Home / सनातन सत्य

सनातन सत्य

स्वावलंबी चिकित्सा पद्धतियाँ क्यों प्रभावशाली?

बिना दवा उपचार की स्वावलंबी चिकित्सा पद्धतियाँ सहज, सरल, सस्ती, स्थायी, दुष्प्रभावों से रहित, शरीर की प्रतिकारात्मक क्षमता को बढ़ाने वाली होती हैं। जो व्यक्ति का स्वविवेक जागृत कर, स्वयं की क्षमताओं के सदुपयोग की प्रेरणा देती है। वे हिंसा पर नहीं अहिंसा पर, विषमता पर नहीं समता पर, साधनों पर नहीं साधना पर, दूसरों पर नहीं स्वयं पर, क्षणिक राहत पर नहीं, अपितु अन्तिम प्रभावशाली स्थायी परिणामों पर आधारित होती हैं। रोग के लक्षणों की अपेक्षा रोग के मूल कारणों को नष्ट करती हैं जो शरीर के साथ-साथ मन एवं आत्मा के विकारों को दूर करने में सक्षम होती हैं। जो जितना महत्त्वपूर्ण होता है, उसको उसकी क्षमता के अनुरूप महत्त्व एवं प्राथमिकता देती हैं। यह प्रकृति के सनातन सिद्धान्तों पर आधारित होने के कारण अधिक प्रभावशाली, वैज्ञानिक, मौलिक एवं निर्दोष होती हैं।

वैकल्पिक चिकित्सा कौनसी?

स्वावलंबी अथवा परावलम्बी, सहज अथवा दुर्लभ, सरल अथवा कठिन, सस्ती अथवा महंगी। प्रकृति के सनातन सिद्धान्तों पर आधारित प्राकृतिक अथवा नित्य बदलते मापदण्डों वाली अप्राकृतिक। अहिंसक अथवा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हिंसा, निर्दयता, क्रूरता को बढ़ावा देने वाली। दुष्प्रभावों से रहित अथवा दुष्प्रभावों वाली। शरीर की प्रतिकारात्मक क्षमता बढ़ाने वाली अथवा कम करने वाली। रोग का स्थायी उपचार करने वाली अथवा क्षणिक राहत पहुँचाने वाली। सारे शरीर को एक इकाई मानकर उपचार करने वाली अथवा शरीर का टुकड़ों-टुकड़ों के सिद्धान्त पर उपचार करने वाली। उपर्युक्त मापदण्ड के आधार पर हम स्वयं निर्णय करें कि कौनसी चिकित्सा पद्धतियाँ मौलिक हैं और कौनसी वैकल्पिक?

स्वावलंबी उपचार क्यों विश्वसनीय?

स्वयं द्वारा स्वयं का उपचार कर स्वस्थ होने की विधि को स्वावलंबी चिकित्सा कहते हैं। इसमें यथा सम्भव दवा एवं चिकित्सक पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं रहती। बिना किसी जीव को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष कष्ट पहुँचाए सहज रूप से उपलब्ध पूर्णतः अहिंसक एवं दुष्प्रभावों से रहित साधनों का सहयोग लिया जाता है। इसमें शरीर मन और आत्मा में जो जितना महत्त्वपूर्ण होता है, उसको उसकी क्षमता के अनुरूप महत्त्व एवं प्राथमिकता दी जाती है। प्रकृति के सनातन सिद्धान्तों की उपेक्षा नहीं हो, इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है। शरीर विज्ञान के विशेष जानकारी की आवश्यकता नहीं होती है। ये उपचार सहज, सरल, सस्ते, सर्वत्र उपलब्ध होने से व्यक्ति को सजग, स्वतंत्र, स्वावलंबी एवं सम्यक् सोच वाला बनाते हैं।

