स्वास्थ्यवर्धक जीवन शैली

स्वास्थ्यवर्धक जीवन शैली

 

 शरीर, मन और आत्मा को विकारों से मुक्त रख, अपने जीवन के लक्ष्य को पाने के लिये, प्रत्येक चिन्तनशील मानव को यथा संभव पूर्ण सजगता एवं विवेक के साथ, प्रकृति के सनातन सिद्धान्तों का पालन कर, अपने आपका संतुलन रखना चाहिए। पुस्तक के प्रत्येक अध्याय में ऐसी आवश्यक बातों की विस्तार से चर्चा की गई है। हमारी जीवन शैली में प्राथमिकता के आधार पर उनका पालन आवश्यक होता है, जो शरीर को असंतुलित होने से बचाती है। उन नियमों का जितनाजितना पालन होगा, उतनाउतना हमारा जीवन स्वस्थ, सुखी एवं शान्त होगा। उन बातों का पालन करने के उपरान्त भी यदि प्रत्यक्ष परोक्ष कारणों से अथवा भूत की भूलों, असावधानी या वर्तमान की असजगता के कारण अगर रोग के लक्षण प्रकट हों भी गये हों तो भी उन सिद्धान्तों के अनुरूप जीवन शैली से उपचार अत्यधिक प्रभावशाली हो जाता है। रोग से शीघ्र मुक्ति मिल सकती है। परन्तु ठीक इसके विपरीत जानेअनजानें में जितनाजितना हम उन नियमों का उल्लंघन करते हैं तो बहुत प्रयास करने के बावजूद भी केवल हम रोग ग्रस्त ही होते हैं, अपितु कोई भी चिकित्सा पद्धति हमें स्वस्थ रखने का दावा नहीं कर सकती। ऐसी चन्द महत्त्वपूर्ण बातों का समावेश हमारी दैनिक गतिविधियों में करने हेतु यहाँ संक्षिप्त विवरण पुनः प्रस्तुत किया जा रहा है।

1.  प्रत्येक व्यक्ति को निद्रा त्यागते ही सर्वप्रथम अपने आराध्य का स्मरण कर प्राणी मात्र के प्रति मैत्री, करुणा, दया एवं अनुकंपा रखने की भावना करनी चाहिए तथा उस दिन के लिये अपने किसी अवगुण को छोड़ने का दृढ़ संकल्प लेकर अपनी दिनचर्या का प्रारम्भ करना चाहिए।

2.  प्रातःकाल जितना जल्दी सूर्योदय से पूर्व निद्रा त्याग सकें, उठना चाहिये एवं शान्त खुले वातावरण में टहलना, व्यायाम, आसन, प्राणायाम, स्वाध्याय और ध्यान करना चाहिए। व्यायाम में रीढ़ के घुमावदार व्यायाम, आसन में व्रजासन, गोदुहासन, पद्मासन एवं ताड़ासन का अवश्य समावेश करना चाहिये जिससे शरीर का संतुलन, मांसपेशियों में लचीलापन बना रहता है। चन्द मिनटों के लिये खुलकर हंसना, जोगिंग करना भी बहुत लाभप्रद होता है।

3.  स्वास्थ्य की आज सारी समस्याओं का मूल सही दृष्टिकोण का अभाव, आत्मनियन्त्रण की कमी, स्वछन्द मनोवृत्ति, असंयम बढ़ती हुई आकांक्षायें, धैर्य एवं सहिष्णुता का अभाव, विवेक की कमी, प्राथमिकताओं का गलत चयन एवं सम्यक् लक्ष्य का अभाव होता है। अतः हमारी जीवन शैली यथा संभव संयमित, नियमित, अनुशासित, स्वावलंबी, श्रम प्रधान, अहिंसक, सात्विक एवं सम्यक् चिन्तन से युक्त विवेकमय होनी चाहिये। प्राथमिकताओं का चयन और उसकी क्रियान्विति क्षमताओं के सम्यक् उपयोग एवं महत्व के अनुरूप होनी चाहिये। प्रवृत्तियाँ करते समय मन, वचन और काया के सम्यक् तालमेल के साथ आत्मा की उपेक्षा हो। इस बात जी सजगता रखनी चाहिए।

