रोग क्यों?

रोग क्यों?

रोग क्यों?

 स्वस्थता को चाहते हुए भी हम स्वस्थ क्यों नहीं होते? अतः हमें उन सभी कारणों की जानकारी आवश्यक है, जो हमें रोगी बनाने में सहायक बनते हैं। रोग होने के अनेक कारण होते हैं। जैसे पूर्व जन्म के संचित असाता वेदनीय कर्मो का उदय, पैतृक संस्कार और वंशानुगत रोग, आकस्मिक दुर्घटनाएँ, आसपास का बाह्य प्रदूषित वातावरण, मौसम का परिवर्तन एवं उसके प्रतिकूल आचरण, पारिवारिक जिम्मेदारियाँ, सामाजिक कुरीतियों का पालन, स्वास्थ्य विरोधी सरकारी नीतियाँ, कानून, सुविधाएँ, प्रोत्साहन, स्वास्थ्य को बिगाड़ने वाले रुढिवादी धार्मिक अनुष्ठानों का पालन, जीवन निर्वाह हेतु स्वास्थ्य विरोधी व्यावसायिक वातावरण, आर्थिक कठिनाईयाँ, अपव्यय, बदनामी, प्राकृतिक आपदाओं का प्रकोप, असंयम, दुव्र्यसनों का सेवन, अकरणीय पाश्विक वृत्तियाँ, मिलावट एवं रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाईयों से प्रभावित उपलब्ध आहार सामग्री, असाध्य एवं संक्रामक रोगों के प्रति प्रारम्भ में रखी गई उपेक्षावृत्ति, अनावश्यक दवाओं का सेवन तथा शारीरिक परीक्षण, इलैक्ट्रोनिक किरणों (एक्स रे, टी.वी, सोनोग्राफी, कम्प्यूटर, सी.टी. स्केनिंग, मोबाइल फोन एवं अन्य प्रकार की आणविक तरंगों) का दुष्प्रभाव, प्राण ऊर्जा का दुरुपयोग या अपव्यय, आराम, निद्रा, विश्राम का अभाव, क्षमता के प्रतिकूल श्रम करना, मलमूत्र को रोकना, अति भोजन, अति निद्रा, शरीर में रोग प्रतीकारात्मक शक्ति का क्षीण होना, गलत निदान अथवा अधूरे उपचार तथा दवाओं का दुष्प्रभाव, वृद्धावस्था के कारण इन्द्रियों का शिथिल हो जाना। प्रमाद, आलस्य, अविवेक, अशुभ चिन्तन, आवेग, अज्ञान, असजगता, हिंसक, मायावी, अनैतिक जीवन शैली, जिससे सदैव तनावग्रस्त एवं भयभीत रहने की परिस्थितियाँ बनना आदि रोगों के मुख्य कारण होते हैं। कुछ कारण तो हमारे नियन्त्रण में होते हैं कुछ कारण नहीं। फिर भी हमारी आत्मा में अनन्त शक्ति होने से यदि सजगता और स्वविवेक पूर्ण जीवन शैली अपनायी जावे तो रोग के जो कारण हमारे नियन्त्रण में नहीं हैं, उनके प्रभाव को कम किया जा सकता है। जीवन में सभी को सदैव सभी प्रकार की अनुकूलताएँ प्रायः नहीं मिलती। प्रतिकूल परिस्थितियों को स्वस्थ चिन्तन, मनन एवं सम्यक् आचरण द्वारा अपने अनुकूल बनाया जा सकता है, यही स्वास्थ्य का मूल सिद्धान्त और स्वस्थ जीवन की आधारशिला होती है। हमारा चिन्तन और आचरण जितनाजितना सम्यक् होगा, उतनेउतने हम स्वस्थ होते जायेंगे।

शरीर की स्वाभाविक विसर्जन क्रियाओं में अवरोध:-

 शारीरिक रोग होने का एक कारण यह भी है कि सहज रूप से शरीर में उत्पन्न होने वाले वेगों को जबरदस्ती या आलस्यवश रोकना, जैसेमल, मूत्र, छींक, डकार, गुदा की वायु, निद्रा, प्यास, आंसू, वमन, उबासी इत्यादि को रोकना।

 जब तक शरीर में विजातीय तत्त्वों के निष्कासन में सहयोगी अंग सशक्त रहते हैं, सही रूप में कार्य करते हैं, रोग होने की संभावना कम रहती है। परन्तु जब विजातीय तत्त्वों के विसर्जन की क्रिया शिथिल पड़ जाती है या उसमें अवरोध जाता है तो शरीर में विकार संग्रहित होने लगते हैं। शरीर की अस्वस्थता का कारण यह विकार बन जाता है। परिणाम स्वरूप रक्त प्रवाह और चेतना का प्रवाह बराबर नहीं होता तथा उसका परिणाम होता हैरोग।