अच्छे स्वास्थ्य हेतु प्रतिरोधक क्षमता आवश्यक

मानव अनन्त शक्तिशाली प्राणी है। उसमें अनन्त क्षमता और ऊर्जा होती है। जिस प्रकार लाखों चूहे मिलकर किसी शेर को परेशान नहीं कर सकते, उसी प्रकार यदि शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता अच्छी हो तो वायरस और कीटाणु उसका क्या बिगाड़ सकते हैं? यदि शेर को अपनी क्षमता पर विश्वास न हो, वह प्रमाद और आलसी या गहरी निद्रा में असजगता से सोया हुआ हो तो निश्चिय रूप से चूहे उसको परेशान कर सकते हैं। जागृत अवस्था में वे उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते। शरीर की प्रतिकारात्मक शक्ति रोगों से हमारी रक्षा करती है। वह शक्ति क्यों क्षीण होती है? उसको क्षीण करने में गर्भावस्था से ही ली जाने वाली आधुनिक दवाइयाँ, इंजेक्शन और टीकाकरण के दुष्प्रभावों की अहं भूमिका होती है। जिनकी प्रतिरोधक क्षमता अच्छी होती है, उसका वायरस और बैक्टीरिया कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते, अर्थात् वायरस उस व्यक्ति को रोगी नहीं बना सकते।

चिकित्सा हेतु हिंसा अनुचित

किसी प्राणी को दुःख दिये बिना हिंसा, क्रूरता, निर्दयता हो नहीं सकती। जो प्राण हम दे नहीं सकते, उसको लेने का हमें क्या अधिकार? दुःख देने से दुःख ही मिलेगा। प्रकृति के न्याय में देर हो सकती है, अंधेर नहीं। जो हम नहीं बना सकते, उसको स्वार्थवश नष्ट करना बुद्धिमता नहीं। अतः चिकित्सा के नाम पर प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप में हिंसा करना, कराना और करने वालों को सहयोग देना अपराध है। जिसका परिणाम हिंसा में सहयोग देने वालों को भविष्य में रोगी बन भुगतना पड़ेगा। हिंसक दवाओं के माध्यम से शरीर में जाने वाले उन बेजुबान प्राणियों की बदुआओ की तरंगे शरीर को दुष्प्रभावों से ग्रसित करें तो आश्चर्य नहीं।

अहिंसा में विश्वास रखने वाला अहिंसक व्यक्ति हजारों रुपयों का प्रलोभन देने के बावजूद जानबूझ कर एक चिंटी को भी नहीं मार सकता। जिन पदार्थों में जानवरों के अवयव होते हैं उनको खाने अथवा उपयोग में लेने से यथासंभव परहेज करता है। जैन संतों के लिए अहिंसा का यथासंभव पूर्ण रूपेण पालन जीवन में ष्वास के समान मुख्य होता है। सामायिक, स्वाध्याय, ध्यान, प्रार्थना, जप-तप आदि शुभ प्रवृत्तियाँ भोजन एवं पानी के समान अन्य प्रमुख प्राथमिकताओं के समान हो सकती है। परन्तु आज अहिंसा प्रेमियों द्वारा भी चिकित्सा में अहिंसा न केवल उपेक्षित एवं गौण होती जा रही है, अपितु ऐसी हिंसा को आवश्यक बतलाने का प्रयास भी किया जा रहा है। क्या ऐसा प्रयास परोक्ष रूप से बूचड़खानों का सहयोग करना एवं पशु क्रूरता को प्रोत्साहन देना नहीं है? अतः उपचार हेतु प्रत्यक्ष या परोक्ष हिंसा करना/करवाना अथवा हिंसा करवाने वालों को प्रोत्साहन देना, कर्जा चुकाने के लिये ऊँचे ब्याज पर कर्जा लेने के समान नासमझी है।

स्वस्थ कौन?

स्वस्थ का मतलब होता है रोग-मुक्त जीवन। स्वस्थता, तन, मन और आत्मोत्साह के समन्वय का नाम है। जब शरीर, मन, इन्दियाँ और आत्मा ताल से ताल मिलाकर सन्तुलन से कार्य करते हैं, तब ही अच्छा स्वास्थ्य कहलाता है। अर्थात् शरीर की समस्त प्रणालियाँ एवं सभी अवयव स्वतन्त्रापूर्वक अपना-अपना कार्य करें, किसी के भी कार्य में, किसी भी प्रकार का अवरोध, आलस्य अथवा निश्क्रियता न हों तथा उनको चलाने हेतु किसी बाह्य दवा अथवा उपकरणों की आवश्यकता न पड़े। मन और पाँचों इन्द्रियाँ सशक्त हों। स्मरण शक्ति अच्छी हों। क्षमताओं का ज्ञान हों। विवेक जागृत हों।

