीं बोलते? आँखों से कामविकार बढ़ाने वाले विषयों को तो नहीं देखते। कान से निन्दा, विकथा अथवा रागद्वेष बढ़ाने वाले शब्द तो नहीं सुनतें? यदि ऐसा करते हैं तो अपनी क्षमताओं का अवमूल्यन करना है। जिस वस्तु का दुरुपयोग अथवा अपव्यय किया जाता है, भविष्य में वह वस्तु पुनः सरलता से प्राप्त नहीं होती। उदाहरण के लिए आपने अपने नासमझ प्रिय बच्चे को जिद्द करने पर एक हजार रुपये का नोट दिया और यदि वह बच्चा उसे फाड़ देता है तो पुनः उस बच्चे को हजार रुपये का नोट आप नहीं देते, भले ही बच्चा कितना ही प्रिय क्यों हो। ठीक उसी प्रकार मनुष्य जीवन का दुरुपयोग करने वाले को पुनः मानव जन्म नहीं मिलता है। सम्यक् आचरण से ही मानव अपने चरम लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। जो उसकी प्राप्ति हेतु सम्यक् पुरुषार्थ करते हैं उन्हीं का मानव जीवन प्राप्त करना अथवा जीना सफल होता हैं। क्या अहिंसक व्यक्ति ऐसा जीवन जी सकता हैं? चिन्तन का विषय हैं।

अहिंसा के पालन हेतु जीव एवं अजीव का ज्ञान आवश्यक:-

 दया धर्म का मूल है। हिंसा करने वाला धर्म का पालन नहीं कर सकता। किसी संत ने ठीक ही कहा

धर्मधर्म सब ही कहे, धर्म जाने कोय।

जाति जाने जीव की, धर्म कहां से होय।।

  जब तक जीव और अजीव का ज्ञान नहीं होगा तब तक हिंसा से बचना कठिन होगा। जो हलनचलन वाले जीव हमें दिखाई देते हैं, प्रायः हम उन्हीं को जीव मानते हैं। बहुत से ऐसे जीव इतने सूक्ष्म होते हैं जिन्हें हम अपने चर्मचक्षुओं से नहीं देख पाते। आज वैज्ञानिकों द्वारा भी वनस्पति में चेतना को स्वीकार किया जा चुका है। केप्टन स्कोर्सवी ने पानी की एक बूंद में सूक्ष्म दर्शक यंत्र से 36450 चलते फिरते जीवों को देखा। जिसका विवरण सिद्ध पदार्थ नामक ग्रन्थ (जो इलाहाबाद प्रेस से प्रकाशित हुआ हैं) में मिलता हैं, जो पानी में जीव की सत्यता को स्पष्ट करता हैं। अग्नि की सजीवता तो स्वयं सिद्ध है। उसमें प्रकाश और उष्णता का गुण है, जो सचेतन में होते हैं। अग्नि वायु के बिना जीवित नहीं रह सकती। लकड़ी, कोयला, पेट्रोल, डीजल, ईधन आदि आहार लेकर बढ़ती है। आहार के अभाव में अग्नि घटती हैं। ये सब उसकी सजीवता के लक्षण हैं। परन्तु प्रायः हम अग्नि, पानी, वनस्पति, पृथ्वी, हवा आदि एकेन्द्रिय जीवों में प्राण नहीं मानते। केवलज्ञानी, सर्वज्ञ अथवा त्रिकालदृष्टा ही सूक्ष्म से सूक्ष्मतम जीवों को देख सकते हैं। अतः उन्होंने जो हमको पृथ्वी, पानी, वायु, अग्नि और वनस्पति जैसे एकेन्द्रिय से लेकर पंचेन्द्रिय तक जीवों की विस्तृत जानकारी दी, उस पर श्रद्धा रख यथासंभव किसी भी जीव को कष्ट नहीं पहुँचाना चाहिये।