4.  तनाव पैदा करने वाले वातावरण से यथा संभव दूर रहना चाहिए अथवा उस समय मौन हो जाना, तथा सकारात्मक सोच रख स्वविवेक, सजगता एवं धैर्य रखने का प्रयास करना चाहिए। घर में अनुशासन, प्रेम, तालमेल और सहयोग का वातावरण होने से स्वतः प्रसन्नता एवं शान्ति मिलती है। तनावमय वातावरण होने से रोग होने की संभावनाएँ बहुत कम हो जाती है। टी.वी. का उपयोग यथा संभव ज्ञानवर्धक कार्यो तक ही सीमित रहा चाहिए। परिवार में मितव्ययता, उपलब्ध सुविधाओं का अनावश्यक दुरुपयोग और अपव्यय हों, ताकि धन उपार्जन हेतु अनैतिक साधनों का उपयोग करना पड़े।

5.  अपनी दिनचर्या का निर्धारण इस प्रकार करना चाहिए, जिससे शरीर के अंगों की क्षमताओं का अधिकतम उपयोग हो सके। अर्थात् जिस समय जिस अंग में प्रकृति से अधिकतम प्राण ऊर्जा का प्रवाह हों उस समय उस अंग से संबंधित कार्यो को प्राथमिकता देनी चाहिए।

6.  शरीर की मूलभूत आवश्यकताओं के रूप में भोजन, पानी, हवा, धूप आदि जो भी हम ग्रहण करते हैं, उनकी क्षमताओं का पूर्ण लाभ लेने हेतु सजगता रखनी चाहिये। अर्थात् यथा संभव मंद परन्तु गहरा पूरा श्वास लेना और निःश्वास निकालना चाहिए। हम वहीं भोजन अथवा अन्य पदार्थ मुख से ग्रहण करें, जिसका पूर्ण पाचन हो सके। पानी कब, कैसा, कितना पीना, इस बात का विवेक रखना चाहिए?

7.  एक्युप्रेशर स्वास्थ्य परीक्षण और उपचार की सरलतम विधि है। अतः प्रतिदिन पगथली और हथेली में आगे पीछे दबाव देकर रोग ग्रस्त प्रतिवेदन बिन्दुओं की जाँच कर लेनी चाहिए। तथा दर्दस्थ केन्द्रों पर उपचार कर विजातीय तत्त्वों को वहां से दूर कर देना चाहिये। विशेषकर अन्तःस्रावी ग्रन्थियों, मेरुदण्ड एवं हाथ और पैर की अंगुलियों के प्रतिवेदन केन्द्रों का चेकअप तो अवश्यक नियमित रूप से करना ही चाहिए।

8.  सप्ताह में कम से कम एक बार मस्तिष्क शोधन की क्रिया कर लेनी चाहिये, जिससे हमारा मस्तिष्क पूर्व संचित तनावों से मुक्त हो जाता है। रोग की अवस्था में यदि संभव हो तो प्रतिदिन करने से उपचार का प्रभाव अनेक गुणा बढ़ जाता है।

9.  प्रातःकालीन उदित सूर्य की रश्मियों को नियमित ग्रहण करना स्वास्थ्य वर्धक होता है, जिसकी अवधि धीरेधीरे 30 से 35 मिनट तक बढ़ानी चाहिये।

10.  जो कार्य जिस स्वर के अनुकूल हों उस कार्य को करते समय उस स्वर को चलाने का यथा संभव प्रयास करना चाहिये। इससे कम श्रम में अधिक अच्छे परिणाम मिलते हैं।

11.  रोग होने की अवस्था में प्रतिदिन अन्यथा सप्ताह में कम से कम एक बार अपने नाभि, मेरुदण्ड, गर्दन, पैरों आदि का संतुलन देख लेना चाहिये और उसमें गड़बड़ हों तो तुरन्त ठीक कर लेना चाहिये।

12.  सप्ताह अथवा पन्द्रह दिनों में कम से कम एक दिन उपवास कर पाचन तंत्र को आराम देना चाहिये।