अच्छे स्वास्थ्य हेतु मूलभूत आवश्यकताएँ

अच्छे स्वास्थ्य के लिए नियमित स्वाध्याय, ध्यान, शुभ भावनाओं का सम्यक् चिन्तन, अनासक्ति एवं निस्पृही जीवनचर्या, सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन एवं सम्यक् आचरण में प्रवृत्ति का अभ्यास, संयमित, नियमित, परिमित जीवन शैली, मौसम के अनुकूल सात्त्विक पौष्टिक खान-पान, शुद्ध प्राणवायु का अधिकाधिक सेवन, स्वच्छ हवा एवं धूप वाला आवास एवं क्रिया स्थल, नियमित आसन, प्राणायाम, व्यायाम, निद्रा, उपवास, स्वास्थ्य के अनुकूल दिनचर्या आवश्यक होती है।
शारीरिक श्रम, सुव्यवस्थित पाचन एवं तनावमुक्त जीवन पद्धति शारीरिक स्वस्थता के लिए आवश्यक होती है तथा जितनी-जितनी इनकी उपेक्षा होगी, शरीर में रोगों की संभावना बढ़ती जायेगी। इन सब बातों का पालन व्यक्ति को स्वयं ही करना पड़ता है, बाजार से मिलने वाली दवाइयाँ नहीं कर सकती। अतः स्वस्थ जीवन जीने के लिए व्यक्ति की सजगता, सहयोग, भागीदारी, स्वावलम्बी बनने की तीव्रतम भावना आवश्यक होती है।

विभाव अवस्था रोग का प्रतीक

‘‘स्वास्थ्य का मतलब है स्व में स्थित हो जाना’’ अर्थात् अपने निज स्वरूप में आ जाना, विभाव अवस्था से निज स्वभाव में आ जाना। जैसे अग्नि के सम्पर्क से पानी उबलने लगता हैं परन्तु जैसे ही पानी को अग्नि से अलग करते हैं, धीरे-धीरे वह स्वतः ही ठंडा हो जाता है। शीतलता पानी का स्वभाव है, गर्मी नहीं। पानी को वातावरण के अनुरूप रखने के लिए किसी बाह्य आलम्बन की आवश्यकता नहीं होती। उसी प्रकार शरीर में हड्डियों का स्वभाव कठोरता है, परन्तु किसी कारणवश कोई हड्डी नर्म हो जाए उसमें लचीलापन आ जाए तो रोग का कारण बन जाती है। मांस-पेशियों का स्वभाव लचीलापन है परन्तु उसमें किसी कारणवश कठोरता आ जाए, गांठ हो जाए अथवा विजातीय तत्त्वों के जमाव के कारण अथवा आवश्यक रसायनों के अभाव के कारण यदि शरीर के किसी भाग की मांसपेशियों में लचीलापन समाप्त हो जाए अथवा क्षमतानुसार न हो तो रोग का कारण बन जाती है। शरीर का तापक्रम 98.4 डिग्री फारेनहाइट रहना चाहिए, परन्तु किसी कारणवश कम या ज्यादा जो जाए तो शरीर में रोग के लक्षण प्रकट हो जाते हैं। रक्त सारे शरीर में आवश्यकतानुसार ऊर्जा पहुँचाने का कार्य अबाध गति से करता है। अतः उसके सन्तुलित प्रवाह हेतु आवश्यक गर्मी एवं निश्चिय दबाव आवश्यक होता है, परन्तु यदि हमारी अप्राकृतिक जीवन शैली से रक्त का बराबर निर्माण न हों अथवा दबाव आवश्यकता से कम या ज्यादा हो जाए तो सारे शरीर में प्राण ऊर्जा का वितरण प्रभावित हो जाता है। रक्त नलिकाओं के फैलने अथवा सिकुड़ने की सम्भावनाएँ बढ़ जाती है अर्थात् अपना स्वरूप बदल देती है, अतः रोग की स्थिति पैदा हो जाती है।

रोग कब होते हैं?