व्यक्त  चेतना ही जीव का आधार नहीं:-

 मूच्र्छित व्यक्ति की बाह्य चेतना सुषुप्त होती हैं, परन्तु अन्तरंग चेतना, अनुभूति सुषुप्त नहीं होती। कोई मनुष्य जन्म से अन्धा, मूक, बधिर और हाथ पैरों से विकलांग हैं। यदि कोई व्यक्ति उसको कष्ट दे, तो भी वह उस पीड़ा को अभिव्यक्त नहीं कर सकता और दुःखी होकर भाग सकता है अथवा अन्य प्रतिक्रिया ही कर सकता हैं। तब क्या ऐसा मान लिया जाए कि उसमें जीव नहीं हैं। जैसे वह व्यक्ति वाणी, चक्षु और गति के अभाव में पीड़ा का अनुभव करता हैं, वैसे ही पृथ्वी, पानी, वायु, अग्नि, वनस्पति आदि एकेन्द्रिय जीवों में, व्यक्त चेतना का अभाव होने के बावजूद भी प्राणों का स्पन्दन होता हैं। संवेदना अपेक्षाकृत अधिक होती हैं।इसी कारण संत मुनिराज सचित्त एकेन्द्रिय का स्पर्श नहीं करते। उनमें भी अनुभव चेतना विद्यमान होती हैं। अतः कष्ट की अनुभूति होती है। एकेन्द्रिय जीवों की चेतना मूच्र्छित रहती हैं, परन्तु वे अन्तरंग चेतना से शून्य नहीं होते। वैदिक परम्परा में पृथ्वी, पानी, हवा, अग्नि और वनस्पति में देवत्व का वास माना गया है। भवन निर्माण अथवा प्रवेश के समय भूमिपूजन, विवाह के प्रसंगों पर अग्नि की साक्षी और उगते सूर्य को नमस्कार, हथैली में पानी की साक्षी से संकल्प लेने की परम्परा तथा पीपल, तुलसी, नीम आदि के पूजन के पीछे यही लक्ष्य रहा हुआ है। चीनी पंच तत्त्व के सिद्धान्त एवम् प्राकृतिक चिकित्सा में पंच तत्त्वों का नामकरण उसी के आधार पर किया गया है। परन्तु पृथ्वी, पानी, वायु, अग्नि और वनस्पति में चेतना का ज्ञान होने से अहिंसक कहलाने वाले भी इनका दुरुपयोग करते तनिक भी संकोच नहीं करते। फलतः सारा संसार आज पर्यावरण एवं प्रदुषण की समस्या से परेशान हैं।

आत्मविकास में बाधक हिंसाः

 जिस प्रकार अहिंसक व्यक्ति में बचपन से ही करुणा, दया के संस्कार होने से कोई कितना ही प्रलोभन दें, उसकी आत्मा एक चींटी को मारने की भी अनुमति नहीं देती। फिर भी चाहते हुए भी उठतेबैठते, चलतेफिरते, हिंसा हो ही जाती है। उसी प्रकार जब जीव और अजीव का भेद समझ में जाता है, तब प्रज्ञावान, विवेकशील व्यक्ति अनावश्यक हिंसा से यथासंभव बचने का प्रयास करता है। जहाँ जीवन है, वहाँ हिंसा अनिवार्य हैं। अतः आजकल ऐसी मान्यता बलवती होती जा रही है कि बिना हिंसा जीवन चल ही नहीं सकता। इस शंका का समाधान करते हुए प्रभु महावीर ने कहा

जयं चरे जयं चिट्ठे जयंमासे जयं सए।

जयं भुजंतो भासंतो पावकम्मं बंधइ।।

 अर्थात् यतनापूर्वक चलने, उठने, बैठने एवम् सोने अथवा जीवन के लिये अन्य अतिआवश्यक प्रवृत्तियाँ करने से पाप कर्मों का बन्ध नहीं होता अर्थात् हिंसा का दोष नहीं लगता। अतः जीवन की सभी प्रवृत्तियाँ विवेकपूर्ण हो तथा प्रत्यक्षअप्रत्यक्ष, जानेअनजाने, किसी भी जीव को कष्ट पहुँचाने की मन में भावना हो।