असंयमित जीवन शैली:-

 प्रत्येक व्यक्ति जीवन पर्यन्त स्वस्थ एवं सुखी रहना चाहता है। स्वस्थ रहना जीव की स्वाभाविक सम्पदा है। आत्मा का स्वभाव भी है। कोई भी रोगी बनना नहीं चाहता। परन्तु चाहने मात्र से तो स्वास्थ्य, शान्ति और समाधि नहीं मिल सकती। स्वस्थ रहने की कामना रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को उन सभी कारणों से बचना चाहिए जो उनका स्वास्थ्य बिगाड़ते हैं। हमें मानव जीवन में पर्याप्तियों के रूप में आहार, शरीर, इन्द्रियाँ, श्वास लेने की शक्ति, वाणी के रूप में भाषा और मन ऊर्जा के जो मूल स्रोत प्राप्त हुए हैं, उनका उपयोग करते समय हमें संयम रखना चाहिए। उनकी क्षमताओं का अधिक से अधिक सम्यक् उपयोग करना चाहिए। परन्तु कभी भी अनावश्यक दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। साथ में वर्तमान में उपस्थित उन कारणों को दूर करने के लिए सम्यक् पुरुषार्थ करना चाहिए, जिसके कारण व्यक्ति रोगी अथवा विकारों से ग्रस्त बना हुआ है। सुखी जीवन के लिए सिर्फ शरीर का होना ही काफी नहीं होता, अपितु शरीर का स्वस्थ, नीरोग और बलवान होना भी आवश्यक है। अनेक व्यक्ति बाह्य रूप से बलिष्ठ, पहलवान जैसे दिखने के बावजूद कभीकभी असाध्य रोगों से पीड़ित पाए जाते हैं, जबकि इसके विपरीत कभीकभी बाह्य दृष्टि से दुबलेपतले दिखने वाले कुछ व्यक्ति मोटेताजे दिखने वाले व्यक्तियों की अपेक्षा ज्यादा मनोबली, आत्मबली और स्वस्थ हो सकते हैं।

 अपनी आदतों की दासता के कारण हम अप्राकृतिक जीवन शैली की बुराईयों को जानते, मानते, स्वीकारते हुए भी छोड़ना नहीं चाहते। हमारी असजगता, अविवेक, उदासीनता, निष्क्रियता, स्वच्छन्दता, अनियमितता, अज्ञानता, सम्यक् आचरण के प्रति उपेक्षावृत्ति, हानिकारक प्रवृत्तियों के प्रति लगाव, अनुमोदन या तटस्थता अर्थात् जैसा चलता है चलने दें, यह मनोवृत्ति अस्वस्थता का मुख्य कारण होती है। अतः स्वस्थ रहने की कामना करने वालों को अपनी जीवन चर्या का निर्वाह करते समय अपनी क्षमताओं का सजगता, स्वविवेक, संयम और सन्तुलन के साथ सम्यक् पालन करना चाहिए।

वाणी का प्रभाव:-

 वाणी के दुरुपयोग से भी जो अव्यवस्था और असंतुलन होता है। उसका प्रारम्भिक प्रभाव मानसिक रोगों पर होता है। वाणी को सुनकर हंसना, मुस्कराना, डाँटना, चेहरे का रूप बदलना उसका द्योतक होता है। परन्तु अधिकांश चिकित्सक और रोगी तथा उनके परिजन आन्तरिक मानसिक रोगों को तो रोग मानते तक नहीं। तब उनके उपचार एवं निवारण के बारे में सोचने का तो प्रश्न ही नहीं होता। परन्तु दुर्घटना, पैतृक, जन्म जात रोगों को छोड़ अधिकांश रोगों का कारण नकारात्मक भावों से प्रारम्भ होता है और जब तक सम्यक् चिन्तन द्वारा उसे बदला नहीं जाता तब तक दीर्घकालीन स्थायी स्वास्थ्य की प्राप्ति संभव नहीं होती। रोग का कारण जब तक बना रहेगा रोग होने की संभावना बनी रहती है।