उपचार से पूर्व यह जानना और समझना आवश्यक है कि रोग क्या है? रोग क्यों, कब और कैसे होता है? उसके प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष कारण क्या हैं? शरीर की रोग प्रतिकारात्मक शक्ति कैसे बढ़ती हैं? और क्यों कम होती है? उसके सहायक और विरोधी तत्व क्या हैं? क्या शारीरिक रोगों का मन, विचार, भाव, वाणी अथवा आत्मा से प्रत्यक्ष-परोक्ष संबंध होता है? क्या उपचार करते समय उनसे संबंधित कारणों को प्राथमिकता दी जाती है? क्या उन कारणों की उपेक्षा तो नहीं होती अथवा उपचार मन और आत्मा के विकारों को बढ़ाने वाला तो नहीं होता है? उपचार हेतु उपयोग में लिए जाने वाले साधन, साध्य और सामग्री कितने पवित्र हैं? रोगी का आचरण और जीवनचर्या प्रकृति के सनातन सिद्धान्तों और नियमों के प्रतिकूल तो नहीं है?
रोग का मतलब शरीर के विकारों, दोषों, विजातीय अथवा अनुपयोगी तत्वों का जमा होकर, शरीर के विभिन्न तन्त्रों के स्वचलित, स्वनियन्त्रित कार्यो में अवरोध अथवा असंतुलन उत्पन्न करना होता है। वास्तव में प्राकृतिक सनातन नियमों का जाने अनजाने वर्तमान अथवा भूतकाल में उल्लंघन करना अर्थात् असंयमित, अनियंत्रित, अविवेकपूर्ण स्वच्छन्द आचरण के द्वारा जो शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक क्षमताओं का अपव्यय, दुरुपयोग करने से जो विकार उत्पन्न हों, असंतुलन की जो स्थिति बनती है, वही रोग होता है। ऐसी परिस्थिति में शरीर एवं मन की सभी क्रियाएं, अंग, उपांग, इन्द्रियां, तंत्र, अवयव आदि अपना-अपना कार्य स्वतंत्रता पूर्वक सामान्य रूप से नहीं कर पाते। फलतः शरीर, मन और आत्मा के अवांछित, विजातीय, अनुपयोगी विकारों का विसर्जन बराबर नहीं होता। उनमें अवरोध उत्पन्न होने से पीड़ा, दर्द, वेदना, जलन, सूजन, विघटन, चेतना की शून्यता, तनाव, बैचेनी, भय, चिन्ता, अधीरता, असजगता, गलत दृश्टिकोण, चिंतन, जीवन के प्रति निराशा आदि के जो लक्षण प्रकट होते हैं, वहीं मिलकर रोग का परिवार कहलाते हैं।