हिंसा की अनुमोदना से बचें:-

 हिंसक प्रवृत्तियों से यथासंभव बचने का ध्यान रखा जाए। हिंसा का भाव आते समय हमारे अन्दर लेश्याओं (भावों) की क्या स्थिति होती है, वह बहुत महत्त्वपूर्ण है। जैन आगमों में इस संदर्भ में तंदुल मच्छ का एक दृष्टान्त आता है, जो समुद्र में भीमकाय मगरमच्छ की आंखों के भौंहे पर बैठा चावल के दाने जितना छोटा मगरमच्छ होता है। जब वह देखता है कि बड़े मगरमच्छ की श्वास के साथ सैंकड़ों मच्छलियाँ उसके पेट में जा रही है और श्वास छोड़ने के साथ वापस बाहर रही है। तंदुल मच्छ विचार करता है कि यह कैसा आलसी मगरमच्छ हैं, जो मुँह में आए शिकार को भी पुनः गवाँ देता है। इसकी जगह अगर मैं होता तो एक भी मछली को जीवित बाहर नहीं आने देता। उसकी ऐसी भावना मात्र ही उसे अधोगति का पथिक बना देती हैं। हालांकि प्रत्यक्ष रूप से हिंसा में वह तनिक भी भागीदार नहीं होता। आजकल हम बिना प्रयोजन ऐसी पापप्रवृत्तियों की प्रेरणा देते हैं अथवा अनुमोदना करते हैं, जिससे प्रत्यक्षअप्रत्यक्ष रूप से उनसे होने वाली हिंसा में भागीदार बन जाते हैं। लोक लाज और व्यवहार निभाने के नाम पर किसी आलीशान मकान की बिना पूछे तारीफ करना, विवाहशादियों के उपलक्ष्य में आयोजित भोजों एवम् कार्यक्रमों की बिना पूछे सराहना करना, शादी के प्रसंगों पर प्रत्येक परिचित को शुभ संदेश भिजवाना, जैसी अनेक प्रवृतियाँ हैं, जिसके पीछे अप्रत्यक्ष रूप से हिंसा को प्रोत्साहन मिलता है। जिन पर यदि हम प्रतिक्रिया करें, अनासक्त रहें तो भी चल सकता है। हम परोक्ष हिंसा की अनुमोदना से सहज बच सकते हैं।

अहिंसक जीवन जीना असंभव नहीं संभव हैं:-

 अहिंसक व्यक्ति को अपनी प्रत्येक प्रवृत्ति करते समय केवल हिंसा से बचना चाहिये, अपितु इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि उनके अविवेक के कारण, दूसरों पर आश्रित परावलम्बी जीवन जीने के कारण व्यर्थ जीवों की उत्पत्ति हों और उनकी हिंसा के दोष से हम बच सकें। जैसे घर में झूठे बर्तन पुनः तुरन्त सफाई करना, पानी छानना, गन्दगी और शारीरिक मल का विसर्जन करते समय स्थान का ध्यान रखना, रातदिन उपयोग में आने वाली वस्तुओं की बराबर देखभाल करना, जिससे जीवों की उत्पति हो। अहिंसा का पालन करने वालों को स्वावलम्बी बनना पड़ेगा। अनावश्यक लोकव्यवहारों से बचकर परिचय घटाना होगा और जीवन की आवश्यकताओं को अल्पतम करना होगा। मन, वचन और काया के अशुभ योगों से अपने को अलग रखना होगा। उनका जीवन संयमित, नियमित, परिमित, सजग, विवेकपूर्ण होना चाहिये। उन्हें प्रतिक्षण चिन्तन करना चाहिये कि उनकी प्रवृत्तियाँ हिंसा को प्रोत्साहन तो नहीं दे रही है। जीवन के लिये होने वाली अल्पमत हिंसा के लिये भी उनकी लाचारी होनी चाहिये कि उपेक्षा। ऐसे दृढ़ मनोबली का जीवन निश्चित रूप से अहिंसक ही होता हैं। जितनीजितनी इन बातों की पालना होगी, उतनाउतना अहिंसक जीवन बनता जायेगा। अतः अहिंसक जीवन जीना कठिन अवश्य हैं, असंभव नहीं।

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