13.  क्षमताओं से अधिक शारीरिक या मानसिक श्रम करें। जितनी आवश्यक हो गहरी निद्रा लें। ताकि दिन भर आलस्य एवं थकान का अनुभव हों। परन्तु अनावश्यक जागृत अवस्था में बिस्तर पर पड़े हुये रहें।

14.  हमारा खानपान और वेषभूषा मौसम के अनुकूल होनी चाहिये।

15.  मल, मूत्र जैसी शरीर की नैसर्गिक विसर्जन क्रियाओं को जबरदस्ती नहीं रोकना चाहिये।

16.  हमारा आवास और कार्य स्थली यथा संभव स्वच्छ, खुला, पर्यावरण एवं प्रदूषण रहित, जहाँ सूर्य की रश्मियाँ आवश्यक मात्रा में प्रवेश पा सकें, होना चाहिए। कमरों में दीवारों के रंग तथा साजसज्जा के समान उत्तेजना एवं भय पैदा करने वाले हों।

17.  यथा संभव अपने शिवाम्बु का अवश्य नियमित सेवन करना चाहिये। जिससे शरीर की आन्तरिक सफाई हो सकें। रोगावस्था में उसके अन्य उपयोग भी लेने चाहिए।

18.  पंच तत्त्वों को संतुलित करने वाली मुद्राओं का नियमित अभ्यास करने से शरीर में पंच तत्त्वों का संतुलन बना रहता है तथा स्वास्थ्य अच्छा रहता है?

19.  पर्याप्ति और प्राणों का संयम ही स्वास्थ्य है। अतः हमारी जीवनचर्या में उनका अपव्यय अथवा दुरुपयोग हों इस बात की यथा संभव सजगता रखनी चाहिये। हमारी प्रवृत्तियां सम्यक् हों। कषाय और प्रमाद कम करने वाली हों। इस हेतु विशेष प्रयत्नशील रहना चाहिए।

20.  प्रतिदिन जल अथवा स्वमूत्र से नेति क्रिया करने से श्वसन तंत्र में आये विकार दूर हो जाते हैं। आंखें अच्छी रहती हैं।

21.  सप्ताह में कम से कम एक बार सूर्य मुखी तेल से गंडूस कर लेना चाहिये, जिससे रक्त में आए विकार दूर हो जाते हैं। शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है। रोगावस्था में नित्य करना चाहिये।

22.  नित्य हाथ और पैर के सभी प्रमुख जोड़ों तथा गर्दन के जोड़ों को कम से कम 5-7 बार धीरेधीरे जितना घुमाया जा सकें, सभी तरफ घुमाना चाहिए।

23.  यदि संभव हों तो अपने आवास और कार्यालय की व्यवस्था वास्तु दोषों रहित रखनी चाहिए, ताकि प्राकृतिक पंच महाभूत ऊर्जाओं का अधिकाधिक लाभ प्राप्त हो सकें। कम से कम शयन कक्ष और कार्यालय जहाँ अधिक समय गुजारना पड़ता है, वहाँ तो उसके अनुरूप व्यवस्था अवश्य रखनी चाहिए।

24.  यथा संभव हमारा खानपान, रहनसहन, आचारविचार स्वच्छ एवं शुद्ध होना चाहिए।

25.  यथा संभव पानी को छानकर, उबालकर अथवा सफेद कांच के बर्तनों में सूर्य तप्त कर पीना चाहिए।

26.  सद्साहित्य के स्वाध्याय, चिन्तन, मनन हेतु नियमित समय निकालना चाहिए।

27.  रात्रि में निद्रा लेने से पूर्व अपने आराध्य को स्मरण कर, अपने दिन भर के कार्यकलापों की समीक्षा करनी चाहिये और मन, वचन और काया से किये गये गलत आचरण का पश्चाताप करना चाहिये। हम ही हमारे सच्चे, निरीक्षक, समीक्षक और परीक्षक होते हैं। दोषों का स्मरण करने से भविष्य में उनसे सरलता पूर्वक छुटकारा पाया जा सकता है।

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