अध्यात्म से शून्य स्वास्थ्य विज्ञान अपूर्ण

शरीर मात्र ढांचा ही नहीं, उसके साथ मन और आत्मा भी जुड़े हैं। मन और आत्मा का संचालन, नियन्त्रण चेतना से होता है। हमारी संवेदनाएँ, भाव, विचार,सोच, कर्म, नियति, स्वभाव, चिंतन, काल तथा जीवनचर्या आदि उसे प्रभावित करते हैं। आत्मिक बल को भौतिक यंत्रों से नहीं मापा जा सकता। इस कारण उस अनुभूत सत्य को नकारना, गलत, असत्य,अवैज्ञानिक तत्त्वहीन मानना कौनसी बुद्धिमता है? आत्मा को प्रभावित करने वाले तथ्यों की उपेक्षा करने वाला अपूर्ण ज्ञान अपने आपको कैसे पूर्ण प्रभावशाली स्वास्थ्य विज्ञान होने का दावा कर सकता है? विज्ञान का आधार होता है सत्यदृश्टि, अनेकांत दृश्टि, समग्रदृश्टि। विज्ञान की पहली शर्त है- ‘सच्चा सो मेरा न कि मेरा जो सच्चा।’ प्राप्त सूचनाओं, प्रमाणों तथा प्रयोगों एवं परीक्षणों से उपलब्ध आंकड़ों का व्यवस्थित लिपिबद्ध संकलन और प्रस्तुतिकरण विज्ञान का मात्र एक पक्ष होता है।
भौतिक विज्ञान का आधार होता है, जिसे दिखाया जा सके, जो मांपा जा सके, जो प्रयोगों, परीक्षणों से प्रमाणित किया जा सके। ऐसे परिणाम जो तथ्य, तर्क एवं आंकड़ों से लिपिबद्ध किये जा सकें। जिसका आधार, निरीक्षण, विष्लेशण, निश्चित प्रक्रिया पर आधारित व्यवस्थित आंकड़ों द्वारा संकलित एवं प्रमाणित हों। जिसका उपयोग, संचालन, नियंत्रण प्रायः व्यक्ति स्वयं अथवा अन्य कोई व्यक्ति द्वारा निश्चित विधि का पालनकर बिना किसी बाह्य भेदभाव कहीं भी कर सकता है। आध्यात्मिक विज्ञान का आधार होता है स्वावलम्बन अर्थात् स्वयं के द्वारा स्वयं का निरीक्षण, परीक्षण, नियंत्रण, संचालन। उसका परिणाम होता है आत्मानुभूति। भौतिक विज्ञान व्यक्ति को विशिष्ठ बनाता है, जबकि आध्यात्मिक ज्ञान मानव को स्वाभाविक बनाता है। भौतिक विज्ञान में प्रयोग में विश्वास करता है, जबकि अध्यात्म विज्ञान योग में। विज्ञान शक्ति की खोज करता है, जबकि अध्यात्म शक्ति की। भौतिक विज्ञान पर आधारित होती है- परावलम्बी चिकित्सा पद्धतियाँ, जबकि प्रकृति के सनातन सिद्धान्तों पर आधारित होती है- स्वावलंबी चिकित्सा पद्धतियाँ।

स्वास्थ्य मंत्रालय से अपेक्षाएँ

स्वास्थ्य मंत्रालय को आधुनिक चिकित्सा पद्धति का अन्धाःनुकरण करने से पूर्व स्वस्थ कौन? अच्छा स्वास्थ्य कैसा? रोग क्यों? अच्छी चिकित्सा के मापदण्ड क्या हों? आदि स्वास्थ्य से जुड़े मूल तथ्यों को परिभाषित करना चाहिये। जनता को रोग-मुक्त करने हेतु उनके पास तत्कालीन और दीर्घकालीन क्या योजनाएँ हैं? स्वास्थ्य के नाम पर अरबों रुपयों को खर्च करके अति आधुनिक अस्पतालों के निर्माण एवं चिकित्सकों की संख्या बढ़ाने के बावजूद रोग और रोगियों की संख्या में वृद्धि क्यों हो रहीं है? स्पष्टीकरण करना चाहिए।

स्वास्थ्य मंत्रालय के कर्तव्य

स्वास्थ्य मंत्रालय का दायित्व है कि जनता के स्वास्थ्य की देखभाल करें। रोग के कारणों से प्रजा को सजग एवं सतर्क करें। रोगियों के लिये प्रभावशाली, सस्ती, स्वावलम्बी, दुश्प्रभावों से रहित चिकित्सा व्यवस्था उपलब्ध करावें तथा अन्य मंत्रालयों से समन्वय रख, स्वास्थ्य के लिये हानिकारक खाद्य में मिलावट एवं कीटनाशक पर आधारित कृषी उपज, शारीरिक अथवा मानसिक प्रदुषण फैलाने वाली गतिविधियाँ, योजनाओं तथा प्रचार माध्यमों पर अंकुश लगायें। स्वास्थ्य सम्बन्धी प्रभावशाली एवं उपयोगी विश्व के किसी भी क्षेत्र में प्रचलित चिकित्सा पद्धति ध्यान में आते ही उसकी विशेश जानकारी प्राप्त करने की पहल करें। स्वास्थ्य के लिए हानिकारक, मांसाहार, शराब एवं अन्य दुव्र्यसनों पर प्रतिबंध लगाकर तथा मनोरंजन के नाम पर काम, विकार, क्रूरता, हिंसा दर्शाने वाले दृश्यों, विज्ञापनों आदि को प्रचारित करने पर अंकुश लगाकर, जनता को रोग मुक्त रख अपने दायित्व का निर्वाह करें।