जीवन की गलत प्राथमिकताएँ:-

 मानव जीवन का उद्देश्य क्या है? खानापीना, मौजशौक करना और सो जाना और दूसरे दिन प्रातः उठकर पुनः उन्हीं कार्यो में लग जाना। यह सभी कार्य तो पशु भी करते हैं। ऐसे जीवन जीने वाले मनुष्य और पशु में क्या अन्तर? मानव में चेतना का सर्वाधिक विकास होने के कारण एक विशेषता होती हैं कि वह जानता भी है और समझता भी है कि वह क्या कर रहा है? क्यों कर रहा है? क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए? मानव में ही चिन्तन, मनन की अपूर्व क्षमता, बुद्धि तथा विवेक होता है। जिससे भूत की भूलों का सुधार और भविष्य के सुखद जीवन की कल्पना एवं सम्यक् पुरुषार्थ कर सकता है। अतः मानव से ही अपनी क्षमताओं के अनुरूप सही उद्देश्य एवं लक्ष्य के प्रति आगे बढ़ने की अपेक्षा रखी जा सकती है। मानव और पशु के जीवन में अन्तर तो होना चाहिए। मानव प्राणी मात्र के लिए उपयोगी होते हुए अपने जीवन का सम्पूर्ण विकास कैसे कर सके? यही मानव जीवन की सफलता का सच्चा मापदण्ड है।

 जिन्दगी क्षणप्रतिक्षण बीत रही है। मनुष्य जीवन में हमें अनन्त शक्तियाँ सहज रूप से प्राप्त होती है, परन्तु अज्ञानवश हम उनका सदुपयोग नहीं कर पाते। अपने जीवन के लक्ष्य के प्रति हम कितने सजग और सक्रिय हैं जिसका प्रत्येक मानव को सम्यक् चिन्तन करना चाहिए।

 आभूषण की डिब्बी का तभी महत्त्व होता है, जब तक उसमें बहुमूल्य आभूषण होते हैं। बटुए (पर्स) का मूल्य उसमें रखें पैसों के आधार पर होता है। ठीक उसी प्रकार मानव शरीर का मूल्य तभी तक होता है, जब तक उसमें आत्मा होती है। जिस प्रकार आभूषण से शून्य डिब्बी और रुपयों के बिना बटुए का विशेष मूल्य नहीं होता और जो व्यक्ति आभूषणों और रुपयों से ज्यादा डिब्बी और बटुए को महत्त्व देता है, उसे बुद्धिमान नहीं समझा जाता। समझदार व्यक्ति पर्स और डिब्बी दोनों का ख्याल रखता है, परन्तु सुरक्षा हेतु ज्यादा आभूषणों और रुपयों को महत्त्व देता है तथा उनकी अनुपस्थिति में डिब्बी और बटुए की उपेक्षा करते हुए भी संकोच नहीं करता। उसकी प्राथमिकता आभूषण और रुपयों की होती है। ठीक उसी प्रकार समझदार ज्ञानी व्यक्ति की सर्वोच्च प्राथमिकता शरीर को स्वस्थ रखने के साथसाथ आत्मा को विकारों से मुक्त करने की होती है। अतः शरीर को स्वस्थ रखने के लिए आत्मा की उपेक्षा नहीं करता। उसको विकारी नहीं बनाता। उसका प्रथम प्रयास तो आत्मा को विकारों से मुक्त बनाने का ही होता है। कभीकभी आत्मोत्थान हेतु शरीर की उपेक्षा करते हुए संकोच नहीं करता। आध्यात्मिक जीवन जीने वालों का ऐसा ही दृष्टिकोण होता है।

सही सोच का अभाव:-

 शरीर, मन और आत्मा के बारे में अधिकांश व्यक्तियों को प्रायः जानने सोचने, समझने की जिज्ञासा ही नहीं होती। क्या गलत और क्या ठीक? क्या उचित और क्या अनुचित? क्या करणीय तथा क्या अकरणीय? क्या प्राथमिक अथवा अति आवश्यक और क्या साधारण अथवा अनावश्यक? प्रकट होने वाले प्रत्येक रोग के लक्षण का कारण एवं मूल क्या? क्यों? कब? कितना? जानने का प्रयास करें। समस्या अथवा रोग का पता लग जाएगा। शरीर क्या करता है, और क्या नहीं, समझ में जाएगा।             

 सम्यक् चिन्तन के अभाव में कभीकभी व्यक्ति का सोच, मायावी विज्ञापनों, भीड़, तत्कालिक लाभ, बाह्य चकाचौन्ध से प्रभावित हो सकता है। परिणामस्वरूप व्यक्ति अपने लक्ष्य का सही निर्धारण नहीं कर पाता। ऐसी अवस्था में व्यक्ति अपनी क्षमताओं और प्राथमिकताओं से भी प्रायः परिचित नहीं होता। सही जानकारी के अभाव में या आंशिक जानकारी के कारण व्यक्ति कभीकभी गलत को सही और सही को गलत मानने की भूल कर सकता है। उसकी प्राथमिकताएँ स्वयं के भविष्य के लिए उपयोगी होने के बजाय हानिकारक हो सकती है। फलतः उसका जीवन तनावग्रस्त, दुःखी, अस्वस्थ बन सकता है।

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