रोग हमारा मित्र अथवा शत्रु

रोग के सम्बन्ध में हमारी गलत धारणाएँ हैं। दर्द अथवा रोग के अन्य लक्षण हमें सजग करते हैं। अपने कत्र्तव्य बोध हेतु चिन्तन करने की प्रेरणा देते हैं। हमें चेतावनी देते हैं, कि हम अपने आपका निरीक्षण कर, अपने आपको बदलें ताकि पीड़ा मुक्त, तनाव मुक्त, जीवन जी सकें। हम स्वप्न में जी रहे हैं यानी बेहोषी में हैं। दर्द अथवा रोग के अन्य संकेत उस बेहोषी को भंग कर हमें सावधान करते हैं, परन्तु सही दृश्टी न होने से हमने, उनको शत्रु मान लिया है। रोगी शरीर की आवाज सुनना और भाशा को समझना नहीं चाहता। उपचार स्वयं के पास है और खोजता है बाजार में, डॉक्टर और दवाइयों के द्वारा। फलतः दवा द्वारा रोग के कारणों को दबाकर खुश होने का असफल प्रयास करता है। रोगी जितना डॉक्टर, दवा अथवा अन्य शुभचिन्तकों, अपूर्ण ज्ञान वाले सलाहकारों पर विश्वास करता है, उतना अपने आप पर एवं अपनी क्षमताओं पर विश्वास नहीं करता।

भ्रमण करना हानिकारक भी हो सकता हैं।

आज स्वास्थ्य के संबंध में अधिकांश व्यक्तियों का चिन्तन प्रायः नगण्य, अथवा अविवेकपूर्ण और सही नहीं होता। हमारी अधिकतर गतिविधियाँ देखा-देखी, सुनी-सुनायी, विज्ञापन पर आधारित , भीड़ से प्रभावित होती है। प्रायः उसके साथ सम्यक् चिन्तन न होने से कभी-कभी अच्छी प्रवृत्तियां भी हानिकारक हो सकती है। जैसे जिस व्यक्ति का एक पैर लम्बा और दूसरा पैर छोटा होता है, यदि ऐसा व्यक्ति पैरों का संतुलन किये बिना प्रतिदिन घूमने जाता है, तो उसके लिये घूमना लाभ के स्थान पर हानिकारक भी हो सकता हैं। शरीर के किसी भाग पर अनावश्यक दबाव लगातार पड़ते रहने से वह भाग रोग ग्रस्त हो जाता है। अतः घूमने से पहले शरीर का संतुलन (Alignment अथवा Balance) आवश्यक होता है।

नाभि का अपने केन्द्र में रहना क्यों आवश्यक?

 

गलत ढंग से उठने-बैठने, चलने-फिरने, वजन उठाने, श्वसन क्रिया करने, शरीर का संतुलन बिगाड़ने वाली अन्य प्रवृत्तियों के कारण प्रायः नाभि अपने केन्द्र से हट जाती है।
यदि नाभि अपने स्थान से अन्दर की तरफ हो जाए, उस व्यक्ति का वजन दिन प्रतिदिन घटता चला जाता है और यदि किसी कारण नाभि अपने स्थान से बाहर की तरफ हो जाती है तो शरीर का वजन न चाहते हुए भी अनावश्यक बढ़ने लगता है। किसी कारण नाभि यदि अपने स्थान से ऊपर की तरफ चढ़ जाती है तो खट्टी डकारें, अपच आदि की शिकायतें रहने लगती है। कब्जी हो सकती है। परन्तु यदि नाभि अपने स्थान से नीचे की तरफ चली जाती है तो दस्तों की शिकायत हो जाती है। इसी प्रकार नाभि कभी दांयें, बायें अथवा तिरछी दिशाओं में भी हट जाती है जिससे शरीर में अनेक प्रकार के रोग होने लगते हैं। सारे परीक्षण एवं पेथोलाजिकल टेस्ट करने के पश्चात् भी रोग पकड़ में नहीं आता। ऐसे में नाभि केन्द्र को अपने केन्द्र में लाने से तुरन्त राहत मिलने लग जाती है।

भोजन का स्वास्थ्य पर प्रभाव

भोजन जीवन का आधार है। आधार हमेशा मजबूत होना चाहिए न कि मजबूरी, लापरवाही, अज्ञान अथवा अविवेकपूर्ण आचरण का। यह आवश्यक भी है और हमारे लिए चेतावनी भी है। आजकल अधिकांश व्यक्ति प्रायः भोजन शरीर की आवश्यकतानुसार नहीं करते अपितु मजबूरी और स्वाद की प्राथमिकता के अनुसार करते हैं। भोजन कितना ही संतुलित,पौष्टिक, सुपाच्य, स्वास्थ्यवर्द्धक क्यों न हो, परन्तु यदि खिलाने वाले का व्यवहार अच्छा न हो, उपेक्षापूर्ण हो, वाणी में व्यंग हो, तो ऐसा भोजन भी अपेक्षित लाभ नहीं पहुँचा सकता। खाया हुआ भोजन तीन भागों में विभक्त हो जाता है। स्थूल भाग मल बनता है, मध्यम अंश से शरीर के अवयवों का निर्माण होता है। सूक्ष्म अंश से मन की पुष्टि होती है। जिस प्रकार दही के मंथन से उसका सूक्ष्म अंश ऊपर आकर मक्खन बन जाता है, जिसको और तपाया जाये तो घी बन जाता है। ठीक उसी प्रकार अन्न के भावांश से मन बनता है। इसी कारण होटल के खाने से पेट तो भर सकता है, पर मन नहीं। पेट भोजन से भर सकता है, परन्तु मन तो भोजन में होने वाले भावों से ही भरता है।

निदान की प्रमाणिकता पर चिन्तन आवश्यक

‘‘शरीर, मन और आत्मा के बारे में अधिकांश व्यक्तियों को प्रायः जानने, सोचने, समझने की जिज्ञासा ही नहीं होती। क्या गलत और क्या ठीक? क्या उचित क्या अनुचित? क्या करणीय तथा क्या अकरणीय? क्या प्राथमिक अथवा अति आवश्यक और क्या साधारण अथवा अनावष्यक? प्रकट होने वाले प्रत्येक रोग के लक्षण का कारण एवं मूल क्या? क्यों? कब? कितना और विकास कैसे? जानने, समझने और चिंतन करने का प्रयास करें? समस्या अथवा रोग के कारण पता लग जाएगा। शरीर क्या स्वीकार करता है और क्या नहीं, समझ में आ जाएगा।’’ उपचार प्रारम्भ करने से पूर्व रोगी अथवा उसके परिजनों को चिकित्सक से निदान की सत्यता एवं उपचार की प्रमाणिकता तथा उससे पड़ने वाले दुश्प्रभावों की तर्क संगत संतोशप्रद जानकारी अनिवार्य होती है अन्यथा रोगी डॉक्टरों की प्रयोगषाला बन जाये तो कोई आष्चर्य की बात नहीं?

स्वास्थ्य के प्रति स्वयं की सजगता आवश्यक

आज हमारे स्वास्थ्य पर चारों तरफ से आक्रमण हो रहा है। स्वास्थ्य मंत्रालय की नीतियों में स्वास्थ्य गौण हैं। भ्रामक विज्ञापनों तथा स्वास्थ्य के लिये हानिकारक प्रदूषित पर्यावरण, दुव्र्यसनों एवं दुष्प्रवृत्तियों पर प्रभावशाली कानूनी प्रतिबंध नहीं है अपितु वे सरकारी संरक्षण में पनप रही है। आज राष्ट्रीयता, नैतिकता, स्वास्थ्य के प्रति सजगता थोथे नारों और अन्धाःनुकरण तक सीमित हो रही है। परिणामस्वरूप जो मांसाहार एवं फ़ास्ट फ़ूड नहीं खिलाना चाहिये व खिलाया जा रहा है। जो शराब एवं ठण्डे पेय नहीं पिलाना चाहिये उसे सरकार पैसे के लोभ में पिला रही है। जो कामवासना, क्रूरता, हिंसा आदि के दृश्यों को सार्वजनिक रूप से टी.वी पर नहीं दिखाया जाना चाहिये, मनोरंजन के नाम पर दिखाया जा रहा है। जो समाज एवं राष्ट्र के लिये Sex Education (यौन शिक्षा) जैसी घातक गतिविधियाँ हैं, वे निःसंकोच करवाई जा रही है। आज रक्षक ही भक्षक हो रहे हैं। खाने में मिलावट आम बात हो गयी हैं। सारा वातावरण पाश्विक वृत्तियों से दूषित हो रहा है। सरकारी तन्त्र को सच्चाई जानने, समझने व उसकी क्रियान्विति में कोई रुचि नहीं हैं। सारे सोच का आधार है भीड़ एवं संख्या बल। क्योंकि जनतन्त्र में उसी के आधार पर नेताओं का चुनाव और नीतियां निर्धारित होती है। फलतः उनके माध्यम से राष्ट्र विरोधी, जन साधारण के लिये अनुपयोगी, स्वास्थ्य को बिगाड़ने वाली कोई भी गतिविधि व्यक्तिगत स्वार्थवश आराम से चलायी जा सकती हैं।

 

प्रकृति का सनातन सिद्धान्त है कि जहाँ समस्या होती है उसका समाधान उसी स्थान पर होता है। शरीर में रोग के अनुकूल दवा बनाने की क्षमता होती है और यदि उन क्षमताओं को बिना किसी बाह्य दवा और आलम्बन विकसित कर दिया जाता है तो उपचार अधिक प्रभावषाली, स्थायी एवं भविष्य में पड़ने वाले दुष्प्रभाव से रहित हो जाता है।

मनुष्य का शरीर दुनियाँ की सर्वश्रेष्ठ  स्वचलित, स्वनियन्त्रित, स्व-अनुशासित मशीन होती है। अच्छे स्वचलित यंत्र में खतरा उपस्थित होने पर स्वतः उसको ठीक करने की व्यवस्था होती है। अतः हमारे शरीर में रोगों से बचने की सुरक्षा व्यवस्था तथा रोग होने पर पुनः स्वस्थ बनाने की व्यवस्था न हो, यह कैसे सम्भव हो सकता है? वास्तव में स्वास्थ्य के लिए हमारे शरीर में, प्रकृति में और आस-पास के वातावरण में समाधान भरे पड़े हैं। परन्तु उस व्यक्ति के लिए जो अपनी असीम क्षमताओं से अपरिचित हों, जिसका चिन्तन सम्यक् न हों, जो भविष्य में पड़ने वाले दुष्प्रभावों के प्रति बेखबर एवं भ्रान्त पूर्वाग्रहों से ग्रसित हों। ऐसे व्यक्तियों के लिए समाधान सामने होते हुए भी नजर नहीं आते हैं।

            किसी बात को बिना सोचे समझे स्वीकार करना यदि मूर्खता है तो अनुभूत सत्य को अज्ञानवश, सम्यक् चिन्तन एवं तर्क की कसौटी पर कसे बिना, प्रचार प्रसार के अभाव में, पूर्वग्रसित गलत धारणाओं के कारण अस्वीकार करने वालों को कैसे बुद्धिमान कहा जा सकता है? जिस प्रकार हीरे की पहचान डॉक्टर, वकील, नेता या सेनापति नहीं कर सकता। उसके लिए जौहरी की द्रष्टि चाहिए। ठीक उसी प्रकार स्वावलंबी अहिंसात्मक चिकित्सा पद्धतियों की प्रभावषालीता के प्रभाव का निष्कर्ष , आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों के चिकित्सक नहीं बता सकते। उसके लिए आवश्यक है पूर्वाग्रहों से मुक्त खुला दिमाग, सम्यक् चिन्तन तथा प्रकृति के सनातन सिद्धान्तों का सही ज्ञान?